07/06/2026
बहुत पहले, रामानन्द सागर जी की रामायण टेलिविज़न पर आती थी, तब...
गिने चुने घरों में टीवी होते थे, इसलिए रामायण के समय लगभग पूरा मुहल्ला किसी एक, तुलनात्मक रूप से अमीर के घर में, चप्पल खोलकर, पालथी मारकर, हाथ जोड़े बैठ जाता था।
रामायण का इतना क्रेज़ था कि बहुत से लोग वाकई रामराज्य लौट आया समझ अपना घर-द्वारा खुला छोड़ आते थे।
इसी खुले द्वार की आपदा को अपना अवसर बना, चोर लोग घर साफ़ कर दिया करते थे।
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कल कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में कैसी विन-विन सिचूऐशन मिली...
कुछ आंदोलनकारियों के, कुछ अन्य आंदोलनकारियों ने फोन चुरा लिए।
कुछ का फोन तो बच गया पर चार्जर गायब हो गया।
दो लड़के प्रधान से इस्तीफ़ा माँगने के बहाने साथ में कॉकरोच फ़ेस वाला मास्क 15 में छपवाकर 30 में बेचने लगे।
इन्हें देखा-देखी दूसरे ग्रुप ने भी मास्क छपवा लिए, इन्होंने शायद काम्पिटिशन को समझते हुए 20 में बेचना शुरू कर दिया।
एलजीबीटीक्यू समुदाय से भी लोग आए, मिलियन्स व्यूज़ वाली रील्स बनाकर चले गए।
सुनने में ये भी आया कि वहीं किसी ने कोल्ड कॉफी का स्टॉल भी लगाया था।
इसमें सबसे बड़े व्यूज़ लूटर तो कैमराजीवी रहे - इनमें से एक मशरूम जर्नलिस्ट ने 80 साल के बूढ़े से सवाल कर दिया कि आप तो 1947 के प्रोटेस्ट में भी शामिल हुए होंगे? बूढ़े ने भी हिचकते हुए हाँ कह दिया।
ये जर्नलिस्ट कम वाईवा टीचर ज़्यादा थे... किसी से पूछते नीट की फुल फॉर्म बताओ, किसी से पूछते कि बताओ वाइस प्रेसीडेंट कौन है? किसी को बताते कि सौरभ दास को नहीं जानते तो यहाँ आए ही क्यों हो?
ये घी खाए पत्तलकार प्रोटेस्ट के एन्ट्रन्स एगज़ामिनर बने खड़े थे, हम इसीलिए भी प्रोटेस्ट में नहीं जाते कि जनरल नालिज के सवाल न पूछ ले कोई...
लास्ट बट नॉट लीस्ट... स्टार कैम्पैनर अभिजीत दीपके दो घंटे देरी से आए तो आधी पब्लिक उन्हें उनकी ट्विटर डीपी से मैच ही नहीं कर पाई।
फिर भी, देर आयद दुरुस्त, भाषण दिया कि मेरी माँ मुझे अमेरिका भेजने में इतना नहीं रोई जितना अब, मेरे वापस लौटने में रो रही थी कि कहीं मुझे गिरफ़्तार न कर ले कोई। कोई डेढ़ घंटे इनका यही चला, माँ, प्रधान, देश, भ्रष्टाचार... फिर युवा नेता को गर्मी लग गई।
वो घुस गए गाड़ी में... बोले - तुम कन्टिन्यू करो, मैं आता हूँ, मुझे मम्मी के पास जाना है, एक साल से मम्मी से नहीं मिला...
प्रोटेस्टर भी समझ गए कि खेला हो गया है। वो भी सेल्फ़ी-वेलफ़ी लेने के बाद, बाल्टी जैसा टंबलर खत्म होते-होते बोल पड़े कि भाई घर खुला छोड़कर आए हैं, कहीं चोर न घुस जाए... तुम लोग रुको, हम नेक्स्ट टाइम यहीं से कन्टिन्यू करते हैं।