18/07/2026
अति संवेदनशील और अति भावुक व्यक्ति अपनी जिंदगी की परवाह नहीं करता, अपनी इच्छाओं को महत्व नहीं देता। वो दूसरों को खुश करने, उनकी जिंदगी में खुशी लाने के लिए अपना सबकुछ समर्पित भी कर देता है, जीवन जीना तक छोड़ देता है।
लेकिन वो अपनी जिंदगी को दूसरों के लिए सैक्रिफाइस करने की आदत कब और कैसे सीखता है, इसके पीछे जो जीवन का विज्ञान है, इस पर आज चर्चा करेंगे। विज्ञान की भाषा को आम जन की भाषा में लिखना आसान नहीं, फिर भी प्रयास कर रहा हूँ।
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प्रकृति ही संवेदनशील को पैदा करती है लेकिन इतना नासमझ भी पैदा नहीं करती कि अपना भला-बुरा सोच ही न पाए। अपना भला-बुरा न सोच पाने की अक्षमता, अत्यधिक भावुकता, अत्यधिक संवेदनशीलता, हमारे आसपास के खराब माहौल, घर के खराब माहौल और बच्चे के साथ परिवार के सदस्यों के खराब बर्ताव से आती है।
जिस माता-पिता के साथ आप पले-बढ़े जिस परिवार में आपने बचपन गुजारा, उन्होंने ही आपको ट्रॉमा देकर इतना अधिक भावुक बना दिया कि आप अपने वजूद, अपनी इच्छाओं, अपने विचारों को उम्रभर के लिए दूसरों की खुशी के लिए दबाना सीख गए।
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अगर आप बहुत संवेदनशील हैं, बहुत अधिक भावुक हैं, दूसरों को दुखी नहीं देख सकते, उनके दुख को कम करने के लिए अपनी जिंदगी की सारी खुशियाँ कुर्बान करने की भावना रखते हैं, तो यह अच्छी बात है।
लेकिन यह बुरी बात तब है, जब आप यह नहीं समझ पाते कि किसकी मदद करनी चाहिए, किसकी नहीं? बुरी बात तब है जब आप अपनी सीमाएं नहीं जानते कि कहाँ तक किसी के लिए खुद को सैक्रिफाइस करना है?
आप यही सारी कुर्बानी, यही सारा सैक्रिफाइस जब एक नारसिसिस्ट, ढोंगी, ड्रामेबाज, धोखेबाज, झूठा, ठग, प्रपंची के लिए करते हैं, तो यह अच्छी बात नहीं है। क्योंकि तब आप किसी का भला नहीं कर रहे होते हैं, सिर्फ अपना बुरा कर रहे होते हैं।
एक नारसिसिस्ट को खुश करने के लिए आप अपनी एनर्जी, अपनी जिंदगी, अपना वजूद, अपनी इच्छाएं, यह अनमोल मानव जीवन, सबकुछ तबाह कर रहे होते हैं। इस तबाही से निकलने की अपील के साथ, आगे जानिए कि आप इस तरह के स्वभाव के कैसे हो गए?
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आप पहले अपने बचपन में चलिए। आसानी से समझने के लिए हम आपके माता-पिता के बीच झगड़े का उदाहरण लेते हैं। जब आप दो साल की अवस्था से ही माँ-पापा के बीच होते झगड़े देखने लगे थे और घर के खराब माहौल से आप डरने लगे थे। जब आप करीब चार-पाँच साल के हो चुके थे और आपने घर में काफी बातें करनी सीख ली थी।
आपके पापा से झगड़े के बाद माँ रोती हुई उदास जब आपके पास आती थी और आप पूछते थे कि, माँ तुम रोती क्यों हो, चुप हो जाओ। आपकी माँ को अच्छा लगता होगा और वो चुप हो जाती होगी, यह सोचकर कि चलो, मेरा बच्चा मेरे दुख में साथ है।
फिर, पापा से भी आप कहते होंगे, कि पापा, माँ के साथ लड़ाई मत करो। इस पर पापा भी आपसे अपना दुख शेयर करते होंगे। पापा भी खुश होते होंगे कि बच्चा मेरी बात सुन रहा है।
इस तरह से आपके बचपन में आपसे अपना दुख शेयर करने वाले माता-पिता अपना दुख तो कम करते रहे लेकिन अनजाने में वो आपको चाइल्डहुड ट्रॉमा देकर अति-संवेदनशील होने की तरफ ले जाते रहे।
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घर में रोज-रोज हो रहे माँ-पापा के झगड़ों को देखकर आप बड़े हो रहे थे। जब छह-सात साल के हो गए तो थोड़ी सोचने की शक्ति आपकी ज्यादा बढ़ गई। आप सोचने लगे कि कैसे मैं अपने माँ और पापा के बीच के झगड़े को कम करूँ?
कहाँ तो आपको बचपन में माँ और पापा से प्यार मिलना चाहिए था, आपके दुखों के बारे में, आपकी इच्छाओं के बारे में माता-पिता को सजग होकर जानना चाहिए था लेकिन वो तो अपनी लड़ाई में उलझे थे, उनको आपका ख्याल ही कहाँ था?
ऐसे में आपके बाल मन में उठ रही इच्छाएँ अपने आप दबने लगी क्योंकि आपके अंदर यह विचार गहराई से बैठ गया कि अपने माँ-पापा से अपना दुख, अपनी इच्छा न कहकर, उनका दुख सुनूँ, उनको शांत करूँ।
कहाँ तो आपके माता-पिता को आपका अभिभावक बनना था, कहाँ आप ही माता-पिता के अभिभावक बन गए।
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ठीक बचपन के इसी बिंदु से, इसी समय से आपने अपनी जिंदगी, अपनी इच्छाओं, अपने विचारों सबको ताक पर रखना सीख लिया और अपने माता-पिता के बीच के झगड़े को शांत करने, उनके दुखों में उनका मरहम बनने की प्रक्रिया में आप दूसरों के लिए जीने लगे, खुद को छोड़ दिया।
आप थोड़े और बड़े हुए, आठ-नौ साल के हो गए तो जैसे ही माँ और पापा के बीच में कोई लड़ाई शुरू होती तो आप हस्तक्षेप करके शांत करने में लगे। अपने माँ और पापा की बात सुनकर उनको समझाने में लगे।
वो माँ-बाप भी आपके बचपन का सहारा न बनकर, आपको ही अपना सहारा बना लिया और उन्होंने आपके अंदर इस बात का बीज बो दिया कि आपको जीवनभर दूसरों के दुखों में काम आने के लिए खुद को झोंक देना है, अपना दुख किसी से नहीं कहना है।
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अब इसके पीछे जीवन के एक विज्ञान को समझते हैं। किसी भी बच्चे के मानसिक विकास के लिए उसे बचपन में इमोशनल अटैचमेंट चाहिए ही चाहिए, इसी से वो खुद को सुरक्षित महसूस करता है। यह इमोशनल कनेक्शन उसे अपने माता-पिता और परिवार से चाहिए। लेकिन ऐसे संवेदनशील बच्चे को यह नहीं मिलता।
इस इमोशनल अटैचमेंट न मिलने की वजह से उसके अंदर एंजायटी होती है और वो इसे कम करने के लिए अपने माँ-बाप या परिवार के कलह और दुख को कम करने की दिशा में काम करने लगता है क्योंकि इसी से उसका मानसिक असुरक्षा का भाव और तनाव का उथल-पुथल कम होता है।
उसके माँ-बाप भी इसके लिए उसकी तारीफ करते हैं कि अरे, मेरा बच्चा तो इतना समझदार है। इस तरह से बच्चा घर में यह सीखता है कि दूसरों के दुखों को कम करने से ही उसको इमोशनल अटैचमेंट मिलेगा। वो इसके लिए आगे की जिंदगी में भी दूसरों के दुखों को ही देखता-सुनता है, दूसरों को खुश करने के प्रयास करता है।
वो बच्चा पीपुल प्लीजिंग बनता है, किसी को ना नहीं कह पाता। क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करेगा तो उसके अंदर फिर वही एंजायटी होगी जो बचपन में घर के अंदर कलह और दुख को देखकर उसको होती थी।
यहाँ सबसे घातक बात उस बच्चे के लिए यह होती है कि वो अपने दुख को अपने अंदर ही रखता है। यह उसके अंदर खालीपन लाता है। एक भावुक इंसान के अंदर खालीपन और अकेलापन बहुत गहरा होता है।
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इस तरह से अब तक हमने यह समझा कि किसी भी इंसान के अंदर अत्यधिक संवेदनशीलता, भावनात्मक जुड़ाव के लिए दूसरों पर निर्भरता उसके बचपन में ही घर के खराब माहौल से आती है। यह सब उसको दूसरों के दुखों में काम आकर जीने पर निर्भर बनाती है।
ऐसे लोग किसी का भी दुख सुनकर ना नहीं कह पाते। उनको लगता है कि दुख सुनेंगे या दुख में मददगार बनेंगे तो इससे इमोशनल कनेक्शन मिलेगा, वो कनेक्शन जो बचपन में माँ-बाप से मिला ही नहीं।
उसकी इसी आदत और इसी अतिसंवेदनशीलता का गलत फायदा घर के नारसिसिस्ट उठाते हैं, बाहर के लोग भी उसके इस स्वभाव का नाजायज फायदा उठाते हैं, ऐसे अति संवेदनशील हो चुके व्यक्ति को कोई भी इस्तेमाल करके चला जाता है।
जीवनभर ऐसा अति संवेदनशील व्यक्ति किसी न किसी के हाथों इस्तेमाल होता ही रहता है क्योंकि वो दूसरों के दुख को सुनकर ना नहीं कह पाता और उसकी इसी आदत को कोई नारसिसिस्ट बड़ी आसानी से समझ लेता है और उसको शिकार बनाता है।
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राजीव
जज़्बात हेल्प सेंटर
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