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जज़्बात हेल्प सेंटर मानव संवाद और प्रकृति संवाद के जरिए आज के समाज में जी रहे इंसानों के दुखों को समझने और कम करने का छोटा सा प्रयास।
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जीवन के जिस दर्द का दुनिया में कोई इलाज नहीं, उसकी दवा है इंसान का इंसान से अनुभव और भावपूर्ण संवाद। आइए संवाद करें और इंसानों में बढ़ रहे दर्द की दवा बनें।
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फाउंडर, लेखक, संपादक- राजीव
संवाद -9899248782
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कानूनी संवाद
Advocate Muskan 1000 ₹

अति संवेदनशील और अति भावुक व्यक्ति अपनी जिंदगी की परवाह नहीं करता, अपनी इच्छाओं को महत्व नहीं देता। वो दूसरों को खुश करन...
18/07/2026

अति संवेदनशील और अति भावुक व्यक्ति अपनी जिंदगी की परवाह नहीं करता, अपनी इच्छाओं को महत्व नहीं देता। वो दूसरों को खुश करने, उनकी जिंदगी में खुशी लाने के लिए अपना सबकुछ समर्पित भी कर देता है, जीवन जीना तक छोड़ देता है।

लेकिन वो अपनी जिंदगी को दूसरों के लिए सैक्रिफाइस करने की आदत कब और कैसे सीखता है, इसके पीछे जो जीवन का विज्ञान है, इस पर आज चर्चा करेंगे। विज्ञान की भाषा को आम जन की भाषा में लिखना आसान नहीं, फिर भी प्रयास कर रहा हूँ।
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प्रकृति ही संवेदनशील को पैदा करती है लेकिन इतना नासमझ भी पैदा नहीं करती कि अपना भला-बुरा सोच ही न पाए। अपना भला-बुरा न सोच पाने की अक्षमता, अत्यधिक भावुकता, अत्यधिक संवेदनशीलता, हमारे आसपास के खराब माहौल, घर के खराब माहौल और बच्चे के साथ परिवार के सदस्यों के खराब बर्ताव से आती है।

जिस माता-पिता के साथ आप पले-बढ़े जिस परिवार में आपने बचपन गुजारा, उन्होंने ही आपको ट्रॉमा देकर इतना अधिक भावुक बना दिया कि आप अपने वजूद, अपनी इच्छाओं, अपने विचारों को उम्रभर के लिए दूसरों की खुशी के लिए दबाना सीख गए।
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अगर आप बहुत संवेदनशील हैं, बहुत अधिक भावुक हैं, दूसरों को दुखी नहीं देख सकते, उनके दुख को कम करने के लिए अपनी जिंदगी की सारी खुशियाँ कुर्बान करने की भावना रखते हैं, तो यह अच्छी बात है।

लेकिन यह बुरी बात तब है, जब आप यह नहीं समझ पाते कि किसकी मदद करनी चाहिए, किसकी नहीं? बुरी बात तब है जब आप अपनी सीमाएं नहीं जानते कि कहाँ तक किसी के लिए खुद को सैक्रिफाइस करना है?

आप यही सारी कुर्बानी, यही सारा सैक्रिफाइस जब एक नारसिसिस्ट, ढोंगी, ड्रामेबाज, धोखेबाज, झूठा, ठग, प्रपंची के लिए करते हैं, तो यह अच्छी बात नहीं है। क्योंकि तब आप किसी का भला नहीं कर रहे होते हैं, सिर्फ अपना बुरा कर रहे होते हैं।

एक नारसिसिस्ट को खुश करने के लिए आप अपनी एनर्जी, अपनी जिंदगी, अपना वजूद, अपनी इच्छाएं, यह अनमोल मानव जीवन, सबकुछ तबाह कर रहे होते हैं। इस तबाही से निकलने की अपील के साथ, आगे जानिए कि आप इस तरह के स्वभाव के कैसे हो गए?
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आप पहले अपने बचपन में चलिए। आसानी से समझने के लिए हम आपके माता-पिता के बीच झगड़े का उदाहरण लेते हैं। जब आप दो साल की अवस्था से ही माँ-पापा के बीच होते झगड़े देखने लगे थे और घर के खराब माहौल से आप डरने लगे थे। जब आप करीब चार-पाँच साल के हो चुके थे और आपने घर में काफी बातें करनी सीख ली थी।

आपके पापा से झगड़े के बाद माँ रोती हुई उदास जब आपके पास आती थी और आप पूछते थे कि, माँ तुम रोती क्यों हो, चुप हो जाओ। आपकी माँ को अच्छा लगता होगा और वो चुप हो जाती होगी, यह सोचकर कि चलो, मेरा बच्चा मेरे दुख में साथ है।

फिर, पापा से भी आप कहते होंगे, कि पापा, माँ के साथ लड़ाई मत करो। इस पर पापा भी आपसे अपना दुख शेयर करते होंगे। पापा भी खुश होते होंगे कि बच्चा मेरी बात सुन रहा है।

इस तरह से आपके बचपन में आपसे अपना दुख शेयर करने वाले माता-पिता अपना दुख तो कम करते रहे लेकिन अनजाने में वो आपको चाइल्डहुड ट्रॉमा देकर अति-संवेदनशील होने की तरफ ले जाते रहे।
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घर में रोज-रोज हो रहे माँ-पापा के झगड़ों को देखकर आप बड़े हो रहे थे। जब छह-सात साल के हो गए तो थोड़ी सोचने की शक्ति आपकी ज्यादा बढ़ गई। आप सोचने लगे कि कैसे मैं अपने माँ और पापा के बीच के झगड़े को कम करूँ?

कहाँ तो आपको बचपन में माँ और पापा से प्यार मिलना चाहिए था, आपके दुखों के बारे में, आपकी इच्छाओं के बारे में माता-पिता को सजग होकर जानना चाहिए था लेकिन वो तो अपनी लड़ाई में उलझे थे, उनको आपका ख्याल ही कहाँ था?

ऐसे में आपके बाल मन में उठ रही इच्छाएँ अपने आप दबने लगी क्योंकि आपके अंदर यह विचार गहराई से बैठ गया कि अपने माँ-पापा से अपना दुख, अपनी इच्छा न कहकर, उनका दुख सुनूँ, उनको शांत करूँ।

कहाँ तो आपके माता-पिता को आपका अभिभावक बनना था, कहाँ आप ही माता-पिता के अभिभावक बन गए।
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ठीक बचपन के इसी बिंदु से, इसी समय से आपने अपनी जिंदगी, अपनी इच्छाओं, अपने विचारों सबको ताक पर रखना सीख लिया और अपने माता-पिता के बीच के झगड़े को शांत करने, उनके दुखों में उनका मरहम बनने की प्रक्रिया में आप दूसरों के लिए जीने लगे, खुद को छोड़ दिया।

आप थोड़े और बड़े हुए, आठ-नौ साल के हो गए तो जैसे ही माँ और पापा के बीच में कोई लड़ाई शुरू होती तो आप हस्तक्षेप करके शांत करने में लगे। अपने माँ और पापा की बात सुनकर उनको समझाने में लगे।

वो माँ-बाप भी आपके बचपन का सहारा न बनकर, आपको ही अपना सहारा बना लिया और उन्होंने आपके अंदर इस बात का बीज बो दिया कि आपको जीवनभर दूसरों के दुखों में काम आने के लिए खुद को झोंक देना है, अपना दुख किसी से नहीं कहना है।
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अब इसके पीछे जीवन के एक विज्ञान को समझते हैं। किसी भी बच्चे के मानसिक विकास के लिए उसे बचपन में इमोशनल अटैचमेंट चाहिए ही चाहिए, इसी से वो खुद को सुरक्षित महसूस करता है। यह इमोशनल कनेक्शन उसे अपने माता-पिता और परिवार से चाहिए। लेकिन ऐसे संवेदनशील बच्चे को यह नहीं मिलता।

इस इमोशनल अटैचमेंट न मिलने की वजह से उसके अंदर एंजायटी होती है और वो इसे कम करने के लिए अपने माँ-बाप या परिवार के कलह और दुख को कम करने की दिशा में काम करने लगता है क्योंकि इसी से उसका मानसिक असुरक्षा का भाव और तनाव का उथल-पुथल कम होता है।

उसके माँ-बाप भी इसके लिए उसकी तारीफ करते हैं कि अरे, मेरा बच्चा तो इतना समझदार है। इस तरह से बच्चा घर में यह सीखता है कि दूसरों के दुखों को कम करने से ही उसको इमोशनल अटैचमेंट मिलेगा। वो इसके लिए आगे की जिंदगी में भी दूसरों के दुखों को ही देखता-सुनता है, दूसरों को खुश करने के प्रयास करता है।

वो बच्चा पीपुल प्लीजिंग बनता है, किसी को ना नहीं कह पाता। क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करेगा तो उसके अंदर फिर वही एंजायटी होगी जो बचपन में घर के अंदर कलह और दुख को देखकर उसको होती थी।

यहाँ सबसे घातक बात उस बच्चे के लिए यह होती है कि वो अपने दुख को अपने अंदर ही रखता है। यह उसके अंदर खालीपन लाता है। एक भावुक इंसान के अंदर खालीपन और अकेलापन बहुत गहरा होता है।
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इस तरह से अब तक हमने यह समझा कि किसी भी इंसान के अंदर अत्यधिक संवेदनशीलता, भावनात्मक जुड़ाव के लिए दूसरों पर निर्भरता उसके बचपन में ही घर के खराब माहौल से आती है। यह सब उसको दूसरों के दुखों में काम आकर जीने पर निर्भर बनाती है।

ऐसे लोग किसी का भी दुख सुनकर ना नहीं कह पाते। उनको लगता है कि दुख सुनेंगे या दुख में मददगार बनेंगे तो इससे इमोशनल कनेक्शन मिलेगा, वो कनेक्शन जो बचपन में माँ-बाप से मिला ही नहीं।

उसकी इसी आदत और इसी अतिसंवेदनशीलता का गलत फायदा घर के नारसिसिस्ट उठाते हैं, बाहर के लोग भी उसके इस स्वभाव का नाजायज फायदा उठाते हैं, ऐसे अति संवेदनशील हो चुके व्यक्ति को कोई भी इस्तेमाल करके चला जाता है।

जीवनभर ऐसा अति संवेदनशील व्यक्ति किसी न किसी के हाथों इस्तेमाल होता ही रहता है क्योंकि वो दूसरों के दुख को सुनकर ना नहीं कह पाता और उसकी इसी आदत को कोई नारसिसिस्ट बड़ी आसानी से समझ लेता है और उसको शिकार बनाता है।
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राजीव
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नारसिसिस्ट अपने बच्चों के साथ क्या सलूक करते हैं, आज इस पर चर्चा करेंगे। मेरे पिछले लेखों से आपने यह जाना होगा कि नारसिस...
17/07/2026

नारसिसिस्ट अपने बच्चों के साथ क्या सलूक करते हैं, आज इस पर चर्चा करेंगे। मेरे पिछले लेखों से आपने यह जाना होगा कि नारसिसिस्ट अपना झूठा सेल्फ इमेज बनाता है जिसमें उसको लगता है कि दुनिया में उससे बेहतर न कोई है और न कोई हो सकता है।

अपनी इमेज बनाने के लिए वो बन-ठन कर रहने से लेकर कई तरह की काल्पनिक झूठी बातें अपने अंदर गढ़कर बोलता है और दूसरों से अटेंशन पाने के लिए अच्छे व्यवहार के दिखावे से लेकर कई तरह की ऐसी हरकतें करता है कि दुनिया में सब उसके बारे में बातें करें।

वो इस इमेज को बचाने के लिए अपने आसपास के रिश्तेदारों, खासकर अपने लाइफ पार्टनर को कंट्रोल करता है, उसके टैलेंट और वजूद को खत्म कर कमजोर करता है, उसको अपने हितैषियों से अलग कर अकेला करता है और रिश्ते में उसे फंसाने के लिए तरह-तरह के झूठ बोलता है, दुत्कार के बाद तुरंत प्यार का ड्रामा करता रहता है।
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अब, नारसिसिस्ट का उसके बच्चों के साथ व्यवहार समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि वो अपने लाइफ पार्टनर को किसी भी प्रकार से मजबूत नहीं होने देना चाहता। वो पार्टनर को उसके दोस्तों, परिवार के लोगों से दूर कर चुका है। आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से कमजोर कर चुका है।

नारसिसिस्ट को सबसे बड़ा डर यह रहता है कि बच्चा तो साथ ही रहेगा तो फिर कहीं वो बड़ा होकर उसके पार्टनर को सपोर्ट न करने लगें। क्योंकि इससे तो परिवार में नारसिसिस्ट अकेला पड़ जाएगा और वो जिस पार्टनर को कंट्रोल कर रहा है, उसका पलड़ा भारी हो सकता है। इसलिए, वो अपने बच्चे को बचपन से ही अपने फेवर में करने के प्रयास में जुट जाता है।

बच्चे का दिमाग इतना विकसित नहीं होता और वो जो देखता है, उसे जो सिखाया जाता है, उसी की नकल कर सीखता है, वैसा ही व्यवहार करता है। हम इस लेख में आसानी से समझने के लिए मान लेते हैं कि पति नारसिसिस्ट है और पत्नी विक्टिम है। पति अपने बच्चे को बचपन से ही बताना शुरू करता है कि उसकी माँ बुरी है, उसके अंदर ये खराबियाँ हैं, वो ये नहीं जानती है, वो नहीं कर पाती है।

साथ ही, अपने बारे में सिर्फ अच्छाइयाँ बताता है कि देखो, पापा कितने अच्छे हैं, तुम्हारे लिए सबकुछ लाते हैं। वो बच्चे को इशारों-इशारों में यह भी सिखाता है कि माँ तुम्हारी बेकार है, इसके साथ बदसलूकी करो।अगर वो बच्चा माँ से बदसलूकी करता है तो पापा उसको और हौसला देते हैं कि अच्छा किया।
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बच्चा यह देखता है कि माँ दिनभर काम कर रही है, पापा उनको डाँट भी रहे हैं, माँ की कोई वैल्यू नहीं है, पापा ही खिलौने, कपड़े लाकर दे रहे हैं, माँ तो कुछ नहीं दे रही है। यहाँ वो नारसिसिस्ट बच्चे को तरह-तरह से प्रलोभन देकर अपने पक्ष में करता है और बच्चे को यह कहकर मैनिपुलेट करता है कि अगर माँ का साथ दिया तो उसे यह सब कुछ नहीं मिलेगा।

अब, बच्चा भी यह समझ लेता है कि घर में जो हैं, पापा ही हैं, माँ का कोई वजूद नहीं है। उसको यह भी समझ में आ सकता है कि अगर माँ के साथ दुर्व्यवहार वो करेगा तो पापा और ज्यादा खुश होंगे और उसकी जरूरतों की पूर्ति जल्दी होगी। इस तरह से, एक नारसिसिस्ट अपने बच्चे को फेवर में कर विक्टिम को अकेला किए रहता है जो कि उसकी स्ट्रेटजी का हिस्सा है।

इस स्ट्रेटजी का डबल फायदा होता है। माँ यह सोचती है कि अगर इस घर से वो चली जाएगी तो बच्चे को पापा का प्यार नहीं मिलेगा क्योंकि बच्चा तो पापा से बहुत अटैच्ड है। वो मजबूर माँ सोचती है कि वो तो उस बच्चे की जरूरतों को पूरा कर नहीं पाएगी। अगर बच्चे को छोड़कर जाती है तो यह नारसिसिस्ट बच्चे को और खराब बना सकता है। इन्हीं सब सोच में वो और ज्यादा नारसिसिस्ट के साथ रिश्ते में फंसती चली जाती है।
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परिवार के माहौल का बच्चे पर बहुत बड़ा असर होता है। वो नारसिसिस्ट पिता से बचपन से ट्रेनिंग पाकर खुद भी नारसिसिज्म की तरफ जा सकता है और ऐसा होता है। बचपन से एक नारसिसिस्ट से ट्रेनिंग पाया हुआ बच्चा नारसिसिस्ट हो सकता है। लेकिन इसका उल्टा असर भी हो सकता है। बच्चा अत्यधिक सेंसिटिविटी की तरफ भी जा सकता है।

बच्चे के अंदर वही नारसिसिस्ट के अवगुण पनप सकते हैं कि कंट्रोल करके ही दुनिया में जिया जा सकता है, भावनात्मक होना उसे कमजोरी लग सकती है। खराब माहौल की वजह से बच्चे में ऐसे जीन्स भी ट्रिगर हो सकते हैं, जिससे उसमें मेंटल डिसऑर्डर की आशंका बढ़ जाती है। बच्चा अत्यधिक संवेदनशील भी हो सकता है, जो जीवनभर उसको किसी के ऊपर इमोशनली डिपेंड होने की कमजोरी दे सकता है।

निष्कर्ष यही है, एक नारसिसिस्ट हमेशा पार्टनर को अकेला, मजबूर और कमजोर बनाए रखना चाहता है। बच्चे चूँकि परिवार का हिस्सा होते हैं तो उसका सबसे बड़ा डर यही होता है कि यह कहीं उसके पार्टनर का साथ न देने लगे इसलिए बचपन से ही नारसिसिस्ट अपने बच्चे को नारसिसिज्म की ट्रेनिंग देता है। कई मामलों में वो सफल होता है।

अगर पिता नारसिसिस्ट है और उसने बच्चे को ट्रेनिंग दी है तो बच्चा अपनी माँ को कोई वैल्यू नहीं देता, उसके साथ बदसलूकी कर सकता है। अब सवाल यह उठता है कि जो पार्टनर विक्टिम है, वो भी तो बच्चे को अपनी तरफ करने के लिए उसे सिखा सकता है।

हाँ, वो प्रयास करता है लेकिन नारसिसिस्ट की ट्रेनिंग, झूठ, प्रलोभन, बच्चे से प्यार करने के ड्रामे के आगे उस विक्टिम पार्टनर के प्रयास असफल हो सकते हैं। क्योंकि अगर पिता नारसिसिस्ट है, वहाँ बच्चा तो यह देखता है कि उसके पापा तो बहुत प्यार करते हैं और उसे अपनी माँ की बातें ही झूठी लगती हैं।
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एक दूसरी परिस्थिति पर विचार करते हैं कि अगर बच्चा बड़ा होकर सबकुझ समझने लगे, संवेदनशील निकले और अपने नारसिसिस्ट पिता को समझकर माँ के दर्द को महसूस करने लगे, उसके पक्ष में जाने लगे तो क्या होता है?

फिर वही होता है, नारसिसिस्ट अपने असली अत्याचारी, जुल्मी रूप में आता है और बच्चे को डरा-धमकाकर उसको भी हर तरह से कमजोर करता है। इसमें कई बच्चे मानसिक रूप से बीमार भी हो सकते हैं। एक नारसिसिस्ट के साथ पला बच्चा बहुत ज्यादा सेंसिटिव भी हो सकता है और बहुत बड़ा नारसिसिस्ट भी।

दोनों ही परिस्थितियों में वो मानसिक रूप से कमजोर और ट्रॉमा का शिकार होता है। अगर बच्चा सेंसिटिव हुआ तो इमोशनल कनेक्शन के लिए वो दूसरों पर जीवनभर के लिए डिपेंड हो सकता है, आगे चलकर फिर किसी नारसिसिस्ट के चंगुल में फंस सकता है। अगर वो बच्चा नारसिसिस्ट हुआ तो दूसरों के जीवन को कंट्रोल कर जीने वाला ड्रैकला हो सकता है।
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बच्चा अत्यधिक सेंसिटिव हुआ तो विक्टिम के लिए यह राहत की बात हो सकती है लेकिन घर में वो बच्चा बलि का बकरा बनता है। नारसिसिस्ट अपनी सारी भड़ास अब उस बच्चे पर निकालता है और उसको भी प्रताड़ित करता है। वो बच्चा घर में ही मानसिक रूप से हमेशा तनावभरा जीवन जीता है।

अगर, वो बच्चा नारसिसिस्ट हुआ तो विक्टिम पर जुल्म दोगुना हो जाता है. जीने की परिस्थितियाँ बदतर हो जाती हैं, एक बच्चे से जो जीने की उम्मीद थी, वो भी खत्म हो जाती है। उस परिस्थिति में हम और आप उस विक्टिम की जिंदगी के दुखों की कल्पना नहीं कर सकते।
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राजीव
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क्या आपका टैलेंट, आपके सपने किसी नारसिसिस्ट के साथ टॉक्सिक रिलेशनशिप को बचाने के चक्कर में नष्ट हो गए, इतना नष्ट कि आप ख...
16/07/2026

क्या आपका टैलेंट, आपके सपने किसी नारसिसिस्ट के साथ टॉक्सिक रिलेशनशिप को बचाने के चक्कर में नष्ट हो गए, इतना नष्ट कि आप खुद को पहचान न पाए कि आप क्या थे और क्या हो गए?

जी, यह एक संवेदनशील प्रतिभावान व्यक्ति के जीवन का बहुत कड़वा सच है कि जब वो किसी नारसिसिस्ट के साथ अटैचमेंट बचाने के लिए अपने वजूद के साथ समझौता और सौदा करता है तो वो अपनी जिंदगी को ऐसी बर्बादी की तरफ ले जाता है कि बरसों बाद आईने में अपनी सूरत भी अजनबी सी लगती है।
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लेकिन, चतुर नारसिसिस्ट अपने फर्जी गढ़े हुए बनावटी विशाल सेल्फ इमेज से समझौता नहीं करता। वो अपने सामने किसी को बड़ा होते देख ही नहीं सकता, यह उसकी बर्दाश्त से बाहर है कि अगर उसके साथ रहने वाला शख्स बेहतर हो गया, बड़ा हो गया तो उसके अपने सेल्फ इमेज का क्या होगा।

वो तो उसकी नजर में छोटा हो जाएगा जिसको वो कंट्रोल कर रहा है, फिर वो उसका शोषण कैसे कर पाएगा। वो जिस झूठे इमेज के सहारे जी रहा है, उसको कैसे बचा पाएगा? और अगर उसका बनावटी सेल्फ इमेज ही अपने लाइफ पार्टनर से कमतर हो गया तो वो जीते-जी मर जाएगा।

इसलिए, वो अपने संवेदनशील प्रतिभाशाली पार्टनर को अपनी जिंदगी के लिए खतरा मान बैठता है और उसकी प्रतिभा पर हमला करता है। उसे वो कुछ करने नहीं देता, घर बिठा देता है। रहो, यहाँ, तुमको मैं सबकुछ लाकर दूँगा, तुमको कुछ भी करने की जरूरत नहीं।

जॉब करने वाले पार्टनर की जॉब छुड़वा दी जाती है, पढ़ाई करने वाले पार्टनर की पढ़ाई छुड़वा दी जाती है। अगर पार्टनर कमाता है तो उसके सारे पैसे हड़पने की तरकीबें निकालता रहता है। यह सब नारसिसिस्ट अपने पार्टनर का कद छोटा करने और अपने बनावटी सेल्फ इमेज को छोटा होने से बचाने के लिए करता है।
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यहाँ सबसे बड़ी समस्या नारसिसिस्ट के सामने यह आती है कि पार्टनर को दूर भी नहीं जाने देना है क्योंकि वो अकेला नहीं रह सकता, उसे हमेशा कोई पास में चाहिए जिस पर वो चीख सके, चिल्ला सके, अपनी सत्ता चला सके, उससे अटेंशन पा सके, उसका भावनात्मक शोषण कर सके, उससे अपनी हवस बुझा सके।

इसके लिए वो दिमाग लगाता है और वो बीच-बीच में प्यार करने का नाटक कर अपने पार्टनर को फंसाए भी रखता है, कंफ्यूजन में डाले रखता है। यही नहीं, नारसिसिस्ट सारी हदें पारकर किसी तीसरे को बीच में ले आता है ताकि पार्टनर ही इनसिक्योर फील करे।

एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से लेकर वो आसपास के लोगों को पार्टनर से बेहतर बताता है। अब संवेदनशील पार्टनर को तो इमोशनल अटैचमेंट चाहिए, इसलिए घबराकर और ज्यादा अटेंशन, और ज्यादा प्यार, और ज्यादा समर्पण लुटाने लगता है।
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एक संवेदनशील पार्टनर को यह मालूम ही नहीं कि नारसिसिस्ट इमोशन्स के चक्कर में नहीं पड़ता। नारसिसिस्ट भावनात्मक जुड़ाव को कमजोरी मानता है, इसी कमजोरी का फायदा तो वो संवेदनशील से ले रहा है। फिर वो कैसे खुद उसी कमजोरी का शिकार होगा?

न, नारसिसिस्ट कभी किसी से प्यार नहीं कर सकता। इमोशनल कनेक्शन उसकी नजर में एक कमजोरी है। एक नारसिसिस्ट हमेशा मजबूत और महान होने की फैंटेसी को जीता है, वो यह कमजोरी भूलकर भी नहीं पालता।
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मैंने कई टैलेंटेड लोगों को नारसिसिस्ट के साथ रिलेशनशिप में अपनी प्रतिभा को तबाह करते देखा है। ऐसे लोग जिनको युवावस्था में कहा जाता था कि वो जीवन में आगे बहुत कुछ करेंगे, वो एक नारसिसिस्ट के साथ रिश्ते में आने के बाद जीवन में कुछ नहीं कर पाए। उनकी जिंदगी बर्बादी की किताब बनकर रह गई।

एक फर्जी, झूठे, बनावटी इंसान के साथ रिश्ते को बचाने में एक संवेदनशील अपना जीवन झोंक देता है, अपना असली वजूद नष्ट कर लेता है। जबकि उसे अपना वजूद बचाना चाहिए, झूठा रिश्ता नहीं। लेकिन, इमोशनल अटैचमेंट पाने के लिए वो अपना वजूद दाँव पर लगाता है और उसे भी हार जाता है।

वहीं दूसरी तरफ, उस नारसिसिस्ट के पास न तो अपना वजूद है और न ही भावनात्मक गहराई। उसके पास है तो एक खुद का गढ़ा हुआ फेक सेल्फ इमेज, जिसको वो दुनिया के लोगों के सामने दिखाता है।

अंदर से वो खोखला, कमजोर, इनसिक्योर और हर नजरिए से बेकार इंसान होता है, लेकिन बाहर ऐसे दिखाता है, ऐसी डींगें हांकता है कि जैसे उसके जैसा दुनिया में कोई नहीं, उसके लेवल का इंसान दुनिया में कोई नहीं।
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एक ऐसे घटिया इंसान के लिए एक संवेदनशील अपना वजूद, अपनी भावनात्मक गहराई, अपनी प्रतिभा, अपनी जिंदगी, अपना सबकुछ नष्ट कर लेता है। वो जीवनभर एक नारसिसिस्ट को अबूझ पहेली मानकर सुलझाने का प्रयास करता रहता है।

वो तरह-तरह से अपने मन में विश्लेषण करता रहता है कि आखिर उसका लाइफ पार्टनर अच्छा है कि बुरा है। वो अपने नारसिसिस्ट पार्टनर के व्यवहार को समझने में लगा रहता है और जीवनभर उसे इसका जवाब नहीं मिलता।

केयर तो बहुत करता है लेकिन मुझे आगे क्यों नहीं बढ़ने देता? मुझे संरक्षण तो देता है लेकिन मुझे सशक्त क्यों नहीं करता? एक दिन तो ऐसा लगता है कि इससे बड़ा कोई शैतान नहीं, अगले दिन ऐसा लगता है कि इससे बड़ा कोई इंसान नहीं, ऐसा क्यों है?

मुझे यह किसी से मिलने क्यों नहीं देता, कहता है कि तुमको बुरे लोगों से बचा रहा हूँ? मुझसे इतना प्यार करता है तो मुझे कैद में क्यों रखता है? बाकी लोगों की तारीफें करता है लेकिन मेरे परिवार, मेरे दोस्तों की इतनी बुराई क्यों करता है?

अगर आपके अंदर भी ऐसे सवाल हैं तो समझ लीजिए कि आप शायद एक नारसिसिस्ट के साथ जी रहे हैं और जीवन आपका बर्बादी की ओर चला जा रहा है। जीवन एक बार ही मिलता है, इसका उपयोग किसी नारसिसिस्ट के चक्कर में बर्बाद न करें। नारसिसिस्ट आपका पार्टनर ही नहीं, परिवार में कोई और करीबी रिश्तेदार भी हो सकता है। उनके स्वभाव के प्रति जागरूक बनें और खुद को उनसे बचाएं।
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राजीव
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आज नारसिसिस्ट के चक्रव्यूह में फंसने और बरसों तक उससे न निकल पाने के पीछे जीवन के विज्ञान की चर्चा करेंगे। मेरे लेख अब त...
15/07/2026

आज नारसिसिस्ट के चक्रव्यूह में फंसने और बरसों तक उससे न निकल पाने के पीछे जीवन के विज्ञान की चर्चा करेंगे। मेरे लेख अब तक हो चुके रिसर्च से मिले वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होते हैं लेकिन इसे मैं आम जन की भाषा में लिखता हूँ।
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आइए सबसे पहले अपने बचपन में चलते हैं। जब हम जन्म लेते हैं तो उस वक्त हम अपनी सुरक्षा के लिए माता-पिता या परिवार के लोगों पर निर्भर होते हैं। एक इंसानी बच्चे को सुरक्षा महसूस करने के लिए अनकंडिशनल लव जिसको हिंदी में सच्चा प्यार कहते हैं, कोई शर्त होती नहीं प्यार में, वाले प्यार की जरूरत होती है।

यह सिर्फ बचपन में ही नहीं, आगे की जिंदगी में हम ऐसे प्यार की तलाश करते हैं क्योंकि इमोशनल कनेक्शन इंसान की मूलभूत प्राकृतिक जरूरत है। हमारी सुरक्षा की अनुभूति आजीवन किसी से भावनात्मक जुड़ाव पर टिकी होती है।
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लेकिन जब किसी बच्चे को बचपन में यह सच्चा भावनात्मक जुड़ाव घर में माता-पिता या परिवार से नहीं मिलता तो वो असुरक्षित महसूस करता है और उसके अंदर असुरक्षित होने की अनुभूति लगातार उसे स्ट्रेस देने लगती है। संवेदनशील लोगों में यह स्ट्रेस बहुत ज्यादा होता है और उसके नर्वस सिस्टम को यह अति संवेदनशीलता की तरफ ले जाता है।

ऐसा संवेदनशील इंसान जो अंदर से इनसिक्योरिटी और डर में जी रहा है, वो सिक्योरिटी फीलिंग के लिए किसी इंसान से इमोशनल कनेक्शन की तलाश करने लगता है। इसी दौरान हो सकता है कि किसी नारसिसिस्ट की नजर उस पर पड़ जाए और आकर वो अपना दुखड़ा भी सुनाए और खूब सारी प्यार भरी बातें भी करने लगे।

इस बात-मुलाकात में उस संवेदनशील इंसान को अच्छा महसूस होता है, उसका नर्वस सिस्टम शांत होता लगता है, उसकी इनसिक्योरिटी फीलिंग कम होती महसूस होती है और उसको लगता है कि अरे, यही तो है वो सच्चा प्यार, सच्चा भावनात्मक जुड़ाव जिसकी तलाश में भटक रहा था।

उसके अंदर ऑक्सिटॉसिन और डोपामाइन हार्मोन छूटते हैं, साथ ही स्ट्रेस हार्मोन्स जैसे कोर्टिसोल का लेवल कम होता जाता है। यही हार्मोनल बदलाव संवेदनशील इंसान को उस नारसिसिस्ट से इमोशनली कनेक्ट कर देता है।
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धीरे-धीरे नारसिसिस्ट की प्यार भरी बातों से संवेदनशील के अंदर डोपामाइन हार्मोन छूटते रहते हैं और यहाँ उस नारसिसिस्ट से बात-मुलाकात की इच्छाएँ और ज्यादा तीव्र होने लगती हैं क्योंकि डोपामाइन मोटिवेशन का हार्मोन है। और-और की रटन लगाता जाता हर पीने वाला, ये दिल माँगे मोर।

नारसिसिस्ट खुद बहुत बड़ा इनसिक्योर इंसान होता है लेकिन वो अपनी इनसिक्योरिटी को छुपाने के लिए अच्छाई और मजबूती का मुखौटा लगाए रहता है। उसे अपने रिश्ते में आए लोगों को कंट्रोल करना होता है कि ये कही छोड़ न जाए।

इसके लिए वो सबसे पहले विक्टिम को अपने ऊपर इमोशनली डिपेंडेंट बनाता है, उसे दोस्त, हितैषी, परिवार सबसे दूर करता है ताकि उसकी जिंदगी में सिर्फ वो बचा रहे। वो उस संवेदनशील इंसान को यकीन दिलाता है दुनिया में सिर्फ वो उसका भला चाहता है, बाकी सब उसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

जब संवेदनशील इंसान इमोशनली डिपेंड और अकेला हो जाता है तो यहाँ से नारसिसिस्ट के चक्रव्यूह का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। वो अपना कंट्रोल मजबूत करने के लिए उस संवेदनशील इंसान को नीचा दिखाना, उसके साथ बदसलूकी करना और उसे इग्नोर करना शुरू करता है।

इससे उस संवेदनशील को झटका लगता है। उसके अंदर फिर वही इनसिक्योरिटी फीलिंग आने लगती है, नर्वस सिस्टम अशांत होने लगता है, स्ट्रेस हार्मोन्स की बाढ़ उसके अंदर आती है। उसके सोचने की क्षमता प्रभावित हो जाती है और मन में विरोधी विचार चलने लगते हैं।

उसे लगता है कि इतना प्यार करने वाला इतना बुरा कैसे हो सकता है? वो सोचता है कि नहीं, नहीं, सब ठीक हो जाएगा, हो सकता है कि मेरी ही गलती हो। नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता वो बुरा नहीं हो सकता। वो अब नारसिसिस्ट के जुल्म के पीछे की वजहें खोजने में लगता है, उससे बचने या दूर जाने का ख्याल बिल्कुल नहीं आता।
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संवेदनशील इंसान नारसिसिस्ट की बदसलूकी को अपनी गलती मानता है और उसके साथ रिश्ता बनाने और चलाने का प्रयास करता है क्योंकि वो इमोशनली उस पर डिपेंड है। उसे अपना सच्चा प्यार, अनकंडिशनल लव मानता है।

नारसिसिस्ट के किए अच्छे व्यवहार के अहसान तले वो दबा रहता है और अपने विचारों को ही गलत ठहराता है। मन बार-बार उस नारसिसिस्ट से प्यार पाने के लिए फिर से तरसने लगता है। नारसिसिस्ट का जुल्म सहते हुए उस प्यार का इंतजार करने लगता है।

कुछ दिन इस तरह की दुत्कार के बाद नारसिसिस्ट उस संवेदनशील को पुचकारने चला आता है, फिर से वही प्यार बरसाना शुरू करता है। इस वक्त तक संवेदनशील का स्ट्रेस लेवल बहुत बढ़ा होता है और अचानक प्यार मिलने पर उसका नर्वस सिस्टम थोड़ा शांत होता है। वो सोचता है कि चलो, अब सब ठीक हो गया। वो अपनी उस सोच पर भी पछताता है जिसमें उसने नारसिसिस्ट के बारे में कुछ बुरा सोचा था।

लेकिन, कुछ दिन बाद नारसिसिस्ट दुत्कारना शुरू करता है तो इस बार वही जस्टिफाई करने की सोच का चक्र संवेदनशील के मन में फिर से शुरू होता है। उसे लगता है कि वो अगर अपनी तरफ से उसे खुश करने के लिए सबकुछ करे, उसे बहुत प्यार दे तो शायद वो सुधर जाएगा, ठीक हो जाएगा। इसी प्रयास में संवेदनशील इंसान उस नारसिसिस्ट के पुचकार-दुत्कार के चक्रव्यूह में फंसता चला जाता है।
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लगातार उस संवेदनशील इंसान को नारसिसिस्ट के पुचकार और दुत्कार की आदत लगती चली जाती है और उसे लगता है कि ऐसा होता रहता है। एक दिन सब ठीक हो जाएगा और इस तरह से बरसों गुजरते रहते हैं। महीने में एक सप्ताह के प्यार के लिए वो संवेदनशील बाकी तीन सप्ताह जुल्मो-सितम झेलता रहता है।

दरअसल, इमोशनल डिपेंडेंसी के साथ-साथ इसमें एक और विज्ञान काम करता है कि मेरा चुनाव गलत नहीं हो सकता। जब संवेदनशील उस नारसिसिस्ट से इमोशनली कनेक्ट हुआ था तो यह उसी का चुनाव था। अब नारसिसिस्ट के दुर्व्यवहार को सहकर भी वो खुद अपने फैसले को जस्टिफाई करना चाहता है। वो बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उससे गलती हो सकती है।

दूसरा विज्ञान यह भी है, कि इसको छोड़कर कहाँ जाएंगे? अगर दूसरा भी ऐसा ही निकला या इससे भी खराब निकला तो क्या करेंगे, इससे बेहतर जो है, यही सही है, इसी को सुधारो, इसी के साथ निबाहने का प्रयास करो। इस तरह की सोच संवेदनशील के अंदर हावी रहती है और वो नारसिसिस्ट के जुल्म को बर्दाश्त करने की आदत लगा लेते हैं।
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जब तक जवानी रहती है तब तक आप बहुत कुछ सह सकते हैं, बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन जब उम्र 40 पार जाती है तो हमारा शरीर अब प्राकृतिक तौर पर उतना सहनशील नहीं रह जाता। तो बरसों नारसिसिस्ट का जुल्म बर्दाश्त कर रहे लोग भी इस उम्र तक आते-आते बहुत ही टूट जाते हैं क्योंकि शरीर और मन दोनों ही कमजोर हो जाते हैं।

अब वो सहने की ताकत नहीं रहती है। इसलिए ज्यादातर संवेदनशील लोग नारसिसिस्ट के साथ बीस से तीस साल निकाल ले जाते हैं लेकिन फिर कहते हैं कि बचाओ, बचाओ, अब और नहीं, अब और नहीं...। इस उम्र तक आते-आते उस संवेदनशील इंसान की जीने की इच्छा मर जाती है, उसे यह समझ में आ जाता है कि अब इस नारसिसिस्ट को नहीं सुधार सकते तो बचने का रास्ता तलाशने लगते हैं।

लेकिन, नारसिसिस्ट के पुचकार और दुत्कार के चक्रव्यूह में फंसा इंसान आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, शारीरिक और मानसिक तौर पर इतना कमजोर हो चुका होता है कि वो यह सोचने के काबिल नहीं होता कि अब इस चक्रव्यूह और नारसिसिस्ट के चंगुल से कैसे निकलें।
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यह चक्रव्यूह एक संवेदनशील के लिए ठीक जुए की लत की तरह काम करता है जिसमें बार-बार हार के बीच-बीच में कभी-कभी जीत हासिल होती है और जुआरी खेल खेलता चला जाता है, आखिर में वो सबकुछ हार जाता है।
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राजीव
जज़्बात हेल्प सेंटर
098992 48782

नारसिसिस्ट स्टेप बाय स्टेप ट्रिक्स अपनाकर अति संवेदनशील लोगों को कंट्रोल करता है और उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता ...
14/07/2026

नारसिसिस्ट स्टेप बाय स्टेप ट्रिक्स अपनाकर अति संवेदनशील लोगों को कंट्रोल करता है और उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है।

आज जीवन के विज्ञान में हम उन ट्रिक्स को भी एक-एक कर समझेंगे कि एक नारसिसिस्ट कहाँ से शुरुआत करता है और कहाँ जाकर वो खत्म करता है।

संवेदनशील लोगों को ऐसी जानकारी होनी बहुत जरूरी है क्योंकि जब वो किसी के साथ रिश्ते में जाएँगे तो यह तो नहीं कहेंगे कि जाओ, साइकिएट्रिस्ट से पहले नारसिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर चेक कराओ।

व्यावहारिक तौर पर यह संभव नहीं। इसलिए जानकारी भी बचाव हो सकती है।
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नारसिसिस्ट पुरुष या स्त्री कोई भी हो सकते हैं। सबसे पहले तो नारसिसिस्ट बहुत ही मीठा, अच्छा, आदर्श तरीके से व्यवहार करता है, बहुत प्यार और स्नेह से बात करता रहता है।

वो हर तरह से आपकी केयर और आपको खुश रखने का प्रयास करता है ताकि आप धीरे-धीरे उनको अच्छा मानने लगें और उनसे रिश्ते के लिए आपके अंदर एक तड़प या निर्भरता बन जाए।

जैसे आप जब भी खाली हों, तब उसी का ख्याल आए कि चलो, उससे बात कर लेते हैं। जब नारसिसिस्ट को यह भरोसा हो जाता है कि आप उनके साथ रिश्ते के लिए तड़प रहे हैं तो वो अपने दूसरे स्टेप पर आता है।
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अब वो आपके आचार-व्यवहार-विचार-पहनावे-खानपान से लेकर आपकी पर्सनैलिटी से जुड़ी हर चीज पर निगेटिव कमेंट्स करना शुरू करता है और आपको कंट्रोल करने के लिए आपकी हर गतिविधि पर अपना आदेश देने लगता है कि मेरे हिसाब से चलो, मैं जैसा कहता हूँ, करो।

जब आपको बुरा लगता है तो वो आपको इग्नोर करने लग जाता है और यह जताता है कि बात नहीं मानोगे तो रिश्ता भी नहीं रहेगा। चूँकि, आप भावनात्मक रूप से नारसिसिस्ट पर निर्भर हो चुके होते हैं तो आप ये सोचकर डरने लगते हो कि ये मुझे छोड़ देगा तो जीना मुश्किल हो जाएगा और आप उनकी बात मानने पर मजबूर हो जाते हैं।

इसके लिए अपने अंदर यह जस्टिफिकेशन पालते हैं कि मेरी ही भलाई के लिए कह रहा है। वो यह भी जताता रहता है कि ये सब मैं तुम्हारे फायदे के लिए ही कह रहा हूँ। जब आप उसके कहे अनुसार चलने लगते हैं तो वो अपने तीसरे स्टेप पर आता है।
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नारसिसिस्ट अगले स्टेप के तौर पर आपके वजूद, आपका आत्मविश्वास और आपकी सोच को कमजोर करने पर काम करता है। इसकी वजह यह होती है कि आप भी नारसिसिस्ट को थोड़ा-थोड़ा पहचानने लगते हैं और उसकी बातों का विरोध करने लगते हैं।

नारसिसिस्ट अपना विरोध या अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि उसको हमेशा दूसरों से प्रशंसा चाहिए, यही उसके जीवन का खाद-पानी है। वो आपके हर विरोधी तेवर को कुचल देना चाहता है। इसके लिए, वो आपकी हर बात पर कुछ न कुछ ऐसा कहता है कि आप अपनी सोच पर शक करने लगें।

आपको वो सेल्फ डाउट करने की आदत में ले जाता है जहाँ आप अपनी हर सोच पर संदेह करते हैं कि कहीं मैं ही तो गलत नहीं हूँ। यह दरअसल, आपके डर का एक दुष्परिणाम होता है। जब हम अंदर से डरे हुए होते हैं तो तार्किक रूप से ठीक से सोच नहीं पाते हैं और भावनात्मक रूप से काफी उथल-पुथल में जीते हैं।

अपनी सोच पर शक करने की वजह से आप और ज्यादा नारसिसिस्ट के कंट्रोल में जाते हैं कि आपको लगता है कि वो ही सही है, मैं ही गलत हूँ। आपका आत्मविश्वास बहुत कम हो जाता है, आप हीन भावना के शिकार होकर जीने लगते हैं और नारसिसिस्ट के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचने लगते हैं।
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इसके अगले स्टेप के तौर पर, वो आपको परिवार और समाज से आइसोलेट या आपका अलगाव करता है। वो अब आपके बारे में लोगों को तरह-तरह की निगेटिव बातें कहता है कि अरे, वो तो ऐसे जीती है, ऐसे सोचती है, कैरेक्टरलेस है, कुछ नहीं आता है, परेशान करके रखा है, मेंटल है।

परिवार और समाज के लोगों में वो आपके खिलाफ जहर भरता है और वो लोग उसकी बातों पर विश्वास भी करते हैं। आप कितनी भी सफाई देंगे, वो लोग आप पर भरोसा नहीं करेंगे।

लोगों का अलगाव दो लेवल पर होता है, एक तो नारसिसिस्ट आपके बारे में निगेटिव बातें फैलाकर लोगों को अलग करता है, दूसरी ओर आप भी मानसिक रूप से इतने परेशान हो जाते हैं कि किसी से मिलना-जुलना छोड़ देते हैं।

आपका यह अलगाव नारसिसिस्ट का आप पर कंट्रोल को और मजबूत कर देता है।
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अब वो आपके साथ हर तरह की जबरदस्ती करता है, आपके साथ बदसलूकी और बदतमीजी करता है, गाली-गलौज और मारपीट करता है लेकिन फिर भी आप सोचते हैं कि इसके बिना जीवन की कल्पना ही मुश्किल है, अब जाएँ तो जाएँ कहाँ।

नारसिसिस्ट आपको आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक रूप से इतना तोड़कर रख देता है कि आप विरोध, प्रतिरोध के लायक ही नहीं रह जाते हैं। खुद को मजबूर, लाचार मानते हैं और गिल्ट, डिप्रेशन वगैरह में जीते हुए यही सोचते रहते हैं कि क्या इस नरक से निकलने का कोई रास्ता है और कोई रास्ता नजर नहीं आता।

नारसिसिस्ट हमारे शरीर से होते हुए, हमारी भावनाओं, हमारी बुद्धि और हमारी आत्मा सबको नोंचकर जिंदा रहने वाला हैवान है।
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नार्सिसिस्ट ऐसा शैतान है जो न केवल आपका अपहरण करता है, बल्कि आपके अस्तित्व और आपकी शक्ति का भी अपहरण कर लेता है। वह आपको इतना कमज़ोर, अकेला, असहाय और डिफेंसलेस बना देता है कि आप सुरक्षा के लिए भी उसी ज़ुल्मी पर निर्भर रहने लगते हैं।

जब उसे लगता है कि आप बिल्कुल खत्म हो रहे हैं, तब वह आपको कुछ देर के लिए प्यार भी जताता है ताकि आपका उससे लगाव बना रहे और आपकी यह उम्मीद कायम रहे कि इस अंधेरी रात की कभी तो सुबह होगी; लेकिन वह सुबह कभी नहीं आती। हर रोज़ एक उम्मीद ही है जो उस संवेदनशील इंसान को नरक में ज़िंदा रखती है और नार्सिसिस्ट से जोड़े रखती है।

यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें ज़ुल्म भी किया जाता है और बीच-बीच में पल भर के लिए झूठा प्यार भी जताया जाता है, जिससे इस चक्रव्यूह से निकलना विक्टिम के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।
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भारत में मानसिक बीमारियों का सामना करने वाले 60 प्रतिशत लोग 35 वर्ष से कम उम्र के युवा हैं। यह आंकड़ा यह साफ करता है कि ...
14/07/2026

भारत में मानसिक बीमारियों का सामना करने वाले 60 प्रतिशत लोग 35 वर्ष से कम उम्र के युवा हैं। यह आंकड़ा यह साफ करता है कि युवा मानसिक संकट से गुजर रहे हैं। इसमें कामकाजी पेशेवर, कॉलेज के छात्र और स्कूली बच्चे तक शामिल हैं। इन मानसिक बीमारियों की शुरुआत बहुत शुरुआती उम्र में हो जाती है। अधिकांश मामलों में लक्षण किशोरावस्था के दौरान या 19 से 20 वर्ष की आयु के आसपास ही उभरने लगते हैं।
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भारत में प्रति 1 लाख आबादी जिसमें औसतन 10,000 से 15,000 मानसिक रोगी हो सकते हैं, उन पर 1 से भी कम (लगभग 0.75) मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। भारत में मानसिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की सबसे बड़ी कमी यह है कि यहाँ 70 से 80 प्रतिशत लोगों को समय पर इलाज, थेरेपी या चिकित्सीय परामर्श मिल ही नहीं पाता। लक्षण दिखने और डॉक्टर के पास पहुँचने के बीच वर्षों का अंतर होता है, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है। इसके पीछे के कारणों का जब मनोचिकित्सकों और समाजशास्त्रियों ने विश्लेषण किया, तो कई ऐसी वजहें सामने आए जो आधुनिक जीवनशैली और सामाजिक बदलावों से सीधे जुड़े हैं।
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आज का युवा चौबीसों घंटे इंटरनेट और सोशल मीडिया से घिरा हुआ है। स्क्रीन टाइम बढ़ने के कारण न केवल नींद प्रभावित हुआ है, मानसिक तनाव भी बढ़ा है। सोशल मीडिया पर दूसरों की 'परफेक्ट लाइफ' को देखकर युवाओं में 'फोमो' (FOMO - Fear of Missing Out) और हीन भावना पैदा हो रही है। साइबरबुलिंग, ट्रोलिंग और डिजिटल दुनिया में खुद को साबित करने की होड़ ने एंग्जायटी (चिंता) और डिप्रेशन (अवसाद) को कई गुना बढ़ा दिया है।
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भारत में प्रतिस्पर्धा का स्तर बेहद ऊंचा है। स्कूल की बोर्ड परीक्षाओं से लेकर आईआईटी, नीट, यूपीएससी और कॉर्पोरेट नौकरियों तक, हर जगह एक गलाकाट प्रतियोगिता है। माता-पिता और समाज की उम्मीदों का बोझ युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है। असफलता का डर और भविष्य की अनिश्चितता उन्हें हर वक्त तनाव में रखती है।
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संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवारों के बढ़ने से युवाओं के पास अपनी भावनाएं साझा करने के लिए लोग कम हो गए हैं। महानगरों में अकेले रहने वाले कामकाजी युवाओं में अकेलापन एक महामारी की तरह फैल रहा है। डिजिटल रूप से हजारों दोस्तों से जुड़े होने के बावजूद, संकट के समय बात करने के लिए उनके पास कोई इंसान नहीं होता।
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आज भी भारत के बड़े हिस्से में मानसिक बीमारी को 'पागलपन' से जोड़कर देखा जाता है। यदि किसी व्यक्ति को बुखार या डायिबिटीज हो, तो वह तुरंत डॉक्टर के पास जाता है। लेकिन यदि कोई उदासी, घबराहट या लगातार आ रहे नकारात्मक विचारों से परेशान हो, तो समाज उसे "कमजोर दिल का" या "नाटक करने वाला" करार दे देता है। लोग इस डर से साइकियाट्रिस्ट या काउंसलर के पास नहीं जाते कि "लोग क्या कहेंगे" या उनके करियर और शादी-ब्याह पर इसका असर पड़ेगा। यही छुपाने की प्रवृत्ति बीमारी को उस स्तर पर ले जाती है जहाँ से वापसी मुश्किल हो जाती है।
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लेख इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) के राष्ट्रीय सम्मेलन (ANCIPS) में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट पर आधारित है।

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