13/08/2021
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध
चित्त क्या होता है-सरल अर्थों में कहें तो चित्त का अर्थ होता है जहां हमारे विचार जन्मते हैं, बनते हैं और जमे रहते हैं संस्कारों के रूप में। चित्त एक प्रकार की भूमि है जहां विचार जन्मते हैं और यह चित्त रूपी भूमि भी पांच प्रकार की होती है।
1.क्षिप्त
2. विक्षिप्त
3. मूढ़
4.एकाग्र एवं
5. निरुद्ध
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि योग केवल चित्त की एकाग्र एवं निरुद्ध अवस्था में ही संभव है।
अब समझते हैं वृत्ति क्या है-वृत्ति एकवचन न होकर बहुवचन में प्रयोग होता है, इसका अर्थ है वृत्ति एक नहीं अपितु एक से अधिक होती हैं। चूंकि आगे के सूत्रों में महर्षि पतंजलि ने स्वयं वृत्तियों के विषय में चर्चा की है इसलिए अभी इतना ही समझें कि हमारे भीतर उठने वाली विचार रूपी तरंगों या मन के क्रियाकलाप को जो कि पांच प्रकार से विभाजित है उसे वृत्तियाँ कहते हैं।
अब सूत्र का अंतिम एवं महत्वपूर्ण भाग आता "निरोध"। इसे ठीक ठीक समझे बिना योग कभी भी समझ में नहीं आ सकता। केवल निरोध शब्द ठीक से नहीं समझा गया इसलिए योग नहीं समझा गया।
संस्कृत में प्रत्यय और उपसर्गों का बहुत महत्व है क्योंकि ये जब किसी शब्द के पीछे और आगे लगते हैं तो अत्यंत बलपूर्वक उस शब्द का अर्थ बिल्कुल बदल देते हैं, वास्तव में इनका केवल अर्थ बदल देने का ही प्रयोजन होता है। अब संस्कृत में 22 उपसर्ग होते हैं और प्रत्येक उपसर्ग यदि एक ही शब्द में लगाया जाए तो उसी शब्द के भिन्न भिन्न अर्थ हो जाते हैं। महर्षि पतंजलि योग दर्शन के रचयिता के साथ साथ एक महान व्याकरणाचार्य भी थे और यदि उन्होंने रुध धातु के साथ यदि नि उपसर्ग जोड़ा है तो यह निष्प्रयोजन नहीं हो सकता है और योग के संबंध में तो बिल्कुल भी नहीं। जहाँ एक ओर सबसे जटिल शब्द की परिभाषा की जा रही हो वहां सामान्य अर्थ में उपसर्ग का प्रयोग नहीं हो सकता है। बहुतों ने निरोध का शाब्दिक अर्थ किया है रोक देना अर्थात चित्त की वृत्तियों को रोक देना योग कहलाता है। यदि रोकने का प्रयत्न अभी भी बचा है तो योग अभी भी पूर्ण रूप से घटा नहीं परिभाषा पूर्ण नहीं हो पाएगी। एक ऐसी स्थिति जब वृत्तियाँ अपने आप रुक जाए तब योग घटित होता है। लेकिन यहां समझने की यह आवश्यकता है कि यह स्थिति बिना प्रयत्न के नहीं आएगी, यह समझना अत्यंत कठिन होता है जब तक कि आप प्रायोगिक रूप से योग विषय में प्रवेश नहीं कर लेते। प्रयत्न जब सहज प्रयत्न में बदलता है तब धीरे धीरे वह चित्त को निरोध अर्थात स्वयं रुक जाने की स्थिति में ले जाता है, फिर बिना प्रयत्न के भान, अहंकार के, कर्तृत्व के भाव से मुक्त हुआ योगाभ्यासी निरुद्ध अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इसी स्थिति को महर्षि पतंजलि ने योग कहा है और योग को ही समाधान कहा है।