22/09/2026
अल्जाइमर रोग (स्मृति भ्रंश) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण कारण, लक्षण, निवारण और सावधानियाँ
अल्जाइमर सिर्फ बुज़ुर्गों की बीमारी नहीं है ! अक्सर हम भूलने की समस्या को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर भूलने की समस्या बार-बार होने लगे और रोज़मर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो यह ध्यान देने योग्य चिकित्सकीय संकेत हो सकता है। कम उम्र में होने वाले मामलों को Early-Onset Alzheimer’s Disease कहा जाता है।
आयुर्वेद में अल्जाइमर को क्या कहते हैं ? 🩷 खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में आधुनिक चिकित्सा के अनुसार वर्णित Alzheimer’s Disease को आयुर्वेद में स्मृति, बुद्धि, मन और वात से संबंधित विकारों माना गया है । स्मृति भ्रंश, स्मृति नाश तथा बुद्धि और मन की कार्यक्षमता में कमी एक तरह से अल्जाइमर का आयुर्वेदिक पर्याय माना जा सकता है ।
अल्जाइमर रोग के संभावित कारण :* बढ़ती उम्र के साथ मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तन। पारिवारिक इतिहास एवं आनुवंशिक प्रवृत्ति। उच्च रक्तचाप, मधुमेह एवं उच्च कोलेस्ट्रॉल। शारीरिक निष्क्रियता एवं असंतुलित आहार।
नींद की समस्या एवं सामाजिक अलगाव। सिर में चोट तथा अन्य मस्तिष्क संबंधी रोग। कुछ मामलों में अन्य चिकित्सकीय कारणों से भी याददाश्त प्रभावित हो सकती है ।
अल्जाइमर के प्रमुख लक्षण :* बार-बार एक ही बात पूछना। हाल की बातें या घटनाएँ भूल जाना। परिचित जगहों पर रास्ता भूलना। सही शब्द याद न आना या बातचीत में परेशानी। चीजें रखकर भूल जाना। पैसे का हिसाब या योजना बनाने में कठिनाई। रोजमर्रा के परिचित कार्य करने में परेशानी। व्यवहार एवं व्यक्तित्व में बदलाव। समय एवं स्थान को लेकर भ्रम। धीरे-धीरे स्मरणशक्ति एवं सोचने की क्षमता में कमी ।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण : 🩷 आयुर्वेद में स्मृति, मेधा, बुद्धि, मन तथा वात के संतुलन का वर्णन मिलता है। मेध्य रसायन की अवधारणा मानसिक कार्यक्षमता एवं स्मरणशक्ति से संबंधित पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान का एक महत्वपूर्ण भाग है। व्यक्ति की प्रकृति, आयु, आहार, निद्रा, पाचन एवं मानसिक स्थिति का चिकित्सकीय मूल्यांकन किया जा सकता है। हालांकि, केवल किसी दोष या लक्षण के आधार पर अल्जाइमर का निदान नहीं किया जा सकता ।
आयुर्वेद में वर्णित मेध्य रसायन द्रव्य ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मंडूकपर्णी, यष्टिमधु जैसे द्रव्यों का पारंपरिक रूप से मेधा एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित उपयोग मिलता है । औषधि का प्रयोग रोगी की आयु, अन्य रोगों, चल रही दवाओं एवं सुरक्षा को ध्यान में रखकर योग्य चिकित्सक की सलाह से करना चाहिए ।
अल्जाइमर से बचाव एवं देखभाल :* अपनी क्षमता के अनुसार नियमित पैदल चलना एवं व्यायाम करना। हरी सब्जियाँ, फल, दालें, साबुत अनाज एवं मेवों से युक्त संतुलित आहार लेना। पर्याप्त एवं नियमित नींद लेना। पढ़ना, संगीत, बातचीत एवं मानसिक गतिविधियों में भाग लेना। परिवार एवं समाज के साथ संपर्क बनाए रखना ।
रक्तचाप, मधुमेह एवं कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना। धूम्रपान से बचना।सुनने की समस्या होने पर उचित जाँच एवं उपचार कराना। चिकित्सक की सलाह के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना।
रोगी एवं परिवार के लिए सावधानियाँ :* रोगी को भूलने पर डाँटें नहीं, शांतिपूर्वक समझाएँ। दवाओं का समय एवं मात्रा व्यवस्थित रखें। घर में गिरने एवं भटकने के जोखिम को कम करें। रोगी को आवश्यक दैनिक कार्यों में सहयोग दें। चिकित्सक की सलाह के बिना कोई नई औषधि शुरू न करें। अचानक भ्रम, बेहोशी, बोलने में परेशानी या हाथ-पैर में कमजोरी होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लें ।
कब चिकित्सक से संपर्क करें ? 🩷 यदि भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही है, दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है या परिवार को व्यवहार एवं स्मृति में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन कराना आवश्यक है। अचानक शुरू होने वाली भ्रम की स्थिति को सामान्य अल्जाइमर मानकर नजरअंदाज न करें ।
याददाश्त की समस्या को केवल उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान, उचित चिकित्सकीय जाँच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद एवं परिवार का सहयोग मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
आयुर्वेद में मेधा एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पारंपरिक ज्ञान उपयोगी सहायक दृष्टिकोण दे सकता है, लेकिन अल्जाइमर के निदान एवं उपचार में आधुनिक चिकित्सकीय मूल्यांकन को प्राथमिकता देना आवश्यक है ।
~यह लेख जनजागरूकता के उद्देश्य से है। व्यक्तिगत उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श आवश्यक है ।
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