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Sethi Rasayan Shala We are Manufacturers, Suppliers and Exporters of a qualitative range of Ayurvedic Medicines. Our range is well-received in the market.

SETHI RASAYAN SHALA Manufacturers of Ayurvedic & Herbal Medicines | We Share Authentic Ayurvedic Health Tips, Disease Awareness & Natural Healing Knowledge Based on Traditional Principles | Promoting Holistic Wellness & Preventive Healthcare Through Trus Sethi Rasayan Shala established in the year 1980, is a leading manufacturer of Ayurvedic herbal products and pharmaceutical bulk drugs.The factory is established in Indore.

25/09/2026
आयुर्वेद दिवस 2026 पर सम्मान हेतु हार्दिक आभार एवं धन्यवादमध्य प्रदेश आयुष निर्माता संघ, इंदौर के अंतर्गत आयुष क्लब, इंद...
23/09/2026

आयुर्वेद दिवस 2026 पर सम्मान हेतु हार्दिक आभार एवं धन्यवाद
मध्य प्रदेश आयुष निर्माता संघ, इंदौर के अंतर्गत आयुष क्लब, इंदौर द्वारा 'आयुर्वेद दिवस 2026' के पावन अवसर पर मुझे प्रदान किए गए सम्मान पत्र के लिए मैं हृदय से आभार एवं धन्यवाद व्यक्त करता हूँ ।

मैं आयुष क्लब के अध्यक्ष श्री राजेश सेठिया जी, सचिव श्री ऋषभ पाटनी जी, समस्त पदाधिकारियों एवं सभी आदरणीय सदस्यों का हार्दिक धन्यवाद प्रकट करता हूँ ।

आप सभी द्वारा दिया गया यह सम्मान मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान है । इस स्नेह एवं विश्वास ने मुझे आयुर्वेद चिकित्सा, स्वास्थ्य जागरूकता एवं जनसेवा के क्षेत्र में और अधिक समर्पण, ऊर्जा तथा उत्साह के साथ कार्य करने की प्रेरणा दी है ।

आयुर्वेद के प्रचार प्रसार एवं समाज सेवा के इस पवित्र कार्य में मैं सदैव अपना सर्वोत्तम योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध रहूँगा ।

आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन यूँ ही बना रहे।
सधन्यवाद एवं हार्दिक आभार !
जय धन्वंतरि । जय आयुर्वेद ।

वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी
Narendra Sethi आयुर्वेदिक चिकित्सक एवं औषधि निर्माता~सेठी रसायन शाला, इंदौर

आयुर्वेद दिवस 2026 की हार्दिक शुभकामनाएँप्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के ज्ञान, सेवा एवं स्वास्थ्य संदेश को जन...
23/09/2026

आयुर्वेद दिवस 2026 की हार्दिक शुभकामनाएँ

प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के ज्ञान, सेवा एवं स्वास्थ्य संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लें । आयुर्वेद अपनाएँ, स्वस्थ जीवन पाएँ ।
स्वस्थ जीवन • सुखी जीवन • दीर्घ जीवन

आयुर्वेद दिवस 2026 की हार्दिक शुभकामनाएँ..
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अल्जाइमर रोग (स्मृति भ्रंश) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण कारण, लक्षण, निवारण और सावधानियाँअल्जाइमर सिर्फ बुज़ुर्गों की बीमारी नह...
22/09/2026

अल्जाइमर रोग (स्मृति भ्रंश) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण कारण, लक्षण, निवारण और सावधानियाँ

अल्जाइमर सिर्फ बुज़ुर्गों की बीमारी नहीं है ! अक्सर हम भूलने की समस्या को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर भूलने की समस्या बार-बार होने लगे और रोज़मर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो यह ध्यान देने योग्य चिकित्सकीय संकेत हो सकता है। कम उम्र में होने वाले मामलों को Early-Onset Alzheimer’s Disease कहा जाता है।

आयुर्वेद में अल्जाइमर को क्या कहते हैं ? 🩷 खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में आधुनिक चिकित्सा के अनुसार वर्णित Alzheimer’s Disease को आयुर्वेद में स्मृति, बुद्धि, मन और वात से संबंधित विकारों माना गया है । स्मृति भ्रंश, स्मृति नाश तथा बुद्धि और मन की कार्यक्षमता में कमी एक तरह से अल्जाइमर का आयुर्वेदिक पर्याय माना जा सकता है ।

अल्जाइमर रोग के संभावित कारण :* बढ़ती उम्र के साथ मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तन। पारिवारिक इतिहास एवं आनुवंशिक प्रवृत्ति। उच्च रक्तचाप, मधुमेह एवं उच्च कोलेस्ट्रॉल। शारीरिक निष्क्रियता एवं असंतुलित आहार।
नींद की समस्या एवं सामाजिक अलगाव। सिर में चोट तथा अन्य मस्तिष्क संबंधी रोग। कुछ मामलों में अन्य चिकित्सकीय कारणों से भी याददाश्त प्रभावित हो सकती है ।

अल्जाइमर के प्रमुख लक्षण :* बार-बार एक ही बात पूछना। हाल की बातें या घटनाएँ भूल जाना। परिचित जगहों पर रास्ता भूलना। सही शब्द याद न आना या बातचीत में परेशानी। चीजें रखकर भूल जाना। पैसे का हिसाब या योजना बनाने में कठिनाई। रोजमर्रा के परिचित कार्य करने में परेशानी। व्यवहार एवं व्यक्तित्व में बदलाव। समय एवं स्थान को लेकर भ्रम। धीरे-धीरे स्मरणशक्ति एवं सोचने की क्षमता में कमी ।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण : 🩷 आयुर्वेद में स्मृति, मेधा, बुद्धि, मन तथा वात के संतुलन का वर्णन मिलता है। मेध्य रसायन की अवधारणा मानसिक कार्यक्षमता एवं स्मरणशक्ति से संबंधित पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान का एक महत्वपूर्ण भाग है। व्यक्ति की प्रकृति, आयु, आहार, निद्रा, पाचन एवं मानसिक स्थिति का चिकित्सकीय मूल्यांकन किया जा सकता है। हालांकि, केवल किसी दोष या लक्षण के आधार पर अल्जाइमर का निदान नहीं किया जा सकता ।

आयुर्वेद में वर्णित मेध्य रसायन द्रव्य ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मंडूकपर्णी, यष्टिमधु जैसे द्रव्यों का पारंपरिक रूप से मेधा एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित उपयोग मिलता है । औषधि का प्रयोग रोगी की आयु, अन्य रोगों, चल रही दवाओं एवं सुरक्षा को ध्यान में रखकर योग्य चिकित्सक की सलाह से करना चाहिए ।

अल्जाइमर से बचाव एवं देखभाल :* अपनी क्षमता के अनुसार नियमित पैदल चलना एवं व्यायाम करना। हरी सब्जियाँ, फल, दालें, साबुत अनाज एवं मेवों से युक्त संतुलित आहार लेना। पर्याप्त एवं नियमित नींद लेना। पढ़ना, संगीत, बातचीत एवं मानसिक गतिविधियों में भाग लेना। परिवार एवं समाज के साथ संपर्क बनाए रखना ।
रक्तचाप, मधुमेह एवं कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना। धूम्रपान से बचना।सुनने की समस्या होने पर उचित जाँच एवं उपचार कराना। चिकित्सक की सलाह के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना।

रोगी एवं परिवार के लिए सावधानियाँ :* रोगी को भूलने पर डाँटें नहीं, शांतिपूर्वक समझाएँ। दवाओं का समय एवं मात्रा व्यवस्थित रखें। घर में गिरने एवं भटकने के जोखिम को कम करें। रोगी को आवश्यक दैनिक कार्यों में सहयोग दें। चिकित्सक की सलाह के बिना कोई नई औषधि शुरू न करें। अचानक भ्रम, बेहोशी, बोलने में परेशानी या हाथ-पैर में कमजोरी होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लें ।

कब चिकित्सक से संपर्क करें ? 🩷 यदि भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही है, दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है या परिवार को व्यवहार एवं स्मृति में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन कराना आवश्यक है। अचानक शुरू होने वाली भ्रम की स्थिति को सामान्य अल्जाइमर मानकर नजरअंदाज न करें ।

याददाश्त की समस्या को केवल उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान, उचित चिकित्सकीय जाँच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद एवं परिवार का सहयोग मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आयुर्वेद में मेधा एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पारंपरिक ज्ञान उपयोगी सहायक दृष्टिकोण दे सकता है, लेकिन अल्जाइमर के निदान एवं उपचार में आधुनिक चिकित्सकीय मूल्यांकन को प्राथमिकता देना आवश्यक है ।
~यह लेख जनजागरूकता के उद्देश्य से है। व्यक्तिगत उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श आवश्यक है ।

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पुनर्नवा : लिवर, सूजन और किडनी रोगों में उपयोगी आयुर्वेदिक औषधिपुनर्नवा Boerhavia diffusa आयुर्वेद की एक अत्यंत प्रभावशा...
18/09/2026

पुनर्नवा : लिवर, सूजन और किडनी रोगों में उपयोगी आयुर्वेदिक औषधि

पुनर्नवा Boerhavia diffusa आयुर्वेद की एक अत्यंत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पति है । आयुर्वेद शास्त्र में पुनर्नवा को मुख्य रूप से शोथहर सूजन को दूर करने वाला और मूत्रल पेशाब के प्रवाह को बढ़ाने वाला द्रव्य माना गया है ।

पारंपरिक रूप से इसका उपयोग शरीर की सूजन, वॉटर रिटेंशन (जल-धारण), मूत्रवह संस्थान (यूटीआई व किडनी संबंधी समस्याएँ) तथा विभिन्न यकृत (लिवर) विकारों के उपचार में किया जाता रहा है ।

खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार, फैटी लिवर और पीलिया जैसी स्थितियों में पुनर्नवा एक अत्यंत उपयोगी औषधि सिद्ध होती है। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पुनर्नवा में Hepatoprotective लिवर रक्षक, Antioxidant ऑक्सीडेटिव तनाव कम करने वाला और Anti inflammatory सूजनरोधी गुण पाए गए हैं, जो लिवर एंजाइम्स के स्तर में सुधार करने और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को सुरक्षा प्रदान करने के संकेत देते हैं ।

पुनर्नवा से लाभान्वित होने वाली प्रमुख बीमारियाँ और स्थितियाँ
यकृत (लिवर) संबंधी विकार फैटी लिवर Fatty Liver लिवर कोशिकाओं में जमा अत्यधिक वसा को कम करने में मदद करती है और SGOT व SGPT जैसे लिवर एंजाइम्स के स्तर को नियंत्रित करती है। पीलिया Jaundice शरीर में बिलीरुबिन का स्तर संतुलित कर लिवर को इंफेक्शन से बचाती है ।

लिवर की सूजन Hepatomegaly लिवर का आकार बढ़ने और उसकी कार्यक्षमता घटने पर यह औषधि लाभकारी मानी जाती है ।
जल-धारण और शरीर की सूजन Edema & Dropsy शरीर के विभिन्न हिस्सों में पानी भरना हाथ, पैर, चेहरे या पेट में तरल जमा होने Water Retention पर इसके मूत्रल Diuretic गुण शरीर से अतिरिक्त द्रव को बाहर निकालते हैं ।

वृक्क (किडनी) संबंधी रोग यूटीआई UTI व पेशाब की रुकावट मूत्रमार्ग के संक्रमण, जलन और रुकावट को दूर कर किडनी की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाती है ।

किडनी की सूजन Nephritis यूरिक एसिड और टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर संतुलन बनाने में मदद करती है। जोड़ों में दर्द व सूजन Arthritis अपने शक्तिशाली Anti-inflammatory गुणों के कारण यह गठिया, आर्थराइटिस और जोड़ों के दर्द व जकड़न में राहत प्रदान करती है ।

प्रमुख सावधानियाँ :* गर्भावस्था, स्तनपान, या यदि आप पहले से हृदय या उच्च रक्तचाप की दवाएँ ले रहे हैं, तो बिना डॉक्टरी परामर्श के इसका उपयोग न करें ।

पुनर्नवा का सेवन हमेशा आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से चूर्ण, काढ़ा (क्वाथ), अर्क, पुनर्नवारिष्ट अथवा पुनर्नवा के घटक से युक्त औषधियां निर्धारित खुराक में ही करें ।

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14/09/2026

अगर भादवा महीने में दही खा लेते हैं तो क्या होता है?

सिर्फ भादवा महीने में दही खा लेने से कोई निश्चित बीमारी या अनिष्ट नहीं होता । यदि दही ताजा, स्वच्छ और उचित मात्रा में खाया गया है तथा व्यक्ति को उससे कोई विशेष परेशानी नहीं होती, तो सामान्यतः घबराने की आवश्यकता नहीं है ।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से🩷 यदि दही व्यक्ति को अनुकूल न हो या अधिक मात्रा में खाया जाए, तो निम्न समस्याएँ हो सकती हैं :

पेट में भारीपन और अपच, गैस, पेट फूलना या खट्टी डकारें,कुछ लोगों में कफ संबंधी शिकायतें, जैसे नाक बंद होना या गले में बलगम महसूस होना, लैक्टोज असहिष्णुता वाले व्यक्तियों में पेट दर्द, गैस या दस्त, इनमें से कोई भी समस्या हर व्यक्ति को होगी, ऐसा नहीं है ।

दही खाने के बाद परेशानी होना व्यक्ति की सहनशीलता, मात्रा और दही की गुणवत्ता पर निर्भर करता है ।

3.यदि दही खा लिया है तो क्या उपाय करें ? यदि आपने भादवा में दही खा लिया है और कोई परेशानी नहीं है, तो किसी विशेष शोधन, विरेचन या औषधि की आवश्यकता नहीं है।

यदि दही खाने के बाद पेट भारी लग रहा हो, तो अगला भोजन हल्का और सुपाच्य रखें । अपनी पाचनशक्ति के अनुसार गुनगुना पानी लें। उस दिन अधिक तला-भुना, बहुत ठंडा या भारी भोजन न करें।

यदि दही से बार-बार गैस, दस्त या पेट दर्द होता है, तो उसका सेवन रोककर चिकित्सकीय सलाह लें।

4. दही और छाछ में अंतर🩷
आयुर्वेद में दही और छाछ को एक जैसा नहीं माना गया है । दही की तुलना में अच्छी तरह मथकर तैयार की गई, उचित मात्रा में ली गई छाछ कई परिस्थितियों में अधिक हल्की और पाचन के लिए अनुकूल मानी जाती है । हालांकि, हर व्यक्ति के लिए छाछ भी उपयुक्त हो, यह आवश्यक नहीं है ।

आयुर्वेदिक सावधानी :* भादवा या शरद ऋतु में दही का त्याग मुख्यतः ऋतुचर्या और दोष संतुलन की परंपरा से जुड़ा है । इसे ऐसा कठोर नियम नहीं समझना चाहिए कि दही खाने से निश्चित रूप से रोग हो जाएगा । ऋतु, व्यक्ति की प्रकृति, अग्नि, रोगावस्था और मात्रा के अनुसार आहार का माननी चाहिए ।

13/09/2026

आयुर्वेद में 14 ऐसे स्वाभाविक शारीरिक वेग Unscalable Urges बताए गए हैं, जिन्हें कभी भी रोकना नहीं चाहिए।
इन्हें रोकने से शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग और दोष उत्पन्न हो सकते हैं।
* अपान वायु (गैस का वेग)
* मल (पॉटी का वेग)
* मूत्र (पेशाब का वेग)
* छींक का वेग
* प्यास का वेग
* भूख का वेग
* नींद का वेग
* खांसी का वेग
* श्रमः श्वास (थकावट के बाद आने वाली गहरी सांस का वेग)
* जंभाई (उबासी का वेग)
* अश्रु (आंसुओं का वेग)
* वमन (उल्टी का वेग)
* शुक्र (वीर्य या कामेच्छा का वेग)
* डकार का वेग
आयुर्वेद का नियम है कि इन प्राकृतिक वेगों को कभी जबरदस्ती न रोकें और न ही बिना समय जबरदस्ती लाने का प्रयास करें। शरीर के संकेतों का सम्मान करें और स्वस्थ रहें ।

पेशाब का रंग क्या संकेत देता है ? शरीर की सेहत को समझने वाला एक आसान संकेतपेशाब का रंग शरीर में पानी की मात्रा, खान-पान,...
11/09/2026

पेशाब का रंग क्या संकेत देता है ? शरीर की सेहत को समझने वाला एक आसान संकेत

पेशाब का रंग शरीर में पानी की मात्रा, खान-पान, कुछ औषधियों/विटामिनों तथा कभी-कभी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में संकेत दे सकता है।

हालांकि केवल पेशाब के रंग के आधार पर किसी रोग का निदान नहीं किया जा सकता। यदि रंग में लगातार असामान्य परिवर्तन रहे या अन्य लक्षण साथ हों तो उचित जाँच आवश्यक है।

पेशाब के अलग-अलग रंग और उनके संभावित संकेत

1.बिल्कुल साफ/पारदर्शी पेशाब :* बहुत अधिक पानी पीने पर पेशाब बिल्कुल साफ हो सकता है। कभी-कभी यह अधिक जल सेवन का संकेत होता है। यदि लगातार बहुत अधिक मात्रा में बिल्कुल साफ पेशाब आता है और बार-बार पेशाब लगती है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

2.हल्का पीला : सामान्य :* आमतौर पर यह सामान्य एवं पर्याप्त जल सेवन का संकेत माना जाता है। सुबह का पहला पेशाब अपेक्षाकृत गहरा पीला होना भी सामान्य हो सकता है।

3.गहरा पीला :* अक्सर शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है। अधिक पसीना, कम पानी पीना, गर्म मौसम या व्यायाम के बाद ऐसा हो सकता है । पानी की आवश्यकता पूरी करने पर रंग सामान्य हो जाना चाहिए।

4.गाढ़ा पीला/एम्बर रंग :* पानी की अधिक कमी होने पर पेशाब गहरा पीला या एम्बर दिखाई दे सकता है। कुछ विटामिन, विशेषकर Vitamin B-complex, भी पेशाब को चमकीला पीला कर सकते हैं।

5.नारंगी रंग :* कुछ दवाओं, खाद्य पदार्थों या शरीर में पानी की कमी के कारण नारंगी रंग दिखाई दे सकता है। यदि यह रंग लगातार बना रहे, विशेषकर साथ में आंखों/त्वचा का पीलापन दिखाई दे, तो चिकित्सकीय जाँच करानी चाहिए।

6.लाल या गुलाबी पेशाब :* चुकंदर जैसे कुछ खाद्य पदार्थों से भी रंग बदल सकता है, लेकिन पेशाब में खून Blood आने पर भी लाल या गुलाबी रंग दिखाई दे सकता है । पेशाब में खून को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

7.भूरा या गहरा भूरा पेशाब :* बहुत अधिक डिहाइड्रेशन, कुछ दवाओं/खाद्य पदार्थों या कभी-कभी लिवर अथवा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ऐसा रंग हो सकता है। लगातार ऐसा रंग दिखाई देने पर चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।

8.धुंधला/मटमैला पेशाब :* पानी की कमी, मूत्र में लवण/क्रिस्टल या कभी-कभी मूत्र संक्रमण जैसी स्थितियों में पेशाब धुंधला दिखाई दे सकता है। यदि साथ में जलन, दुर्गंध, दर्द या बार-बार पेशाब आए तो जाँच कराना चाहिए।

कब विशेष ध्यान देना चाहिए ? 🩵
यदि पेशाब का असामान्य रंग बार-बार या लगातार दिखाई दे, अथवा इसके साथ पेशाब में खून, पेशाब करते समय जलन या दर्द, कमर/पेट के निचले हिस्से में दर्द, बुखार या कंपकंपी, पेशाब बहुत कम आना ।

अत्यधिक बार-बार पेशाब आना, पेशाब में असामान्य दुर्गंध,आंखों या त्वचा का पीला होना जैसे लक्षण हों, तो चिकित्सक से परामर्श लेकर आवश्यक औषधि तथा अन्य उचित जाँच करानी चाहिए ।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण :* खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार आयुर्वेद में मूत्र के स्वरूप, मात्रा, आवृत्ति तथा अन्य लक्षणों को रोगी की स्थिति समझने में सहायक संकेत माना जाता है। लेकिन केवल रंग देखकर दवा लेना उचित नहीं है।

व्यक्ति की प्रकृति, आहार-विहार, जल सेवन, आयु और साथ मौजूद लक्षणों को ध्यान में रखकर चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक उचित है।

पेशाब का रंग सामान्य रखने के लिए :* प्यास और शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त पानी पिएँ। अत्यधिक चाय कॉफी और शराब से बचें । बहुत अधिक नमक और अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन सीमित करें ।

मौसम और शारीरिक श्रम के अनुसार जल सेवन रखें। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं या सप्लीमेंट्स का अनावश्यक सेवन न करें ।

महत्वपूर्ण बात :* पेशाब का रंग एक संकेत है, स्वयं में कोई रोग नहीं। एक-दो बार रंग बदलने से घबराने की आवश्यकता नहीं, लेकिन लगातार असामान्य रंग या साथ में अन्य लक्षण हों तो सही जाँच और चिकित्सकीय परामर्श जरूरी है ।

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