हर घर आयुर्वेद

हर घर आयुर्वेद क्या आप स्वास्थ्य को लेकर सजग हैं ? रोग?

13/07/2026

यह चमत्कारिक अष्टाक्षरी मंत्र असली तुलसी की माला से पूर्ण समर्पण भास से केवल 5 या 11 सुबह शाम अपनी संध्या /पूजा के समय करें और लौकिक आलौकिक अद्भुत लाभ साक्षात्कार जीवन में अनुभव करें....

सज्जनों "ॐ नमो नारायणाय" महामंत्र का उच्चारण केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि विज्ञान और स्वास्थ्य (Science and Health) के दृष्टिकोण से भी शरीर और मस्तिष्क पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डालता है।वैज्ञानिक शोधों और न्यूरोलॉजी (तंत्रिका विज्ञान) के अनुसार, इस मंत्र के नियमित जाप के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
वैज्ञानिक महत्व (Scientific Significance)ध्वनि तरंगें और कंपन (Sound Vibrations): इस मंत्र के प्रत्येक अक्षर (ॐ-न-मो-ना-रा-य-णा-य) के उच्चारण से शरीर में विशिष्ट कंपन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं। यह कंपन हमारे अंतःस्रावी ग्रंथियों (Endocrine Glands) को उत्तेजित करता है, जिससे हार्मोन का संतुलन बेहतर होता है।
अल्फा मस्तिष्क तरंगें (Alpha Brain Waves): मंत्र जाप के समय मस्तिष्क में 'अल्फा तरंगें' बढ़ने लगती हैं। यह तरंगें गहरी शांति, उच्च एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता की स्थिति में ही सक्रिय होती हैं।
वेगस तंत्रिका की उत्तेजना (Vagus Nerve Stimulation): 'ॐ' और 'नारायणाय' शब्द का गहरा उच्चारण वेगस तंत्रिका (Vagus Nerve) को उत्तेजित करता है। यह तंत्रिका हमारे हृदय, फेफड़ों और पाचन तंत्र को नियंत्रित करती है, जिससे पूरा शरीर तुरंत शांत (Relax) मोड में आ जाता है।
।। सनातन विज्ञानं विजयते।।
डॉ मनोज शर्मा
सदमार्ग वाले गुरुजी
सनातन विद्या परिषद्,सनातन शक्तिपीठं

With Deepak Kumar Sharma – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
08/07/2026

With Deepak Kumar Sharma – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

01/07/2026

सनातन विज्ञानं का परिणाम है परमानन्द

1990 से स्वामी सत्यानन्द गिरी जी महाराज के सानिध्य में आरम्भ किए सनातन विज्ञानं के संकल्प के 36 वर्षों के अनुभव के आधार पर सनातन विद्या परिषद् के संस्थापक सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ मनोज शर्मा सनातन शक्तिपीठं के परमाध्यक्ष के अनुसार यह शरीर कोई फिजिकल इंस्ट्रूमेंट मात्र नहीं है यह परमात्मा की अभिव्यक्ति है परमानन्द का स्रोत है जिसके लिए जीव 8399999 योनियों की लंबी यात्रा करता हुआ मनुष्य शरीर तक पहुंचता है यह एक्सीडेंडली नहीं है यह बहुत सारे एग्जाम्स का लास्ट रिजल्ट है इसे भी मनुष्य पशुवत खो रहा है तो हाय इससे अभागा कौन है मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य लक्ष्य परमानन्द की प्राप्ति है और वह स्वस्थ शरीर के बिना असंभव है और स्वस्थ शरीर भी सनातन विज्ञानं के अनुसार परमानन्द के बिना असंभव है नोट कर लीजिए।

30/06/2026

रात को सोने से पहले मुंह धोकर सूती कपड़े से पोंछकर प्राकृतिक अरंड/कैस्टर ऑयल लगाएं । साबुन का प्रयोग न्यूनतम करें प्राकृतिक साधनों जैसे चावल का धोवन, मसूर की दाल संतरे के छिलके का पाउडर, कच्चे टमाटर , कच्चे आलू , नेचुरल ग्वारपाठा जेल, हल्दी जौं का आटा बेसन दही का पेक आदि अपनी त्वचा की प्रकृति रुखी अथवा तैलीय के अनुसार उपयोग कर आप प्राकृतिक तरीके से अपनी त्वचा को कोमल और जवां बनाए रख सकते हैं बाजारवाद केवल आपकी जेब ढीली और आपकी निर्भरता बाजार पर ही बनाए रखने के लिए काम करता है। आप देख ही रहे हैं मर्द बल शौर्य शक्ति के प्रतीक का शब्द है बाजार में फिमेल वाली फेयरनेस क्रीम क्यों लगाते हो मर्दों की फेयरनेस क्रीम बिक रही हैं।
।। सनातन विज्ञानं विजयते।।
डॉ मनोज शर्मा, सदमार्ग वाले गुरुजी,
सनातन विद्या परिषद्,सनातन शक्तिपीठं

16/06/2026

समयानुसार उचित शब्द ही समाधान और इलाज हैं

15/06/2026

06/06/2026

सनातनी शास्त्रों में स्वच्छता के सूत्र
​हमारे ऋषि-मुनि अत्यंत सूक्ष्मद्रष्टा एवं दूरद्रष्टा थे। उन्होंने हजारों-लाखों वर्ष पूर्व वेदों, पुराणों एवं आयुर्वेद ग्रंथों में पूर्ण स्वस्थ, आरोग्य जीवन और महामारियों की रोकथाम के लिए परिपूर्ण स्वच्छता रखने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं:
1. ​लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च।लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।। — धर्मसिन्धु ३ पू. आह्निक ​अर्थ: नमक, घी, तेल, व्यंजन एवं अन्य खाद्य पदार्थ चम्मच या पात्र से परोसना चाहिए, सीधे हाथों से कभी नहीं।
​अर्थ: नमक, घी, तेल, व्यंजन एवं अन्य खाद्य पदार्थ चम्मच या पात्र से परोसना चाहिए, सीधे हाथों से कभी नहीं।
2. ​अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः।। — मनुस्मृति ४/१४४ ​अर्थ: अपने शरीर के संवेदनशील अंगों (जैसे आँख, नाक, कान, मुख आदि) को बिना किसी अनिवार्य कारण के बार-बार नहीं छूना चाहिए।
​अर्थ: अपने शरीर के संवेदनशील अंगों (जैसे आँख, नाक, कान, मुख आदि) को बिना किसी अनिवार्य कारण के बार-बार नहीं छूना चाहिए।
3. ​अपमृज्यान्न च स्न्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः।। — मार्कण्डेय पुराण ३४/५२ ​अर्थ: स्नान के बाद अपने शरीर को स्वच्छ वस्त्र से शीघ्र सुखाना चाहिए।
​अर्थ: स्नान के बाद अपने शरीर को स्वच्छ वस्त्र से शीघ्र सुखाना चाहिए।
4. ​हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे भोजनं चरेत्।। — पद्मपुराण, सृष्टि खंड ५१/८८नाप्रक्षालितपाणिपादो भुञ्जीत।। — सुश्रुतसंहिता, चिकित्सा स्थान २४/९८ ​अर्थ: भोजन करने से पूर्व अपने दोनों हाथ, दोनों पैर और मुख (इन पांच अंगों) को जल से अच्छी तरह स्वच्छ करने के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
​अर्थ: भोजन करने से पूर्व अपने दोनों हाथ, दोनों पैर और मुख (इन पांच अंगों) को जल से अच्छी तरह स्वच्छ करने के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
5. ​स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः स्युः निष्फलाः क्रियाः।। — व्यासस्मृति ​अर्थ: बिना स्नान, शुद्धि और सदाचार के किए गए शारीरिक व मानसिक कर्म निष्फल रहते हैं।
​अर्थ: बिना स्नान, शुद्धि और सदाचार के किए गए शारीरिक व मानसिक कर्म निष्फल रहते हैं।
6. ​न धारयेत् परस्यैवं स्न्नानवस्त्रं कदाचन।। — पद्मपुराण, सृष्टि खंड ५१/८६ ​अर्थ: स्नान के बाद अपना शरीर पोंछने के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग किया गया वस्त्र (तौलिया) कभी भी उपयोग में नहीं लाना चाहिए।
​अर्थ: स्नान के बाद अपना शरीर पोंछने के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग किया गया वस्त्र (तौलिया) कभी भी उपयोग में नहीं लाना चाहिए।
7. ​अन्यदेव भवद्वासः शयनीये नरोत्तम।अन्यद् रथ्यासु देवानाम अर्चायाम् अन्यदेव हि।। — महाभारत, अनुशासन पर्व १०४/८६ ​अर्थ: देव-पूजन, शयन (सोने) एवं मार्ग (बाहर जाने) के समय अलग-अलग वस्त्रों का उपयोग करना चाहिए। बाहर के वस्त्र घर के भीतर या बिस्तर पर वर्जित होने चाहिए।
​अर्थ: देव-पूजन, शयन (सोने) एवं मार्ग (बाहर जाने) के समय अलग-अलग वस्त्रों का उपयोग करना चाहिए। बाहर के वस्त्र घर के भीतर या बिस्तर पर वर्जित होने चाहिए।
8. ​तथा न अन्यधृतं वस्त्रं धार्यम्।। — महाभारत, अनुशासन पर्व ​अर्थ: दूसरे व्यक्ति द्वारा धारण किए गए (पहने हुए) वस्त्रों को स्वयं नहीं पहनना चाहिए।
​अर्थ: दूसरे व्यक्ति द्वारा धारण किए गए (पहने हुए) वस्त्रों को स्वयं नहीं पहनना चाहिए।
9. ​न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयाद्।। — विष्णुस्मृति ६४ ​अर्थ: एक बार पहने हुए वस्त्रों को बिना स्वच्छ (धोए) किए दोबारा नहीं धारण करना चाहिए।
​अर्थ: एक बार पहने हुए वस्त्रों को बिना स्वच्छ (धोए) किए दोबारा नहीं धारण करना चाहिए।
10. ​न आद्रं परिदधीत।। — गोभिलगृह्यसूत्र ३/५/२४ ​अर्थ: कभी भी गीले या सीलनयुक्त वस्त्र नहीं पहनने चाहिए।
​अर्थ: कभी भी गीले या सीलनयुक्त वस्त्र नहीं पहनने चाहिए।
वैज्ञानिक प्रासंगिकता और हमारा दर्शन
हमारे रिसर्चर ऋषियों द्वारा सनातन धर्म ग्रंथों के माध्यम से ये सभी सावधानियां समस्त मानव जाति को हजारों वर्षों पूर्व से सिखाई जाती रही हैं। इस वैज्ञानिक पद्धति से हमें अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखने के निर्देश तब दिए गए थे, जब आधुनिक सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) का आविष्कार भी नहीं हुआ था। हमारे पूर्वजों ने सनातन वैदिक ज्ञान का उपयोग कर धार्मिकता व सदाचरण का अभ्यास दैनिक जीवन में स्थापित किया था।
आज के समय में भी ये सावधानियां अत्यंत प्रासंगिक हैं। यदि हम पूर्ण आरोग्यता चाहते हैं, तो इन सूत्रों को अपने जीवन में ढालना अनिवार्य है। स्वास्थ्य का मूल आधार केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि हमारी संपूर्ण जीवनशैली है। इसीलिए हम सदैव कहते हैं— "फैमिली डॉक्टर नहीं, फैमिली किसान ढूंढिए।" शुद्ध, रसायणमुक्त और प्राकृतिक भोजन ही वास्तविक आरोग्यता की नींव है।
सनातन संस्कृति का यह शाश्वत विज्ञान सदमार्ग परिवार के पंचप्राण सिद्धांतों का मुख्य हिस्सा है, जो मानव को प्रकृति, सदाचार और अध्यात्म से जोड़ता है। भारतीय देशी गौमाता आधारित कृषि और ऋषि-परंपरा का संरक्षण ही सनातन विद्या परिषद, सनातन शक्तिपीठम और सनातन विज्ञानम् का मूल प्राण है।
आइए, इन दिव्य नियमों का पालन कर स्वयं को और समाज को स्वस्थ व सुरक्षित बनाएं।

।। सनातन विज्ञानं विजयते।।
04/06/2026

।। सनातन विज्ञानं विजयते।।

03/06/2026

सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ. मनोज शर्मा वर्तमान युग में सनातन परंपरा, गऊ विज्ञान, आयुर्वेद और मानवता की सेवा के एक सशक्त स्तंभ हैं। वे सदमार्ग परिवार, सनातन विद्या परिषद और सनातन शक्तिपीठम के संस्थापक संचालक हैं। लगभग 35 वर्षों से अधिक के अपने सघन अनुभव, शोध और निस्वार्थ साधना के माध्यम से उन्होंने न केवल लाखों लोगों को असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाई है, बल्कि भटके हुए समाज को धर्म और विज्ञान के सही मार्ग ('सदमार्ग') पर चलने की प्रेरणा भी दी है।डॉ. मनोज शर्मा जी के जीवन, उनकी विचारधाारा और उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं के महान कार्यों को सदैव याद किया जाएगा।
सनातन चेतना के संवाहक सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ मनोज शर्मा आधुनिक युग में प्राचीन मेधा का पुनर्जागरणआज के भौतिकवादी युग में जहाँ चिकित्सा और शिक्षा केवल व्यवसाय बनकर रह गए हैं, वहीं डॉ. मनोज शर्मा प्राचीन भारतीय ऋषियों की परंपरा को जीवंत कर रहे हैं। आयुर्वेद न्यूरोथैरेपी के जनक और राष्ट्रीय गुरु के रूप में विख्यात डॉ. शर्मा ने सिद्ध किया है कि सनातन विद्याएं आज भी उतनी ही वैज्ञानिक और प्रासंगिक हैं, जितनी हजारों वर्ष पूर्व थीं। उनके मार्गदर्शन में चल रहा 'सदमार्ग परिवार' आज देश-विदेश में भारतीय संस्कृति और स्वास्थ्य चेतना का एक महाअभियान बन चुका है।
त्रिवेणी संगम डॉ. मनोज शर्मा का ३५ वर्षों का साधना-पथ गुरुजी का जीवन सनातन विज्ञान, गऊ विज्ञान और शुद्ध आयुर्वेद का एक अद्भुत त्रिवेणी संगम है।सनातन विज्ञान: वे वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों में निहित ज्ञान को अंधविश्वास से दूर हटाकर पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाज के सामने रखते हैं। उनका मानना है कि सनातन जीवन शैली ही सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य की कुंजी है।
गऊ विज्ञान (पंचगव्य) गुरुजी ने भारतीय मूल की गाय (देशी गाय) के दूध, घी, गोमूत्र और गोबर की शक्ति पर व्यापक शोध किया है। उनका दृढ़ विश्वास है कि 'गो-विज्ञान' के माध्यम से असाध्य से असाध्य शारीरिक व मानसिक व्याधियों को ठीक किया जा सकता है।आयुर्वेद और न्यूरोथैरेपी: नाड़ी परीक्षण और त्रिदोष सिद्धांत में पारंगत गुरुजी ने बिना किसी चीर-फाड़ या ऑपरेशन के केवल प्राकृतिक औषधियों और न्यूरोथैरेपी के माध्यम से रीढ़ की हड्डी (Spine), सर्वाइकल, लकवा (Paralysis) और जोड़ों के दर्द (AVN) जैसी गंभीर बीमारियों का सफल इलाज किया है। सनातन विद्या परिषद, सनातन शक्तिपीठम के संस्थापक और संचालक सेवा के तीन मुख्य केंद्र (संस्थाएं) डॉ. मनोज शर्मा जी ने अपने लोक-कल्याणकारी कार्यों को संस्थागत रूप देने के लिए तीन प्रमुख केंद्रों की स्थापना की है, जो उनके विज़न को धरातल पर उतार रहे हैं:१. सदमार्ग परिवार (Sadmarg Parivar)यह एक वैश्विक परिवार है जो मानव मात्र के भीतर सदाचार, सेवा और करुणा के भाव जगाने का कार्य करता है। 'सदमार्ग' का अर्थ ही है- 'सत्य और धर्म का मार्ग'। इस परिवार के माध्यम से गुरुजी समाज के उपेक्षित वर्गों की सेवा करते हैं और लोगों को मानसिक तनाव, अवसाद (Depression) तथा व्यसनों से मुक्त कर एक संतुलित आध्यात्मिक जीवन जीने की कला सिखाते हैं।२. सनातन विद्या परिषद (Sanatan Vidya Parishad)यह परिषद प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और गुरु-शिष्य परंपरा के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित है। इस परिषद का मुख्य उद्देश्य हमारी विलुप्त हो रही वैदिक विद्याओं, आयुर्वेद के गुप्त सूत्रों, और गऊ-विज्ञान के रहस्यों को युवा पीढ़ी तक पहुँचाना है। गुरुजी का मत है कि जब तक युवा अपनी मूल विद्याओं से नहीं जुड़ेंगे, तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।३. सनातन शक्तिपीठम (Sanatan Shaktipitham)यह संस्थान आध्यात्मिक ऊर्जा, साधना और लोक-कल्याण का एक मुख्य केंद्र है। यहाँ सनातन संस्कृति के अनुसार यज्ञ, अनुष्ठान और मंत्र साधनाओं के माध्यम से वातावरण की शुद्धि और आंतरिक शक्ति के जागरण का कार्य किया जाता है। यह पीठम मानव जाति के कल्याण और विश्व शांति के लिए निरंतर प्रार्थना और सेवा कार्यों में संलग्र रहता है।
चिकित्सा दर्शन "ज्ञान बांटने से ही मिटेगा अज्ञान का अंधकार"आमतौर पर देखा जाता है कि लोग अपनी पारंपरिक चिकित्सा विद्याओं और गुप्त नुस्खों को छिपाकर रखते हैं। परंतु सदमार्ग वाले गुरुजी का विचार इसके ठीक विपरीत है। वे अपने शिविरों और व्याख्यानों में अपने ३५ वर्षों के संचित ज्ञान और अनुभवों को पूरी प्रामाणिकता के साथ दुनिया के सामने खुलकर साझा करते हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि ज्ञान तिजोरियों में बंद रखने के लिए नहीं, बल्कि मानव जाति के दुखों को दूर करने के लिए फैलाया जाना चाहिए।निष्कर्ष: समाज के लिए एक अमूल्य वरदानसदमार्ग वाले गुरुजी डॉ. मनोज शर्मा केवल एक साधारण परामर्शक या आयुर्वेदाचार्य नहीं हैं वे एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक, समाज सुधारक और संस्कृति रक्षक हैं। सनातन शक्तिपीठम, सनातन विद्या परिषद और सदमार्ग परिवार के माध्यम से किए जा रहे उनके कार्य आने वाली कई पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। उनका जीवन और दर्शन हमें याद दिलाता है कि जब प्राचीन ज्ञान को निस्वार्थ सेवा भाव से जोड़ा जाता है, तो वह साक्षात् ईश्वर का रूप ले लेता है।

Address

Sanatan Shaktipeeth, Bhana Brahamanan, Simla Road
Narwana
126116

Telephone

+19253229687

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when हर घर आयुर्वेद posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share