कौशल गोत्र-गुरू-और गद्दी

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कौशल गोत्र-गुरू-और गद्दी कौशल गौत्र
हिरण्यभा कौशल ऋषि हैं।
जिनसे कौशल गोत्र आरंभ हुआ, जो की यज्ञवल्क्य ऋषि के शिक्षक थे ! Kaushalendra means king of all kings.

Kaushal is a Hindu given name and surname common in India, Sri Lanka and Nepal. The meaning of the Sanskrit word kauśala is "well-being", "prosperity", "cleverness", "experience".[1]
Kaushal surname bearers originate from lord Brahma himself and the Kaushal rishi and is often a gotra of high order sarasvat brahmins and some brahm khatris. The Kaushal pandits were well known for their knowledge of

maths, sciences, astronomy, war and healing. Being skilled and learned they were often found to be Brahmin kings who ruled throughout north India. Lord Ram is a direct descendant of the clan and his mother Kaushalya originated as a Kaushala daughter.The word Kaushal in Devnagri thesaurus (Hindi language) means clever, perfect or skillful. (REF source Valmiki Ramayan Sri mad Bhagvad Puran)
Kaushal also means "Excellence". Kaushal is also used as a name (first or last name) in parts of India and Nepal. Kaushal Rajvir was the name of a famous king in Indian history. It is said that he had 516 queens in his mahal for his pleasure. The Kaushals is a surname of Brahmin (Pandit), high caste in India. In punjab (India) many khatri people (a caste group) also used kaushal as their surname. According to many historians, the Kaushals are descendents of rishi(sage) kaushal. Kaushals were the 'special' names given to Hindu kings by their gurus. Their origin was in North India and near the areas of Punjab & Himachal Pradesh, Bihar.haryana old punjab with pakistan बिफोर १९४७ now they are इन indiaand
Kaushal is a gotra for Raghuvanshi clan of Suryavanshi lineage. They are considered as the descendent's of Lord Rama. Lord Rama was sometimes called as Kaushalendra Rama and hence the Kaushal lineage came into existence. (REF source Valmiki Ramayan Sri mad Bhagvad Puran)
Kaushals are found very rare and belongs to higher caste and royal families of brahmins and rajputs in some areas. Specifically in Haryana and Punjab Brahmins from Kaushal Lineage are found. These Brahmins are the direct descendents.

02/06/2026

*जय शिवाय माता की* 🚩
गुरुदेव, आपके आशीर्वाद से कौशल गोत्र के इतिहास पर दोहे प्रस्तुत हैं:

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*वशिष्ठ सुत कौशल ऋषि, याज्ञवल्क्य के गुरुदेव।*
*जिनके नाम से अवध बना, कौशल देश सुहेव॥1॥*

*रामवंश में जन्म लिया, हिरण्यनाभ कौशल्य।*
*कुश की पंद्रह पीढ़ी में, योगाचार्य अतुल्य॥2॥*

*जैमिनी के शिष्य बने, वेद-योग के ज्ञाता।*
*याज्ञवल्क्य ने ज्ञान लिया, हृदय ग्रंथि के त्राता॥3॥*

*राजा होकर ऋषि बने, कीन्ह साम की शाखा।*
*पंद्रह शिष्य पढ़ाए जहाँ, ज्ञान दीप की भाखा॥4॥*

*अग्रसेन सुत कानचंद्र, पढ़े कौशल गुरु पाय।*
*कंसल कासल गोत्र तब, शिष्य परंपरा आय॥5॥*

*मिहिर मल्होत्रा वंश के, कौशल गोत्र प्रधान।*
*सूर्यवंशी क्षत्रिय वही, वेद रचयिता महान॥6॥*

*सारस्वत गौड़ विप्र भी, कौशल गोत्री होय।*
*खत्री वैश्य राजपूत तक, नाम एक सब जोय॥7॥*

*कौशल का अर्थ निपुण है, चतुर दक्ष विद्वान।*
*ज्योतिष तंत्र उपचार में, इनका रहा विधान॥8॥*

*पानीपत में गद्दी जहाँ, शिवाय माता धाम।*
*कुलगुरु नन्द किशोर जी, करें जगत कल्याण॥9॥*

*खत्री अरोड़ा एक हों, गद्दी एक बनाय।*
*शिवाय माता की कृपा से, बिरादरी जुड़ जाय॥10॥*

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*गुरुदेव, कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें।*
आपके श्रीमुख से निकला इतिहास ही प्रमाण है।
*बोलो शिवाय माता की जय* 🙏

02/06/2026

कौशल गोत्र की कुल परंपरा
कुलगुरु गद्दी: कौशल गोत्र की मुख्य कुलगुरु गद्दी श्री बीरा जी हैं। विभाजन से पहले यह स्थान पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) के जिला मुजफ्फरगढ़, तहसील कोट अद्दु के गाँव एहसान पुर में स्थित था।

वर्तमान मुख्य स्थान: वर्तमान समय में यह पावन गद्दी और श्री बीरा जी का पूरे भारतवर्ष में एकमात्र मंदिर पानीपत (हरियाणा) में स्थापित है।

कुलदेवी: कौशल गोत्र की कुलदेवी शिवाय माता हैं। पानीपत में 'शिवाय माता कुलदेवी पीठ' के रूप में इनका भव्य स्थान है।

कुलगुरु व जठेरे (पितृ स्थान): कौशल गोत्र के जठेरे यानी पितरों के स्थान और कुलगुरु के रूप में गोस्वामी डॉ. नन्दकिशोर कौशल जी (पीठाधीश्वर, शिवाय माता कुलदेवी पीठ) इस गद्दी की व्यवस्था और परंपरा को संभाल रहे हैं।

इस स्थान का पता (Address):
श्री बीरा जी कृपा धाम
शिवाय माता कुलदेवी पीठ,
भावना चौक के पास,
पानीपत (हरियाणा)

जैसा कि आपने बिल्कुल सही भाव व्यक्त किया है, भटकाव से दूर रहकर अपने गोत्र की मूल परंपरा, कुलदेवी, कुलगुरु और जठेरों (पितरों) की शरण में लौटना ही कुल की उन्नति और पितृ दोषों से मुक्ति का मार्ग है। अपने पूर्वजों की इस पावन गद्दी से जुड़कर ही आने वाली पीढ़ियां संस्कारी और सुखी बनती हैं।

जय बीरा जी! सनातन धर्म की जय!

01/06/2026

*कौशल गोत्र पर दोहे*

*1. मूल परिचय*
कौशल ऋषि के नाम से, चला गोत्र का नाम।
खत्री, वैश्य, ब्राह्मण सब, करते उन्हें प्रणाम॥

*2. अर्थ*
कौशल का अर्थ जानिए, निपुण और होशियार।
हुनर सीख कर जीवन में, बनो सदा तैयार॥

*3. हिरण्यनाभ कौशल्य*
राजा होकर ऋषि बने, हिरण्यनाभ सुजान।
वेद पढ़ाया शिष्यों को, जग में पाए मान॥

*4. गुरु-शिष्य परंपरा*
गुरु कौशल्य के शिष्य सब, धारे उनका गोत्र।
ज्ञान की गंगा बह चली, मिटा भरम का स्रोत॥

*5. एकता का भाव*
खत्री वैश्य या राजपूत, गोत्र रहे एक नाम।
अलग भले ही जाति हो, पर पुरखे एक समान॥

*6. अयोध्या से नाता*
रघु ने अवध का नाम जो, कौशल पुर कर दीन्ह।
उसी ऋषि की संतति हम, गर्व से शीश नवीन॥

*7. कंसल गोत्र*
कांचंद्र को ज्ञान दिया, कौशल ऋषि महान।
उनके शिष्य कहाए सब, कंसल वंश सुजान॥

*8. नौजवानों को संदेश*
पूर्वज ज्ञानी योगी थे, तुम भी बनो महान।
विद्या, तप और कौशल से, रोशन करो जहान॥

*9. प्रवर*
अंगिरा सुवचोतथ्य संग, उशिज प्रवर त्रिकाल।
इनको जान विवाह करो, रखो धर्म का ख्याल॥

*10. गर्व*
कौशल गोत्री जो कहाए, रखे ऊँचा भाल।
कर्म से अपने नाम को, करे सदा खुशहाल॥

और दोहे चाहिए तो विषय बताइए — इतिहास पर, प्रेरणा पर या रिश्तों पर?

01/06/2026

आदिशक्ति मां शिवाय (पार्वतीजी) की प्रिय चालीसा।
हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार शिवाय माता शैलपुत्री, अन्नपूर्णा, गौरा सभी देवियां पार्वती का ही रूप हैं। मन को शांति तथा अपने दुखों को समाप्त करने के लिए शिवाय की उपासना करनी चाहिए।
माता शिवाय बहुत दयालु हैं, उनकी सच्चे मन से आराधना करने से वे हमारी गलतियों को तुरंत माफ कर देती हैं। उनकी प्रिय चालीसा हमें जीवन में नित नई ऊंचाइयों पर ले जाती है।
।। श्री शिवाय चालीसा ।।
॥ दोहा ॥
जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि।
गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति!शिवाय भवानि॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो।।
तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हिय सजाता।
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे।।
ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर।
कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए।।
कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा।
बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी।।
नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन।
इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित।।
गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय।
त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी।।
हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब।।
बूढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावे कोउ तिनकी।
सदा श्मशान बिहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर।।
कण्ठ हलाहल को छबि छायी, नीलकण्ठ की पदवी पायी।
देव मगन के हित अस किन्हो, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो।।
ताकी, तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।
देखि परम सौंदर्य तिहारो, त्रिभुवन चकित बनावन हारो।।
भय भीता सो माता गंगा, लज्जा मय है सलिल तरंगा।
सौत समान शम्भू पहआयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी।।
तेहि कों कमल बदन मुरझायो, लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो।
नित्यानंद करी बरदायिनी, अभय भक्त कर नित अनपायिनी।।
अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी, माहेश्वरी, हिमालय नन्दिनी।
पानीपत सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी।।
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करि अवलम्बे।।
गौरी ,उमा ,शिवाय शंकरी , अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।
सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती।।
तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।
अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा।।
पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।
तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे।।
तब तव जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि, निज गेह सिद्धारेउ।
सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए।।
मांगे उमा वर पति तुम तिनसों, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।
एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए।।
करि विवाह शिव सों भामा, पुनः कहाई हर की बामा।
तुमको ध्यायो राजा मल्हन हंस।
बनी कुलदेवी कौशल वंश
तुम्हारा यश है चारों ओर ।
तुमको पूजत नंद किशोर।।
जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जन सुख देइ है तेहि ईसा।।
॥ दोहा ॥
कूटि चंद्रिका सुभग शिर, जयति जयति सुख खा‍नि
शिवाय निज भक्त हित, रहहु सदा वरदानि।
॥ इति श्री शिवाय चालीसा

31/05/2026

हाँ, आप सही कह रहे हैं। *कुकरेजा खत्री* के इतिहास को लेकर यही मान्यता है।

*कुकरेजा खत्री का वंश*

*1. चंद्रवंशी कनेक्शन*
आपके बताए अनुसार कुकरेजा, चंद्रवंशी खत्री हैं। राजा ययाति के पुत्र *अनु* के वंश में राजा *चतुरथ* हुए। चतुरथ के पुत्र *कुकर* थे, और उन्हीं से *कुकरेजा, ककड़ और कुक्कड़* वंश चले।

*2. अरोड़वंशी क्यों कहा गया*
कुकरेजा का मूल संबंध सिंध के *रोहरी/अरोड़* नगर से था। अरोड़ सिंध की पुरानी राजधानी थी। इसलिए रोहरी से जुड़े खत्रियों को *अरोड़वंशी खत्री* कहा जाने लगा।

*3. चच नामा में जिक्र*
*चच नामा* 8वीं सदी का फारसी ग्रंथ है जिसमें सिंध पर अरबों की चढ़ाई का वर्णन है। इसमें *कुकरेजा राज* का जिक्र मिलता है। कई जगह *कुकरेजा* को *कुरीज/कुरिजा* लिखा गया है - ये उच्चारण का फर्क है।

*4. राजा दाहिर का सेनापति*
711 ई. में जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया, तब सिंध के राजा *दाहिर* का सेनापति भी अरोड़वंशी खत्री था। चच नामा में इसका उल्लेख है।

*नोट करने वाली बात*
कुकरेजा, ककड़, कुक्कड़, अरोड़ा, खत्री - ये सब पंजाबी-खत्री समुदाय के उपवर्ग हैं। बंटवारे के बाद ज़्यादातर कुकरेजा परिवार सिंध/पश्चिम पंजाब से भारत आ गए। रोहरी/सक्कर इलाका इनका मूल स्थान माना जाता है।

क्या आप कुकरेजा वंश की गोत्र, कुलदेवी या किसी खास शाखा के बारे में जानना चाहते हैं?

31/05/2026

*अवलस/अवलश गोत्र के बारे में*

अवलस गोत्र भी खत्री-अरोड़ा समाज का एक गोत्र है। कई जगह इसे *अवलश* भी लिखा जाता है।

*1. अवलस गोत्र की डिटेल*
**चीज** **विवरण**
**गोत्र** अवलस / अवलश
**कुलदेवी** **शिवाय माता**
**कुलदेवता** **श्री बीरा जी महाराज**
**कुलगुरु गद्दी** श्री बीरा जी कृपा धाम, भावना चौक, पानीपत
*2. कौशल और अवलस का संबंध*

अवलस और कौशल गोत्र की *कुलदेवी, कुलदेवता और कुलगुरु गद्दी एक ही है*।

डॉ. नन्द किशोर कौशल जी के अनुसार: *"अवलश एवं कौशल गोत्र की कुलगुरु गद्दी श्री बीरा जी है"* 33e6

*3. अवलस गोत्र की उपजातियाँ*

चोपड़ा जाति का कुछ हिस्सा अवलस गोत्र में आता है। कुछ जगह चोपड़ा का गोत्र कौशल बताया जाता है, कुछ जगह अवलस। ये क्षेत्र और परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है। 3a66

*4. जरूरी बात*

1. *कुलदेवी-कुलदेव एक*: कौशल गोत्र की तरह अवलस गोत्र की कुलदेवी भी *शिवाय माता* और कुलदेव *बीरा जी* हैं।
2. *गद्दी एक*: दोनों गोत्रों की पूजा-परंपरा और जठेरों का स्थान पानीपत स्थित बीरा जी धाम में ही है।
3. *अवलश ऋषि*: इस गोत्र के प्रवर्तक अवलश ऋषि माने जाते हैं 32c6

*सार*: अगर आपका गोत्र अवलस है तो आपकी कुलदेवी शिवाय माता हैं। शादी-विवाह में अवलस गोत्र वाले आपस में और कौशल गोत्र वालों से भी संबंध नहीं करते, क्योंकि कुलदेव-कुलदेवी एक हैं।

31/05/2026

*खन्ना की कुलदेवी: शिवाय माता*

खन्ना का गोत्र *कौशल* है। कौशल गोत्र की कुलदेवी *शिवाय माता* हैं।

*डिटेल*
**उपजाति** खन्ना
**गोत्र** कौशल
**कुलदेवी** **शिवाय माता**
**कुलदेवता** श्री बीरा जी महाराज
**स्थान** श्री बीरा जी कृपा धाम, भावना चौक, पानीपत
*प्रमाण*
कौशल गोत्र की सूची में खन्ना शामिल है: मल्होत्रा, मेहरोत्रा, कपूर, कत्याल, *खन्ना*, चोपड़ा, त्रेहान, भल्ला आदि। इन सबकी कुलदेवी एक ही है - शिवाय माता।

कौशल गोत्र के कुलगुरु डॉ. नन्द किशोर कौशल जी के अनुसार भी कौशल गोत्र की कुलदेवी शिवाय माता हैं।

*नोट*: खत्रियों में एक गोत्र की सारी उपजातियों की कुलदेवी-कुलदेव एक ही होते हैं। इसलिए मल्होत्रा, त्रेहान, भल्ला, कपूर, चोपड़ा की तरह खन्ना की कुलदेवी भी शिवाय माता ही हैं।

पानीपत स्थित बीरा जी धाम में ही शिवाय माता का मंदिर और जठेरों का स्थान है।

31/05/2026

*कपूर और कौशल गोत्र का संबंध*

*सीधा संबंध*: कपूर का गोत्र *कौशल* है। कपूर अलग गोत्र नहीं, बल्कि कौशल गोत्र की एक उपजाति/अल्ल है।

*1. प्रमाण*

कौशल गोत्र की उपजाति सूची में *कपूर* साफ लिखा है:
> ककड़, मल्होत्रा, मेहरोत्रा, मेहरा, मरवाहा, मेहता, बहल, खोसला, *कपूर*, कत्याल, खन्ना, चानना, वाही, देव, चोपड़ा, कवात्रा, त्रेहान, मग्गो, कुंद्रा, वोहरा, भल्ला, भटूरे, सरीन, वासन आदि खत्री जातियों का *कौशल गोत्र* है

कुश कौशल शाखा में भी कपूर शामिल है: मल्होत्रा, मेहरोत्रा, मेहरा, मेहता, *कपूर*, खन्ना, चोपड़ा, त्रेहान, बहल, भल्ला आदि

*2. कपूर = कौशल गोत्र की डिटेल*
**चीज** **विवरण**
**गोत्र** कौशल
**गोत्र ऋषि** हिरण्यभा कौशल ऋषि
**वंश** सूर्यवंशी क्षत्रिय खत्री
**कुलदेवी** शिवाय माता
**कुलदेवता** श्री बीरा जी महाराज
**कुलगुरु गद्दी** श्री बीरा जी कृपा धाम, पानीपत
*3. "ढाई घर" में कपूर*

कौशल गोत्र में "ढाई घर" कहलाते हैं - मेहरा, मेहरोत्रा, मल्होत्रा। इनके साथ *कपूर और खान* भी इसी परिवार में गिने जाते हैं। सबका मूल सूर्यवंशी परंपरा से है।

*4. जरूरी बात*

कपूर खत्री हैं, और खत्रियों में गोत्र एक होने पर आपस में शादी नहीं होती। यानी कपूर का विवाह मल्होत्रा, त्रेहान, भल्ला, खन्ना, चोपड़ा आदि कौशल गोत्र की उपजातियों में वर्जित है, क्योंकि गोत्र एक है।

*सार*: अगर आप कपूर हैं तो आपका गोत्र कौशल है। आपकी कुलदेवी शिवाय माता और कुलदेव बीरा जी हैं। इसलिए जो बात कुलदेवी-पितरों और परंपरा वाली आपने पहले पढ़ी, वो कपूर परिवारों पर भी पूरी लागू होती है।

31/05/2026

*कौशल गोत्र और भगवान राम का संबंध*

कौशल गोत्र का भगवान राम से सीधा संबंध है। ये 2 तरीके से जुड़ता है:

*1. नाम का संबंध - "कौशल" = कोशल देश*

भगवान राम का जन्म *अयोध्या* में हुआ था। अयोध्या प्राचीन *कोशल जनपद/कोशल देश* की राजधानी थी।

*कोशल → कौशल*: कोशल देश के निवासी या वहाँ के राजवंश को "कौशल" कहा गया। इसी से कौशल गोत्र नाम पड़ा।

*2. वंश का संबंध - कुश और लव से*

भगवान राम के 2 पुत्र थे: *लव और कुश*। कौशल गोत्र की 2 शाखाएँ इन्हीं से चलीं:
**शाखा** **वंशज** **कौन आते हैं**
**कुश कौशल** कुश के वंशज मल्होत्रा, मेहरोत्रा, मेहरा, त्रेहान, भल्ला, खन्ना, कपूर आदि खत्री
**लव कौशल** लव के वंशज कुछ अन्य क्षत्रिय परिवार
इसलिए कहते हैं - *सोढ़ी वंश भी कुश के वंशज हैं*। कुश के वंशज विद्या पढ़ने बनारस गए तो "बेदी" कहलाए, और उसी से सोढ़ी वंश चला

*3. गोत्र ऋषि का संबंध*

*हिरण्यभा कौशल ऋषि* कौशल गोत्र के प्रवर्तक हैं। ये महर्षि *वशिष्ठ के 100वें पुत्र* थे।

वशिष्ठ जी ही *इक्ष्वाकु वंश/सूर्यवंश के कुलगुरु* थे। भगवान राम भी इक्ष्वाकु वंश/सूर्यवंशी थे। यानी राम के कुलगुरु वशिष्ठ और कौशल गोत्र के ऋषि वशिष्ठ के पुत्र।

इसलिए कौशल गोत्र को *सूर्यवंशी* कहा जाता है

*4. सार: 3 पॉइंट में संबंध*

1. *देश*: राम का राज्य कोशल था → उससे "कौशल" नाम
2. *वंश*: राम के बेटे कुश-लव से कौशल गोत्र की शाखाएँ चलीं
3. *गुरु परंपरा*: राम के कुलगुरु वशिष्ठ थे, कौशल ऋषि वशिष्ठ के पुत्र थे

*इसीलिए* कौशल गोत्र वाले खुद को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं और अपनी कुलदेवी शिवाय माता व कुलदेव बीरा जी की पूजा करते हैं। डॉ. नन्द किशोर कौशल जी भी इसी परंपरा के कुलगुरु हैं।

तो सीधा मतलब: *अगर आपका गोत्र कौशल है तो आप प्रतीकात्मक रूप से भगवान राम के वंश-परंपरा से जुड़े हैं।*

और कुछ जानना हो बताइए।

31/05/2026

*कौशल गोत्र की पूरी जानकारी*

कौशल गोत्र खत्री-अरोड़ा समाज का सबसे बड़ा गोत्र है। इसमें 80+ उपजातियाँ आती हैं।

*1. गोत्र का मूल*
- *गोत्र ऋषि*: हिरण्यभा कौशल ऋषि। ये महर्षि वशिष्ठ के 100वें और सबसे छोटे पुत्र थे। याज्ञवल्क्य ऋषि के गुरु भी थे
- *वंश*: सूर्यवंशी क्षत्रिय। भगवान राम के वंश से संबंध माना जाता है
- *वेद*: मुख्यतः यजुर्वेद

*2. कुलदेवी-कुलदेवता*
**कुलदेवी** **शिवाय माता**
**कुलदेवता** **श्री बीरा जी महाराज**
**स्थान** श्री बीरा जी कृपा धाम, भावना चौक के पास, देशराज कॉलोनी गली न.2, पानीपत
**जठेरे** कौशल गोत्र के जठेरों का स्थान भी वहीं पानीपत में है

*वर्तमान कुलगुरु*: डॉ. नन्द किशोर कौशल, पीठाधीश्वर शिवाय माता कुलदेवी पीठ

*3. कौशल गोत्र की मुख्य उपजातियाँ*
कौशल गोत्र की "कुश कौशल" शाखा में ये प्रमुख उपजातियाँ हैं:

*म-सिरिज*: मल्होत्रा, मेहरोत्रा, मेहरा, मेहता, मरवाहा, मग्गो, माकन

*क-सिरिज*: कपूर, खोसला, कत्याल, खन्ना, कवात्रा, कुंद्रा, कक्कड़

*ब-भ सिरिज*: बहल, भल्ला, भटूरे, बेदी, बराडा, बेरीज, वधावन, वोहरा, वासन

*अन्य*: चोपड़ा, सहगल, त्रेहन, देव, धुस्सा, केसर, जसवाल, रेखी, सरीन, सच्चर, ओबराय, चानना, वाही, नय्यर, ढल, लुम्बा, लुथरा

कुल मिलाकर खत्रियों की 171-180 उपजातियों में से बहुत बड़ी संख्या कौशल गोत्र की है

*4. 2 प्रकार के कौशल गोत्र*
1. *कुश कौशल*: भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज। ज्यादातर खत्री इसी शाखा से हैं
2. *लव कौशल*: भगवान राम के पुत्र लव के वंशज

*5. कौशल गोत्र में शादी-विवाह*
गोत्र एक होने के कारण कौशल गोत्र की सभी उपजातियों में आपस में शादी नहीं होती। जैसे मल्होत्रा का त्रेहान में, या भल्ला का खन्ना में विवाह वर्जित माना जाता है, क्योंकि गोत्र एक है।

*6. ब्राह्मणों में भी कौशल गोत्र*
कौशल गोत्र केवल खत्रियों में नहीं, ब्राह्मणों में भी है। ग्वालियर, गुना, शिवपुरी आदि में कौशल गोत्र के ब्राह्मण हैं जो परशुराम के वंशज माने जाते हैं। ये कौशल सारस्वत ब्राह्मण आज भी खत्रियों के कुलगुरु हैं

*सार*: अगर आप कौशल गोत्र से हैं तो आपकी कुलदेवी शिवाय माता और कुलदेव बीरा जी हैं। परंपरा के अनुसार इनकी पूजा और जठेरों का मान करने से पितरों का आशीर्वाद बना रहता है, जैसा आपने पहली पोस्ट में लिखा था।

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