मंज़िल अभी दूर है, चलना जरूर है।

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मंज़िल अभी दूर है, चलना जरूर है। Hometown: Rajkot, Gujarat. Insta ID: dr_aarohi_auham_desani

Doctor & Budding Writer! 🖋️
Writing here Medical Experiences of Dr Aarohi & Dr Auham Desani 🥼🖋️
Dr Auham is currently Working in Rainbow Hospital, Sec 17, Opp Andha Vidyalaya, shri Ganganagar.

साल : 2013। नेपाल की ठंडी पहाड़ियों के बीच हमारी २८ दीन की पारिवारिक यात्रा चल रही थी। रात गहरी हो चुकी थी और चांदनी पहा...
07/12/2025

साल : 2013।
नेपाल की ठंडी पहाड़ियों के बीच हमारी २८ दीन की पारिवारिक यात्रा चल रही थी।
रात गहरी हो चुकी थी और चांदनी पहाड़ों पर बिखरी हुई थी। तभी अचानक हमारी बस ज़ोर से हिली, एक बड़ा झटका लगा और ड्राइवर ने बताया कि टायर पंचर हो गया है। हम एक पेट्रोल पंप के पास रुक गए। हवा में ठंड थी, पर भीतर एक अजीब-सी शांति भी।
उसी शांति के बीच मेरी नज़र कोने में रखे हुए बड़े पत्थर पर बैठे हुए अंकल पर पड़ी, वे हमारे साथ पिछले २० दिनों से इसी बस में थे इसलिए हमारी जान पहचान हो चुकी थी। मैं उनके पास बैठ गई, तब उन्होंने मुजे मुस्कुराते हुए पूछा, "बेटा, क्या तुम भारतीय शास्त्र पढ़ते हो?"

मैंने कहा "जी अंकल, मुजे दिलचस्पी है, लेकिन अब तक रामायण और महाभारत के अलावा कुछ भी पूरा नहीं पढ़ पाई हूं।
क्योंकि बस का पंक्चर ठीक होने में अभी बहुत वक्त था, हम वहीं बैठे रहे
और हमारी बातचीत शुरू हुई—वेदों, गीता, उपनिषदों, और भारत की प्राचीन परम्पराओं पर, जो शायद 2-3 घंटे तक चली । उनकी हर बात में सौम्यता थी, जैसे वे किसी बीते युग से उठकर आए हों।
हमने आसपास देखा, लगभग सारे पैसेंजर जमीन पर कुछ न कुछ बिछाकर सो चुके थे,
तब वह बोले, आज का वार्तालाप यहीं पूर्ण करते हैं, रात बहुत हो चुकी है, फिर अचानक उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा,
"आजका आखरी सवाल, बताओ, वह कौन-सा एक शब्द है जो बताता है कि परमात्मा हर जगह है?"

मैं मौन हो गई। मुझे उत्तर नहीं मालूम था।
उन्होंने धीरे से कहा— “सोऽहम् !"
उन्होंने बताया सोऽहम् का अर्थ—“वही मैं हूँ, मैं वही हूँ”—यह भगवद्गीता का निचोड़ है।
यह सुनते ही मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा—
"ये आँसू आत्मबोध के हैं, इसे सँभाल कर रखना। ज़िंदगी में हर कठिन प्रश्न का जवाब सोऽहम् से जन्म लेगा।”
उस क्षण के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
उस पल से सोऽहम् मेरे भीतर गूंजने लगा। मैं सोचने लगी—
“एक ही ईश्वर सभी में कैसे निवास करता है? सब अलग होते हुए भी एक जैसे कैसे हैं?”
क्योंकी तब में २nd Year की स्टूडेंट थी,मेरी खोज मुझे तुरंत ही एक शब्द तक ले गई— “प्रकृति।”

UG के प्रथम वर्ष में मैंने जाना था कि प्रकृति ही प्रत्येक मनुष्य को विशिष्ट बनाती है। यही संयोजन व्यक्ति का शरीर, मन, व्यवहार, शक्तियाँ, कमजोरियाँ और जीवन यात्रा तय करता है।
और अचानक मुझे समझ आया—
सोऽहम् वह आध्यात्मिक सत्य है जो बताता है कि स्रोत एक है,
प्रकृति वह वैज्ञानिक भाषा है जो बताती है कि अभिव्यक्तियाँ विविध हैं।
वेद कहते हैं—“प्रकृति ही वह देवी है, जिससे शरीर, मन और संसार का ताना-बाना बुना है।”
पुराणों में यह वर्णित है कि व्यक्तित्व का हर अंश पंचमहाभूत और त्रिदोष के संतुलन-असंतुलन से निर्मित होता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“प्रकृतिं स्वाम् अधिष्ठाय...”
अर्थात—प्रकृति के आधार पर मनुष्य कर्म, विचार और प्रवृत्ति में अलग-अलग होता है।
“आहार-विहार मनुष्य की प्रकृति को स्थिर भी करते हैं और विकृत भी। और प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप ही खोराक, व्यवहार और व्यक्ति को पसंद या नापसंद करता है।"
मेरी UG की पढ़ाई 2013 के बाद और 2 साल तक चली। और इन 2 सालो में कई बार ऐसा कुछ न कुछ पढ़ने में आया जो सोऽहम् शब्द की याद दिलाता रहा।

इसके बाद मैंने PG में एडमिशन लिया और धीरे धीरे मैं वह दिन और वह शब्द मैं भूलती गई।

3 साल PG पूरी करने के बाद जीवन स्थिरता की और बढ़ रहा था,तभी एक दिन मेरे जीवन में एक नया अध्याय आया—एक व्यक्ति—औहम।
मैंने उस दिन तक कोई भी व्यक्ति का यह नाम नहीं सुना था।

मेरा उनसे सबसे पहला सवाल यही था “तुम्हारे नाम का क्या अर्थ है?”

बड़ी स्थिरता के साथ उन्होंने जवाब दिया
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—‘I am the One, मैं वही हूं"
मेरा नाम उसी श्लोक से लिया गया है।
और उन्होंने मुस्कुराते हुए जोड़ दिया, यहां पर हमारी बात में इसका मतलब है कि मैं ही ‘the one’ हूँ, "The One for you'"! ”

उस क्षण मेरे भीतर सोऽहम् की वही साल २०१३ की अनुगूँज जाग उठी।
मैंने पहली बार महसूस किया—
“हाँ… शायद यही वह है।”
केवल उनके नाम की वजह से उनसे बातचीत बढ़ती गई।
उनकी सरलता में एक अद्भुत गहराई थी।
कभी लगता कि मेरी प्रकृति की अधूरी पंक्तियाँ उनके भीतर पूरी हो रही हैं।

सोऽहम् मेरी आध्यात्मिक यात्रा था,
औहम मेरी मानवीय यात्रा।

आज, हमारी शादी को "पाँच" साल हो चुके हैं।
जब भी मैं उनका नाम लेती हूं, "औहम", ऐसा लगता है जैसे ब्रह्म का संदेश मेरे जीवन में उतर आया हो—“I am the One.”
और मैं मुस्कुरा उठती हूँ—
क्योंकि सच में,
He is the One! ❤️

वह मेरी पहली नौकरी थी — मेडिकल ऑफिसर के तौर पर। खेमदास हॉस्पिटल में नियुक्ति मिली थी। नई पहचान, नया दायित्व और एक नई दुन...
10/07/2025

वह मेरी पहली नौकरी थी — मेडिकल ऑफिसर के तौर पर। खेमदास हॉस्पिटल में नियुक्ति मिली थी। नई पहचान, नया दायित्व और एक नई दुनिया में प्रवेश।

मैं पूरे जोश के साथ काम में जुटी हुई थी। मरीजों के बीच रहना, जिम्मेदारियाँ निभाना, वरिष्ठों का भरोसा जीतना — सब कुछ जैसे जीवन का सपना पूरा होने जैसा लग रहा था। और फिर एक दिन, मेरी पहली नाइट ड्यूटी लगी।

रात की शिफ्ट।

अस्पताल का माहौल दिन में जितना हलचल भरा होता था, रात को उतना ही शांत और रहस्यमयी। लंबे कॉरिडोर और धीमी रोशनी। मेरे मन में थोड़ा उत्साह था, थोड़ा डर, और बहुत ज़्यादा ज़िम्मेदारी का एहसास।
मैं रात में फीमेल वार्ड में कोने के बेड में ही सोना पसंद करती थी।
रात के क़रीब 11 बजे कुछ नर्सिंग स्टाफ मेरे पास आए। हँसते हुए, एक ने कहा —
मैडम, इस वार्ड में जो मरीज़ है, वो रात को अजीब हरकतें करते है। कभी चुपचाप छत की ओर देखते है, कभी ज़ोर से चिल्लाते है।"
दूसरे ने कहा,
कल रात को दो बजे के आसपास जब हम घूम रहे थे, तब हम ने देखा के वह आपके बेड के आसपास गोल चक्कर काट रहे थे।।
उनकी हँसी और आँखों में मज़ाक साफ़ था, लेकिन मेरे दिल की धड़कन बढ़ने लगी। मुझे नहीं पता क्यों, पर उस पल मुझे वो मज़ाक नहीं लगा — वो मुझे सच लगा।

मैंने खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश की, पर अंदर से घबरा गई थी। हर परछाईं डराने लगी थी, हर आहट चौंका रही थी।

11:45 PM —
मैंने चुपचाप फोन उठाया, बैग लिया और बिना किसी को कुछ बताए अस्पताल से निकल गई।

रात के उस सुनसान रास्ते पर अकेले जाना शायद अस्पताल में रुकने से ज़्यादा ख़तरनाक था — लेकिन उस समय समझने की शक्ति जैसे खत्म हो गई थी। मन में सिर्फ एक बात थी — "यहाँ से निकलो"।

अगली सुबह जब अस्पताल पहुँची, तो अहसास हुआ कि जो डर मैं अपने तक सीमित समझ रही थी, वो अब पूरे अस्पताल में चर्चा बन चुका था।

"मेडिकल ऑफिसर पेशेंट को छोड़ कर भाग गई थीं!"
"प्रिंसिपल सर तक बात पहुँच गई है!"

मुझे हर कोने से हँसी, फुसफुसाहटें, और निगाहें महसूस हो रही थीं।

और सबसे ज्यादा जो बात मुझे डराती थी — वो थे प्रिंसिपल सर।
एक बहुत सुलझे हुए, आदरणीय और अनुशासन प्रिय व्यक्ति।
उन्होंने हमेशा मेरे काम की सराहना की थी — "तुम बहुत अनुशासित हो", "काम में ईमानदारी झलकती है" — ये उनके शब्द थे।

इस घटना के बाद वह जब भी सामने से आते हुए दिखते,तो मैं रास्ता बदल लेती। जैसे एक बच्चा गलती करने पर टीचर से छुपता है — ठीक वैसे ही।

दो तीन दिन बाद उन्होंने मुझे ऑफिस में बुलाया।

मैं चुपचाप उनके सामने बैठ गई, हाथ में एक " एपोलॉजी लेटर"— जिसमें मैंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए लिखा था कि डर के कारण मैं बिना सूचना दिए अस्पताल से चली गई, और इसके लिए मुझे खेद है।
उन्होंने शांत होकर मेरी ओर देखा। फिर बिना कुछ बोले वह एपोलॉजी लेटर मुझे लौटा दिया और हंसते हुए बोले -

"आरोही, इस लेटर की कोई जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारा समर्पण जानता हूँ।
इंसान डरता है, ये गलत नहीं है।
लेकिन जो असली खतरा था, वो अस्पताल में नहीं — सड़क पर था।
तुम्हें जाना ही था, तो मुझे कॉल करती।
मैं ख़ुद आता, तुम्हें छोड़ आता।
मेरी जिम्मेदारी सिर्फ स्टाफ़ की पूर्ति की नहीं, उनकी सुरक्षा की भी है।"

उनकी आँखों में न गुस्सा था, न उपहास — सिर्फ करुणा और स्नेह था।
मेरे गले में कुछ अटक गया। शब्द निकलने से पहले आंखें नम हो चुकी थीं।
मैंने सिर झुका लिया। उस दिन जो सीखा, वो किसी किताब में नहीं लिखा था।

इस एक घटना ने मेरी सोच बदल दी।
डर एक इंसानी भाव है, लेकिन उस डर में जब कोई गुरु आपके साथ खड़ा हो — तो जीवन का सबसे बड़ा सबक मिल जाता है।

आज भी जब मैं पीछे मुड़कर उस रात को देखती हूं, तो सिर्फ डर याद नहीं आता — याद आते हैं वो शब्द, वो समर्थन, और वो एक शिक्षक, जिनकी रोशनी ने मेरे जीवन की पहली नौकरी की सबसे डरावनी रात को सीख में बदल दिया।

उस दिन प्रिंसिपल सर ने जो एपोलोजी लेटर मुझे लौटा दिया था, वो अब मेरे लिए सिर्फ़ एक काग़ज़ का टुकड़ा नहीं था —
वो मेरे आत्मबल का प्रमाण-पत्र बन गया।
मैंने वो पत्र संभाल कर अपने घर के मंदिर में रख दिया।
वहीं जहाँ हर दिन दीया जलता है, वहीं उस पत्र का भी स्थान है —
क्योंकि वो सिर्फ़ एक क्षमा नहीं था,
वो मेरे शिक्षक का विश्वास था,
जो मुझे हर बार मेरे कर्तव्यों की याद दिलाता है।
आज उस घटना को नौ साल हो चुके हैं।
पर जब भी जीवन में कोई दुविधा आती है, जब दुविधाएं मुजे अपने कर्तव्य से दूर खींचने लगती है —
मैं उस पत्र को फिर से पढ़ती हूं।
हर शब्द जैसे फिर से मेरे भीतर जीवन फूंक देता है।

"तुम बहुत मेहनती हो। मैं तुम्हारा समर्पण जानता हूँ।
डर गलत नहीं है, पर तुम्हारा स्थान इस डर से ऊपर है।"

ये शब्द मेरे जीवन के संकल्प बन गए हैं।
शायद इसीलिए कहते हैं —
एक सच्चा शिक्षक सिर्फ़ पढ़ाता नहीं,
वो एक जीवन का मार्गदर्शक बनता है।

आज की यह कहानी का "हीरो" कोई डॉक्टर नहीं है, बल्की, आज जिस फुल्की ( नाम बदला है) की कहानी लिखी जा रही है, उसके मां बाप क...
22/02/2025

आज की यह कहानी का "हीरो" कोई डॉक्टर नहीं है, बल्की, आज जिस फुल्की ( नाम बदला है) की कहानी लिखी जा रही है, उसके मां बाप कोई सुपर हीरो से कम नहीं।

चार पांच दीन पहले की ही बात है, करीब 35-40 साल की उम्र के पति पत्नी अपनी 8-9 साल की लड़की "फुलकी" को दिखाने के लिए डॉक्टर औहम की OPD में आए।

फुलकी के दाई तरफ़ के हाथ और दाई तरफ़ के पैर, दोनो में ही जान नही थी। कई बार गर्भकाल के दौरान या जन्म के समय ऐसी कुछ परिस्थिति आती है, जिससे इंसान के अंग में खामी रह जाती है, कई बार कुछ बीमारियां विरासत में भी मिलती है। क्योंकी फुलकी के मां बाप दोनो ही अपंग थे, उसके केस में भी यही कारण दिख रहा था।

फुलकी के पिता बोले,
" डॉक्टर साहब, आप मेरी बेटी के हाथ और पैर देखिए, जो की बाहर की और मुड़े हुए हैं। क्या ऐसा कोई भी उपाय है जिससे वह सीधे हो जाए, और फुल्की अपना जीवन अच्छे से निकाल पाए? हमने तो अपना जीवन परेशानियों से निकाल लिया, लेकिन हम नहीं चाहते, की फुल्की भी हमारी तरह अपंग रहे..."

पहली नज़र में तो यह केस नामुमकिन नज़र आ रहा था, क्योंकी जन्मजात अपंगता का लगभग केस में कोई उपाय नहीं रहता, फिर भी, फुल्की की अच्छी तरह से जांच करने पर पता चला, की, शायद एक खास प्रकार के ऑपरेशन से फुल्की के पैर को सीधा किया जा सकता है!

डॉ औहम ने, जांच करने के बाद, फुल्की के पापा को ऑपरशन के बारे में समजाते हुए कहा,
" फुल्की के हाथ को तो सही करना अब नामुमकिन है, लेकिन शायद पैर सही हो जाए, ऑपरेशन के बाद वह कितना काम करेगा उसका अंदाजा लगाने के लिए, एडवांस में ही नर्व कंडक्षन स्टडी करवा लेते है, लेकिन, मेरे हिसाब से, आनुवंशिक अपंगता के इलाज की हम ज़्यादा उम्मीद नहीं रख सकते.."

" जी, आपकी एक गलतफहमी है डॉ साहब" फुल्की के पिता बोले...
" फुल्की हमारी अपनी बच्ची नहीं है..."

नम आंखों से, भूतकाल को याद करते हुए उसकी मम्मा ने बताया,..

"भगवान ने मुजे मां बनने का सुख नहीं दिया था, और, हम दोनों के अपंग होने से हमने बांझपन का कोई इलाज भी नहीं करवाया था!"
शादी के कुछ साल बाद, जब जीवन खाली सा लगने लगा, तब हमने एक बच्चा गोद लेने के लिए सोचा।

उसी समय, हमे किसी से खबर मिली की सरकारी हस्पताल में कोई एक नवजात बच्ची को छोड़ कर चला गया है। और हम ने, बिना किसी दुसरे विचार के, फुल्की को गोद ले लिया। उस दिन से, आज तक, हम ने फुल्की को अपनी जान से ज्यादा संभाला है। फुल्की की हाथ और पैर की तकलीफ आनवंशिक है या नहीं, वो हमे नहीं पता है, लेकिन इसका जो भी इलाज होगा, वो उसके मां बाप होने के नाते हम जरूर करवाएंगे...!"

इनकी बात सुनकर डॉ औहम को उनके प्रति अब तक जो दया थी, वह अब सम्मान में बदल गई।
फुल्की का नर्व कंडक्षन स्टडी हुआ, जिसमे पता चला की उसके पैर की नसों में जान बची हुई थी, और ऑपरेशन के बाद उसका पैर "नॉर्मल" होने की काफी संभावना थी।

वैसे तो, हर ऑपरेशन से पहले डॉ औहम ईश्वर से मरीज़ का इलाज सही होने की प्रार्थना करते है, लेकिन फुल्की का ऑपरशन सही करने की उन्होंने भगवान को जिम्मेदारी ही दे दी।
तीन दिन पहले फुल्की का ऑपरशन हुआ है, उसको कुछ दिनों तक प्लास्टर लगा रहेगा, हमारा मानना है, फुल्की की मंजिल अभी दूर है, लेकिन उसे चलना जरूर है.....!

( सत्य घटना )

बुरे वक्त में जोतुमसे जुदा ना हो,गौर से देखनाकहीं बंदा-ए-खुदा ना हो..!!मनोज (नाम बदला है) अपनी मम्मी को हाथलारी में सुला...
12/12/2024

बुरे वक्त में जो
तुमसे जुदा ना हो,
गौर से देखना
कहीं बंदा-ए-खुदा ना हो..!!

मनोज (नाम बदला है) अपनी मम्मी को हाथलारी में सुलाकर शाम के समय हॉस्पिटल पहुंचा! शायद उसके पास अपनी माता को हॉस्पिटल ले जाने के लिए एंबुलेंस या ऑटो रिक्शा करने तक के पैसे नही बचे थे! पीछले तीन चार दिन से वह अपनी माता को लेकर अलग अलग हॉस्पिटल जा रहा था, जिससे उसको शायद दिहाड़ी करने का वक्त भी नहीं मिल पाया था! अब तक की जमा पूंजी उसकी सारी हॉस्पिटल के चक्कर काटने में ही खत्म हो चुकी थी।
उसने आते ही तीन चार दिन में माता के जितने भी रिपोर्ट्स अलग अलग हॉस्पिटल में की गए थे जो की एक कपड़े की पुरानी थैली में रखे हुए थे, वह सारे डॉ. औहम के सामने रख दिए।
मनोज ने वह रिपोर्ट्स दिखाते हुए विनती, निराशा और डर की आवाज़ में बताया-
"डॉ साहब, मेहरबानी आप मेरी मां को चेक करके बताइए, क्या इनका ऑपरेशन यहां हो पाएगा? पीछले चार दिन से में हर जगह घूमते हुए इधर आया हूं, यहां तक की सरकारी हॉस्पिटल में से भी मना कर दिया गया है, अब हमारे पास जाने के लिए कोई जगह ही नहीं बची है, इतना बोलते बोलते उसकी आंखों में आंसु आ गए, और बेबस होकर ओपीडी में ही उल्टा घूम कर रोने लग गया! शायद वह अपने आंसु दिखाना नहीं चाहता था।

इतनी बात हुई तब तक हॉस्पिटल स्टाफ मनोज की मां को स्ट्रेचर में डाल कर एमरजेंसी में ले आए थे। लगभग बेहोश दिखने वाली, एक बूढ़ी औरत, जिसका एक पैर चार दिन पुराने फ्रेक्चर की वजह से बिल्कुल सूज गया था, और वह दर्द से कराह रही थी।
फ्रेक्चर तो बिलकुल आसान सा दिख रहा था, फिर सभी डॉ मना क्यों कर रहे थे? यह बात जब डॉ औहम ने मनोज से पूछी तब उसने बताया,

हमे तो पता नहीं साहब, सब बोल रहे है की मां को कैंसर है, जबकि हमे तो आज तक इस बात का पता नही था। आप ही रिपोर्ट्स पढ़ लीजिए।

मनोज की बात सुनकर जब डॉ औहम ने फाइल देखी तब पता चला, उनको सच में ही कैंसर था, जो की दोनो ही फेफड़ों में फैल चुका था! जिससे माता को ऑक्सीजन लेवल लगातार निचे गिर रहा था, ऐसी हालत में ऑपरेशन करने से मरीज़ की जान को खतरा दस गुना बढ़ जाता है।
यह सोचकर डॉ औहम ने भी उनको आगे भेज देने के लिए सोचा, तभी मनोज बोल पड़ा:

" साहब, मेरी मां को मैं इन हालात में देख नही पा रहा हूं, और तो और मेरी बीवी घर पे अकेली है, वह प्रेगनेंट है उसे ८वा महीना चालू है,मेरी दिहाड़ी रुक गई है, मुझे समझ नही आ रहा में क्या करूं? कहां जाऊ?"

मनोज की दयनीय दशा देखकर डॉ औहम ने होंसला देते हुए कहा,
मैं तुम्हारे लिए एक कोशिश जरूर करूंगा, लेकिन मैं सौ प्रतिशत जिम्मेदारी नहीं दे सक्ता, सब कुछ भगवान के हाथो में ही है।

क्यूंकि माता के सारे रिपोर्ट्स पहले से हुए ही थे, उनको तुरंत दाखिल किया गया और दूसरे दिन उनका बहुत नाजुक हालात में ऑपरेशन हुआ। ऑपरशन के दौरान बहुत परेशानीयां हुई, माता का ऑक्सीजन बहुत नीचे गिर रहा था, लेकिन फिर भी, वह ऑपरेशन को बहुत हिम्मत के साथ, कम से कम समय में पूर्ण किया गया और तो और वह ऑपरेशन मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत बिलकुल मुफ्त में किया गया!

ऑपेरशन के दुसरे दिन मनोज को डॉ औहम ने समझाया,
" देख मनोज, मेरा काम तो मैने कर दिया है, लेकिन अभी खतरा टला नहीं है, तुम्हें अब कैंसर का इलाज करने के लिए माता को अवश्य आगे ले ही जाना पड़ेगा! कुछ दिनों की दवाई और आराम का प्रिस्क्रिप्शन देकर कैसे और कहा जाना होगा वह सब समझाकर मनोज की माता को छुट्टी दे दी गई।

यह बात डॉ औहम लगभग भूल ही चुके थे, और एकाद महीने बाद मनोज अकेला ओपीडी में आया, उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था,

डॉ साहब, परसो बिटिया हुई है, आपने बुरे वक्त में हमारा साथ दिया, इसलिए सबसे पहले आपके लिए मिठाई लेकर आया हूं,
मिठाई लेने से पहले डॉ औहम ने माता के बारे में पूछा,
तब मनोज ने बताया,
माता का पैर तो बिलकुल ठीक है, दवाई से उनकी कमजोरी भी कुछ ठीक हुई है, लेकिन अभी तक हम उनके कैंसर का इलाज करवाने हम जा नही पाए, घर में उनके पीछे जा सके ऐसा फिलहाल कोई भी नही है......"

वो बात वहीं रुक गई....
अब हम सोच रहे है, की वह मिठाई खाए या नहीं????

16/09/2024

यह कहानी लिखते लिखते मेरे मन में फिल्म "बूट पॉलिश" के बच्चे बेलू और भोला दिखाई दे रहे है, हो सकता है कहानी खत्म होने तक, शायद आप भी गुनगुनाएं...... "मुट्ठी में है तकदीर हमारी., हमने किस्मत को बस में किया है...!"

हर शनिवार की तरह, पीछले शनिवार भी डॉ. औहम श्री गंगानगर, राजस्थान से 50 कि.मी. की दूरी पर आए गांव अबोहर में मेडिकल कैंप लगाने गए हुए थे। वैसे तो कैम्प का समय 10-1 का रहता है, लेकिन उस शनिवार पेशेंट कुछ ज्यादा होने की वजह से अबोहर में ही 2.30 बज चुके थे।
सारे मरीजों की जांच खत्म होने पर, डॉ औहम ने अपने साथ आए हुए स्टाफ के साथ अबोहर में ही लंच करने का मन बनाया, और वह सभी अबोहर से 20-25km दूर हाई-वे पर एक ढाबे पर खाना खाने के लिए रुक गए।
भरी दोपहर सब के पेट में चूहे कूद रहे थे, अपना ऑर्डर आने का इंतजार कर सब बैठे हुए थे तभी फ़ोन की रींग बजी....स्क्रीन पर कोई unknown number था, पहले तो डॉ औहम ने सोचा, रहने देते है, Car Insurance Policy का नंबर लग रहा है, फिर विचार किया, जब तक खाना नहीं आता, क्यों न बात ही कर ली जाए.....?
जैसे ही फोन उठाया,
सामने से किसी आधेड़ उम्र के इंसान की आवाज़ आई...
" डॉ साहब, आप जल्दी नीचे आ जाइए, हम एक 6 साल के बच्चे को एम्बुलेंस में डालकर लेकर आ रहे है, उसका सज्जा हाथ वॉशिंग मशीन के ड्रायर में आ गया है, उसकी हाथ की हड्डी पूरी ड्रायर के साथ गोल घूमकर फट चुकी है, हाथ उल्टा हो गया है और बहुत खून भी बह रहा है....हम शायद 20-25 मिनट में पहुंच जाएंगे...!"

फोन करने वाले को यह तो पता था कि डॉ औहम हॉस्पिटल में ही रहते है इसलिए कोई भी इमरजेंसी आने पर २ मिनट में पहुंच सकते है, लेकिन उसको शायद यह नहीं पता था, की शनिवार को वह कैंप में रहते है....

उनके आने में 20-25 मिनट का अभी भी वक्त था, जरा सा भी वक्त बरबाद किए बिना पूरे स्टाफ के साथ डॉ. औहम खाने का ऑर्डर कैंसल कर हॉस्पिटल की ओर निकल पड़े...

गाड़ी तेज चलाते हुए वह सोच रहे थे की जब वह पहुंचेंगे तब बच्चा बहुत जोरो से रो रहा होगा, उसकी मां उसे सहला रही होगी, टोफि दे कर उसके पापा उसको चुप कराने की कोशिश कर रहे होंगे...
लेकिन जब वह हॉस्पिटल पहुंचे तो जैसा माहौल मन में सोच रखा था, उनसे कुछ अलग ही नजर आया...
खून से लथपथ उल्टा घुमा हुआ हाथ लेकर एक मजदूर का बच्चा हॉस्पिटल के इमरजेंसी रूम में बिल्कुल शांति से लेटा हुआ था..
उसके गरीब मां बाप को उसे चुप कराने की कोई जरूरत नहीं पड़ रही थी..!
अक्सर गरीब बच्चो में उम्र से पहले ही बचपन खत्म हो जाता है, उसका एक और उदाहरण सामने बैठा हुआ था!

उसके पापा ने आकर डॉ औहम से बात की,
" मेरा बेटा "भोला" बहुत ही समझदार है डाक्टर साहब, मेरे साथ मजदूरी करने आता है, मुजे सारे काम में मदद करवाता है। मैं जहां पर काम करने जाता हूं, वहा पर कपड़े धोने की मशीन लगी हुई है, जिसका ड्रायर घूम रहा था, और इसने कुतुहलवश उसमे हाथ डाल दिया... आप अगर इसका हाथ बचा ले तो हम पर बड़ी मेहरबानी होगी , अगर इसका हाथ नहीं बचा, तो यह कमाएगा क्या?"

इमरजेंसी रूम में 2-3 मिनट में सब चेक कर, भोले को X-ray करवाने भेजा गया।
X-Ray आने पर पता चला की भोले की हाथ की हड्डी जहां से टूटी थी, वही पर से हाथ की कलाई, हथेली एवम ऊंगलीओ को जान देने वाली एक चेता तंतु (Nerve) निकलती है, अगर उस Nerve को चोट लग जाए, तो इंसान का कलाई से आगे का हाथ का पंजा आजीवन काम करना बंद कर सकता है।

सारी जांच करवाने के बाद 6 साल के भोले को ऑपरेशन के लिए ऑपरेशन थिएटर में लिया गया!
हर प्रकार की जटिल सर्जरी से पहले मरीज को बेहोशी एवम नींद का टीका लगाया जाता है ताकि मरीज़ को सर्जरी के दौरान किसी भी तरह की पीड़ा महसूस न हो।
जब बेहोशी का टीका अपनी असर दिखाने की शुरुआत करता है तब इंसानी दिमाग एक ऐसी अवस्था में पहुंचता है जहां उसको अपने आस पास की कोई सूझ बूझ नही रहती, नाही हकीकत का कोई ध्यान रहता है..
ऐसा ही बेहोशी का टीका भोले को भी लगाया गया, बेहोशी की असर हो रही है या नही उसकी तसल्ली के लिए डॉ.औहम ने उसको पूछा...
" भोले, तुजे यह चोट कैसे लगी?"
तब 6 साल के बच्चे ने बेहोशी की असर में जवाब दिया...
"मैं..मैं.. धूम बाइक चला रहा था, बाइक पर से गिर गया और.. और.. मेरी हड्डी....!"

इतना बोलते बोलते भोला गहरी नींद में सो गया, और उसका एक जटिल एवम लंबा ऑपरेशन हुआ।
ऑपरेशन के दौरान उस चेता तंतु जिसकी चौड़ाई धागे के समान होती है, उसको बहुत बारीकी से संभाल कर अपनी जगह रखा गया और फटी हुई हड्डी को जोड़ने के लिए प्लेट लगाई गई।
ऑपरेशन के बाद डॉ औहम ने घर आकर मुजे खाना खाते वक्त सारी बात बताते हुए कहा, ऑपरेशन तो बहुत अच्छा हुआ है, लेकिन उसकी सक्सेस तभी मिलेगी जब आज रात को भोले का राउंड होगा तब अगर भोला अपनी कलाई मोड़ लेगा, और अपनी सारी उंगली दबा कर सही से हाथ की मुट्ठी बना लेगा...!"

रात के राउंड में जब डॉ औहम ने दूर से भोले को देखा तब वो उसी हाथ की मुट्ठी में अपनी मम्मी की सारी का पल्लू कसकर पकड़कर सोया हुआ था। नज़दीक जाकर उन्होंने भोले की मम्मी को भोले को उठाने का इशारा किया।
उठते ही डॉ औहम ने भोले को हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया, जिसके पीछे का उद्देश उसके हाथ की मूवमेंट चेक करना था।
भोले को अच्छे से हाथ हिलाता, और मुठ्ठी बंद करता देख उनको चैन आया, अगर आज भोला मुठ्ठी बंद न कर पाता, तो भोले के पापा आजीवन इसी चिंता में रहते की भोला कैसे कमाएगा?
राउंड खत्म कर वो तुंरत घर आए तो मैंने पूछा, भोला कैसा है?
उन्होंने बस गुनगुनाते हुए जवाब दिया...
" नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है??? मुठ्ठी में है तकदीर हमारी.....हमने किस्मत को बस में किया है..!"

*Imageforreferencepurposeonly

Doctor & Budding Writer! 🖋️
Writing here Medical Experiences of Dr Aarohi & Dr Auham Desani 🥼🖋️
Dr Auham is currently Working in Rainbow Hospital, Sec 17, Opp Andha Vidyalaya, shri Ganganagar.
Hometown: Rajkot, Gujarat.
Insta ID: dr_aarohi_auham_desani

अगर उस महिला डॉक्टर की आत्मा हम से कुछ बोलना चाहती तो शायद यही बोलती ...👇🏻👇🏻👇🏻हां, में जूठ बोलती हुं। आप "कैसी थी किस्मत...
17/08/2024

अगर उस महिला डॉक्टर की आत्मा हम से कुछ बोलना चाहती तो शायद यही बोलती ...👇🏻👇🏻👇🏻

हां, में जूठ बोलती हुं।
आप "कैसी थी किस्मत?" पुछ कर तो देखो..
पुछकर तो देखो, कितना दर्द मेहसूस था किया?
जब बंद कमरे में मुझे मिली मौत की सजा?
हौसला न में रख पाई,
अंदर ही अंदर घबराई,
मैं चीखी चिल्लाई,
पर
दरिंदो से जीत ना पाई,
हां मैं जूठ बोलती हूं,
आप , "कितनी थी हिम्मत?" पुछकर तो देखो...

मिली थी जो जिन्दगी जी लेना चाहती थी,
मरीजों की तकलीफों को कम करना चाहती थी,
पूछती हूं ईश्वर से एक ही सवाल,
जब दिया मुझे द्रौपदी का अवतार,
तो क्यों नहीं भेजा कोई कृष्ण भरतार?
हां मैं जूठ बोलती हूं,
आप " कितनी की थी मन्नत?" पुछकर तो देखो..

करती हुं न्याय शास्त्र से एक ही request,
आपके लिए होगी कल लडकी कोई next,
पर मेरी तो झिंदगी का गौरव है आपके हाथो में,
हो सके तो दर्द पढ लेना मेरे मांबाप की आँखों में..
लफ्झो से उन्हे पूछोगे तो रहेगा ऐसा रूआब,
जी लेंगे अब वो पहन के चुप्पी का नकाब,
खैर,
हुआ तो वही जो तकदीर में था लिखा,
रहा है न कोई अब शिकवा न गिला..
हां में जूठ बोलती हुं,
आप "कितनी थी हिम्मत?" पूछकर तो देखो..

हां में जूठ बोलती हुं,
आप "कैसी थी किस्मत?" पूछकर तो देखो....!

R.G.Kar Hospital में हुए हादसे में पीड़ित महिला डॉक्टर को मेरी भावनात्मक श्रद्धांजलि 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
- डॉ आरोही देसानी.

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