07/12/2025
साल : 2013।
नेपाल की ठंडी पहाड़ियों के बीच हमारी २८ दीन की पारिवारिक यात्रा चल रही थी।
रात गहरी हो चुकी थी और चांदनी पहाड़ों पर बिखरी हुई थी। तभी अचानक हमारी बस ज़ोर से हिली, एक बड़ा झटका लगा और ड्राइवर ने बताया कि टायर पंचर हो गया है। हम एक पेट्रोल पंप के पास रुक गए। हवा में ठंड थी, पर भीतर एक अजीब-सी शांति भी।
उसी शांति के बीच मेरी नज़र कोने में रखे हुए बड़े पत्थर पर बैठे हुए अंकल पर पड़ी, वे हमारे साथ पिछले २० दिनों से इसी बस में थे इसलिए हमारी जान पहचान हो चुकी थी। मैं उनके पास बैठ गई, तब उन्होंने मुजे मुस्कुराते हुए पूछा, "बेटा, क्या तुम भारतीय शास्त्र पढ़ते हो?"
मैंने कहा "जी अंकल, मुजे दिलचस्पी है, लेकिन अब तक रामायण और महाभारत के अलावा कुछ भी पूरा नहीं पढ़ पाई हूं।
क्योंकि बस का पंक्चर ठीक होने में अभी बहुत वक्त था, हम वहीं बैठे रहे
और हमारी बातचीत शुरू हुई—वेदों, गीता, उपनिषदों, और भारत की प्राचीन परम्पराओं पर, जो शायद 2-3 घंटे तक चली । उनकी हर बात में सौम्यता थी, जैसे वे किसी बीते युग से उठकर आए हों।
हमने आसपास देखा, लगभग सारे पैसेंजर जमीन पर कुछ न कुछ बिछाकर सो चुके थे,
तब वह बोले, आज का वार्तालाप यहीं पूर्ण करते हैं, रात बहुत हो चुकी है, फिर अचानक उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा,
"आजका आखरी सवाल, बताओ, वह कौन-सा एक शब्द है जो बताता है कि परमात्मा हर जगह है?"
मैं मौन हो गई। मुझे उत्तर नहीं मालूम था।
उन्होंने धीरे से कहा— “सोऽहम् !"
उन्होंने बताया सोऽहम् का अर्थ—“वही मैं हूँ, मैं वही हूँ”—यह भगवद्गीता का निचोड़ है।
यह सुनते ही मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा—
"ये आँसू आत्मबोध के हैं, इसे सँभाल कर रखना। ज़िंदगी में हर कठिन प्रश्न का जवाब सोऽहम् से जन्म लेगा।”
उस क्षण के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
उस पल से सोऽहम् मेरे भीतर गूंजने लगा। मैं सोचने लगी—
“एक ही ईश्वर सभी में कैसे निवास करता है? सब अलग होते हुए भी एक जैसे कैसे हैं?”
क्योंकी तब में २nd Year की स्टूडेंट थी,मेरी खोज मुझे तुरंत ही एक शब्द तक ले गई— “प्रकृति।”
UG के प्रथम वर्ष में मैंने जाना था कि प्रकृति ही प्रत्येक मनुष्य को विशिष्ट बनाती है। यही संयोजन व्यक्ति का शरीर, मन, व्यवहार, शक्तियाँ, कमजोरियाँ और जीवन यात्रा तय करता है।
और अचानक मुझे समझ आया—
सोऽहम् वह आध्यात्मिक सत्य है जो बताता है कि स्रोत एक है,
प्रकृति वह वैज्ञानिक भाषा है जो बताती है कि अभिव्यक्तियाँ विविध हैं।
वेद कहते हैं—“प्रकृति ही वह देवी है, जिससे शरीर, मन और संसार का ताना-बाना बुना है।”
पुराणों में यह वर्णित है कि व्यक्तित्व का हर अंश पंचमहाभूत और त्रिदोष के संतुलन-असंतुलन से निर्मित होता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“प्रकृतिं स्वाम् अधिष्ठाय...”
अर्थात—प्रकृति के आधार पर मनुष्य कर्म, विचार और प्रवृत्ति में अलग-अलग होता है।
“आहार-विहार मनुष्य की प्रकृति को स्थिर भी करते हैं और विकृत भी। और प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप ही खोराक, व्यवहार और व्यक्ति को पसंद या नापसंद करता है।"
मेरी UG की पढ़ाई 2013 के बाद और 2 साल तक चली। और इन 2 सालो में कई बार ऐसा कुछ न कुछ पढ़ने में आया जो सोऽहम् शब्द की याद दिलाता रहा।
इसके बाद मैंने PG में एडमिशन लिया और धीरे धीरे मैं वह दिन और वह शब्द मैं भूलती गई।
3 साल PG पूरी करने के बाद जीवन स्थिरता की और बढ़ रहा था,तभी एक दिन मेरे जीवन में एक नया अध्याय आया—एक व्यक्ति—औहम।
मैंने उस दिन तक कोई भी व्यक्ति का यह नाम नहीं सुना था।
मेरा उनसे सबसे पहला सवाल यही था “तुम्हारे नाम का क्या अर्थ है?”
बड़ी स्थिरता के साथ उन्होंने जवाब दिया
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—‘I am the One, मैं वही हूं"
मेरा नाम उसी श्लोक से लिया गया है।
और उन्होंने मुस्कुराते हुए जोड़ दिया, यहां पर हमारी बात में इसका मतलब है कि मैं ही ‘the one’ हूँ, "The One for you'"! ”
उस क्षण मेरे भीतर सोऽहम् की वही साल २०१३ की अनुगूँज जाग उठी।
मैंने पहली बार महसूस किया—
“हाँ… शायद यही वह है।”
केवल उनके नाम की वजह से उनसे बातचीत बढ़ती गई।
उनकी सरलता में एक अद्भुत गहराई थी।
कभी लगता कि मेरी प्रकृति की अधूरी पंक्तियाँ उनके भीतर पूरी हो रही हैं।
सोऽहम् मेरी आध्यात्मिक यात्रा था,
औहम मेरी मानवीय यात्रा।
आज, हमारी शादी को "पाँच" साल हो चुके हैं।
जब भी मैं उनका नाम लेती हूं, "औहम", ऐसा लगता है जैसे ब्रह्म का संदेश मेरे जीवन में उतर आया हो—“I am the One.”
और मैं मुस्कुरा उठती हूँ—
क्योंकि सच में,
He is the One! ❤️