आयुर्वेदिक चकित्सा और घरेलू नुस्खे 2

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मेदहर आरोग्य चूर्ण”मोटापा कमने के लिऐ ( मेदहर आरोग्य चूर्ण। ) इस योग का परिचय तो इसके नाम से ही प्रकट हो जाता है आरोग्य ...
27/08/2026

मेदहर आरोग्य चूर्ण”
मोटापा कमने के लिऐ ( मेदहर आरोग्य चूर्ण। ) इस योग का परिचय तो इसके नाम से ही प्रकट हो जाता है आरोग्य प्रदान करनेवाले और स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले इस योग का नामकरण बहुत सोच समझ कर किया गया है क्योंकि यह योग अनेक रोगों और शारिरीक विकृतयों को दूर कर निस्सन्देह आरोग्य का वर्धन करता है आज भी यह योग आयुर्वेदिक चिकित्सक वौद्दों का प्रिय और विश्वास भाजन बना हुआ है।
घटक द्रव्य-- शुध्द गन्धक, शहस्त्र फुटी लोह भस्म, अभ्रक भस्म,ताम्र भस्म, जीरा, लौंग,दालचीनी, आजवाइन, दारुहरिद्रा, चित्रक,नागोरमोथा,बायविडंग,10--10 ग्राम त्रिफला 300 ग्राम,
शुध्द शीलाजीत 30 ग्राम, शुध्द गुगल 40 ग्राम, चित्रक मूल की छाल 40 ग्राम और कुटकी 60 ग्राम सबको विधि पूर्वक मिल कर , नीम के पत्तों के रस में तिन दीन तक खरल करके सुखाले बस, आरोग्य चूर्ण तैयार है उपयोग-- यह वात पित या कफ जनित ज्वर और कुष्ठ रोग की प्रसिद्ध औषधि है । यह पाचक ,दीपन,पथ्य कारक,हदय के लिये हितकारी, मेद (चर्बि) घटाने वाली, मलशुध्दिकारक,भूख बढने वाली और आमतौर से सभी रोगों का शमन करने वाली श्रेष्ठ औषधि है यह प्रत्येक घर में रखी जाने योग्य "यथानाम तथा गुण " वाली श्रेष्ठ आयुर्वेदिक औषधि है जिसका सेवन किसी भी ऋतु में, किसी भी आयु वाले व्दारा किया जा सकता है। जिन जिन व्याधियोन को दूर करने के लिए निरापद रूप से इसे सेवन कर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।। यह
मेदहर आरोग्य चूर्ण”
अगर आप बनाने में असमर्थ है तो हमसे बनी बनाई मंगवा सकते हैं।
हमारा संफर्क सुत्र 079889 28708
वैद्य मोनू महरोलिया https://whatsapp.com/channel/0029Vb86BgR4yltTZenQl51t

कोलेस्ट्रॉल कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर के लिए जरूरी वसा है—समझिए पूरा सच!आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में “कोलेस्ट्रॉल” शब्...
22/08/2026

कोलेस्ट्रॉल कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर के लिए जरूरी वसा है—समझिए पूरा सच!

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में “कोलेस्ट्रॉल” शब्द सुनते ही लोग डर जाते हैं। किसी की रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल बढ़ा मिले तो तुरंत दवा शुरू करने की चिंता होने लगती है। लेकिन सच्चाई यह है कि कोलेस्ट्रॉल स्वयं कोई बीमारी नहीं है। यह शरीर के लिए आवश्यक मोमी पदार्थ है, जो कोशिकाओं की संरचना, कुछ हार्मोन और विटामिन-D के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समस्या तब होती है जब रक्त में कुछ प्रकार के लिपिड का स्तर लंबे समय तक असंतुलित रहता है।

कोलेस्ट्रॉल के प्रकार समझना जरूरी

लिपिड प्रोफाइल में मुख्य रूप से Total Cholesterol, LDL, HDL और Triglycerides देखे जाते हैं। LDL को आमतौर पर “खराब” कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि इसका अधिक स्तर धमनियों में प्लाक बनने के जोखिम से जुड़ा है। वहीं HDL को “अच्छा” कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है, क्योंकि यह अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को वापस लीवर तक पहुंचाने में मदद करता है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केवल Total Cholesterol देखकर हृदय रोग का जोखिम तय नहीं किया जा सकता। उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास और अन्य स्वास्थ्य कारकों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के प्रमुख कारण

अधिक संतृप्त वसा और ट्रांस फैट वाला भोजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा, धूम्रपान, अत्यधिक शराब, मधुमेह और आनुवंशिक कारण कोलेस्ट्रॉल असंतुलन में भूमिका निभा सकते हैं। केवल “तला-भुना खाना” ही इसका कारण नहीं होता।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद में आधुनिक अर्थों वाला LDL या HDL सीधे वर्णित नहीं है। कुछ आयुर्वेदिक अवधारणाओं, जैसे मेद धातु, अग्नि और आम, को आधुनिक चयापचय संबंधी समस्याओं से जोड़कर समझाया जाता है, लेकिन इन्हें सीधे LDL का समानार्थी मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

परंपरागत रूप से लहसुन, मेथी, त्रिफला, जौ और कुछ अन्य वनस्पतियों का उपयोग आहार या औषधीय संदर्भ में किया जाता रहा है। आधुनिक शोध में भी कुछ खाद्य पदार्थों के संभावित लाभ मिले हैं, लेकिन ये डॉक्टर द्वारा निर्धारित कोलेस्ट्रॉल की दवा का विकल्प नहीं हैं।

दवा से ज्यादा महत्वपूर्ण है दिनचर्या

रोजाना कम-से-कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि, वजन को स्वस्थ सीमा में रखना, फाइबर से भरपूर भोजन लेना, सब्जियां और साबुत अनाज खाना तथा धूम्रपान से बचना हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। ओट्स और जौ में मौजूद घुलनशील फाइबर LDL कम करने में सहायक हो सकता है।

किन चीजों को सीमित करें?

ट्रांस फैट, अत्यधिक संतृप्त वसा, पैकेज्ड स्नैक्स, बेकरी उत्पाद, अत्यधिक मीठे पेय और बार-बार डीप-फ्राइड भोजन को सीमित करना बेहतर है।

निष्कर्ष:
कोलेस्ट्रॉल शरीर का दुश्मन नहीं है; उसका असंतुलन समस्या बन सकता है। सही लिपिड प्रोफाइल, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह—यही हृदय स्वास्थ्य की सबसे भरोसेमंद रणनीति है।

🌿 हमारे पास कोलेस्ट्रॉल के लिए आयुर्वेदिक औषधि तैयार उपलब्ध है।

🇮🇳 पूरे भारत में डिलीवरी की सुविधा उपलब्ध।
🎁 पहले महीने से 60% तक आरंभिक छूट मिलेगी।

M.B Ayurveda – Trusted Ayurvedic Care
वैद्य मोनू महरोलिया
📞 7988928708
https://whatsapp.com/channel/0029Vb86BgR4yltTZenQl51t

नोट: यदि आप पहले से कोलेस्ट्रॉल या हृदय रोग की दवा ले रहे हैं, तो चिकित्सकीय सलाह के बिना अपनी चल रही दवा बंद या कम न करें।कोलेस्ट्रॉल कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर के लिए जरूरी वसा है—समझिए पूरा सच!

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में “कोलेस्ट्रॉल” शब्द सुनते ही लोग डर जाते हैं। किसी की रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल बढ़ा मिले तो तुरंत दवा शुरू करने की चिंता होने लगती है। लेकिन सच्चाई यह है कि कोलेस्ट्रॉल स्वयं कोई बीमारी नहीं है। यह शरीर के लिए आवश्यक मोमी पदार्थ है, जो कोशिकाओं की संरचना, कुछ हार्मोन और विटामिन-D के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समस्या तब होती है जब रक्त में कुछ प्रकार के लिपिड का स्तर लंबे समय तक असंतुलित रहता है।

कोलेस्ट्रॉल के प्रकार समझना जरूरी

लिपिड प्रोफाइल में मुख्य रूप से Total Cholesterol, LDL, HDL और Triglycerides देखे जाते हैं। LDL को आमतौर पर “खराब” कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि इसका अधिक स्तर धमनियों में प्लाक बनने के जोखिम से जुड़ा है। वहीं HDL को “अच्छा” कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है, क्योंकि यह अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को वापस लीवर तक पहुंचाने में मदद करता है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केवल Total Cholesterol देखकर हृदय रोग का जोखिम तय नहीं किया जा सकता। उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास और अन्य स्वास्थ्य कारकों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के प्रमुख कारण

अधिक संतृप्त वसा और ट्रांस फैट वाला भोजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा, धूम्रपान, अत्यधिक शराब, मधुमेह और आनुवंशिक कारण कोलेस्ट्रॉल असंतुलन में भूमिका निभा सकते हैं। केवल “तला-भुना खाना” ही इसका कारण नहीं होता।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद में आधुनिक अर्थों वाला LDL या HDL सीधे वर्णित नहीं है। कुछ आयुर्वेदिक अवधारणाओं, जैसे मेद धातु, अग्नि और आम, को आधुनिक चयापचय संबंधी समस्याओं से जोड़कर समझाया जाता है, लेकिन इन्हें सीधे LDL का समानार्थी मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

परंपरागत रूप से लहसुन, मेथी, त्रिफला, जौ और कुछ अन्य वनस्पतियों का उपयोग आहार या औषधीय संदर्भ में किया जाता रहा है। आधुनिक शोध में भी कुछ खाद्य पदार्थों के संभावित लाभ मिले हैं, लेकिन ये डॉक्टर द्वारा निर्धारित कोलेस्ट्रॉल की दवा का विकल्प नहीं हैं।

दवा से ज्यादा महत्वपूर्ण है दिनचर्या

रोजाना कम-से-कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि, वजन को स्वस्थ सीमा में रखना, फाइबर से भरपूर भोजन लेना, सब्जियां और साबुत अनाज खाना तथा धूम्रपान से बचना हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। ओट्स और जौ में मौजूद घुलनशील फाइबर LDL कम करने में सहायक हो सकता है।

किन चीजों को सीमित करें?

ट्रांस फैट, अत्यधिक संतृप्त वसा, पैकेज्ड स्नैक्स, बेकरी उत्पाद, अत्यधिक मीठे पेय और बार-बार डीप-फ्राइड भोजन को सीमित करना बेहतर है।

निष्कर्ष:
कोलेस्ट्रॉल शरीर का दुश्मन नहीं है; उसका असंतुलन समस्या बन सकता है। सही लिपिड प्रोफाइल, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह—यही हृदय स्वास्थ्य की सबसे भरोसेमंद रणनीति है।

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नोट: यदि आप पहले से कोलेस्ट्रॉल या हृदय रोग की दवा ले रहे हैं, तो चिकित्सकीय सलाह के बिना अपनी चल रही दवा बंद या कम न करें।

🌿🌿 बालम खिरा (BALAM KHIRA) 🌿🌿मूत्रवह संस्थान एवं पथरी संबंधी पारंपरिक आयुर्वेदिक उपयोग वाली जड़ी-बूटीवानस्पतिक नाम: Kige...
21/08/2026

🌿🌿 बालम खिरा (BALAM KHIRA) 🌿🌿

मूत्रवह संस्थान एवं पथरी संबंधी पारंपरिक आयुर्वेदिक उपयोग वाली जड़ी-बूटी

वानस्पतिक नाम: Kigelia africana (Lam.) Benth.
कुल: Bignoniaceae
अंग्रेजी नाम: Sausage Tree / Sausage Tree Fruit
हिंदी नाम: बालम खिरा / बालम खीरा
प्रयुक्त भाग: मुख्यतः फल

बालम खिरा एक विशिष्ट औषधीय वनस्पति है, जिसका पारंपरिक औषधीय प्रयोग विभिन्न हर्बल एवं आयुर्वेदिक योगों में किया जाता है। इसका सही वनस्पति-निर्धारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

🌿 बालम खिरा के प्रमुख पारंपरिक उपयोग

🔹 मूत्र संबंधी विकारों में
मूत्र की रुकावट, मूत्र प्रवाह में कमी तथा पेशाब से जुड़ी तकलीफों में इसे पारंपरिक रूप से विभिन्न योगों में शामिल किया जाता है।

🔹 गुर्दे एवं मूत्राशय की पथरी
पथरी संबंधी पारंपरिक योगों में बालम खिरा का प्रयोग किया जाता है। कुछ प्रारंभिक प्रायोगिक अध्ययनों में Kigelia africana के फल से मूत्र प्रणाली की पथरी पर संभावित प्रभाव देखा गया है, लेकिन इसे मनुष्यों में पथरी का सिद्ध इलाज मानने के लिए पर्याप्त उच्च-गुणवत्ता वाले नैदानिक प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं हैं।

🔹 मूत्राशय एवं यूरिनरी सिस्टम
मूत्रमार्ग एवं मूत्राशय से संबंधित पारंपरिक हर्बल संयोजनों में इसका उपयोग किया जाता है। बाजार में उपलब्ध कुछ आयुर्वेदिक संयोजनों में बालम खिरा के साथ गोखरू, पाषाणभेद, पुनर्नवा, वरुण आदि द्रव्यों का भी प्रयोग मिलता है।

🔹 गदूद / प्रोस्टेट संबंधी परेशानी
बार-बार पेशाब आना, पेशाब शुरू होने में कठिनाई या मूत्रधारा कमजोर होने जैसी गदूद (प्रोस्टेट) से जुड़ी शिकायतों में इसे पारंपरिक मूत्रल एवं मूत्रमार्ग-सहायक योगों में शामिल किया जाता है। हालांकि बढ़े हुए प्रोस्टेट का कारण और गंभीरता चिकित्सकीय जांच से निर्धारित होना चाहिए।

🔹 बवासीर (Piles)
कुछ पारंपरिक एवं बाजार में उपलब्ध हर्बल संयोजनों में बालम खिरा का उपयोग बवासीर एवं पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी किया जाता है।

🔹 पाचन तंत्र
परंपरागत उपयोग में इसे कुछ पाचन संबंधी विकारों और उदर संबंधी शिकायतों वाले योगों में भी प्रयोग किया जाता है।

🌿 आयुर्वेदिक योगों में प्रयोग

बालम खिरा को अकेले प्रयोग करने के बजाय आवश्यकता एवं रोगावस्था के अनुसार अन्य द्रव्यों के साथ योग बनाकर प्रयोग किया जाता है।
गोखरू, पाषाणभेद, पुनर्नवा, वरुण, चंदन, मकोय आदि के साथ बनाए गए कुछ हर्बल संयोजन मूत्र एवं गुर्दे से संबंधित स्वास्थ्य के लिए बाजार में उपलब्ध हैं।

⚠️ महत्वपूर्ण सावधानी

बालम खिरा को देखकर स्वयं पहचानकर सेवन न करें। Kigelia africana का कच्चा फल सामान्य खाद्य फल नहीं है और इसकी सुरक्षा तथा उचित मात्रा के लिए चिकित्सकीय मार्गदर्शन आवश्यक है।

पथरी के साथ तेज दर्द, पेशाब बंद होना, पेशाब में खून, बुखार/कंपकंपी या गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी हो तो केवल जड़ी-बूटी पर निर्भर न रहें और तुरंत चिकित्सकीय जांच कराएं।

🌿 M.B AYURVEDA

वैद्य मोनू महरोलिया
📍 रोहतक रोड, जींद
📞 079889 28708

🌿 प्रकृति की औषधीय शक्ति — सही पहचान और सही प्रयोग के साथ।

#बालमखिरा #बालमखीरा #आयुर्वेद #जड़ीबूटी #पथरी #मूत्रविकार #मूत्राशय #गदूद #बवासीर

🌿 सुदर्शन चूर्ण 🌿सुदर्शन चूर्ण आयुर्वेद का प्रसिद्ध बहुद्रव्य योग है, जिसका पारंपरिक रूप से ज्वर एवं ज्वर से संबंधित अवस...
14/08/2026

🌿 सुदर्शन चूर्ण 🌿

सुदर्शन चूर्ण आयुर्वेद का प्रसिद्ध बहुद्रव्य योग है, जिसका पारंपरिक रूप से ज्वर एवं ज्वर से संबंधित अवस्थाओं में प्रयोग किया जाता है। इसके अलग-अलग शास्त्रीय पाठों में घटकों की संख्या तथा कुछ द्रव्यों में अंतर मिलता है, इसलिए निर्माण के लिए किसी प्रमाणित शास्त्रीय संदर्भ को आधार बनाना आवश्यक है।

🌿 प्रमुख घटक:
अमलकी, हरीतकी, विभीतकी, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, कंटकारी, बृहती, कचूर, पिप्पली, मरिच, पिप्पलीमूल, गुडूची, धन्वयास, कुटकी, पर्पट, मुस्ता, त्रायमाणा, नीम, पुष्करमूल, मुलेठी, कुटज, यवानी, इन्द्रयव, भारंगी, वचा, त्वक, पद्मक, उशीर, चंदन, अतिविषा, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, विडंग, तगर, चित्रक, देवदारु, चव्य, पटोलपत्र, लवंग, तेजपत्र, जातिपत्र, तालिसपत्र, शुण्ठी, मूर्वा, बला, त्रिवृत, एला आदि।

⚗️ बनाने की विधि:
सभी कच्चे द्रव्यों को अच्छी तरह साफ करके बाहरी अशुद्धियां अलग कर लें। आवश्यकतानुसार जिन द्रव्यों का शोधन शास्त्र में बताया गया है, उनका शोधन करें। सभी द्रव्यों को उचित प्रकार से सुखाकर अलग-अलग बारीक चूर्ण तैयार करें। प्रत्येक चूर्ण को निर्धारित महीन छलनी से छान लें। इसके बाद सभी चूर्णों को शास्त्र में निर्धारित मात्रा/अनुपात के अनुसार लेकर अच्छी तरह मिलाएं, ताकि मिश्रण समान रूप से तैयार हो जाए। तैयार चूर्ण को सूखे, स्वच्छ एवं नमी रहित, अच्छी तरह बंद पात्र में सुरक्षित रखें।

💧 भावना:
सुदर्शन चूर्ण के सभी शास्त्रीय संस्करणों में भावना का निर्देश समान नहीं है। जिस प्रमाणित ग्रंथ/योग में भावना निर्दिष्ट हो, उसी में बताए गए भावनाद्रव्य, मात्रा और भावना की संख्या के अनुसार ही भावना दें। जिस संस्करण में भावना का निर्देश नहीं है, उसमें अपनी ओर से भावना जोड़ना उचित नहीं है।

🌿 पारंपरिक उपयोग:
सुदर्शन चूर्ण का आयुर्वेद में मुख्यतः ज्वर एवं ज्वर से संबंधित अवस्थाओं में पारंपरिक प्रयोग वर्णित है। ज्वर के साथ अरुचि, शरीर में भारीपन तथा पाचन की कमजोरी जैसी स्थितियों में भी चिकित्सक रोगी की स्थिति के अनुसार इसका प्रयोग निर्धारित कर सकते हैं।

🥄 सेवन:
मात्रा एवं अनुपान व्यक्ति की आयु, प्रकृति, रोग की स्थिति और संबंधित शास्त्रीय योग के अनुसार योग्य आयुर्वेद चिकित्सक द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए।

⚠️ महत्वपूर्ण:
तेज या लगातार बुखार, बहुत अधिक कमजोरी, सांस लेने में परेशानी, बेहोशी या डेंगू/मलेरिया जैसी बीमारी की आशंका होने पर चिकित्सकीय जांच आवश्यक है। किसी भी औषधि का सेवन योग्य चिकित्सक की सलाह से करें।

🌿 M.B Ayurveda – Trusted Ayurvedic Care
वैद्य मोनू महरोलिया
📞 079889 28708

ये चूर्ण हमरे पास तैयार है पूरे भारत मे डिलीवरी सुविधा
650रू 120 ग्राम

#सुदर्शनचूर्ण #आयुर्वेद #ज्वर #आयुर्वेदिकऔषधि #आयुर्वेदिकचिकित्सा

🌿 सितोपलादि चूर्ण 🌿शास्त्रीय आयुर्वेदिक योगसितोपलादि चूर्ण आयुर्वेद में मुख्यतः कास (खाँसी) बदलते मौसम में खांसी ज़ुकाम,...
08/08/2026

🌿 सितोपलादि चूर्ण 🌿
शास्त्रीय आयुर्वेदिक योग

सितोपलादि चूर्ण आयुर्वेद में मुख्यतः कास (खाँसी) बदलते मौसम में खांसी ज़ुकाम,बूखार, टायफाइड,बलगम, श्वास संबंधी तकलीफों तथा कफ-विकारों में प्रयोग किया जाने वाला प्रसिद्ध चूर्ण है।

🌿 मुख्य घटक एवं मात्रा

1. सितोपल / मिश्री — 48 ग्राम
2. वंशलोचन — 24 ग्राम
3. पिप्पली — 12 ग्राम
4. इलायची — 6 ग्राम
5. त्वक / दालचीनी — 3 ग्राम

➡️ अनुपात — 16 : 8 : 4 : 2 : 1

🪴 बनाने की विधि

सभी द्रव्यों को अच्छी तरह साफ करके अलग-अलग सुखाएँ।
प्रत्येक द्रव्य का बारीक चूर्ण तैयार करें और छलनी से छान लें। इसके बाद सभी चूर्णों को निर्धारित मात्रा में लेकर अच्छी तरह मिलाएँ, ताकि पूरा मिश्रण एकसार हो जाए।

तैयार चूर्ण को नमी और प्रकाश से बचाकर एयरटाइट डिब्बे में रखें। आयुर्वेदिक फॉर्मूलरी-आधारित निर्माण में द्रव्यों को अलग-अलग चूर्ण करके छानने और फिर समान रूप से मिश्रित करने की प्रक्रिया बताई गई है।

🌿 पारंपरिक उपयोग

• कास (खाँसी)
• कफ की अधिकता
• गले में खराश/जलन
• सर्दी-जुकाम से जुड़े श्वसन लक्षण
• आवाज बैठना
• श्वसन मार्ग में जमा कफ

सितोपलादि चूर्ण का पारंपरिक उपयोग श्वसन एवं पाचन संबंधी समस्याओं में वर्णित है।

🥄 सेवन

सेवन की मात्रा व्यक्ति की आयु, प्रकृति, लक्षण और चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार तय की जानी चाहिए। शहद आदि अनुपान के साथ इसका प्रयोग आयुर्वेद में किया जाता है, लेकिन मधुमेह या अन्य बीमारी वाले व्यक्ति चिकित्सकीय सलाह लें।

⚠️ महत्वपूर्ण: यह सामान्य जानकारी है। लगातार खाँसी, साँस फूलना, तेज बुखार, सीने में दर्द या खून वाली खाँसी होने पर चिकित्सकीय जाँच आवश्यक है।

हमरे पास तैयार है पूरे भारत मे डिलीवरी की सुविधा

🌿 M.B Ayurveda
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📍 रोहतक रोड, जींद
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🌿 शास्त्रों में वर्णित अति प्रसिद्ध और परीक्षित योग 🌿           तालिसादि चूर्णएक श्रेष्ठ कफ-शामक एवं श्वसन लाभकारी आयुर्...
05/08/2026

🌿 शास्त्रों में वर्णित अति प्रसिद्ध और परीक्षित योग 🌿

तालिसादि चूर्ण

एक श्रेष्ठ कफ-शामक एवं श्वसन लाभकारी आयुर्वेदिक योग

तालिसादि चूर्ण आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध शास्त्रोक्त योग है, जिसका वर्णन भैषज्य रत्नावली एवं सहस्रयोगम् जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह विशेष रूप से कफ विकार, खांसी, जुकाम, गले की खराश, स्वर बैठना तथा श्वास संबंधी समस्याओं में लाभकारी माना गया है। साथ ही यह पाचन शक्ति को भी सुधारने में सहायक है।

मुख्य घटक द्रव्य

1. तालिसपत्र (Abies webbiana)
2. सोंठ (Zingiber officinale)
3. काली मिर्च (Piper nigrum)
4. पिप्पली (Piper longum)
5. त्वक (दालचीनी)
6. एला (छोटी इलायची)
7. तेजपत्र
8. नागकेशर
9. वंशलोचन
10. मिश्री

गुण एवं लाभ

✔ सूखी एवं बलगमी खांसी में लाभकारी।
✔ जुकाम, गले की खराश एवं स्वर बैठने में सहायक।
✔ श्वास (दमा) एवं कफ विकारों में उपयोगी।
✔ अग्नि प्रदीप्त कर पाचन शक्ति बढ़ाने में सहायक।
✔ गले को साफ रखकर आवाज को मधुर बनाने में मददगार।
✔ बार-बार होने वाले सर्दी-जुकाम में उपयोगी।

सेवन विधि

2–5 ग्राम (लगभग आधा से एक चम्मच) दिन में 2 बार शहद या गुनगुने पानी के साथ अथवा योग्य आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह अनुसार सेवन करें।

घर पर तालिसादि चूर्ण बनाने की विधि

1. सभी औषधियों को अच्छी तरह साफ करके छाया में सुखा लें।
2. प्रत्येक द्रव्य का अलग-अलग बारीक चूर्ण बना लें।
3. सभी चूर्णों को निर्धारित अनुपात में अच्छी तरह मिला लें।
4. अंत में मिश्री का बारीक चूर्ण मिलाकर पुनः अच्छी तरह मिश्रित करें।
5. तैयार चूर्ण को वायुरोधक (एयरटाइट) पात्र में सुरक्षित रखें।

क्या इसे बाजार से भी खरीदा जा सकता है?

हाँ, तालिसादि चूर्ण विश्वसनीय आयुर्वेदिक कंपनियों से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यदि आपके पास शुद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध हों तथा आयुर्वेदिक निर्माण की उचित जानकारी हो, तो इसे घर पर भी तैयार किया जा सकता है।

उपलब्ध प्रमुख आयुर्वेदिक कंपनियाँ

• Dabur
• Baidyanath
• Unjha Pharmacy
• Kottakkal Arya Vaidya Sala
• Zandu
आवश्यक सूचना

औषधि की गुणवत्ता, शुद्धता एवं सही अनुपात का विशेष ध्यान रखें। किसी भी औषधि का सेवन योग्य आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह के अनुसार ही करें।

📞 संपर्क: 079889 28708
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🌿 मरोड़ फली (Helicteres isora)परिचयमरोड़ फली एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधीय वनस्पति है। इसके फल मरोड़े हुए (स्पाइरल) आकार ...
02/08/2026

🌿 मरोड़ फली (Helicteres isora)

परिचय

मरोड़ फली एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधीय वनस्पति है। इसके फल मरोड़े हुए (स्पाइरल) आकार के होने के कारण इसे मरोड़ फली कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे विशेष रूप से अतिसार, ग्रहणी, पेचिश, कृमि, पेट दर्द तथा पाचन विकारों में उपयोगी माना गया है।

नाम परिचय

- संस्कृत: आवर्तनी, मृगशृंगा
- हिंदी: मरोड़ फली
- अंग्रेज़ी: East Indian Screw Tree
- वानस्पतिक नाम: Helicteres isora

आयुर्वेदिक गुण

- रस: कषाय, तिक्त
- गुण: लघु, रुक्ष
- वीर्य: शीत
- विपाक: कटु
- दोष प्रभाव: कफ-पित्त शामक

प्रमुख लाभ

✔ अतिसार (दस्त) में लाभकारी।
✔ ग्रहणी दोष में सहायक।
✔ आंव एवं पेचिश में उपयोगी।
✔ पेट दर्द एवं मरोड़ में राहत देने में सहायक।
✔ कृमि (आंतों के कीड़े) में उपयोगी।
✔ मंदाग्नि में पाचन सुधारने में सहायक।
✔ पारंपरिक उपयोग में मधुमेह एवं रक्तस्राव संबंधी कुछ स्थितियों में भी प्रयुक्त।

संबंधित आयुर्वेदिक योग

- मरोड़ फली चूर्ण
- मरोड़ फली क्वाथ
- मरोड़ फली घनवटी
- मरोड़ फली–बेलगिरी चूर्ण
- मरोड़ फली–कुटज चूर्ण
- मरोड़ फली–इंद्रयव चूर्ण
- मरोड़ फली–नागरमोथा–बिल्वादि योग
- मरोड़ फली सिद्ध क्वाथ

निर्माण विधि (चूर्ण)

1. अच्छी गुणवत्ता की सूखी मरोड़ फली लें।
2. साफ करके धूप में अच्छी तरह सुखाएँ।
3. बारीक पीसकर कपड़छन करें।
4. स्वच्छ एवं वायुरोधी पात्र में सुरक्षित रखें।

मात्रा

- चूर्ण: 2–5 ग्राम, दिन में 1–2 बार।
- क्वाथ: लगभग 40–50 मि.ली., चिकित्सकीय सलाह के अनुसार।

सावधानियाँ

- गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को चिकित्सकीय सलाह से ही सेवन करना चाहिए।
- गंभीर रोगों में स्वयं उपचार करने के बजाय योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लें।

प्रकृति की अनमोल देन – मरोड़ फली, पाचन तंत्र के स्वास्थ्य की एक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि।
वैद्य मोनू महरोलिया
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🌿 लिवर रक्षक चूर्ण 🌿यकृत (Liver) की सुरक्षा एवं पाचन शक्ति का आयुर्वेदिक योगस्वस्थ लिवर – स्वस्थ शरीर🌿 घटक- भूमि आंवला– ...
29/07/2026

🌿 लिवर रक्षक चूर्ण 🌿

यकृत (Liver) की सुरक्षा एवं पाचन शक्ति का आयुर्वेदिक योग

स्वस्थ लिवर – स्वस्थ शरीर

🌿 घटक

- भूमि आंवला– 100 ग्राम
- कालमेघ – 100 ग्राम
- कुटकी – 100 ग्राम
- भृंगराज पंचांग – 100 ग्राम
- पुनर्नवा मूल – 100 ग्राम
- कासनी पंचांग – 100 ग्राम
- मकोय पंचांग – 100 ग्राम
- गिलोय (सूखी) – 100 ग्राम
- दारुहरिद्रा – 50 ग्राम
- गुडूची सत्व – 50 ग्राम (इच्छानुसार)

⚗️ निर्माण विधि

1. सभी औषधियों को अच्छी तरह साफ करके छाया में सुखा लें।
2. प्रत्येक द्रव्य का अलग-अलग बारीक चूर्ण (लगभग 80 नंबर चलनी) तैयार करें।
3. सभी चूर्णों को निर्धारित मात्रा के अनुसार मिलाकर अच्छी तरह मिश्रित करें।
4. नमी रहित, साफ एवं वायुरोधक (एयरटाइट) डिब्बे में भरकर सुरक्षित रखें।
5. आवश्यकता अनुसार पैकिंग कर उपयोग करें।

✅ आयुर्वेदिक उपयोग

- यकृत (लिवर) के सामान्य कार्य को सहयोग।
- भूख बढ़ाने एवं पाचन शक्ति को सुधारने में सहायक।
- अपच, गैस एवं भोजन न पचने की समस्या में उपयोगी।
- शरीर की प्राकृतिक विषहरण (डिटॉक्स) प्रक्रिया का समर्थन।
- सामान्य कमजोरी एवं थकान में सहायक।

सेवन विधि

3–5 ग्राम चूर्ण, दिन में दो बार, भोजन के बाद गुनगुने पानी या शहद के साथ अथवा योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के परामर्शानुसार लें।
वैद्य मोनू महरोलिया
079889 28708

⚠️ सावधानी

- गंभीर लिवर रोग, गर्भावस्था या स्तनपान की स्थिति में सेवन से पहले योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श करें।
- संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली के साथ उपयोग करना अधिक लाभकारी रहता है।

🌿 वातगंजाकुश रस – वात रोगों के लिए एक प्रसिद्ध शास्त्रीय आयुर्वेदिक योगवातगंजाकुश रस आयुर्वेद का एक शक्तिशाली शास्त्रीय ...
26/07/2026

🌿 वातगंजाकुश रस – वात रोगों के लिए एक प्रसिद्ध शास्त्रीय आयुर्वेदिक योग

वातगंजाकुश रस आयुर्वेद का एक शक्तिशाली शास्त्रीय योग माना जाता है। इसका नाम ही इसके गुणों का परिचायक है—"वात" अर्थात वातजन्य रोग और "गंजाकुश" अर्थात अंकुश की भाँति वात विकारों को नियंत्रित करने वाला। इसका उपयोग विशेष रूप से ऐसे रोगों में किया जाता है जिनमें वात दोष बढ़ जाने से दर्द, जकड़न, सूजन या चलने-फिरने में कठिनाई होती है।

🌿 वात दोष बढ़ने के लक्षण

जब शरीर में वात दोष बढ़ता है, तब निम्न समस्याएँ देखने को मिल सकती हैं—

- जोड़ों में दर्द और अकड़न
- कमर, गर्दन या कंधे में दर्द
- हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन
- साइटिका (गृध्रसी)
- आमवात (रूमेटिक प्रकार के लक्षण)
- संधिवात
- शरीर में सूखापन और कमजोरी
- चलने-फिरने में कठिनाई

📋 मुख्य घटक

शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार इसमें निम्न द्रव्य सम्मिलित किए जाते हैं (निर्माता या ग्रंथ के अनुसार भिन्नता हो सकती है)—

- शुद्ध पारद
- शुद्ध गंधक
- शुद्ध वत्सनाभ
- त्रिकटु
- त्रिफला
- चित्रक
- अन्य शास्त्रोक्त द्रव्य

🌿 आयुर्वेदिक दृष्टि से कार्य

- वात दोष का शमन करने में सहायक।
- अग्नि (पाचन शक्ति) को सुधारने में सहायक।
- आम (अधपचा विषाक्त पदार्थ) के शोधन में सहायक।
- जोड़ों की जकड़न और पीड़ा कम करने में सहायक।
- शरीर में बल और गतिशीलता बनाए रखने में सहायक।

✅ किन स्थितियों में वैद्यकीय परामर्श से उपयोग किया जाता है?

- आमवात
- संधिवात
- गठिया संबंधी शिकायतें
- कटिशूल (कमर दर्द)
- गृध्रसी (साइटिका)
- गर्दन और कंधे का दर्द
- वातजन्य स्नायु एवं मांसपेशियों की पीड़ा
- हाथ-पैरों में जकड़न

💊 सेवन विधि

आमतौर पर 125–250 मि.ग्रा., दिन में 1–2 बार, उपयुक्त अनुपान के साथ केवल योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अनुसार।

⚠️ आवश्यक सावधानी

यह रसौषधि है तथा इसमें शक्तिशाली शास्त्रीय द्रव्य हो सकते हैं। इसलिए:

- स्वयं सेवन न करें।
- गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं में बिना चिकित्सकीय सलाह उपयोग न करें।
- बच्चों में केवल विशेषज्ञ आयुर्वेद चिकित्सक के निर्देशानुसार दें।
- निर्धारित मात्रा से अधिक सेवन न करें।

🌿 संदेश

आयुर्वेद में केवल औषधि ही नहीं, बल्कि उचित आहार, दिनचर्या और जीवनशैली भी उपचार का महत्वपूर्ण भाग हैं। इसलिए वात रोगों में उचित चिकित्सा के साथ संतुलित भोजन, हल्का व्यायाम और पर्याप्त विश्राम भी आवश्यक है।

M.B AYURVEDA – Trusted Ayurvedic Care
वैद्य मोनू महरोलिया
📞 संपर्क: 079889 28708

🌿 अजमोदादि चूर्ण 🌿पाचन शक्ति बढ़ाने वाला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योगअजमोदादि चूर्ण आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध शास्त्रीय चूर्...
24/07/2026

🌿 अजमोदादि चूर्ण 🌿

पाचन शक्ति बढ़ाने वाला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग

अजमोदादि चूर्ण आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध शास्त्रीय चूर्ण है, जो विशेष रूप से अग्निमांद्य (कमजोर पाचन), गैस, पेट फूलना, अपच, कब्ज तथा वातजन्य रोगों में उपयोगी माना जाता है।

🌱 प्रमुख घटक

- अजमोद (अजवाइन)
- सोंठ
- पिप्पली
- काली मिर्च
- जीरा
- सफेद जीरा
- धनिया
- सैंधव लवण
- काला नमक
- विद लवण
- सौवर्चल लवण
- समुद्र लवण
- हरितकी
- चित्रक मूल
- हींग (अल्प मात्रा)

सभी औषधि को बराबर मात्रा ले केवल हिंग एक भाग ले

🏺 बनाने की विधि

1. सभी द्रव्यों को अच्छी तरह साफ करके छाया में सुखा लें।
2. प्रत्येक द्रव्य का अलग-अलग बारीक चूर्ण तैयार करें।
3. निर्धारित अनुपात में सभी चूर्णों को अच्छी तरह मिलाएँ।
4. बारीक कपड़े से छान लें।
5. तैयार चूर्ण को सूखे एवं वायुरुद्ध काँच के पात्र में सुरक्षित रखें।

✅ संभावित लाभ

✔ भूख बढ़ाने में सहायक।
✔ अपच, गैस और पेट फूलने में उपयोगी।
✔ कब्ज की समस्या में लाभदायक।
✔ भोजन के पाचन में सहायता करता है।
✔ वात विकारों में सहायक।
✔ पेट के भारीपन और डकार की समस्या में उपयोगी।
✔ पाचन अग्नि को प्रबल बनाने में सहायक।

🥄 सेवन विधि

2–5 ग्राम चूर्ण भोजन के बाद गुनगुने पानी या छाछ के साथ, या आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह अनुसार लें।

⚠️ सावधानी

- गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों तथा गंभीर रोगियों को चिकित्सकीय सलाह के बाद ही सेवन करना चाहिए।
- किसी भी औषधि का सेवन योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक के मार्गदर्शन में करें।
वैद्य मोनू महरोलिया
079889 28708
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🌿 स्वस्थ पाचन – स्वस्थ जीवन 🌿
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