13/05/2026
न्युरोथैरेपी के जनक
डॉ. लाजपतराय मेहरा जी
“स्वस्थ शरीर, खुशहाल जीवन”
डॉ. लाजपतराय मेहरा जी का जन्म 23 अगस्त 1932 को अमृतसर में हुआ।
उन्होंने मानव सेवा और प्राकृतिक उपचार को अपना जीवन समर्पित कर दिया। कई वर्षों पूर्व उन्होंने मुंबई में न्युरोथैरेपी की नींव रखी और एक ऐसी उपचार पद्धति विकसित की जिसने हजारों लोगों को नया जीवन दिया।
सन 1947 में उन्होंने सबसे पहले “नाभि ठीक करने” से उपचार कार्य प्रारंभ किया। शुरुआत अपने घर से हुई, लेकिन धीरे-धीरे कमर दर्द, गर्दन दर्द, सन्धिवात तथा अनेक बीमारियों से पीड़ित लोग उनके पास आने लगे। उनके सफल उपचारों की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी।
लोग उन्हें प्रेम से “गुरु जी” कहकर पुकारते थे।
मानव सेवा के इसी मिशन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक उपचार केंद्र स्थापित किया और सन 1976 में इस चिकित्सा पद्धति को “न्युरोथैरेपी” नाम दिया।
न्युरोथैरेपी की विशेषता
बिना दवाई
बिना मशीन
बिना ऑपरेशन
प्राकृतिक एवं सुरक्षित उपचार
इस पद्धति में शरीर के विभिन्न भागों पर विशेष प्रकार का दबाव देकर नसों एवं ग्रंथियों को सक्रिय किया जाता है, जिससे शरीर की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक एवं उपचार शक्ति जागृत होती है।
सूर्यमाल आश्रम की स्थापना
डॉ. लाजपतराय मेहरा जी ने 1996 में महाराष्ट्र के सूर्यमाल (तालुका मोखाडा) में आदिवासी एवं जरूरतमंद लोगों के निःशुल्क उपचार हेतु रविवारीय चिकित्सा शिविर की शुरुआत की।
यहाँ आज भी हजारों लोगों को मुफ्त उपचार प्रदान किया जाता है।
न्युरोथैरेपी अकैडमी
सन 1999 में “डॉ. लाजपतराय मेहरा न्युरोथैरेपी अकैडमी” की स्थापना हुई।
देशभर से विद्यार्थी यहाँ प्रशिक्षण लेने आने लगे और प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने-अपने क्षेत्रों में क्लीनिक एवं सेंटर संचालित कर समाज सेवा कर रहे हैं।
18 अक्टूबर 2017 को गुरु जी ने सूर्यमाल आश्रम (महाराष्ट्र) में अंतिम सांस ली, लेकिन उनके द्वारा दिया गया ज्ञान और सेवा का संदेश आज भी लाखों लोगों के जीवन को स्वस्थ बना रहा है।
प्रेरणादायक संदेश
“हर घर न्युरोथैरेपी — हर व्यक्ति स्वस्थ रहे।”
न्युरोथैरेपी का परिचय
न्युरोथैरेपी एक भारतीय प्राकृतिक उपचार पद्धति है।
हमारे शरीर के अंदर स्वयं को ठीक करने के लिए हर प्रकार के आवश्यक केमिकल एवं हार्मोन बनाने की क्षमता होती है। लेकिन कई कारणों से — जैसे आहार-विहार पर नियंत्रण न होना, गलत तरीके से उठना-बैठना, दूषित वातावरण, मानसिक तनाव, अपनी क्षमता से अधिक शारीरिक या मानसिक कार्य, पोषण की कमी, डर, क्रोध आदि — शरीर के अंगों एवं ग्रंथियों के कार्य प्रभावित होने लगते हैं।
जब ग्रंथियों का कार्य धीमा या असंतुलित हो जाता है, तब शरीर में बनने वाले आवश्यक केमिकल एवं हार्मोन्स की मात्रा कम होने लगती है। इसके कारण शरीर का एसिड-अल्कली संतुलन बिगड़ जाता है और धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।
न्युरोथैरेपी में शरीर के विभिन्न अंगों पर विशेष प्रकार के दबाव द्वारा संबंधित ग्रंथियों एवं नसों को सक्रिय किया जाता है, जिससे उनका कार्य सुचारू रूप से चलने लगता है और शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक एवं उपचार शक्ति जागृत होती है।
“न्युरोथैरेपी में किसी भी प्रकार की दवाई या साधन का प्रयोग नहीं होता है।”
इस उपचार में थेरेपिस्ट विशेष तकनीक से अपने हाथों या पैरों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों — जैसे हाथ, पैर, जाँघ आदि — पर नियंत्रित दबाव देते हैं। उपचार के दौरान मरीज को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती।
यह उपचार एक दिन के शिशु से लेकर सौ वर्ष तक की आयु के व्यक्ति को दिया जा सकता है। छोटे बच्चों, बुजुर्गों एवं कमजोर व्यक्तियों को हाथों से तथा स्वस्थ एवं बड़ी आयु के व्यक्तियों को पैरों से उपचार दिया जाता है।