21/12/2025
यह कल संविधान क्लब, नई दिल्ली में हुई बहस को देखने के बाद मन में उतरा हुआ मेरा आत्मचिंतन है—
न किसी की जीत, न किसी की हार; बल्कि चेतना का संवाद।
ऐसे समय में, जब मदरसों की तालीम पर उँगलियाँ उठाई जा रही हैं, जब उन्हें संकीर्णता और अज्ञान का प्रतीक बताकर बंद करने के स्वप्न रचे जा रहे हैं—उसी समय यह बहस एक शीतल हवा की तरह आई।
एक ओर थे जावेद अख़्तर—जो ईश्वर के वजूद को नहीं मानते, नास्तिक हैं, और यह उनका निजी विश्वास है।
दूसरी ओर थे पश्चिम बंगाल के एक युवा आलिम-ए-दीन—मुफ़्ती इस्माइल नदवी—जिन्होंने अपने इल्म, संयम और शालीनता से इस संवाद को ऊँचाई दी।
यह बहस किसी आक्रोश की नहीं थी, न ही आरोप-प्रत्यारोप की।
यह बहस थी—विवेक की, मर्यादा की, और इंसानी समझ की।
जावेद साहब ईश्वर को न मानते हों, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि वे हमारे समय के अत्यंत प्रखर बुद्धिजीवियों में गिने जाते हैं। उनके सामने खड़ा यह युवा आलिम—जो अरबी और उर्दू ही नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी और आधुनिक ज्ञान में भी दक्ष है—जिस जीवंतता और विनम्रता से प्रश्नों का सामना करता रहा, वह देखने योग्य था।
इस संवाद से सबसे बड़ा संदेश यह निकला कि
ईश्वर के वजूद पर बहस को डर से नहीं, विवेक से देखा जाना चाहिए।
और जो ईश्वर को न मानते हैं, वे भी यदि खुले मन से सुनें, तो भीतर कहीं न कहीं एक हलचल अवश्य जन्म लेती है।
इस बहस ने उन सभी सोचों को एक शांत लेकिन गहरा झटका दिया, जो मदरसों को केवल किताबों का ढेर समझते हैं।
यह स्पष्ट हुआ कि मदरसा केवल क़ुरान और हदीस तक सीमित नहीं रहा—
वहाँ अब गणित है, विज्ञान है, अंग्रेज़ी है, और सबसे बढ़कर इंसानियत की तालीम है।
यह भी सच है कि यदि यह युवा आलिम आधुनिक विषयों में दक्ष न होता, तो शायद यह संवाद इस स्तर तक न पहुँच पाता।
यहीं से एक और संदेश जन्म लेता है—
कि आज के समय में दीन और दुनिया के बीच सेतु बनाना आवश्यक है।
क़ुरान और हदीस के साथ-साथ
अंग्रेज़ी, विज्ञान और गणित—
ये विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
यह बहस किसी की ज़बान बंद करने की नहीं थी,
बल्कि यह दिखाने की थी कि
पुख़्ता इल्म, विनम्रता और आत्मविश्वास के सामने अहंकार स्वयं मौन हो जाता है।
मेरे सूफ़ी और योगी मन ने इसमें यही देखा—
जब ज्ञान में करुणा जुड़ जाए,
और संवाद में अहंकार न हो,
तो असहमति भी इबादत बन जाती है।
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