27/07/2026
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"डॉक्टर साहब, खाना खाते ही पेट फूल जाता है। कभी दस्त हो जाते हैं, कभी कई दिनों तक पेट साफ नहीं होता। थोड़ा-सा तला-भुना खाने पर गैस, पेट में गुड़गुड़ाहट और कमजोरी होने लगती है। आखिर मुझे हुआ क्या है?"
ऐसी शिकायतें लेकर आने वाले अनेक मरीज वास्तव में ग्रहणी रोग से पीड़ित हो सकते हैं।
✨ आयुर्वेद में इसे ग्रहणी रोग (Grahani Roga) कहा गया है, जबकि आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine) में इसके लक्षण कई रोगों से मिलते-जुलते हैं, जैसे—
• Irritable Bowel Syndrome (IBS)
• Malabsorption Syndrome
• कुछ मामलों में Celiac Disease या अन्य छोटी आंत (Small Intestine) के रोगों से भी इसके लक्षण मिल सकते हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि ग्रहणी रोग किसी एक आधुनिक बीमारी का सटीक पर्याय नहीं है, बल्कि यह एक आयुर्वेदिक रोग-समूह (Clinical Syndrome) है, जिसके लक्षण कई आधुनिक पाचन विकारों से मेल खाते हैं।
👉 ग्रहणी क्या है?
आयुर्वेद के अनुसार ग्रहणी छोटी आंत (विशेषकर Duodenum और Proximal Small Intestine) से संबंधित एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसका मुख्य कार्य भोजन को उचित समय तक रोककर पचाना तथा उसके पोषक अंशों का अवशोषण (Absorption) करना है।
जब जठराग्नि (Digestive Fire) कमजोर हो जाती है, तब ग्रहणी अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप भोजन अधपचा रह जाता है और अनेक प्रकार की पाचन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
👉 ग्रहणी रोग क्यों होता है?
आयुर्वेद के अनुसार इसका मुख्य कारण अग्निमांद्य (कमजोर पाचन शक्ति) है।
इसके अतिरिक्त—
• अनियमित भोजन करना
• बार-बार बाहर का भोजन
• अत्यधिक तला-भुना एवं मसालेदार भोजन
• देर रात तक जागना
• मानसिक तनाव
• बार-बार एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन
• लंबे समय तक पाचन की उपेक्षा
• बार-बार होने वाला अतिसार (दस्त)
भी ग्रहणी रोग का कारण बन सकते हैं।
✨ ग्रहणी रोग के प्रमुख लक्षण
ग्रहणी रोग में मरीज को निम्न समस्याएँ हो सकती हैं—
• बार-बार दस्त आना
• कभी दस्त तो कभी कब्ज रहना
• भोजन के बाद पेट फूलना
• गैस बनना
• पेट में गुड़गुड़ाहट
• भोजन के बाद भारीपन
• अधपचा मल आना
• मल से दुर्गंध आना
• भूख कम लगना
• खट्टी डकारें
• कमजोरी
• वजन घटना
• शरीर में पोषण की कमी
कुछ मरीजों में केवल पेट की समस्या होती है, जबकि कुछ में लंबे समय तक रहने पर शरीर में विटामिन एवं खनिजों की कमी भी हो सकती है।
✨ आधुनिक चिकित्सा में किन जाँचों की आवश्यकता हो सकती है?
हर मरीज को सभी जाँचों की आवश्यकता नहीं होती। चिकित्सक लक्षणों के अनुसार सलाह देते हैं। हालांकि एक अनुभवी डॉक्टर अपने अनुभव के आधार पर रोग की डायग्नोसिस कर सकता है और आपके बहुत से पैसे बचा सकता है।
संभावित जाँचें—
• Complete Blood Count (CBC)
• Liver Function Test (LFT)
• Kidney Function Test (KFT)
• Blood Sugar
• Thyroid Profile
• Stool Routine Examination
• Stool Occult Blood
• Stool Culture (यदि आवश्यकता हो)
• Celiac Disease Antibodies
• Serum Vitamin B12
• Vitamin D
• Iron Profile
• Colonoscopy (चयनित मरीजों में)
• Upper GI Endoscopy
• Ultrasound Abdomen
यदि वजन तेजी से घट रहा हो, मल में खून आ रहा हो, रात में दस्त होते हों, बुखार हो या एनीमिया हो, तो गंभीर रोगों को बाहर करना आवश्यक होता है।
👉 आयुर्वेद में ग्रहणी रोग की चिकित्सा
आयुर्वेद में उपचार का मुख्य उद्देश्य केवल दस्त रोकना नहीं, बल्कि अग्नि को पुनः सामान्य करना होता है।
👉 उपचार में रोगी की प्रकृति, दोष, रोग की अवस्था तथा शक्ति के अनुसार योजना बनाई जाती है।
इसमें प्रमुख सिद्धांत हैं—
• दीपनीय चिकित्सा
• पाचन चिकित्सा
• आम का नाश
• अग्नि की पुनर्स्थापना
• दोषानुसार शोधन (उपयुक्त रोगियों में)
• उचित पथ्य-अपथ्य
• जीवनशैली में सुधार
आयुर्वेदिक औषधियाँ हमेशा योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही लेनी चाहिए।
👉 आहार-विहार का महत्व
ग्रहणी रोग में दवा जितनी आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण भोजन है।
रोगी को चाहिए कि—
• समय पर भोजन करें।
• अधिक भोजन न करें।
• तला-भुना एवं जंक फूड से बचें।
• अत्यधिक ठंडे पेय पदार्थों से परहेज़ करें।
• तनाव कम करें।
• पर्याप्त नींद लें।
• भोजन अच्छी तरह चबाकर खाएँ।
ग्रहणी रोग केवल "पेट खराब" होने का नाम नहीं है। यह पाचन शक्ति की कमजोरी और भोजन के उचित पाचन एवं अवशोषण में होने वाली गड़बड़ी का संकेत है। यदि समय रहते सही जाँच, उचित निदान और व्यवस्थित उपचार किया जाए, तो अधिकांश मरीजों में अच्छा सुधार देखा जा सकता है।
आयुर्वेद इस रोग में केवल लक्षणों को दबाने के बजाय पाचन शक्ति (अग्नि) को संतुलित करने और रोग की जड़ पर कार्य करने का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। हालांकि, जिन मरीजों में गंभीर लक्षण हों, उनमें आधुनिक जाँचों द्वारा अन्य गंभीर बीमारियों को पहले बाहर करना अत्यंत आवश्यक है।
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