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नटराज योग संस्थान Yoga, Meditation, Power Yoga, Weight loss , Yoga Therapy , Panchkarma &Naturopathy Treatment

27/08/2026

Kids 10 Yoga

कब्ज से मिले राहत!आयुर्वेदिक ड्रिंक अपनाएं, पेट को स्वस्थ बनाएं।कब्ज के लिए आयुर्वेदिक ड्रिंक 🌿1 चम्मच सौंफ½ चम्मच अजवाइ...
17/08/2026

कब्ज से मिले राहत!
आयुर्वेदिक ड्रिंक अपनाएं, पेट को स्वस्थ बनाएं।

कब्ज के लिए आयुर्वेदिक ड्रिंक 🌿

1 चम्मच सौंफ
½ चम्मच अजवाइन
2 कप पानी में रातभर भिगो दें।
सुबह इसे हल्का गर्म करें और छान लें।
गुनगुना पिएँ – खाली पेट।

लाभ 🌿
* मल त्याग को आसान बनाने में सहायक
* पेट की गैस और भारीपन कम करने में सहायक
* आंतों की सफाई में सहायक
* पाचन शक्ति को बेहतर बनाने में सहायक
महत्वपूर्ण
* पर्याप्त पानी पिएँ, रेशेदार आहार लें और नियमित दिनचर्या अपनाएँ।

आयुर्वेदिक संदर्भ
* चरक संहिता (Ch. Su. 15/34) – सौंफ और अजवाइन पाचन एवं वातनाशक हैं।
* भावप्रकाश निघंटु (Bh. N. 2/154, 38) – सौंफ दीपान, पाचन और मलवर्तन में सहायक है।
Note: This post includes AI‑generated images/videos for illustration

विषय: अर्श चिकित्सा (बवासीर का नाश और सूजी हुई नसों का सिकुड़ना)।शास्त्र: अथाभयां प्रयुञ्जीत... गुड़हरीतकीं वा... (अष्टांग...
16/08/2026

विषय: अर्श चिकित्सा (बवासीर का नाश और सूजी हुई नसों का सिकुड़ना)।
शास्त्र: अथाभयां प्रयुञ्जीत... गुड़हरीतकीं वा... (अष्टांग हृदयम्, चिकित्सास्थान 8).
अर्थ: महर्षि वाग्भट कहते हैं कि अर्श (बवासीर) के रोगी को सबसे पहले 'अभया' (छोटी हरड़) का प्रयोग गुड़ के साथ करना चाहिए। हरड़ शरीर के वात को नीचे की ओर धकेलती है (अनुलोमन) और गुड़ के साथ मिलकर यह सूजी हुई नसों को सिकोड़ कर बवासीर का जड़ से नाश कर देती है।

पिछली पोस्ट में हमने जाना था कि जब मल पत्थर की तरह सूख जाता है, तो सुबह टॉयलेट में ज़ोर लगाने पर वह गुदा की कोमल नसों को चीर देता है, जिससे नसें फूल कर बाहर आ जाती हैं (बवासीर)।
लोग इस पीड़ा को दूर करने के लिए बाज़ार से तेज़ पेट साफ़ करने वाले चूर्ण (Laxatives) खाते हैं। ये चूर्ण आंतों को और ज्यादा सुखा देते हैं, जिससे कुछ दिन बाद बवासीर भयंकर रूप ले लेती है। अष्टांग हृदयम् के चिकित्सास्थान में महर्षि वाग्भट ने इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए 'गुड़-हरीतकी' (छोटी हरड़ और पुराना गुड़) का विधान बताया है।
🔥 यह जादुई मिश्रण कैसे काम करता है?
मल का मक्खन बनना (अनुलोमन): हरड़ एक बहुत ही बुद्धिमान औषधि है। यह पेट में जाकर पानी को आंतों की तरफ खींचती है। इससे पत्थर जैसा मल फूलकर बिल्कुल मुलायम (मक्खन जैसा) हो जाता है। अगली सुबह बिना किसी दबाव या ज़ोर (Straining) के पेट पूरी तरह साफ़ हो जाता है।
नसों का सिकुड़ना (Astringent Action): हरड़ स्वाद में 'कसैली' होती है। आयुर्वेद में कसैला रस मांस को सिकोड़ने का काम करता है। जब यह गुड़ के साथ मिलती है, तो यह गुदा की उन सूजी हुई और बाहर लटकती हुई नसों को सिकोड़ कर वापस अंदर खींच लेती है। रक्तस्राव (Bleeding) तुरंत रुक जाता है।
🔥 औषधि निर्माण और प्रयोग विधि:
बाज़ार से 'छोटी हरड़' (काली हरड़) ले आएं और उसे थोड़े से घी में भून लें (घी में भूनने से वह फूल जाएगी)। अब इसका चूर्ण बना लें। प्रतिदिन रात को सोने से पहले आधा चम्मच हरड़ का चूर्ण, समान मात्रा में 'पुराने काले गुड़' के साथ मिलाकर चबा लें और ऊपर से हल्का गर्म पानी पी लें।
🛑 सबसे बड़ी भूल:
बवासीर के रोगी द्वारा भोजन में लाल मिर्च और बैंगन का सेवन करना। ये दोनों चीजें नसों में भयंकर आग लगा देती हैं। भोजन में केवल 'सूरन' (जिमीकंद/Elephant foot yam) की सब्ज़ी खाएं, इसे आयुर्वेद में 'अर्शोघ्न' (बवासीर का काल) कहा गया है।
🧬 छात्र tip - कुर्सी पर बैठकर पढ़ने से होने वाला 'पेल्विक कंज़ेशन' (Pelvic Congestion):
लगातार 8 घंटे तक लकड़ी या प्लास्टिक की कठोर कुर्सी पर बैठकर पढ़ने से छात्रों के निचले हिस्से (पेल्विस) में खून का संचार रुक जाता है, जिससे नसों में दबाव (Congestion) पैदा होता है और भविष्य में बवासीर का खतरा बढ़ जाता है। शून्य से शिखर तक पहुँचने के लिए अपनी नसों को मृत न होने दें। इसका आयुर्वेदिक हैक: पढ़ते समय हमेशा अपनी कुर्सी पर एक 'मुलायम सूती गद्दा' (Cushion) रखें। हर 1 घंटे में कुर्सी पर बैठे-बैठे ही 'अश्विनी मुद्रा' करें (यानी मल त्यागने वाले मार्ग की नसों को 10 बार ऊपर की ओर खींचें और छोड़ें)। यह गुप्त क्रिया उस हिस्से में खून के संचार को तुरंत तेज़ कर देगी, नसें मज़बूत बनी रहेंगी और आपके मस्तिष्क को भी नई ऊर्जा मिलेगी!
अपनी नसों को कटने न दें, आयुर्वेद के इस अमृत से उन्हें सिकोड़ कर स्वस्थ बनाएं।
#आयुर्वेद #अष्टांग_हृदयम् #चिकित्सास्थान #बवासीर_का_इलाज #पाइल्स #कब्ज़_मुक्ति े_फायदे #छात्र_tip #आयुर्वेद_संजीवनी #दिवस_273

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत वीर स्वतंत्रता सेनानियों के ...
15/08/2026

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳

15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत वीर स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने भारत माता की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई और ऐसे असंख्य वीरों के बलिदान के कारण आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं।

लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि देश की आज़ादी केवल हमारा अधिकार नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है।

आज देश को केवल सीमा पर लड़ने वाले वीरों की ही नहीं, बल्कि ईमानदार नागरिकों, मेहनती युवाओं, शिक्षकों, खिलाड़ियों और समाज के प्रति जिम्मेदार लोगों की भी आवश्यकता है।

हम संकल्प लें कि हम अपने देश को स्वच्छ, शिक्षित, स्वस्थ और मजबूत बनाने में अपना योगदान देंगे।
हम जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को मजबूत करेंगे।

आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम सब मिलकर संकल्प लें—

देश का सम्मान करेंगे,
तिरंगे का मान बढ़ाएँगे,
ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे,
और भारत को विश्व का श्रेष्ठ राष्ट्र बनाने में अपना योगदान देंगे।

अंत में बस इतना कहना चाहूँगा—

“वतन से बढ़कर कुछ नहीं,
तिरंगे से प्यारा कुछ नहीं।
हम रहें या न रहें,
भारत का गौरव हमेशा बना रहे।”

आर्य प्रहलाद भगत
( नटराज योग संस्थान)

जय हिंद!
वंदे मातरम्! 🇮🇳

Specialize in healing and wellness with the Advance Level Yoga Therapist Course. Get certified as a YCB Yoga Therapist b...
07/08/2026

Specialize in healing and wellness with the Advance Level Yoga Therapist Course. Get certified as a YCB Yoga Therapist by the Ministry of AYUSH, Govt. of India, along with an Advance Certificate Course in Yoga by YCB ( PrCB :- INO Surya Foundation) and NATRAJ YOG SANSTHAN This dual certification prepares you to work in healthcare, wellness centers, and therapy-based yoga programs with professional recognition.

Registration Start :- 7808475779
Last Date 01 Sep. 2026
Course Start :- 15 Sep. 2026

शुद्ध कुमकुम / सिन्दूर बनाने की विधि ❤💜💙💗💛💚🌷❤❤❤❤❤ #सिन्दूर का आयुर्वेद में वर्णन क्यों है और क्यों विवाह के बाद लगाया जा...
30/07/2026

शुद्ध कुमकुम / सिन्दूर बनाने की विधि ❤💜💙💗💛💚🌷❤❤❤❤❤

#सिन्दूर का आयुर्वेद में वर्णन क्यों है और क्यों विवाह के बाद लगाया जाता है ...?

#आयुर्वेद में सिन्दूर की महत्ता है....स्त्री शरीर की संरचना बहुत विचित्र है I स्त्री के ललाट के ललाट या मस्तिष्क के उपरी भाग में एक महत्वपूर्ण ग्रंथि होती है, जिसको ब्रह्मरंध्र कहते हैं I यह अत्यंत संवेदनशील भी होती है I जहाँ पर सिन्दूर लगाने के स्थान यानी कपाल के अंत से लेकर सर के मध्य तक होती है I सिन्दूर में पारा नाम की धातु होती है I पारा ब्रह्मरन्ध्र के लिए औषधि का काम करता है I विवाह के बाद सामाजिक और ग्रहस्थ दायित्व आने से महिला पर दबाव आ जाता है तो उसको तनाव व चिंता और अनिन्द्रा जैसी बीमारियाँ आमतौर पर घेरने लगती हैं...!पारा मात्र एक ऐसी धातु है जो तरल रूप में रहती है I
हालाँकि बाज़ार में मिलाने वाला सिन्दूर सिंथेटिक होता है जो फायदे की बजाय नुक्सान पहुंचाता है I रिएक्शन कर जाता है I
घर में ही सिन्दूर बनाने की आसान विधि

1 - हल्दी साबुत – 1 KG
2 – फिटकरी - 40 GM
3 – सुहागा - 120 GM
4 - नींबू - 20 – 25 बूँद
5 – तिल तेल - 2 चम्मच

विधि
सबसे पहले फिटकरी पाउडर सुहागा नींबू के रस के साथ मिक्स करें I फिर इसमें हल्दी पाउडर डालकर मिक्स करें I इस मिश्रण को छाया में दो से तीन दिनों तक के लिए सुखा लें I सुखाने के बाद इसमें तिल का तेल मिला लें I ध्यान रखें पेस्ट न बनने पाये I
हल्दी त्वचा के इन्फेक्शन से बचाती है और एलर्जी भी नहीं होने देती I महिलाओं को तनाव से दूर रखती है और मस्तिष्क हमेशा चैतन्य अवस्था में रखता है I

क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?पारस में अरु संत में, बहुत अंतरौ जान। वह लोहा कंचन करे, वह करै आपु समान ॥यह प्रसिद्ध पंक्ति प...
29/07/2026

क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?

पारस में अरु संत में, बहुत अंतरौ जान। वह लोहा कंचन करे, वह करै आपु समान ॥

यह प्रसिद्ध पंक्ति पारस मणि और संत-महात्माओं के बीच के महान अंतर को स्पष्ट करती है। इसका अर्थ है कि पारस सिर्फ लोहे को सोना बनाता है लेकिन दूसरा पारस नहीं बना सकता, जबकि संत अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को बदलकर अपने जैसा ही ज्ञानी और महापुरुष बना देते हैं।

गुरुकी महिमा

वास्तवमें गुरुकी महिमाका पूरा वर्णन कोई कर सकता ही नहीं। गुरुकी महिमा भगवान्से भी अधिक है। इसलिये शास्त्रोंमें गुरुकी बहुत महिमा आयी है। परन्तु वह महिमा सच्चाईकी है, दम्भ-पाखण्डकी नहीं। आजकल दम्भ-पाखण्ड बहुत हो गया है और बढ़ता ही जा रहा है। कौन अच्छा है और कौन बुरा - इसका जल्दी पता लगता नहीं। जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना सुगम होता है। परन्तु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है
उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है। सीताजीके सामने रावण, राजा प्रतापभानुके सामने कपट मुनि और हनुमान्जीके सामने कालनेमि आये तो वे उनको पहचान नहीं सके, उनके फेरेमें आ गयेः क्योंकि उनका स्वाँग साधुओंका था। आजकल भी शिष्योंकी अपने गुरुके प्रति जैसी श्रद्धा देखनेमें आती है, वैसा गुरु स्वयं होता नहीं। इसलिये सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका कहते थे कि आजकलके गुरुओंमें हमारी श्रद्धा नहीं होती, प्रत्युत उनके चेलोंमें श्रद्धा होती है ! कारण कि चेलोंमें अपने गुरुके प्रति जो श्रद्धा है, वह आदरणीय है।

शास्त्रोंमें आयी गुरु-महिमा ठीक होते हुए भी वर्तमानमें प्रचारके योग्य नहीं है। कारण कि आजकल दम्भी-पाखण्डी लोग गुरु-महिमाके सहारे अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इसमें कलियुग भी सहायक है; क्योंकि कलियुग अधर्मका मित्र है- 'कलिनाधर्ममित्रेण' (पद्मपुराण, उत्तर० १९३।३१)। वास्तवमें गुरु-महिमा प्रचार करनेके लिये नहीं है, प्रत्युत धारण करनेके लिये है। कोई गुरु खुद ही गुरु-महिमाकी बातें कहता है, गुरु- महिमाकी पुस्तकोंका प्रचार करता है तो इससे सिद्ध होता है कि उसकै मनमें गुरु बननेकी इच्छा है। जिसके भीतर गुरु बननेकी इच्छा होती है, उससे दूसरोंका भला नहीं हो सकता। इसलिये * मैं गुरुका निषेध नहीं करता हूँ, प्रत्युत पाखण्डका निषेध करता हूँ। गुरुका निषेध तो कोई कर सकता ही नहीं।

गुरुकी महिमा वास्तवमें शिष्यकी दृष्टिसे है, गुरुकी दृष्टिसे नहीं। एक गुरुकी दृष्टि होती है, एक शिष्यकी दृष्टि होती है और एक तीसरे आदमीकी दृष्टि होती है। गुरुकी दृष्टि यह होती है कि मैंने कुछ नहीं किया, प्रत्युत जो स्वतः-स्वाभाविक वास्तविक तत्त्व है, उसकी तरफ शिष्यकी दृष्टि करा दी। तात्पर्य हुआ कि मैंने उसीके स्वरूपका उसीको बोध कराया है, अपने पाससे उसको कुछ दिया ही नहीं। चेलेकी दृष्टि यह होती है कि गुरुने मेरेको सब कुछ दे दिया। जो कुछ हुआ है, सब गुरुकी कृपासे ही हुआ है। तीसरे आदमीकी दृष्टि यह होती है कि शिष्यकी श्रद्धासे ही उसको तत्त्वबोध हुआ है।

असली महिमा उस गुरुकी है, जिसने गोविन्दसे मिला दिया है। जो गोविन्दसे तो मिलाता नहीं, कोरी बातें ही करता है, वह गुरु नहीं होता। ऐसे गुरुकी महिमा नकली और केवल दूसरोंको ठगनेके लिये होती है!

(आर्य प्रहलाद भगत )
नटराज योग संस्थान

https://youtube.com/?si=gN80lTrnyn6BPP72"डॉक्टर साहब, खाना खाते ही पेट फूल जाता है। कभी दस्त हो जाते हैं, कभी कई दिनों त...
27/07/2026

https://youtube.com/?si=gN80lTrnyn6BPP72

"डॉक्टर साहब, खाना खाते ही पेट फूल जाता है। कभी दस्त हो जाते हैं, कभी कई दिनों तक पेट साफ नहीं होता। थोड़ा-सा तला-भुना खाने पर गैस, पेट में गुड़गुड़ाहट और कमजोरी होने लगती है। आखिर मुझे हुआ क्या है?"
ऐसी शिकायतें लेकर आने वाले अनेक मरीज वास्तव में ग्रहणी रोग से पीड़ित हो सकते हैं।

✨ आयुर्वेद में इसे ग्रहणी रोग (Grahani Roga) कहा गया है, जबकि आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine) में इसके लक्षण कई रोगों से मिलते-जुलते हैं, जैसे—
• Irritable Bowel Syndrome (IBS)
• Malabsorption Syndrome
• कुछ मामलों में Celiac Disease या अन्य छोटी आंत (Small Intestine) के रोगों से भी इसके लक्षण मिल सकते हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि ग्रहणी रोग किसी एक आधुनिक बीमारी का सटीक पर्याय नहीं है, बल्कि यह एक आयुर्वेदिक रोग-समूह (Clinical Syndrome) है, जिसके लक्षण कई आधुनिक पाचन विकारों से मेल खाते हैं।

👉 ग्रहणी क्या है?
आयुर्वेद के अनुसार ग्रहणी छोटी आंत (विशेषकर Duodenum और Proximal Small Intestine) से संबंधित एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसका मुख्य कार्य भोजन को उचित समय तक रोककर पचाना तथा उसके पोषक अंशों का अवशोषण (Absorption) करना है।

जब जठराग्नि (Digestive Fire) कमजोर हो जाती है, तब ग्रहणी अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप भोजन अधपचा रह जाता है और अनेक प्रकार की पाचन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

👉 ग्रहणी रोग क्यों होता है?
आयुर्वेद के अनुसार इसका मुख्य कारण अग्निमांद्य (कमजोर पाचन शक्ति) है।
इसके अतिरिक्त—
• अनियमित भोजन करना
• बार-बार बाहर का भोजन
• अत्यधिक तला-भुना एवं मसालेदार भोजन
• देर रात तक जागना
• मानसिक तनाव
• बार-बार एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन
• लंबे समय तक पाचन की उपेक्षा
• बार-बार होने वाला अतिसार (दस्त)
भी ग्रहणी रोग का कारण बन सकते हैं।

✨ ग्रहणी रोग के प्रमुख लक्षण
ग्रहणी रोग में मरीज को निम्न समस्याएँ हो सकती हैं—
• बार-बार दस्त आना
• कभी दस्त तो कभी कब्ज रहना
• भोजन के बाद पेट फूलना
• गैस बनना
• पेट में गुड़गुड़ाहट
• भोजन के बाद भारीपन
• अधपचा मल आना
• मल से दुर्गंध आना
• भूख कम लगना
• खट्टी डकारें
• कमजोरी
• वजन घटना
• शरीर में पोषण की कमी
कुछ मरीजों में केवल पेट की समस्या होती है, जबकि कुछ में लंबे समय तक रहने पर शरीर में विटामिन एवं खनिजों की कमी भी हो सकती है।

✨ आधुनिक चिकित्सा में किन जाँचों की आवश्यकता हो सकती है?
हर मरीज को सभी जाँचों की आवश्यकता नहीं होती। चिकित्सक लक्षणों के अनुसार सलाह देते हैं। हालांकि एक अनुभवी डॉक्टर अपने अनुभव के आधार पर रोग की डायग्नोसिस कर सकता है और आपके बहुत से पैसे बचा सकता है।
संभावित जाँचें—
• Complete Blood Count (CBC)
• Liver Function Test (LFT)
• Kidney Function Test (KFT)
• Blood Sugar
• Thyroid Profile
• Stool Routine Examination
• Stool Occult Blood
• Stool Culture (यदि आवश्यकता हो)
• Celiac Disease Antibodies
• Serum Vitamin B12
• Vitamin D
• Iron Profile
• Colonoscopy (चयनित मरीजों में)
• Upper GI Endoscopy
• Ultrasound Abdomen
यदि वजन तेजी से घट रहा हो, मल में खून आ रहा हो, रात में दस्त होते हों, बुखार हो या एनीमिया हो, तो गंभीर रोगों को बाहर करना आवश्यक होता है।

👉 आयुर्वेद में ग्रहणी रोग की चिकित्सा
आयुर्वेद में उपचार का मुख्य उद्देश्य केवल दस्त रोकना नहीं, बल्कि अग्नि को पुनः सामान्य करना होता है।

👉 उपचार में रोगी की प्रकृति, दोष, रोग की अवस्था तथा शक्ति के अनुसार योजना बनाई जाती है।
इसमें प्रमुख सिद्धांत हैं—
• दीपनीय चिकित्सा
• पाचन चिकित्सा
• आम का नाश
• अग्नि की पुनर्स्थापना
• दोषानुसार शोधन (उपयुक्त रोगियों में)
• उचित पथ्य-अपथ्य
• जीवनशैली में सुधार
आयुर्वेदिक औषधियाँ हमेशा योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही लेनी चाहिए।

👉 आहार-विहार का महत्व
ग्रहणी रोग में दवा जितनी आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण भोजन है।
रोगी को चाहिए कि—
• समय पर भोजन करें।
• अधिक भोजन न करें।
• तला-भुना एवं जंक फूड से बचें।
• अत्यधिक ठंडे पेय पदार्थों से परहेज़ करें।
• तनाव कम करें।
• पर्याप्त नींद लें।
• भोजन अच्छी तरह चबाकर खाएँ।

ग्रहणी रोग केवल "पेट खराब" होने का नाम नहीं है। यह पाचन शक्ति की कमजोरी और भोजन के उचित पाचन एवं अवशोषण में होने वाली गड़बड़ी का संकेत है। यदि समय रहते सही जाँच, उचित निदान और व्यवस्थित उपचार किया जाए, तो अधिकांश मरीजों में अच्छा सुधार देखा जा सकता है।
आयुर्वेद इस रोग में केवल लक्षणों को दबाने के बजाय पाचन शक्ति (अग्नि) को संतुलित करने और रोग की जड़ पर कार्य करने का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। हालांकि, जिन मरीजों में गंभीर लक्षण हों, उनमें आधुनिक जाँचों द्वारा अन्य गंभीर बीमारियों को पहले बाहर करना अत्यंत आवश्यक है।

नमस्कार दोस्तों नटराज हेल्थ वेलनेस सेंटर के माध्यम से योग के विभिन्न बिंदुओं को आपके समक्ष लाना चाहता हूं, इस यूटय...

Specialize in healing and wellness with the Advance Level Yoga Therapist Course. Get certified as a YCB Yoga Therapist b...
23/07/2026

Specialize in healing and wellness with the Advance Level Yoga Therapist Course. Get certified as a YCB Yoga Therapist by the Ministry of AYUSH, Govt. of India, along with an Advance Certificate Course in Yoga by YCB ( PrCB :- INO Surya Foundation) and NATRAJ YOG SANSTHAN This dual certification prepares you to work in healthcare, wellness centers, and therapy-based yoga programs with professional recognition.

Registration Start :- 7808475779
Last Date 25 July 2026
Course Start :- 01 September 2026

महर्षि पतंजलि के अनुसार योगमहर्षि पतंजलि भारतीय दर्शन की षड्दर्शिनियों में से एक 'योग दर्शन' के प्रणेता हैं। उन्होंने अप...
23/07/2026

महर्षि पतंजलि के अनुसार योग
महर्षि पतंजलि भारतीय दर्शन की षड्दर्शिनियों में से एक 'योग दर्शन' के प्रणेता हैं। उन्होंने अपने ग्रंथ 'योगसूत्र' में योग की बहुत ही वैज्ञानिक और व्यवस्थित परिभाषा दी है।
महर्षि पतंजलि से जुड़ी योग की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
1. योग की परिभाषा
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के दूसरे श्लोक में योग का अर्थ स्पष्ट किया है:
> "योगः चित्तवृत्तिनिरोधः"
> (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः)
>
अर्थ: चित्त की वृत्तियों (विचारों, भावनाओं, और मानसिक उतार-चढ़ाव) को नियंत्रित करना या रोकना ही योग है। जब मन के सारे विचार शांत हो जाते हैं, तब द्रष्टा (आत्मा) अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है।
2. चित्त की वृत्तियाँ
पतंजलि के अनुसार, मनुष्य का मन (चित्त) हमेशा पांच प्रकार की वृत्तियों में उलझा रहता है:
* प्रमाण: सही ज्ञान (प्रत्यक्ष, अनुमान, और आगम/शास्त्र)।
* विपर्यय: मिथ्या ज्ञान या भ्रम।
* विकल्प: कल्पना या शब्दों के सहारे होने वाला ज्ञान, जिसका कोई वास्तविक आधार न हो।
* निद्रा: वह वृत्ति जो अभाव या अज्ञान का अनुभव कराती है (सोने की अवस्था)।
* स्मृति: अनुभव किए गए विषयों का पुनरावृत्ति या याद रखना।
3. योग के साधन (अष्टांग योग)
चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करने और मोक्ष (कैवल्य) प्राप्त करने के लिए महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग) का मार्ग बताया है:
* यम (सामाजिक अनुशासन): अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह (संग्रह न करना)।
* नियम (व्यक्तिगत अनुशासन): शौच (पवित्रता), संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर को समर्पण)।
* आसन: शरीर को स्थिर और सुखद स्थिति में रखना ताकि ध्यान लगाया जा सके।
* प्राणायाम: श्वास-प्रश्वास की गति पर नियंत्रण कर प्राण ऊर्जा को साधना।
* प्रत्याहार: इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना।
* धारणा: मन को किसी एक निश्चित बिंदु या लक्ष्य पर केंद्रित करना।
* ध्यान: जिस वस्तु या केंद्र पर मन टिकाया है, उसमें तल्लीन हो जाना (अखंड प्रवाह)।
* समाधि: यह योग की अंतिम अवस्था है, जहाँ साधक अपने और ध्येय (ध्येय वस्तु/ईश्वर) के बीच का अंतर भूल जाता है और पूर्ण शांति (कैवल्य) को प्राप्त होता है।
4. योग का उद्देश्य
महर्षि पतंजलि के अनुसार योग का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को सभी प्रकार के दुखों से मुक्त कराना और आत्मा को उसके शुद्ध, स्वतंत्र स्वरूप (कैवल्य) में स्थापित करना है।

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