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Ojas provides physical and emotional healing services such as Prana chikitsa and yoga-medication to people as well as teaches this technique to new students.

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
21/06/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*

जिस वस्तु से प्रतिष्ठा बढ़ती है, प्रशंसा होती है, उसी काम को करने के लिए उसी मार्ग पर चलने के लिए लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। हम प्रशंसा और निन्दा करने में, सम्मान और तिरस्कार करने में थोड़ी सावधानी बरतें तो लोगों को कुमार्ग पर न चलने और सत्पथ अपनाने में बहुत हद तक प्रेरणा दे सकते हैं। आमतौर से उनकी प्रशंसा की जाती है जिनने विशेष सफलता, योग्यता, सम्पदा एवं विभूति एकत्रित कर ली है।
चमत्कार को नमस्कार किया जाता है। यह तरीका गलत है। विभूतियों को लोग केवल अपनी सुख सुविधा के लिए ही एकत्रित नहीं करते वरन् प्रतिष्ठा प्राप्त करना भी उद्देश्य होता है। जब कि धन वैभव वालों को ही समाज में प्रतिष्ठा मिलती है तो मान का भूखा मनुष्य किसी भी कीमत पर उसे प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठता है। अनीति और अपराधों की बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण यह है कि अन्धी जनता हर सफलता की प्रशंसा करती है और हर असफलता को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है।

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....

21/06/2026

What if the real cause of today's problems is not outside us—but inside us?
Have you ever wondered why, wars, diseases, conflicts, despite so much scientific progress the world still struggles with stress? What happens when a person believes that no higher power is watching his actions? Why is worship of God the ultimate solution to all human problems?
https://www.youtube.com/


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21/06/2026

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*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
20/06/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*

मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।
मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसके द्वारा मानवीय उच्च मूल्यों का निर्वाह, कितना हो सका, उनको कितना प्रोत्साहन दे सका। योग्यतायें विभूतियां तो साधन मात्र हैं। लाठी एवं चाकू स्वयं न तो प्रशंसनीय है न निन्दनीय। उनका प्रयोग पीड़ा पहुंचाने के लिए हुआ या प्राण रक्षा के लिए? इसी आधार पर उनकी भर्त्सना या प्रशंसा की जा सकती है।
मनुष्य की विभूतियां एवं योग्यतायें भी ऐसे ही साधन हैं। उनका उपयोग कहां होता है इसका पता उसके विचारों एवं कार्यों में लगता है। वे यदि सद् हैं तो यह साधन भी सद् हैं, पर यदि वे असद् हैं तो वह साधन भी असद् ही कहे जावेंगे। मनुष्यता का गौरव एवं सम्मान इन जड़ साधनों से नहीं उसके प्राण रूपा सद्विचारों एवं सद्प्रवृत्तियों से जोड़ा जाना चाहिए। उसी आधार पर सम्मान देने, प्राप्त करने की परम्परा बनायी जानी चाहिए।

*क्रमशः* *........*
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*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
19/06/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*

शिवाजी, राणा प्रताप, बन्दा वैरागी, गुरु गोविन्द सिंह, लक्ष्मीबाई, सुभाष बोस आदि को पराजय का ही मुंह देखना पड़ा पर उनकी यह पराजय भी विजय से अधिक महत्वपूर्ण थी। धर्म और सदाचार पर दृढ़ रहने वाले सफलता में नहीं कर्तव्य पालन में प्रसन्नता अनुभव करते हैं और इसी दृढ़ता को स्थिर रख सकने को एक बड़ी भारी सफलता मानते हैं। अनीति और सफलता में से यदि एक को चुनना पड़े तो असफलता को ही पसन्द करना चाहिए, अनीति को नहीं। जल्दी सफलता प्राप्त करने के लोभ में अनीति के मार्ग पर चल पड़ना ऐसी बड़ी भूल है जिसके लिए सदा पश्चाताप ही करना पड़ता है।
वास्तव में नीति मार्ग छोड़कर किसी मानवोचित सदुद्देश्य की पूर्ति की नहीं जा सकती। मनुष्यता खोकर पाई सफलता कम से कम मनुष्य कहलाने में गौरव अनुभव करने वाले के लिए तो प्रसन्नता की बात नहीं ही है। यदि कोई व्यक्ति ऊपर से नीचे जल्दी पहुंचने की उतावली में सीधा कूदकर हाथ-पैर तोड़ ले तो उसे कोई ‘जल्दी पहुंचने में सफल हुआ’ नहीं कहना चाहेगा। इससे तो थोड़ी देर में पहुंचना अच्छा। मानवोचित नैतिक स्तर गंवाकर किसी एक विषय में सफलता की लालसा उपरोक्त प्रसंग जैसी विडम्बना ही है। हर विचारशील को इससे सावधान रहकर नीति मार्ग को अपनाये रहकर मनुष्यता के अनुरूप वास्तविक सफलता अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए।

*क्रमशः* *........*
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