22/05/2026
कमर दर्द : कारण व निवारण
आयुर्वेद विज्ञान सदा ही मानव का हितचिन्तक रहा है इसके अंतर्गत वर्णित दिनचर्या, रात्रिचर्या, त्रऋतुचर्या, सदवृत्त आचार आदि का पालन कर मनुष्य सुखी एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकता है किन्तु वर्तमान में भौतिकवादी एवं विलासितापूर्ण जीवन जीने के कारण आयुर्वेद में वर्णित परिचर्याओं का पालन नहीं हो रहा है। फलस्वरूप विभिन्न रोग पैदा हो रहे हैं, उन्हीं में से कमर दर्द भी एक है।
लगभग 80 से 90 प्रतिशत लोग जिन्दगी में कभी न कभी कमरदर्द का अनुभव करते हैं।
कारण - रीढ़ की हड्डी के निर्माण में अस्थियाँ, वातनाड़ियाँ, जोड़, मांसपेशियों, स्नायु, कंडरा आदि संरचनायें होती हैं। कमरदर्द का मुख्य कारण मांसपेशियों में तनाव, संधियों में तनाव खिंचाव व चोट लगना है। रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाले रोग यथा ऑस्टियोआर्द्रराइटिस, यूमेटॉइडआर्ब्रराइटिस, ऑस्टयोपोरोसिस, ऑस्टिओमैलेशिया, एन्क्लिोजिंगस्पॉन्डिलाइटिस, हड्डियों की टी.बी. तथा स्त्रियों सम्बन्धी रोग यथा कष्टार्तव, फाइब्रायड्स, एन्डिमेट्रिओसिस, गर्भाशय अंश, उम्र के साथ शरीर में होने वाले क्षयजन्य (Degeneration) रोग यथा गद्दी का हास (Degeneration of Disc) जोड़ों में परिवर्तन तथा स्नायुओं की जीर्णता, शारीरिक विकृतियाँ, जैसे स्कोलिओसिस के मुख्य कारण शरीर की नित्य रूप से की जाने वाली दोषपूर्ण गतिविधियाँ जैसे गलत तरीके से खड़ा होना, बैठना व सोना, वजन उठाना, झटके से मुड़ना, ऊँचाई से कूदना, कुर्सी व टेबल का दोषपूर्ण डिजाइन तथा व्यायाम में लगातार कमी आदि हैं।
आईबीएस, कब्ज, गुर्दे की बीमारी, प्रोस्टेट का बढ़ना, विटामिन बी-12 तथा विटामिन सी की कमी, सूर्य की रोशनी का अभाव एवं मानसिक तनाव से भी कमर में पीड़ा का अनुभव होता है। आजकल अधिकांश व्यक्तियों में स्लिप डिस्क (नाड़ी शोथ, साइटिका) की बीमारी देखने को मिल रही है इसका मुख्य कारण चोट लगना, अचानक भारी वजन उठाना, वाहन चलाते समय जर्क लगना, व्यायाम की कमी के कारण कमर की मांसपेशियों में शक्ति की कमी है। रोगी को प्रमुख रूप से कमर, दोनों या एक नितंब में तीव्र शूल दर्द तथा दर्द का एक पैर या दोनों पैरों तक जाना, झनझनाहट होना, कभी कभी सुत्र होना आदि का भी अनुभव होता हैं।
चिकित्सा - कमर दर्द को दूर करने हेतु जो दवाइयों दी जाती हैं वह पूरी तरह से समस्या का समाधान तो नहीं करतीं पर दवाइयों की आदत अवश्य पड़ जाती है। इसके लिए सबसे आवश्यक कार्य कमर सम्बन्धी व्यायाम करना है जिससे स्पाइन डिस्क को पोषक द्रव्यों की आपूर्ति हो सके जिससे कि आयु के साथ-साथ रीढ़ की हड्डियों में होने वाले क्षय (De-terioration) को विलंबित (Delay) किया जा सके।
रोग के कारण के अनुरूप ही चिकित्सा व्यवस्था करनी होती है सामान्यतया 2 से 3 सप्ताह विश्राम करने से लाभ हो जाता है। फिजियोथैरपी तथा कुछ योगासन यथा भुजंगासन, नौकासन, शलभासन भी लाभप्रद हैं। आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा में इस रोग का बहुत अच्छा इलाज है। 25 वर्षों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कमरदर्द के अधिकांश रोगियों को पंचकर्म चिकित्सा, मर्म चिकित्सा, लेप व बंधन चिकित्सा से स्थाई रूप से ठीक किया जा सकता है।
यदि किसी रोगी को ट्यूमर, फ्रैक्चर आदि से कारण मल व मूत्र पर नियंत्रण नहीं हो. पक्षाघात की स्थिति हो तो इस अवस्था में तुरन्त शल्य किया करवाना चाहिए। आजकल अधिकता लोगों को स्लिप डिस्क होने पर ऑपरेशन की सलाह दी जाती है परन्तु तथ्य यह है कि 95 प्रतिशत लोगों को सर्जरी से बचाया जा सकता है। रोग की स्थिति के अनुसार 3 से 4 सप्ता तक वातनाशक तैलों से मृदु अभ्यंग, कटिषिङ्ग है। या कटिबस्ति, नाड़ी स्वेद या सर्वांग भाप सार मर्म गुटिका का लेप तथा बंधन करने एवं चिकित्सा के प्रयोग में रोगी लीक हो औषधियों में विशेषतः रास्नासप्तकर सहचरादि क्वाथ त्रयोदशांगली रस आदि का प्रयोग किया जाता है।
यदि रोगी को बहुत अधिक पीड़ा है तो मर्म चिकित्सा या ऑस्टियोपैथी, शिरावेध, अग्निकर्म, आदि चिकित्सा के द्वारा सधः लाभदिया जा सकता है।
कटि प्रदेश अपानवायु का स्थान है अतः आमदोष का पाचन करना व कोष्ठ की शुद्धि करना आवश्यक है।
बचाव व सावधानियाँ - जो व्यक्ति लगातार कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं, उन्हें निश्चित् अंतराल पर खड़े होकर कमर का हल्का व्यायाम करना चाहिए। फोम या मुलायम गद्दों का उपयोग न करें इससे स्पाइन का प्राकृतिक पोश्चर बदल जाता है जो कि कटिशूल का कारण बनता है। रूई का पतला गद्दा इस्तेमाल करें, आगे की ओर झुककर वजन न उठायें। बैठते समय, कम्प्यूटर पर कार्य करते समय, पोछा लगाते समय पोश्चर का ध्यान रखें। गृहणियाँ रसोई में खड़े होकर बर्तन साफ न करें।
यौगिक सूक्ष्म व्यायाम द्वारा शरीर की सभी संधियों का व्यायाम तथा स्पाइन की कुछ स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज द्वारा लम्बे समय तक राहत प्राप्त की जा सकती है।