Maharshi Gautam Jyotish & Vastu Anusandhan Sansthan

Call Directions

Maharshi Gautam Jyotish & Vastu Anusandhan Sansthan MAHARSHI GAUTAM JYOTISH & VASTU ANUSANDHAN SANSTHAN (RESEARCH ON ASTROLOGY & VASTU)®,BHOPAL

जन्म कुंडली का अष्टम भाव — छुपे हुए गूढ़ रहस्यअष्टम भाव का नाम आते ही बहुत से लोग डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि यह मृत्...
01/09/2026

जन्म कुंडली का अष्टम भाव — छुपे हुए गूढ़ रहस्य
अष्टम भाव का नाम आते ही बहुत से लोग डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि यह मृत्यु का भाव है इसलिए यह जीवन का सबसे कठिन हिस्सा होगा। लेकिन अष्टम भाव को केवल मृत्यु के अर्थ में पढ़ना उसके विशाल स्वरूप को बहुत छोटा कर देना है। यह आयु का भाव है। रन्ध्र का भाव है। छिपी हुई चीजों का भाव है। अचानक होने वाले परिवर्तन का भाव है। विरासत का भाव है। गूढ़ ज्ञान का भाव है। और सबसे बढ़कर उस परिवर्तन का भाव है जिसके बाद मनुष्य पहले जैसा नहीं रहता। अष्टम भाव आपको उस जगह ले जाता है जहाँ जीवन की चमक खत्म होकर जीवन का असली चेहरा दिखाई देता है। जब सब कुछ आपके अनुसार चल रहा हो तब आप अपने बारे में बहुत कम जानते हैं। लेकिन जब अचानक कोई परिस्थिति आपकी पूरी दुनिया हिला देती है तब आपको पता चलता है कि आपके भीतर कितना धैर्य है कितनी शक्ति है और कितनी कमजोरियां छिपी हुई हैं। यही अष्टम भाव है। यह केवल संकट नहीं दिखाता। यह बताता है कि संकट के बाद आप कौन बनेंगे।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में अष्टम भाव को आयु से जोड़ते हुए कहा गया है “अथायुर्गेहगं वक्ष्ये फलं शृणु मुनेऽधुना” अर्थात अब आयु भाव के फल को सुनो। आगे परंपरा में अष्टमेश की शक्ति और उसकी स्थिति के आधार पर आयु संबंधी अनेक नियम बताए गए हैं। लेकिन यहां एक बहुत जरूरी बात समझनी चाहिए। किसी एक ग्रह को देखकर मृत्यु या आयु का फैसला करना न तो उचित है और न ही गंभीर ज्योतिष। अष्टम भाव हमें जीवन की गहराई समझने का रास्ता देता है। कभी यही भाव व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से बचने की असाधारण क्षमता देता है। कभी यही भाव उसे शोधकर्ता बनाता है। कभी ज्योतिष तंत्र मंत्र आध्यात्मिकता मनोविज्ञान या रहस्य की ओर खींचता है। कभी विरासत या दूसरे के धन के माध्यम से जीवन बदलता है। इसलिए अष्टम भाव को देखकर डरना नहीं चाहिए। इसे पढ़ना चाहिए।
कल्पना कीजिए एक व्यक्ति की जिंदगी बिल्कुल ठीक चल रही थी। नौकरी थी। परिवार था। योजनाएं थीं। उसे लगता था कि उसने अपने जीवन को समझ लिया है। फिर एक घटना हुई और सब कुछ बदल गया। नौकरी चली गई। कोई रिश्ता टूट गया। धन की स्थिति बदल गई। घर बदलना पड़ा। या कोई ऐसी सच्चाई सामने आई जिसे वह वर्षों से नहीं देख पा रहा था। शुरुआत में उसे लगा कि जीवन ने उसे तोड़ दिया। वह भगवान से पूछता रहा कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ। लेकिन कुछ साल बाद उसी व्यक्ति ने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि उस घटना ने उसके भीतर ऐसा साहस पैदा किया जो उसके अच्छे दिनों में कभी पैदा नहीं हुआ था। यही अष्टम भाव की सबसे गहरी कहानी है। जो घटना उस समय विनाश लगती है वह कई बार भविष्य के व्यक्ति का जन्मस्थान होती है। अष्टम भाव पुराने स्वरूप को तोड़ता है ताकि भीतर छिपा हुआ नया स्वरूप बाहर आ सके।
अब अष्टम भाव में बैठे ग्रह को देखिए। वहां बैठा ग्रह जैसे आपकी कुंडली में एक बंद दरवाजे के सामने खड़ा होकर कह रहा हो कि “मेरी बात समझो।” सूर्य हो तो वह आपकी पहचान अहंकार पिता सत्ता और आत्मसम्मान के भीतर छिपे सत्य की ओर देख सकता है। चंद्रमा हो तो वह आपके मन के उन डर को सामने ला सकता है जिन्हें आप दुनिया से छिपाते हैं। मंगल हो तो वह आपकी शक्ति क्रोध साहस और संघर्ष की कहानी खोल सकता है। बुध हो तो शोध गुप्त ज्ञान मनोविज्ञान ज्योतिष और जटिल बातों को समझने की क्षमता जाग सकती है। गुरु हो तो जीवन के रहस्य को ज्ञान और आध्यात्मिक दृष्टि से समझने की चाह पैदा हो सकती है। शुक्र हो तो प्रेम संबंध साझा धन और भावनात्मक बंधनों की गहराई सामने आ सकती है। शनि हो तो समय धैर्य जिम्मेदारी और लंबे परिवर्तन की परीक्षा हो सकती है। राहु हो तो अज्ञात और रहस्यमय विषयों की भूख बढ़ सकती है। केतु हो तो व्यक्ति उस सत्य को खोजने लग सकता है जो दिखाई देने वाली दुनिया के पीछे छिपा है। लेकिन यह केवल प्रारंभिक संकेत हैं। ग्रह की राशि उसका स्वामित्व उसकी दृष्टि उसकी युति उसका नक्षत्र नवांश और दशा साथ देखकर ही असली कहानी खुलती है।
यहीं से अष्टम भाव और पूर्व जन्म के संभावित कर्मों का संबंध बहुत रोचक हो जाता है। इसे निश्चित इतिहास की तरह नहीं बल्कि कर्मिक संभावना की तरह समझना चाहिए। हम यह दावा नहीं कर सकते कि किसी व्यक्ति ने पिछले जन्म में निश्चित रूप से कौन सा कर्म किया था। लेकिन यदि कुंडली में अष्टम भाव बार बार किसी विशेष विषय को सक्रिय करता है और जीवन में वही विषय अलग अलग रूप में लौटता रहता है तो ज्योतिषी उसके पीछे छिपे संस्कार को समझने की कोशिश करता है। किसी व्यक्ति को बार बार विश्वास टूटने का अनुभव क्यों होता है। कोई व्यक्ति नियंत्रण खोने से इतना डरता क्यों है। किसी के जीवन में धन अचानक आता और चला क्यों जाता है। कोई व्यक्ति गहरे रहस्यों की ओर बिना किसी कारण खिंचता क्यों है। किसी को सामान्य जीवन से संतुष्टि क्यों नहीं मिलती और वह बार बार जीवन के अंतिम सत्य को खोजने लगता है। यह सब अष्टम भाव की भाषा में पढ़ा जा सकता है। कर्मिक दृष्टि से अष्टम भाव कहता है कि जो विषय आपको सबसे ज्यादा भीतर तक हिलाता है शायद उसी विषय को सबसे गहराई से समझना आपके जीवन का हिस्सा है।
और अब सबसे महत्वपूर्ण बात। अष्टम भाव को सही करने का अर्थ क्या है। क्या कोई पूजा कर दी और अष्टम भाव की सारी समस्या समाप्त हो गई। नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है। अष्टम भाव को संतुलित करने का पहला उपाय है उस ग्रह के विकृत रूप को अपने व्यवहार से कम करना। सूर्य अष्टम में है तो अहंकार को जिम्मेदारी में बदलना होगा। चंद्रमा है तो भावनाओं को दबाने के बजाय स्वस्थ तरीके से स्वीकार करना होगा। मंगल है तो क्रोध को अनुशासन देना होगा। बुध है तो झूठ और छल से बचना होगा। गुरु है तो ज्ञान को आचरण में उतारना होगा। शुक्र है तो रिश्तों में ईमानदारी रखनी होगी। शनि है तो जिम्मेदारी से भागना नहीं होगा। राहु है तो लालच और अति को पहचानना होगा। केतु है तो पलायन को वैराग्य समझने की गलती नहीं करनी होगी। इसके साथ ग्रह की प्रकृति के अनुसार मंत्र दान सेवा साधना और सदाचार को जोड़ा जा सकता है। अष्टम भाव का सबसे बड़ा उपाय है उस सत्य से भागना बंद करना जिसे जीवन बार बार आपके सामने ला रहा है।
शास्त्रीय फलित में अष्टमेश की स्थिति के बहुत विशिष्ट परिणाम भी दिए गए हैं। उदाहरण के लिए परंपरा में अष्टमेश के अष्टम भाव में होने पर दीर्घायु की संभावना का उल्लेख मिलता है जबकि उसके निर्बल होने पर फल बदलने की बात कही गई है। अष्टमेश छठे में हो तो शत्रुओं पर विजय जैसे फल बताए गए हैं लेकिन साथ में स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों का उल्लेख भी मिलता है। इससे एक बहुत बड़ा सिद्धांत सामने आता है। अष्टम भाव को केवल शुभ या अशुभ की एक मुहर लगाकर नहीं पढ़ा जा सकता। वही स्थिति एक क्षेत्र में संघर्ष दे सकती है और दूसरे क्षेत्र में शक्ति। यही कारण है कि कुंडली पढ़ते समय केवल यह पूछना कि अष्टम भाव खराब है या अच्छा है गलत प्रश्न है। सही प्रश्न है कि अष्टम भाव किस क्षेत्र को बदल रहा है और उस परिवर्तन की शक्ति व्यक्ति के पक्ष में कैसे काम कर सकती है।
अष्टम भाव का संबंध अचानक धन से भी है और यहां बहुत गहराई है। दूसरे भाव से संचित धन देखा जाता है। ग्यारहवें से लाभ देखा जाता है। नवम से भाग्य देखा जाता है लेकिन अष्टम अचानक मिलने वाले संसाधनों विरासत साझा धन और ऐसी आर्थिक घटनाओं की ओर संकेत कर सकता है जो सामान्य मेहनत की सीधी रेखा से नहीं आतीं। इसलिए यदि अष्टमेश का संबंध दूसरे ग्यारहवें पांचवें या नवम भाव से बनता है और दशा गोचर उसे सक्रिय करते हैं तो अचानक आर्थिक परिवर्तन की संभावना देखी जा सकती है। लेकिन यही अष्टम बारहवें भाव से जुड़कर धन के अचानक निकल जाने की कहानी भी बना सकता है। इसलिए अष्टम भाव केवल यह नहीं बताता कि अचानक क्या मिलेगा। वह यह भी पूछता है कि जो अचानक मिला उसे संभालने की आपकी क्षमता कितनी है। यही वह जगह है जहाँ फलित ज्योतिष वास्तव में गहरी होती है।
अब अष्टम भाव की एक और अद्भुत शक्ति देखिए। यह व्यक्ति को उन विषयों का विशेषज्ञ बना सकता है जिन्हें सामान्य व्यक्ति देखकर डरता है। मृत्यु को समझने वाला व्यक्ति जीवन को अधिक गंभीरता से समझ सकता है। बीमारी से गुजरने वाला व्यक्ति स्वास्थ्य का मूल्य समझ सकता है। आर्थिक संकट से गुजरने वाला व्यक्ति धन का वास्तविक अर्थ समझ सकता है। धोखा खाने वाला व्यक्ति मनुष्य के स्वभाव को पढ़ना सीख सकता है। अकेलापन देखने वाला व्यक्ति दूसरे के दर्द को समझने की क्षमता पा सकता है। यही कारण है कि कई बार अष्टम भाव मजबूत होने पर व्यक्ति शोधकर्ता ज्योतिषी मनोवैज्ञानिक चिकित्सक अन्वेषक या गूढ़ विषयों का विद्यार्थी बन सकता है। उसके भीतर सतह से नीचे जाने की क्षमता पैदा हो सकती है। उसे उत्तर नहीं चाहिए होते उसे उत्तर के पीछे छिपा हुआ कारण चाहिए होता है।
और फिर एक दिन व्यक्ति समझता है कि अष्टम भाव उसका दुश्मन था ही नहीं। वह तो उसके जीवन का सबसे कठोर गुरु था। उसने जो छीना उसके पीछे कोई सीख थी। उसने जो बदला उसके पीछे कोई दिशा थी। उसने जो छिपाया उसके पीछे कोई रहस्य था। उसने जो अचानक सामने ला दिया उसके पीछे कोई जागृति थी। अष्टम भाव ने उससे केवल इतना कहा था कि “जिसे तुम अपना अंत समझ रहे हो वह शायद तुम्हारे पुराने रूप का अंत है।” यही अष्टम भाव का पुनर्जन्म है। यही उसका रहस्य है। यही उसकी शक्ति है।
इसलिए अपनी कुंडली में अष्टम भाव को देखकर डरिए मत। वहां बैठे ग्रह को ध्यान से देखिए। अष्टमेश को देखिए। उससे जुड़े भावों को देखिए। नक्षत्र देखिए। दशा देखिए। नवांश देखिए। और फिर अपने जीवन से एक प्रश्न पूछिए।
“मेरी जिंदगी मुझे किस सत्य से मिलाने की कोशिश कर रही है जिसे मैं अब तक देखने से डरता रहा?”
क्योंकि हो सकता है आपकी सबसे बड़ी समस्या वहीं बैठी हो।
और शायद उसी समस्या के भीतर आपकी सबसे बड़ी शक्ति भी छिपी हो।अष्टम भाव जीवन को खत्म करने नहीं आता।
वह उस जीवन को बदलने आता है जिसमें आप अब आगे नहीं बढ़ सकते।जो टूटता है वह हमेशा आपका नुकसान नहीं होता।
कभी कभी वही टूटना आपके भीतर किसी ऐसी शक्ति का जन्म होता है जिसके बिना आपकी असली यात्रा शुरू ही नहीं हो सकती। 🔱🕉️ॐ श्री हरि।

"मर्यादा की डोर"सुबह का समय था, कॉलेज का गेट खुल चुका था और छात्र-छात्राओं की भीड़ अंदर जा रही थी। प्रत्येक दिन की तरह आ...
24/11/2025

"मर्यादा की डोर"
सुबह का समय था, कॉलेज का गेट खुल चुका था और छात्र-छात्राओं की भीड़ अंदर जा रही थी।
प्रत्येक दिन की तरह आज भी प्रोफेसर संजय गौतम अपनी कक्षा की ओर बढ़ रहे थे, रास्ते में उनकी नज़र कुछ विद्यार्थियों पर पड़ी — कुछ लड़के मॉडर्न फैशन के कपड़ों में, और कुछ लड़कियाँ भी अत्यधिक खुले वस्त्रों में थीं।
गौतम जी के मन में सवाल उठा ??
“क्या यही हमारी नई पीढ़ी की आधुनिकता है?”
वह कक्षा में पहुँचे, पढ़ाई शुरू करने से पहले उन्होंने बोर्ड पर लिखा —
“स्वतंत्रता और मर्यादा”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
सभी छात्र सोचने लगे कि आज शायद कोई खास चर्चा होने वाली है।
गौतम जी ने पूछा, “बच्चो, बताओ —
"स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?”
एक छात्र बोला,
“सर, अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करना।”
दूसरा बोला,
“जहाँ किसी का हक़ न मारा जाए, वही असली स्वतंत्रता है।”
गौतम जी मुस्कुराए,
“सही कहा।
लेकिन क्या स्वतंत्रता का मतलब यह भी है कि हम सड़क पर गाड़ी को 150 की स्पीड से गाड़ी दौड़ाएँ, क्योंकि वो हमारी मर्ज़ी है?”
सभी ने एक साथ कहा,
“नहीं सर, इससे हादसा हो सकता है।”
“ठीक कहा,” गौतम जी बोले, “अब बताओ, सार्वजनिक जीवन में जो भी काम हम करते हैं, क्या उसमें दूसरों की भावनाएँ और मर्यादाएँ नहीं जुड़ी होतीं?”
सभी चुप थे।
तभी एक लड़की बोली,
“सर, लेकिन कपड़े तो व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद हैं।”
गौतम जी ने गहरी साँस ली,
“हाँ, बिल्कुल।
जैसे भोजन भी व्यक्तिगत पसंद है। लेकिन जब हम परिवार के साथ भोजन करते हैं,
तब सबकी रुचि का ध्यान रखते हैं न?
कोई तीखा नहीं खा सकता,
कोई मीठा पसंद नहीं करता।
समाज में भी हमें वही आचरण करना चाहिए,
हमारा आचरण सबके लिए सहज और मर्यादित हो।”
छात्रों के बीच कक्षा में गहरा सन्नाटा छा गया।
गौतम जी ने आगे कहा,
“हमारा समाज एक बड़ी सड़क जैसा है — जहाँ सड़क पर हर किसी को चलने का अधिकार है।
लेकिन अपनी- अपनी लेन में। कोई तेज़ चल दे तो टकराव होगा,
कोई नियम तोड़े तो दुर्घटना होगी।
यही बात जीवन पर भी लागू होती है।
"पुरुष हो या महिला, दोनों को मर्यादा की सीमा में ही रहकर चलना चाहिए।”
उन्होंने बोर्ड पर लिखा —
‘अधिक कसना भी गलत,
अधिक ढील छोड़ना भी गलत।’
“देखो बच्चों,” वह बोले,
जीवन "वीणा के तार" की तरह है। ज़्यादा कसो तार तो टूट जाएगा',
ढीला छोड़ो तो स्वर नहीं निकलेगा।
' संतुलन ही संगीत है',
' संतुलन ही संस्कार है'।
एक छात्र ने सवाल किया,
“सर, क्या इसका मतलब यह है कि हमें पुराने रीति- रिवाज ही अपनाने चाहिए?”
गौतम जी हँसे, नहीं,
इसका मतलब है कि हमें विवेक अपनाना चाहिए।
घूँघट और बुर्का जितना गलत है, उतना ही अर्धनग्नता का प्रदर्शन भी गलत है।
दोनों ही छोर पर संतुलन नहीं है। हमें न अति छिपना चाहिए,
न अति दिखना चाहिए।
भारतीय संस्कृति हमें यही सिखाती है —
"संयम में ही सौंदर्य है।”
कक्षा में हर छात्र अब मनन कर रहा था।
“हम जानवर नहीं हैं
कि जैसे चाहें वैसे चलें,
उन्होंने आगे कहा, “जानवरों के पास कपड़े नहीं,
लेकिन सभ्यता का अर्थ है
अपने व्यवहार को मर्यादा से बाँधना।
अगर खुलापन ही आधुनिकता है, तो सबसे आधुनिक तो जानवर हुए।
लेकिन हम इंसान हैं,
और हमें अपनी संस्कृति से जुड़कर ही आगे बढ़ना चाहिए।”
कक्षा का माहौल अब पूरी तरह गंभीर था।
कुछ छात्र जिनके विचार पहले अलग थे,
अब सोच में पड़ गए थे।
कक्षा के अंत में गौतम जी ने कहा —“सच्ची आधुनिकता कपड़ों से नहीं,
विचारों की पवित्रता से आती है। मर्यादा कोई बंधन नहीं,
बल्कि सुरक्षा की डोर है।
जैसे हेलमेट हमें बचाता है,
वैसे ही संस्कार जीवन को सुरक्षित रखते हैं।”
जब वे कक्षा से बाहर निकले,
तो छात्रों ने तालियाँ बजाईं।
कई लड़कियाँ और लड़के आपस में बात करने लगे कि सच में, फैशन और मर्यादा का संतुलन बनाना जरूरी है।
उस दिन के बाद कॉलेज में एक नया बदलाव देखने को मिला — कपड़ों की नहीं, सोच की दिशा में।
सीख: सच्ची स्वतंत्रता वही है
जो समाज और संस्कृति दोनों का सम्मान करे। मर्यादा का पालन किसी बंधन के कारण नहीं, बल्कि आत्म- सम्मान के कारण होना चाहिए।
आप भी समझें जी🙏✋✍️🌹✅🎈👆👆

कभी हिन्दी वर्णमाला का क्रमबद्ध इतना सुन्दर प्रयोग देखा है। आप भी अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय कह उठेंगे...   *यह कविता जि...
22/09/2025

कभी हिन्दी वर्णमाला का क्रमबद्ध इतना सुन्दर प्रयोग देखा है। आप भी अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय कह उठेंगे...

*यह कविता जिसने भी लिखी प्रशंसनीय है।*

"अ"चानक
"आ"कर मुझसे
"इ"ठलाता हुआ पंछी बोला
"ई"श्वर ने मानव को तो
"उ"त्तम ज्ञान-दान से तौला
"ऊ"पर हो तुम सब जीवों में
"ऋ"ष्य तुल्य अनमोल
"ए"क अकेली जात अनोखी
"ऐ"सी क्या मजबूरी तुमको
"ओ"ट रहे होंठों की शोख़ी
"औ"र सताकर कमज़ोरों को
"अं"ग तुम्हारा खिल जाता है
"अ:"तुम्हें क्या मिल जाता है.?
"क"हा मैंने- कि कहो
"ख"ग आज सम्पूर्ण
"ग"र्व से कि- हर अभाव में भी
"घ"र तुम्हारा बड़े मजे से
"च"ल रहा है
"छो"टी सी- टहनी के सिरे की
"ज"गह में, बिना किसी
"झ"गड़े के, ना ही किसी
"ट"कराव के पूरा कुनबा पल रहा है
"ठौ"र यहीं है उसमें
"डा"ली-डाली, पत्ते-पत्ते
"ढ"लता सूरज
"त"रावट देता है
"थ"कावट सारी, पूरे
"दि"वस की-तारों की लड़ियों से
"ध"न-धान्य की लिखावट लेता है
"ना"दान-नियति से अनजान अरे
"प्र"गतिशील मानव
"फ़"ल के चक्कर में
"ब"न बैठे हो असमर्थ
"भ"ला याद कहाँ तुम्हें
"म"नुष्यता का अर्थ.?
"य"ह जो थी, प्रभु की
"र"चना अनुपम...
"ला"लच लोभ के
"व"शीभूत होकर
"श"र्म-धर्म सब तजकर
"ष"ड्यंत्रों के खेतों में
"स"दा पाप-बीजों को बोकर
"हो"कर स्वयं से दूर
"क्ष"णभंगुर सुख में अटक चुके हो
"त्रा"स को आमंत्रित करते हुए
"ज्ञा"न-पथ से भटक चुके हो।

🎊🪴🎊

हरियाली तीज की शुभकामनाए आप सभी को ओर परिवार को जी।
27/07/2025

हरियाली तीज की शुभकामनाए आप सभी को ओर परिवार को जी।

07/06/2025
*निर्जला एकादशी महिमा : 07 जून 2025**🌹 निर्जला एकादशी व्रत कथा 👇🙏🌹**🌹युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक...
06/06/2025

*निर्जला एकादशी महिमा : 07 जून 2025*

*🌹 निर्जला एकादशी व्रत कथा 👇🙏🌹*

*🌹युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।*

*🌹भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।*

*🌹तब वेदव्यासजी कहने लगे : दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।*

*🌹यह सुनकर भीमसेन बोले : परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।*

*🌹भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।*

*🌹भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।*

*🌹व्यासजी ने कहा : भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है ।*

*🌹व्रत खोलने की विधि : अगले दिन सूर्योदय के बाद सेवापूजा की जगह पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए । ‘मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए’ - यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए🌹*

*🌹 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🚩 🚩 🌹*

*भाई जी ! कम से कम 2 बार पढ़ना.*   तभी असली आनंद और सही बात          समझ में आएगी.   😊🤣          लोग दुकानों के बाहर    ...
30/05/2025

*भाई जी ! कम से कम 2 बार पढ़ना.*
तभी असली आनंद और सही बात
समझ में आएगी. 😊
🤣
लोग दुकानों के बाहर
टोटके के नींबू मिर्च लटकाते हैं.
अगले शनिवार को
नये नींबू मिर्च लटकाते हैं , और
पुराने सड़क पर फेंक देते हैं.

बचपन में कहावत सुनी थी कि
सड़क पर पड़े नींबू मिर्च को
कोई बच्चा कुचल देता है तो
उसे बाद में बदसूरत पत्नी मिलती है.

मेरे मन यह बात घर कर गयी.
मैं स्कूल आते जाते समय हमेशा
ऐसे नींबू मिर्च से बच कर चलता था.
नतीजा अच्छा रहा.
*घरवालों ने मुझे*
*खूबसूरत पत्नी दिला दी.*

शादी के कुछ वर्षों बाद
पत्नी को ये बात बताई , कि कैसे
मैं नींबू मिर्च वाले टोटकों से बचता रहा
और मुझे .... तुम मिल गयी.

पत्नी ने जवाब दिया ~
ये कहावत बचपन मैंने भी सुनी थी,
पर मैंने विश्वास नहीं किया.
कई बार नींबू मिर्च कुचल दिये.
*नतीजे में आप से शादी हो गयी.*
🤣

जब तक सबका मतलब हल है तब  तक  कीचड़  गंगा जल हैकिसको जग में क्या है मिलता   ये  तो बस कर्मो  का  फल है खुद  पर  इतना मत इ...
30/05/2025

जब तक सबका मतलब हल है
तब तक कीचड़ गंगा जल है

किसको जग में क्या है मिलता
ये तो बस कर्मो का फल है

खुद पर इतना मत इतराओ
सबका इक दिन आना कल है

अपनी अर्थी खुद ढोते हो
मान गये हम तुम में बल है

चाँद सितारे दोगे हमको
रहने भी दो ये तो छल है

हमसे दूर चले जाओगे
हम भी देखेंगे क्या हल है

देख हमें भर आईं हैं क्या
आँखों में क्यों इतना जल है

बात पुरानी लगती है वो
कल जो कहते थे तुम कल है

केवल इतनी बात समझ लो
मिलकर रहने में ही बल है ।

Address

11, Apoorva Encleve , Bihaind Boonei Foi Coolege, Ayodhya By Pass Road
Bhopal
462023

Telephone

9754932010

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Maharshi Gautam Jyotish & Vastu Anusandhan Sansthan posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share