वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

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06/06/2026

कुछ किताबें कीड़े जिनको औषधि निर्माण करने तक का कोई अनुभव नहीं है केवल कम्पनियों की औषधि अधिक कमीशन लेकर बेंचते हैं। वे मुझ अनुभवी ( बीस वर्षों से अधिक औषधि निर्माण का अनुभव गुटी-वटी, चूर्ण, अवलेह, आसव, अरिष्ट, क्वाथ, कषाय, भस्म, रस रसायन औषधि बनाने का) व्यक्ति को जबरदस्ती उंगली करते हैं। जबकि हम बीएएमएस एमडी आयुर्वेदाचार्य चिकित्सक के निर्देशन देखरेख में औषधि तैयार करते हैं। अब ऐसे लोगों को क्या कहें....?

 #प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि पेट के निचले हिस्से में मूत्राशय के मुख के ठीक नीचे प्रोस्टेट ग्रंथि स्थित रहती है। युवा पुरुष...
05/06/2026

#प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि पेट के निचले हिस्से में मूत्राशय के मुख के ठीक नीचे प्रोस्टेट ग्रंथि स्थित रहती है। युवा पुरुषों में इसका वजन लगभग 20 ग्राम होता है। इस रोग से पीड़ित होने से मतलब यह है कि प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ गई। है। जब यह ग्रंथि बढ़ जाती है, तो इसका वजन 100 ग्राम तक पहुच जाता है। इससे मूत्र नली में अवरोध पैदा हो जाता है। वस्तुतः होता यह है कि मूत्राशय के ठीक नीचे यह ग्रंथि स्थित होती है। जब किन्हीं कारणों से यही ग्रंथि बढ़ जाती है, तो मूत्राशय की गरदन में दबाव पड़ने से मूत्र त्याग में अवरोध आने लगता है। इससे मूत्राशय प्रसारित होने लगता है, परिणाम यह होता है कि बढ़ा हुआ प्रैशर मूत्रवाहिकाओं के माध्यम से किडनी नेफ्रांस तक पहुंच जाता है। परिणाम यह होता है कि गुरदों को हानि पहुंचती है तथा गुरदों के कार्य बाधित होने लगते हैं। यह रोग बहुधा पचास की उम्र के बाद आधे से भी ज्यादा पुरुषों को हो जाता है। यह रोग धीरे-धीरे पनपता है। आरंभ में रोग के लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं।

#कारण -

● लगभग 45 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट के आकार में दिन प्रतिदिन वृद्धि होने लगती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अभी तक इस रोग के कारणों को अज्ञात मानता है। यदि मूत्र इसी प्रकार मूत्राशय में बार-बार रुका हुआ रहता है, तो उसमें तेज गंध पैदा होने लगती है, साथ ही मूत्राशय में पथरियों का निर्माण होना सम्भव है। साथ ही मूत्र नलिका में सूजन आना भी सम्भव है। हां, यदि बहुत ही ज्यादा अवरोध हो जाता है, तो बढ़े हुए दबाव के कारण गुरदों को भी हानि पहुंचती है।

● सरदी एवं एलर्जी की दवाओं का अंधाधुंध सेवन करना अल्सर के उपचार में डिप्रेशन तथा इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के उपचार में दी जाने वाली आधुनिक औषधियां

● हारमोनल असंतुलन बढ़ती उम्र के साथ-साथ पुरुषों में पुरुष हारमोन टेस्टोस्टेरोन में कमी आने लगती है, जिसके कारण प्रोस्टेट बढ़ने लगता है।

#लक्षण -

• रात के समय बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा, जबकि वास्तव में उस समय मूत्र त्याग की आवश्यकता नहीं होती है। रात के समय बार-बार मूत्र त्याग करने के लिए बार-बार बिस्तर से उठने के कारण रोगी अच्छी तरह से नहीं सो पाता है, जिसके परिणाम स्वरूप यह दिन भर थका थका रहता है।

• दिन में भी बार-बार मूत्र त्याग करने के लिए जाना

• मूत्र त्याग के मध्य की अवधि का कम होना

• मूत्र की इच्छा को बिलकुल भी नहीं रोक पाना, जिसके कारण उन्हें मूत्र त्याग करने की हड़बड़ी रहती है। साथ ही उन्हें हमेशा कपड़े खराब होने का डर बना रहता है।

• मूत्र त्याग करने में कठिनाई, मूत्र-प्रवृत्ति के समय जोर लगाना

• मूत्राशय को पूरी तरह खाली करने में असमर्थता, मूत्राशय में कठोरता आना

• मूत्र त्याग करते समय जलन होना

• मूत्र का उचित प्रेशर नहीं रहना तथा मूत्र त्याग के अंत में बूंद-बूंद मूत्र आना

• मूत्र के साथ रक्त आना

• तीव्र अवस्थाओं में मूत्र का अवरोध होना

• खड़े होकर ही अच्छी तरह से मूत्र त्याग कर पाना

• कुछ अवस्थाओं में बुखार, कंपकंपी का होना भी संभव है।

• सैक्स के समय कठिनाई के साथ वीर्यपात होना।

#क्या_कहता_है_आयुर्वेद ?

आयुर्वेद में इस रोग को अष्ठीला संज्ञा दी गई है। चूंकि इस रोग में प्रोस्टेट ग्रंथि का स्वरूप लो अथवा बट्टे जैसा हो जाता है, इसीलिए आयुर्वेदज्ञों ने उपमा स्वरूप इस रोग को अष्ठीला नाम दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार मूत्राशय में वायु में नामक दोष प्रकुपित हो जाने से यह रोग पैदा होता है। इस रोग में उस स्थान की पेशियां संकुचित होने लगती हैं तथा उनमें जकड़न पैदा हो जाती है। इस प्रकार आयुर्वेद की मान्यता के अनुसार वायु नामक दोष मूत्राशय एवं गुद प्रदेश में अवरोध पैदा कर उन्हें फुलाकर पाषाणखंड के समान कठोर, चलायमान, लटका हुआ, अत्यंत दर्द-युक्त गंथि को पैदा करके मल एवं मूत्र का अवरोध पैदा करती है।

#आयुर्वेद_सम्मत_कारण -

• किसी भी प्रकार की चोट लगना
• अर्बुद अथवा कैंसर होना
• उस स्थान पर पुराना घाव होना
• बार-बार संक्रमण होना
• अत्यधिक व्यायाम करना
• अत्यधिक सम्भोग करना
• लम्बे समय तक संतुलित
• रूखा-सूखा भोजन करना
• आहार का सेवन नहीं करना
• मल-मूत्र इत्यादि वेगों को रोकना

#आयुर्वेद_में_प्रोस्टेट_की_चिकित्सा -
कांचनार गुग्गुल, गोक्षुरादि गुग्गुल, शोभान्जन वटी, आरोग्यवर्धनी वटी, चन्दनादि वटी, गंडमाला कंडन रस आदि।

एक बार एक रोगी ने पूंछा कि वैद्य जी महाराज क्या मुझको यह सभी औषधियां खानी पड़ेगी। हमने उसको समझाया कि तुम जिस ऑपरेशन को सरल समझ रहे हो असल में वह सच नहीं है। ऑपरेशन करके पेशाब नली में पेशाब करने की जगह बढा दी जाती है। जिससे आसानी से पेशाब निकलने लगता है मगर पेशाब पर नियंत्रण समाप्त हो सकता है एवं प्रोस्टेट फिर से बढ़ सकता है।

#पथ्यापथ्य -

#सेवन_करें -
गेंहू, पुराना चावल, मूंग, कुलथी, जौ का पानी, लहसुन, अदरक, हल्दी, परवल, सहिजन, नारियल, खीरा, तरबूज, धनिया, जीरा, अंगूर, गन्ना

#सेवन_नहीं_करें -
पालक, टमाटर, काले चने, मटर, गुड, तेल, खटाई, गरम मसाले, सरसों, अधिक गरम एवं मसालेदार भोजन, चाय-कॉफी, मदिरा।

#विशेष -
मूत्राशय में मूत्र को धारण करने की शक्ति कम हो जाने पर, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मूत्र-स्राव होता रहता है। विशेषतः यह विकार यकृत की निर्बलता होने के पश्चात होता है। यकृत के निर्बल हो जाने पर घी, तेल एवं शक्कर का यदि अधिक सेवन होता रहेगा, तो मूत्र-यंत्र पर भार पड़ता है, जिससे मूत्राशय को हानि पहुंचती है। यह कारण हो तो घृतादि का सेवन मर्यादित करें।
• सवेरे बिस्तर से उठते ही दो गिलास ठंडा अथवा हलका-गरम पानी अवश्य पिएं। आयुर्वेद में इसे उषापान नाम दिया गया है। दिन भर में आठ से दस गिलास पानी अवश्य पिएं। शाम के समय कम मात्रा में पानी सेवन करें, ताकि रात को सुख-पूर्वक सो सकें। अन्यथा बार-बार पेशाब की हाजत होने से आप सो नहीं पाएंगे।

यह भी याद रखने योग्य बात है कि मल-मूत्र के आवेग को जरा भी नहीं रोकें।

• मदिरा एवं चाय-कॉफी के सेवन से बचें क्योंकि इनके सेवन से मूत्राशय उत्तेजित होता है। विशेष रूप से बीयर का सेवन भूलकर भी नहीं करें। नियमित रूप से अवगाहन अर्थात पानी से भरे हुए टब में बैठना भी लाभप्रद सिद्ध होता है।

#अश्विनी_मुद्रा -

जिस प्रकार घोड़ा लीद करने के बाद अपनी गुदा को अंदर की ओर सिकोड़ता है और तत्पश्चात ढीला छोड़ता है, ठीक उसी प्रकार का अभ्यास करने का नाम अश्विनी मुद्रा है।

#अश्विनी_मुद्रा_की_विधि -

किसी भी आसन में सुख-पूर्वक बैठ जाएं। तत्पश्चात उक्त क्रिया को करें। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब आप गुदा को सिकोड़ते हैं, तो अपने दोनों हाथों की मुट्ठियों को अच्छी तरह से कस कर बांधलें और जब आप गुदा को ढीला छोड़ते हैं, तो हाथों की मुट्ठियां भी खोल लें।

#विशेष - यह मुद्रा नियमित रूप से सुबह-सवेरे खाली पेट की जानी चाहिए। 10 से 20 बार तक धीरे-धीरे, पूरी एकाग्रता के साथ इस मुद्रा का अभ्यास किया जाना चाहिए।

#अश्विनी_मुद्रा_से_होने_वाले_लाभ -

• यह मुद्रा बवासीर के रोगियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। • गर्भाशय-भ्रंश (प्रोलेस्ड यूट्रस) की रुग्णाओं के लिए अमोघ औषधि का कार्य करती है।

• गुद-अंश (काच का निकलना या प्रोलेप्स ऑफ रैक्टम) की शिकायत से पीड़ित होने पर उत्तम लाभ देती है।
• इसका नियमित अभ्यास करने से 'प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि की शिकायते दूर होने लगती हैं।
• जो लोग इसका नियमित अभ्यास करते है, उन्हें ब्रह्मचर्य पालन करने तथा वीर्य की रक्षा करने में बहुत सहायता मिलती है।

अपने शरीर को किसी भी प्रकार की बीमारी से मुक्त करने के लिए आयुर्वेदिक उपचार अपनाएं।

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

एक बात समझिये इस आधुनिक विकासवाद की। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि , वायुयान का जिक्र तो विमानिका शास्त्र में है , सर्जरी...
05/06/2026

एक बात समझिये इस आधुनिक विकासवाद की। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि , वायुयान का जिक्र तो विमानिका शास्त्र में है , सर्जरी के जनक तो आचार्य सुश्रुत हैं , बैटरी का सिद्धांत तो इस ग्रन्थ में है , और भी सभी रिसर्च को ग्रन्थों से प्रमाणित करते हैं। बात ये सही भी है , लेकिन.... लेकिन असली बात ये नही जानते हैं।
सत्यता में हमारे पूर्वज मूर्ख नही थे, वो बैलगाड़ी बना सकते थे तो मोटर गाड़ी भी बना सकते थे, लेकिन ज्ञान होने के बाद भी उन्होंने ना तो उसको बताया और ना ही उसका कोई प्रेक्टिकल किया।
कारण ये था कि वो इस आधुनिक विनाशवाद को जानते थे। वो जानते थे कि प्रकति का दोहन करके जीवन नरक हो जाएगा।
इसी लिए उन्होंने गाड़ी में बैल को जोता नाकि उसमे मोटर लगाई । उन्होंने लोहे के भंगार से ट्रेक्टर नही बनाया, अपितु हल के पीछे बैल जोत दिए। सच्चाई में प्रकृति प्रदत्त ही धर्म होता है ।।
आज अगर आप हांफ रहे हैं तो प्रकृति को चूसने की वजह से ही ।
कुंवा हजार साल पानी दे सकता है , लेकिन आज घर घर सबमर्सिबल पम्प से प्रकृति को निचोड़ा जा रहा है , जिसकी वजह से मेट्रो सिटी में जल स्तर भेहद नीचे चला गया है ।।
ओर भी बहुत उद्धरण हैं वेसे तो...
खैर😌😌 आप तो पर्यावरण संरक्षण का ट्रेंड चलाओ जून की भीषण गर्मी में सेल्फी खींचने के लिए पेड़ लगाओ भले ही अगले दिन सूख जाए।

 #गर्भाशय_की_गांठ    #अण्डेदानी_की_गांठ_रसौली  ें_Cyst से पाएं 100% छुटकारा आयुर्वेदिक उपचार से        बिना ऑपरेशन बच्चे...
03/06/2026

#गर्भाशय_की_गांठ #अण्डेदानी_की_गांठ_रसौली ें_Cyst से पाएं 100% छुटकारा आयुर्वेदिक उपचार से

बिना ऑपरेशन बच्चेदानी की गांठ, रसौली का 100% आयुर्वेदिक उपचार ( , )

अनेक बार ऐसा देखने में आता है, कि महिलाओं के गर्भाशय में एक प्रकार की गांठ बन जाती है, जिसकी वजह से उन्हें मां बनने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। चिकित्सकीय भाषा में इसे लिओमायोमा नाम से जाना जाता है। यह गर्भाशय के फायब्रस एवं मस्क्युलर टिश्यूज में पैदा होने वाला ट्यूमर है, जो कि कभी भी मेलिग्नेंट नहीं होता है। लोक भाषा में इसे रसौली कहा जाता है। गर्भाशय की मांसपेशीय दीवारों पर ही पैदा होते हैं। इनका निर्माण तंतु उतकों से तथा सरल पेशियों से होता है। इनका आकार अंडाकार अथवा गोल होता है। कभी तो ये मटर के दाने के बराबर होते हैं, तो कभी इनका आकार अंगूर के जितना होता है और कभी कभी इनका आकार बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है। ये प्रायः महिलाओं में पुनर्जनन आयु के मध्य पैदा होते हुए देखे जाते हैं। प्रायः तीस से चालीस वर्ष की उम्र में ही इनका अस्तित्व देखने में आता है। फायब्राइड के कारण दो प्रमुख नुकसान हो सकते है, जिनमें पहला तो यह है कि संतानोत्पादन में बाधाएं पैदा हो सकती है। दूसरा रक्ताल्पता (एनीमिया) का खतरा बढ़ जाता है। कुछ अवस्थाओं में जब फायब्राइड का आकार बेहद बढ़ जाता है, तो इससे इससे मूत्रमार्ग में दबाव पड़ने से गुरदों को भी हानि पहुंच सकती है अथवा उनके नैसर्गिक किया-कलाप में व्यवधान पैदा हो सकता है। बहुधा ये फायब्राइड अनेक प्रकार की ब्लीडिंग पैदा करते हुए, बहुत धीरे-धीरे बढ़ते रहते हैं तथा मेनूपाज होने के साथ ही समाप्त होते हैं। प्रायः ये संतानोत्पादन वाली अवस्था में ही पैदा होते हैं तीस से चालीस वर्ष की वाली महिलाओं में अधिक देखने में आते हैं। ज्यादातर फाइब्राइड्स कैंसर युक्त नहीं होते हैं, लेकिन कुछ महिलाओं में ये कैंसर का रूप भी ग्रहण कर लेते हैं।

#लक्षण :-
• पेट में सूजन आना,
• गर्भस्राव होना,
• असामान्य रूप से लंबी अवधि वाली तथा भारी रक्तस्राव वाली माहवारी,
• माहवारी के साथ होने वाला रक्तस्त्राव गाढ़े टुकड़ों (बलॉट्स) में आना,
• कष्टार्तव अर्थात् दर्द के साथ मासिकधर्म होना,
• दो माहवारियों के मध्य में भी रक्तस्राव होना,
• शरीर में भारीपन की अनुभूतियां होना,
• नाभि के निचले हिस्से (पेडू) में दर्द होना,
• लंबे समय तक चलने वाला पीठदर्द,
• सहवास के समय दर्द होना ,
• बार-बार पेशाब (मूत्र त्याग) करने की इच्छा होना,
• सफेद पानी (ल्यूकोरिया) की शिकायत होना,
• बाहर से स्पर्श करने पर,
• फायब्राइड महसूस होना,
• कब्ज होना,
• लम्बे समय तक चलने वाला पीठ दर्द,
• यदि फायब्राइड का आकार बहुत बड़ा है, तो शरीर के अन्यान्य अवयवों पर इसका दबाव पड़ने लगता है, जिसके कारण कब्ज बवासीर, वेरीकोज वेन्स इत्यादि लक्षण भी पैदा होने लगते हैं।

#आयुर्वेद_में_उपचार - -

इस रोग से पीड़ित महिला की लक्षणों के अनुरूप चिकित्सा करनी होती है। हमने अनेक रुग्णाओं का पूर्णतः आयुर्वेदिक औषधियों के द्वारा सफल उपचार किया है। इस रोग में ऑपरेशन कराना उचित नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि अनेक बार यह देखने में आया है कि ऑपरेशन के बाद पुनः नए फायब्राइड तेजी के साथ पैदा होने लगते हैं।

#आयुर्वेदिक_उपचार

सिद्ध मकरध्वज रसायन वटी 60 गोलियां - एक एक गोली भोजन के बाद सुबह-शाम पीसकर शहद मिलाकर चाट लें।

साइटोक्रूयल टैबलेट 90 टैबलेट - एक एक टैबलेट भोजन के बाद दिन में तीन बार पानी से लें।

गण्डमाला कंडन रस - दो दो टैबलेट भोजन के बाद सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें।

आरोग्य वर्धनी वटी - दो टैबलेट भोजन के बाद सुबह-शाम सादे पानी से लें।

शोभान्जन वटी - दो दो गोली भोजन के बाद सुबह-शाम सादे पानी से लें।

लोकनाथ रस - एक एक गोली भोजन के बाद सुबह-शाम पीसकर शहद मिलाकर चाट लें।

कांचनार गुग्गुल - दो दो टैबलेट भोजन के बाद सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें।

कांचनार सिरप 20ml-20ml शीरप बराबर पानी मिलाकर सुबह-शाम पीएं।

ग्रन्थिहर कषाय - 15ml-15ml शीरप बराबर पानी मिलाकर सुबह-शाम पीएं

दो-तीन महीनों तक लाभ होने तक औषधियों का सेवन करते रहें। प्रतिमास अल्ट्रासोनोग्राफी भी कराएं ताकि परिणामों की सही जानकारी मिलती रहे।

#विशेष :- औषधि निर्माण एवं सेवन कुशल वैद्य के देखरेख में करें, तनाव प्रबंधन अवश्य ही करते रहें। अनुलोम-विलोम नियमित सवेरे एवं सायं खाली पेट सौ बार करें तथा कम से कम दो सौ बार कपालभाति अवश्य करें।

#सेवन_करने_से_बचें

• फास्टफूड,
• विविध प्रकार के शीतल पेय(कोल्ड ड्रिंक),
• गरम मसाले,
• चाय-कॉफी,
• लालमिर्च,
• अचार,
• इमली, अमचूर,
• दूध एवं दूध से बनी हुई मिठाईयां,
• दही,
• तेल,
• चॉकलेट,
• आलू,
• चावल,
• उड़द की दाल,
• तले-भुने हुए आहार-द्रव्य,
• अंडा, मांस,
• मैदा से बने हुए खाद्य पदार्थ,
• अधिक मात्रा में नमक एवं नमक से बने हुए खाद्य-पदार्थों का सेवन ।

ये बिटिया खुशी गुप्ता हमारे गृह जनपद चित्रकूट धाम उत्तर प्रदेश से ही जो प्रयागराज में B.s.c. nursing की छात्रा हैं इनकी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में present Hydronephrosis changes are present in Rt Kidney. A calculus size 0.50 cm. और A hypoechoic mass size 3.55 x 3.01 cm present in Lt tubo की लेफ्ट ओवरी की सिस्ट केवल 30 दिन में बिना किसी आपरेशन आदि के केवल शुद्ध आयुर्वेदिक औषधियों के द्वारा इलाज करने पर पूरी तरह से खत्म हो गई।

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

सत्तु अमृत है जीवन के लिए गाँव के स्टाइल में सत्तु बनाने की विधि: #सामग्री -1. चने का सत्तु (भुने हुए चने का आटा) - 1 कप...
03/06/2026

सत्तु अमृत है जीवन के लिए गाँव के स्टाइल में सत्तु बनाने की विधि:

#सामग्री -
1. चने का सत्तु (भुने हुए चने का आटा) - 1 कप
2. पानी - 2 कप
3. नींबू का रस - 1 चम्मच
4. काला नमक - स्वादानुसार
5. भुना जीरा पाउडर - 1 चम्मच
6. हरी मिर्च (बारीक कटी हुई) - 1-2
7. पुदीने के पत्ते (बारीक कटे हुए) - थोड़े से
8. धनिया पत्ते (बारीक कटे हुए) - थोड़े से

#विधि -
1. एक बड़े बर्तन में सत्तु डालें।
2. उसमें धीरे-धीरे पानी मिलाते जाएं और उसे अच्छे से घोलते जाएं ताकि गांठें ना बने।
3. जब मिश्रण स्मूथ हो जाए, उसमें नींबू का रस, काला नमक, भुना जीरा पाउडर, हरी मिर्च, पुदीने के पत्ते, और धनिया पत्ते डालें।
4. सभी सामग्री को अच्छे से मिलाएं।
5. तैयार सत्तु को एक गिलास में डालें और ठंडा-ठंडा सर्व करें।

सत्तु के फायदे -

1. पोषण से भरपूर - सत्तु में प्रोटीन, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट्स, और विभिन्न विटामिन्स एवं मिनरल्स होते हैं जो शरीर के लिए आवश्यक होते हैं।
2. ऊर्जा बढ़ाने वाला - सत्तु एक नेचुरल एनर्जी ड्रिंक है जो थकान को दूर करता है और तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है।
3. पाचन में सहायक - इसमें फाइबर की अच्छी मात्रा होती है जो पाचन तंत्र को सुधारता है और कब्ज की समस्या को दूर करता है।
4. वजन नियंत्रित करने में सहायक - सत्तु के नियमित सेवन से भूख कम लगती है और वजन नियंत्रित रहता है क्योंकि यह पाचन को धीमा करता है और लंबे समय तक पेट भरे होने का अहसास कराता है।
5. गर्मी में राहत - सत्तु शरीर को ठंडा रखता है और गर्मी में लू से बचाव करता है।
6. हृदय स्वास्थ्य - इसमें मौजूद फाइबर और कम कोलेस्ट्रॉल स्तर हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं।
7. डायबिटीज के लिए लाभकारी - सत्तु का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे यह डायबिटीज के मरीजों के लिए भी अच्छा होता है।

#निष्कर्ष - सत्तु न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। गाँव की स्टाइल में सत्तु बनाना सरल और आसान है, और इसे विभिन्न स्वादों में मिलाकर बनाया जा सकता है।

 #बुंदेलखंड और कुछ दूसरे राज्यों के किसान " #कठिया" गेहूं उगाते हैं। क्योंकि इसके लिए एक पानी ही पर्याप्त है। कठिया गेंह...
01/06/2026

#बुंदेलखंड और कुछ दूसरे राज्यों के किसान " #कठिया" गेहूं उगाते हैं। क्योंकि इसके लिए एक पानी ही पर्याप्त है।

कठिया गेंहूँ बुन्देलखण्ड की पैदावार है...और बहुत ही ज्यादा स्वास्थ्य वर्धक होता है... लेकिन कठिया की उपज कम होती है। एक एकड़ में आठ से दस कुंतल। पर यही सूखा वरदान है, सिंचाई का बेहतर इंतजाम मतलब थोक के भाव कैमिकल, कैमिकल फर्टिलाइजर डाला जाएगा और पानी नहीं तो जहर भी नहीं।

#कठिया #गेंहू 😊👍
GI Tag { Geographical Indication Tag } क्या होता है ?
GI टैग एक तरह की पहचान {Identity}है, जो किसी खास भौगोलिक क्षेत्र {Geographical Area}में बने या उगाए गए उत्पाद को दी जाती है!
इसका मतलब है कि वह उत्पाद अपने विशिष्ट गुणों, गुणवत्ता, स्वाद, बनावट या कला के कारण उसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है!
GI टैग मिलने के बाद उस उत्पाद का नाम कोई और जगह वाला बिना अनुमति के इस्तेमाल नहीं कर सकता😊👍
जैसे: दार्जिलिंग चाय, बनारसी साड़ी, अल्फांसो आम, कांगड़ा पेंटिंग आदि को GI टैग मिला है!
#कठिया #गेंहू
अब बात करते हैं "बुंदेलखंड के कठिया गेहूं" की:-
हाल ही में बुंदेलखंड क्षेत्र के 'कठिया गेहूं' को GI टैग मिल गया है!
बुंदेलखंड का कठिया गेहूं खास माना जाता है क्योंकि उसमें.....
ज़्यादा प्रोटीन और ग्लूटेन होता है!
इसका स्वाद अलग होता है!
और इसकी बनावट {texture}भी मजबूत होती है!
GI टैग मिलने से अब इस गेहूं को एक अनोखी पहचान मिलेगी और किसानों को भी इसका आर्थिक फायदा होगा। {जैसे - अच्छा दाम मिलना, एक्सपोर्ट में पहचान बढ़ना आदि}

जीआई टैग मिलने के बाद खासतौर से बुंदेलखंड में होने वाला कठिया गेहूं ने एशियाई देशों तक अपनी पहुंच बना ली है। जीआई टैग मिलने के बाद से निर्यात में इजाफा हुआ है। इस वजह से अबकी रबी सीजन में झांसी में इसका रकबा पहले के मुकाबले करीब दोगुना हो गया है।

वहीं #पंजाब, #हरियाणा या #पश्चिमी_उत्तर_प्रदेश में गेहूं की पैदावार प्रति एकड़ 20 से 25 क्विंटल है।

जब आप कठिया और पंजाब के गेहूं की गुणवत्ता की वैज्ञानिक तुलना करेंगे तो यही कहेंगे..कठिया सोना है तो पंजाब का गेहूं कचरा।

लेकिन का आरक्षण दोनों को "समान भाव" देगा। MSP में कचरा भी सोने के भाव तो सोना भी कचरे के भाव।

इसी को कहा गया है....

""अंधेर नगरी चौपट राजा।
टका सेर भाजी, टका से खाजा!""

दरअसल, एक किस्म का #आरक्षण ही है। जो "योग्य-अयोग्य" को न सिर्फ "एक भाव" बेचता है, बल्कि योग्य को लगातार "हतोत्साहित" भी करता आ रहा है।

वो क्या है, भीड़ की जरूरत "अयोग्य" को होती है। ताकि भीड़ में छिपकर अपनी खामियां छिपा सके। योग्य तो हमेशा स्वस्थ और मुक्त प्रतिस्पर्धा चाहेगा। अलग पहचान चाहेगा।

कठिया गेहूं कई बीमारियों के खिलाफ असरदार है। गैस की बीमारी के दौरान इस गेहूं के सेवन की सलाह दी जाती है। इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन A, फाइबर, ऑक्सीडेंट भी मौजूद है. यह गेंहूं बुंदेलखंड क्षेत्र के किसान उगाते हैं।
लाल कठिया गेहूं मधुमेह, हृदय रोगियों और बच्चों की सेहत के लिए स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।

जैविक किसान वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

डॉक्टर भी ठीक नहीं कर पाते जिन रोगों को, उनके लिए संजीवनी बूटी है मकोय का फल......।लते समय के साथ बीमारियां भी बदलने लग ...
29/05/2026

डॉक्टर भी ठीक नहीं कर पाते जिन रोगों को, उनके लिए संजीवनी बूटी है मकोय का फल......।

लते समय के साथ बीमारियां भी बदलने लग गई हैं, आज के टेक्नोलोजी वाले समय में ऐसी कई बीमारियां हैं जिनका इलाज डॉक्टर के पास भी नहीं होता है. लेकिन जिन बीमारियों का इलाज हमारे डॉक्टर नहीं कर सकते उनका इलाज हमारी औषधियों द्वारा संभव हो जाता है l

आज हम आपको एक ऐसे फल के बारे मे बताएँगे जिसके इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों का इलाज किया जाता है. यह फल काफी दुर्गम परिस्थितियों में पाया जाता है, जिस कारण इसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता है.

शुगर :- जिन व्यक्तियों को शुगर की समस्या हैं, वह मकोई के सूखे फलों का एक चम्मच चूर्ण बनाकर सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी के साथ पिये.

किडनी :- मकोय का पाउडर ओर सब्जी किडनी के लिए फायदेमंद होती है, जिन व्यक्तियों को किडनी की समस्या होती है उन्हे हफ्ते में कम से एक बार इस सब्जी को जरूर खानी चाहिए.

लिवर :- लीवर की समस्या से परेशान व्यक्तियों को मकोई के हरे फलों को निचोड़ कर उसके एक चम्मच रस को सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में मिलाकर पीए,,,।।

आज बहुत मात्रा में मकोय काकमाची देखी और सेवन भी किया गुर्दो के लिए सरीर पर सूजन के लिए खूनी बाबासीर के लिए खुजली के लिए बहुत ही रामबाण औषधि है ये पहले गुर्दो की बीमारी कहा देखने को मिलती थी आज कल 25 से 30 साल के युवा की गुर्दो की समस्या से परेशान है इसके 1 महीना सेवन से गुर्दे एक दम नए हो जाते है आजकल मकोय के फलों का मौसम चल रहा है।मौसमी फलों का सेवन अवश्य करना चाहिए।
- यह हर जगह अपने आप ही उग जाती है। सर्दियों में इसके नन्हे नन्हे लाल लाल फल बहुत अच्छे लगते हैं ।ये फल बहुत स्वादिष्ट होते हैं और लाभदायक भी।इसके फल जामुनी रंग के या हलके पीले -लाल रंग के होते हैं ।
- मकोय के फल सवेरे सवेरे खाली पेट खाने से अपच की बीमारी ठीक होती है।
- शहद मकोय के गुणों को सुरक्षित रख कर दोषों को दूर करता है।
- यह वात , पित्त और कफ नाशक होता है।
- यह सूजन और दर्द को दूर करता है।
- शुगर की बीमारी हो या फिर कमजोरी हो तो मकोय के सूखे बीजों का पावडर एक एक चम्मच सवेरे शाम लें . किडनी की बीमारी हों तो 10-15 दिन लगातार इसकी सब्जी खाइए . इसके 10 ग्राम सूखे पंचांग का 200 ग्राम पानी में काढ़ा बनाकर पीयें .
- बुढापे में हृदय गति कम हो जाए तो इसके 10 ग्राम पंचांग का काढ़ा पीयें । हृदय की किसी भी प्रकार की बीमारी के लिए 5 ग्राम मकोय का पंचांग और 5 ग्राम अर्जुन की छाल ; दोनों को मिलाकर 400 ग्राम पानी में पकाएँ । जब एक चौथाई रह जाए तो पी लें ।
- लीवर ठीक नहीं है , पेट खराब है , आँतों में infection है , spleen बढ़ी हुई है या फिर पेट में पानी भर गया है ; सभी का इलाज है मकोय की सब्जी . रोज़ इसकी सब्जी खाएं । या फिर इसके 10 ग्राम पंचांग का काढ़ा पीयें ।
- पीलिया होने पर इसके पत्तों का रस 2-4 चम्मच पानी मिलाकर ले लें ।
- अगर नींद न आये तो इसकी 10 ग्राम जड़ का काढ़ा लें । अगर साथ में गुड भी मिला लें तो नींद तो अच्छी आयेगी ही साथ ही सवेरे पेट भी अच्छे से साफ़ होगा ।
- त्वचा सम्बन्धी बीमारियाँ भी इसके नित्य प्रयोग से ठीक होती हैं ।
- यह सर्दी -खांसी , श्वास के रोग , हिचकी आदि को ठीक करता है।

अथ काकमाची द्रव्यगुणं प्रतिपद्ये
काकमाची (मकोय) : यकृत ( liver ) रोगों की निःशुल्क दिव्य औषधि
मकोय का शाक एक दिव्यौषधी है जो प्रायः खेतों और सडकों के किनारे स्वयमेव उत्पन्न होता है . इसके श्वेत पुष्प और पत्र मिर्च के तादृश, पौधे की ऊँचाई लगभग तीन फीट होती है .कच्चे फल हरे और पकने पर नारंगी या गहरे नीले गुच्छों में लगते हैं . ग्रामीण लोग प्रायः इसका अकेले या दूसरे पालक , सरसों आदि के साथ शाक बनाकर खाते हैं . फल मीठे होते हैं अतः बच्चे बड़े प्रायः खाते हैं . कच्चे फल कडुवे और उपविष हैं .
काकमाची ( मकोय) के आयुर्वेदिक गुण : काकमाची कटु, तिक्त, अनुष्ण, स्निग्ध, त्रिदोष नाशक है . यह श्वांस रोग, अर्श , कुष्ठ , प्रमेह , ज्वर , वमन , हिचकी, शूल, शोथ,शोफ ( सूजन , पानीदार छाले) और यकृत रोगों का नाशक है . स्वर शोधक , हृद्य , चाक्षुष्य , वीर्य जनक , रसायन है .
मात्रा : स्वरस 10-20 मिली . फल चूर्ण - 1-3 ग्राम , क्वाथ - 20-50 मिली

मकोय के औषधीय गुण :
1 * यकृत ( लीवर ) रोग : यकृत की क्रिया बिगड़ने से अनेक उपद्रव यथा: सूजन,पतले दस्त,व पीलिया बवासीर जैसे रोग होने लगते हैं. इन रोगों में मकोय का सेवन बहुत ही लाभप्रद रहता है. यह रोग क्रमशः समाप्त हो जाते हैं. मकोय के पत्तों के 10-20 मिली . रस के सेवन से विषाक्त द्रव्य, मूत्रादि द्वारा बाहर निकल जाते हैं.
2 * शरीर में कहीं सूजन हो या फिर यकृत व हृदय में सूजन हो तो इस औषधि के पत्तों का रस पिलाना लाभकारी है.
3 * खूनी बबासीर में या मुँह के किसी भी हिस्से से रक्त स्त्राव में मकोय के पत्तों का रस लाभप्रद है.
4 * हृदय रोग, जलोदर में इसके पके फल या पत्तों का क्वाथ देने से रोग मिट जाता है

★ बहुत प्यारी चमत्कारी औष्धि “मकोय” “काकमाची”★
यकृत आपके अनीयमित खानपान,शराब आदि का ज्यादा सेवन,शहरी जीवन शैली,तनाव व काम की अधिकता,निराशा आदि के कारण रोग ग्रसित होता है वैसे इसकी कार्य क्षमता इतनी है कि इसका 10प्रतिशत भाग भी सही रहै तो यह काम करता रहेगा।

ध्यान दें कि आपके शरीर के दो ही अंग हैं जिन पर खानपान व जीवन शैली का गंभीर प्रभाव पड़ता है।
जिनमें पहला है यकृत और दूसरा हृदय जिसे दिल भी कहते हैं।

इन दोनों अंगों में रोग हो जाने पर विशेष बात यह है कि हजार रुपये से कम में तो बात बनती नही और लाखों लग जाए इसकी संभावना भी कम नही। सो भइया आयुर्वेद का कहना मानो उसका नीति श्लोक है कि 'चिकित्सा से परहैज बेहतर' अर्थात जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ रोग का इलाज है। उन कारणों का विनाश करो जिनसे रोग की उत्पत्ति हुयी है । सो अपनी जीवनचर्या एेसी बनाओ कि रोग पास ही न फटकें ।लेकिन जब रोग हो ही गया है तो चिकित्सा तो करनी ही पड़ेगी।प्रकृति ने हमें अनेकों औषधियाँ प्रदान की हैं जो प्रयोग करने पर हमारे रोगों को दूर कर सकती हैं इनमें कुछ तो एेसी है कि जिन्हे हम अनजाने में घास कूड़ा समझते है और आजकल के वैज्ञानिकों ने कृषि विज्ञान के छात्रों को भी खरपतबार नाम बताकर भारतीय चिकित्सा विज्ञान में प्रमाणित औषधियों का विनाश करा दिया है।अब समय आ गया है जबकि हमें इनकी उपयोगिता को समझना होगा जिससे दिव्य औषधियां समाप्त न हो जाऐं ।

यह मिर्च के पौधे जैसा पोधा होता है जिसकी अधिकतम ऊँचाई 3 फिट के लगभग हो सकती है।इस पर फूल भी लगभग मिर्च जैसा ही आता है और मिर्च जैसी डालियाँ भी होती हैं इसके फल छोटे - छोटे तथा समूह में होते है ये गोल- गोल होते हैं पकने पर लाल हो जाते हैं तथा बाद में काले हो जाते हैं।इसके पुष्प मिर्च जैसे तथा छोटे छोटे सफेद रंग के होते हैं।

मकोय के गुण व प्रभाव-
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मकोय या काकमाची त्रिदोषनाशक अर्थात वात,पित्त व कफ तीनो दोषों का शमन करने वाला है।यह तिक्त अर्थात कड़ुवा स्वाद रखने वाली तथा इसकी प्रकृति गर्म,स्निग्ध,स्वर शोधक,रसायन,वीर्य जनक,कोढ़,बवासीर,ज्वर,प्रमेह,हिचकी,वमन को दूर करने वाला तथा नेत्रों को हितकर औषधि है।यह यकृत व हृदय के रोगो को हरने वाली औषधि है।यकृत की क्रिया विधि जब विगड़ जाती है तो शरीर में अनेक उपद्रव यथा सूजन,पतले दस्त,व पीलिया जैसे रोगो के अलाबा कई बार बवासीर जैसे रोग होने लगते हैं।इन रोगों में मकोय का सेवन बहुत ही लाभप्रद रहता है।यह औषधि यकृत की क्रियाविधि को धीरे धीरे सुद्रढ़ करके रोग का विनाश कर देती है।इस औषधि के प्रयोग से यकृत संवंधी रोग धीमें धीमें समाप्त हो जाते हैं।इस औषधि के पत्तों का रस आँतों में पहुँचकर वहाँ इकठ्ठे विषों का विनाश कर देता है तथा पेशाब द्वारा शरीर से बाहर कर दिया जाता है।
शरीर में कहीं सूजन हो या फिर यकृत व हृदय में सूजन हो तो इस औषधि के पत्तों का रस पिलाना लाभकारी है।

खूनी बबासीर में या मुँह के किसी भी हिस्से से रक्त स्त्राव में मकोय के पत्तों का रस लाभप्रद है।

हृदय रोग में इसके फल देने से रोग मिट जाता है।

जलोदर रोग में मकोय के फल देने से रोग मिटने लगता है।

नेत्रों के रोगों में भी इस औषधि मकोय का प्रयोग बहुत ही हितकारी है।

अब इतना बता देने पर इसके रस की महिमा आपको पता चल गयी होगी।मकोय का रस तिल्ली की सूजन,यकृत की सूजन,यकृत के पुराने से पुराने रोग को मिटाने की ताकत रखता है।

मकोय का रस तैयार करने की विधि नीचे दे रहा हूँ।

मकोय का रस तैयार करना:-
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मकोय का रस निकाल कर उसे मिट्टी के बर्तन में भरकर धीमी अग्नि पर गर्म करें,धीरे धीरे उसका हरा रंग बादामी रंग में बदल जाता है,तब इसे उतार कर छान लें।

इस प्रकार तैयार रस को 100-150 ग्राम की मात्रा में लेने पर यकृत के रोग, बड़ी हुयी तिल्ली, हृदय संबंधी रोग दूर होने लगते हैं।यदि शरीर में खुजली की शिकायत हो तथा वह मिट नही रही हो।तो मकोय के रस की 25 से 50 ग्राम की मात्रा लेते रहने से यह मिट जाऐगी।इससे शरीर का रक्त शुद्ध हो जाता है।और रक्त से जुड़े सभी रोग मिट जाते हैं।किसी चिकित्सक के सानिध्य में मकोय का रस लेते रहने पर गठिया,संधिवात,प्रमेह,कफ,जलोदर,सूजन,बवासीर,यकृत और तिल्ली के रोगों को मिटाया जा सकता है।हृदय रोग में इसके काले फल देने से मूत्र ज्यादा मात्रा में लाकर तथा पसीना लाकर यह रोगी को आराम प्रदान कर देता है। इसका प्रयोग एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग से उत्पन्न रिऐक्सन में भी फायदा करता है।

मकोय की गोली या कैपसूल “ मकोय घनसत ”
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मकोय के साफ स्वच्छ पत्तो को अच्छे से धोकर कूटकर जूसर से रस निकाल लें । मिट्टी के बर्तन में डालकर लकड़ी की अग्नि पर रख दें । आग धीमी -धीमी ही रखे। रस दूध की तरह फटेगा । बीच - बीच लकड़ी के डंडे से हिलाते रहे ।धीरे -धीरे पानी सूखने लगेगा । चटनी जैसा बनने लगेगा। ध्यान रखें । नीचे न लगने दें । लकड़ी की कलछी की सहायता से पलटते रहे । जब सूख जाएं गोली बांधने लायक हो जाए। तो नीचे उतारकर ठंडा होने पर हाथों पर कोई भी तेल हल्का सा चुपड़कर ½-½ ग्राम की गोली बांध लें । अगर कैपसूल बनाना चाहे तो धूप में सुखाकर पाउडर करके 500 मिलीग्राम के कैपसूल में भर सकते है ।
सुबह दोपहर शाम पानी से 1 से 4 गोली या कैपसूल ।
रोग के अनुसार लेवें । उपरोक्त रोगों में सफल लाभकारी । कई वर्षों से अपनी चिकित्सा में प्रयोग कर सैकड़ों रोगियों को लाभ पहुँचाया है । यह मेरा अनुभूत प्रयोग है ।

मकोय के काले फल खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होते है । गांव के लोग बड़े चाव से खाते है , ज्यादातर वही जो खेती से जुड़े किसान या उनके बच्चे है , लेकिन आजकल गांवो या शहरी बच्चे जो अंग्रेजी स्कूल में पढ़े लिखे है वो बरगर, पीजा , पास्ता वगैरा ही पसंद करते है । ऐसी चीजों पर ध्यान कम ही देते है । मैं भी गांवो में रहकर पढ़ लिख कर जवान हुआ हुं । खेती से संबंध रखता हुं । मैंने यह फल खूब खाएं है , गांव का हर रंग यादों में बसा है। मेरा काम तो वैद्य का है , जितनी जानकारी है लोगों को देने की कोशिश करता हुं ।

इसके पत्ते वैसे भी चबा कर खा सकते है । चटनी के रूप में या आलू के साथ भुर्जी बनाकर सब्जी के रूप भी खाया जा सकता है ।

इसका बना बनाया “मकोय अर्क” आयुर्वेद स्टोर पर आसानी से मिल जाता है । यानि कि कोई भी यह अफसोस जाहिर ही नही कर सकता कि मैं इसका सेवन नही कर पाया । अत: आप किसी भी रूप में इस्तेमाल कर सकते है । बच्चे बूढ़े जवान इसका अर्क बेखोफ होकर इस्तेमाल करें ।

क्या आप इस  #फल को पहचानते है...?  #लभेर_का_फल।  #लसोढ़ा उर्फ  #गुंदे - मुंह मे जाने के बाद बेहद ही स्वादिष्ट मीठा पर इत...
27/05/2026

क्या आप इस #फल को पहचानते है...? #लभेर_का_फल।
#लसोढ़ा उर्फ #गुंदे - मुंह मे जाने के बाद बेहद ही स्वादिष्ट मीठा पर इतना चिपचीपा होता कि पुरा फेवीकोल ही मान लें मतलब मुंह मे जबडे चिपकने को हो जाते है इसे खाने के बाद पानी पी लें तो डिहाईड्रेसन और लू नही लगती,हम लोग इस फल से बचपन में हम लोग कापी - किताबें चिपकाया करते थे।
इसे हमारे इधर इस फल को लसोढ़ा भी कहा जाता है, यह इस माह (जून)के अंत तक खूब पक चुका होगा,क्योंकि कुछ फल इस प्रकार के होते है की उसके पकने के एक सप्ताह के अंदर मानसूनी वर्षा हो जाए तभी उसकी गुठली में अंकुरण होता है,जिनमें नीम,जामुन,महुआ,प्रमुख है पर लगता है कि लभेर भी संभवतः इसी प्रकार का होगा क्योंकि इनके फल जून अंत तक पकते है,लभेर का फल पकने पर पीला आकर्षक होता है जिसे दूर से देख चिड़िया खींची चली आती है,वह इसे गुठली गुदा समेत पूरा फल निगल जाती है तथा फिर कहीं दूर जाकर बीट कर इसके बीज को फ़ैलाने का काम करती है,वैसे फलों से आकर्षित दो चार फल मनुष्य भी खा लेते है पर गूदा लिरबिरा ,स्वाद रहित होने के कारण यह मनुष्य के भोजन में शामिल नहीं है हां अचार जरूर बनाया जा सकता है किन्तु इन दिनों फलों के राजा आम की बाहुलता के कारण इसे भला कौन पूछे ? यू भी गांव के आस पास मेड़ों बगीचों में विरल ही कहीं जमने के कारण यह पौधा रेयर ही पाया जाता है।

लसोड़े के पेड़ बहुत बड़े होते हैं इसके पत्ते चिकने होते हैं। दक्षिण, गुजरात और राजपूताना में लोग पान की जगह लसोड़े का उपयोग कर लेते हैं। लसोड़ा में पान की तरह ही स्वाद होता है।
इसके पेड़ की तीन से चार जातियां होती है पर मुख्य दो हैं जिन्हें लमेड़ा और लसोड़ा कहते हैं। छोटे और बड़े लसोडे़ के नाम से भी यह काफी प्रसिद्ध है। लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है। इमारती काम के लिए इसके तख्ते बनाये जाते हैं और बन्दूक के कुन्दे में भी इसका प्रयोग होता है। इसके साथ ही अन्य कई उपयोगी वस्तुएं बनायी जाती हैं।
कोई भी पुरुष अपनी खूबसूरती को चेहरे से नहीं अपनी आकर्षक शरीर से दर्शाता है. लेकिन आज कल के खानपान के कारण ही कई लोग बहुत ही ज्यादा दुबले और कमजोर होते है। कई लोग शरीर को ताकतवर और मजबूत बनाने के लिए रोजाना मीट का सेवन करते है. लेकिन उसमे मौजूद ज्यादा मात्रा में तेल मसाले सेहत के लिए हानिकारक होते हैं।
आज हम आपको एक ऐसे फल के बारे में बताने रहें हैं जो बहुत ही शक्तिवर्धक माना जाता है, यह मांस से भी 10 गुना ज्यादा ताकतवर होता हैं। इसका सेवन करते है शरीर में ताकत आ जाती है,इस फल का नाम लसोड़ा है, इसे आम भाषा में भारतीय चेरी भी कहा जाता है, इसका सेवन शरीर के लिए बहुत ही उत्तम और ताकत से भरपूर होता है,आयुर्वेद में लसोड़ा ताकतवर फल माना गया है,आप महीने भर में ही इसको लगातार खाकर शरीर में पहलवानों जैसी ताकत का अनुभव करेंगे।
लसोड़ा में भरपूर मात्रा में कैल्शियम और फास्फोरस होता हैं जो हड्डियों को मजबूत बनता है और शरीर को ताकत प्रदान करता हैं. इस फल को खाने से शरीर में ताकत आती है और शरीर को कई अन्य बीमारियों से राहत मिलती है. इस फल को खाने से आपके शरीर में नई ऊर्जा पैदा होती है जो आपके मस्तिष्क को भी तेज करती है. लसोड़ा का सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती हैं।
दाद के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा के बीजों की मज्जा को पीसकर दाद पर लगाने से दाद मिट जाता है.
फोड़े-फुंसियां के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े के पत्तों की पोटली बनाकर फुंसियों पर बांधने से फुंसिया जल्दी ही ठीक हो जाती हैं।
गले के रोग उपचार में लसोड़ा के फायदे : लिसोड़े की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से गले के सारे रोग ठीक हो जाते हैं.
हैजा के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोडे़ की छाल को चने की छाल में पीसकर हैजा के रोगी को पिलाने से हैजा रोग में लाभ होता है।
दांतों का दर्द दूर करने में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े की छाल का काढ़ा बनाकर उस काढ़े से कुल्ला करने से दांतों का दर्द दूर होता है।
लसोड़े का अचार
यह दाद, खाज, खुजली जैसी स्किन समस्याओं से काफी हद तक राहत दिला सकता है. लसोड़े के अचार के सेवन से ब्लड प्रेशर को भी कंट्रोल किया जा सकता है. इसमें एंटी-कैंसर और एंटी-एलर्जिक प्रॉपर्टी भी पाई जाती हैं।
अचार, इन लोगों को नहीं खाना चाहिए--
जिन लोगों को पाचन से जुड़ी समस्याएं हैं, जैसे गैस, अपच, पेट दर्द, और सीने में जलन दिल की समस्या है,हाई ब्लड प्रेशर
,अर्थराइटिस या जोड़ों से जुड़ी समस्याएं हैं ,ऑस्टियोपोरोसिस है।
लसोड़े के अचार में सोडियम की मात्रा ज़्यादा होती है, जिससे कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं. अचार में मौजूद सोडियम, शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को रोकता है. इससे हड्डियां कमज़ोर होती हैं और दर्द होने लगता है।

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