वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

  • Home
  • India
  • Chitrakoot
  • वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी हमारे यूट्यूब चैनल से जुड़िए👇
https://youtube.com/?si=oaE0s9E6KQSNnCtW
(2)

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में तंत्र शास्त्र एवं भूगर्भ जल शास्त्र के विशेषज्ञनमस्कार दोस्तों, हर किसी को अपने जीवन के ल...
07/09/2026

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में तंत्र शास्त्र एवं भूगर्भ जल शास्त्र के विशेषज्ञ

नमस्कार दोस्तों, हर किसी को अपने जीवन के लिए एक मार्गदर्शक की जरूरत पड़ती है, जो हमें एक अच्छे संस्कार के साथ ही अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। हमारे पहले गुरू माता पिता होते है जो हमें इस दुनिया में लाते है। जिनकी शिक्षा हमारे जीवन में हर जगह पर काम आती है।

गुरू शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। पारमार्थिक और सांसारिक ज्ञान देने वाले व्यक्ति को गुरू कहा जाता है। माता पिता के बाद गुरू ही होता है जो हमें बिना किसी भेदभाव और निस्वार्थ भाव से हमारे जीवन को सकारात्मकता की ओर ले जाने में हमारी मदद करते हैं और हमें नकारात्मकता से दूर रखते हैं। हमारे जीवन में गुरू के महत्व को धर्म ग्रंथों में विस्तार से संस्कृत भाषा में समझाया गया है।

Guru Stotra/गुरु स्तोत्र
|| श्री महादेव्युवाच ||

गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा |

विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ||

श्री गुरु स्तोत्रम् श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में वर्णन करें |

|| श्री महादेव उवाच ||

जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् |

उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||1||

श्री महादेव बोले: जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||1||

प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् |

भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||2||

प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||2||

वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम् |

साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||3||

वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||3||

विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम् |

विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||4||

भगवान विष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता सेवा – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||4||

प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम् |

इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||5||

प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र जप, तपस्या व भक्ति – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||5||

काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा |

श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||6||

काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरि, त्रिपुरासुन्दरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||6||

मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम् |

नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||7||

भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||७||

श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम् |

अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||8||

भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||8||

गंगा काशी कान्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा |

यमुना रेवा पुष्करतीर्थ न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||9||

गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||9||

गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम्|

एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||10||

हे सुन्दरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्री वृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन – ये सब भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||10||

तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः |

किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||11||

तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगा सागर के संगम पर देह त्याग और अधिक क्या कहुं परात्पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||11||

एतत् स्तोत्रम् पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम् |

ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||12||

इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है | निश्चित ही समस्त ब्रह्माण्ड मे जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||12||

|| वृहदविज्ञान परमेश्वरतंत्रे त्रिपुराशिवसंवादे श्रीगुरोःस्तोत्रम् ||

गणेश विसर्जन :- ( #गोबर_गणेश) यह यथार्थ है कि जितने लोग भी गणेश विसर्जन करते हैं उन्हें यह बिल्कुल पता नहीं होगा कि यह ग...
06/09/2026

गणेश विसर्जन :- ( #गोबर_गणेश)
यह यथार्थ है कि जितने लोग भी गणेश विसर्जन करते हैं उन्हें यह बिल्कुल पता नहीं होगा कि यह गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है और इसका क्या लाभ है ??
हमारे देश में हिंदुओं की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि देखा देखी में एक परंपरा चल पड़ती है जिसके पीछे का मर्म कोई नहीं जानता लेकिन भयवश वह चलती रहती है ।

आज जिस तरह गणेश जी की प्रतिमा के साथ दुराचार होता है , उसको देख कर अपने हिन्दू मतावलंबियों पर बहुत ही ज्यादा तरस आता है और दुःख भी होता है ।

शास्त्रों में एकमात्र गौ के गोबर से बने हुए गणेश जी या मिट्टी से बने हुए गणेश जी की मूर्ति के विसर्जन का ही विधान है ।

गोबर से गणेश एकमात्र प्रतीकात्मक है माता पार्वती द्वारा अपने शरीर के उबटन से गणेश जी को उत्पन्न करने का ।

चूंकि गाय का गोबर हमारे शास्त्रों में पवित्र माना गया है इसीलिए गणेश जी का आह्वाहन गोबर की प्रतिमा बनाकर ही किया जाता है ।

इसीलिए एक शब्द प्रचलन में चल पड़ा :- "गोबर गणेश"
इसिलिए पूजा , यज्ञ , हवन इत्यादि करते समय गोबर के गणेश का ही विधान है । जिसको बाद में नदी या पवित्र सरोवर या जलाशय में प्रवाहित करने का विधान बनाया गया ।

अब आईये समझते हैं कि गणेश जी के विसर्जन का क्या कारण है ????

भगवान वेदव्यास ने जब शास्त्रों की रचना प्रारम्भ की तो भगवान ने प्रेरणा कर प्रथम पूज्य बुद्धि निधान श्री गणेश जी को वेदव्यास जी की सहायता के लिए गणेश चतुर्थी के दिन भेजा ।
वेदव्यास जी ने गणेश जी का आदर सत्कार किया और उन्हें एक आसन पर स्थापित एवं विराजमान किया ।
( जैसा कि आज लोग गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की प्रतिमा को अपने घर लाते हैं )

वेदव्यास जी ने इसी दिन महाभारत की रचना प्रारम्भ की या "श्री गणेश" किया ।
वेदव्यास जी बोलते जाते थे और गणेश जी उसको लिपिबद्ध करते जाते थे । लगातार दस दिन तक लिखने के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन इसका उपसंहार हुआ ।

भगवान की लीलाओं और गीता के रस पान करते करते गणेश जी को अष्टसात्विक भाव का आवेग हो चला था जिससे उनका पूरा शरीर गर्म हो गया था और गणेश जी अपनी स्थिति में नहीं थे ।

गणेश जी के शरीर की ऊष्मा का निष्कीलन या उनके शरीर की गर्मी को शांत करने के लिए वेदव्यास जी ने उनके शरीर पर गीली मिट्टी का लेप किया । इसके बाद उन्होंने गणेश जी को जलाशय में स्नान करवाया , जिसे विसर्जन का नाम दिया गया ।

बाल गंगाधर तिलक जी ने अच्छे उद्देश्य से यह शुरू करवाया पर उन्हें यह नहीं पता था कि इसका भविष्य बिगड़ जाएगा ।
गणेश जी को घर में लाने तक तो बहुत अच्छा है , परंतु विसर्जन के दिन उनकी प्रतिमा के साथ जो दुर्गति होती है वह असहनीय बन जाती है ।

आजकल गणेश जी की प्रतिमा गोबर की न बना कर लोग अपने रुतबे , पैसे , दिखावे और अखबार में नाम छापने से बनाते हैं ।
जिसके जितने बड़े गणेश जी , उसकी उतनी बड़ी ख्याति , उसके पंडाल में उतने ही बड़े लोग , और चढ़ावे का तांता ।
इसके बाद यश और नाम अखबारों में अलग ।

सबसे ज्यादा दुःख तब होता है जब customer attract करने के लिए लोग DJ पर फिल्मी अश्लील गाने और नचनियाँ को नचवाते हैं ।

आप विचार करके हृदय पर हाथ रखकर बतायें कि क्या यही उद्देश्य है गणेश चतुर्थी या अनंत चतुर्दशी का ?? क्या गणेश जी का यह सम्मान है ??
इसके बाद विसर्जन के दिन बड़े ही अभद्र तरीके से प्रतिमा की दुर्गति की जाती है ।
वेदव्यास जी का तो एक कारण था विसर्जन करने का लेकिन हम लोग क्यों करते हैं यह बुद्धि से परे है ।
क्या हम भी वेदव्यास जी के समकक्ष हो गए ??? क्या हमने भी गणेश जी से कुछ लिखवाया ?
क्या हम गणेश जी के अष्टसात्विक भाव को शांत करने की हैसियत रखते हैं ??????????

गोबर गणेश मात्र अंगुष्ठ के बराबर बनाया जाता है और होना चाहिए , इससे बड़ी प्रतिमा या अन्य पदार्थ से बनी प्रतिमा के विसर्जन का शास्त्रों में निषेध है ।

और एक बात और गणेश जी का विसर्जन बिल्कुल शास्त्रीय नहीं है ।
यह मात्र अपने स्वांत सुखाय के लिए बिना इसके पीछे का मर्म , अर्थ और अभिप्राय समझे लोगों ने बना दिया ।

एकमात्र हवन , यज्ञ , अग्निहोत्र के समय बनने वाले गोबर गणेश का ही विसर्जन शास्त्रीय विधान के अंतर्गत आता है ।

प्लास्टर ऑफ paris से बने , चॉकलेट से बने , chemical paint से बने गणेश प्रतिमा का विसर्जन एकमात्र अपने भविष्य और उन्नति के विसर्जन का मार्ग है ।
इससे केवल प्रकृति के वातावरण , जलाशय , जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र , भूमि , हवा , मृदा इत्यादि को नुकसान पहुँचता है ।

इस गणेश विसर्जन से किसी को एक अंश भी लाभ नहीं होने वाला ।
हाँ बाजारीकरण , सेल्फी पुरुष , सेल्फी स्त्रियों को अवश्य लाभ मिलता है लेकिन इससे आत्मिक उन्नति कभी नहीं मिलेगी ।

इसीलिए गणेश विसर्जन को रोकना ही एकमात्र शास्त्र अनुरूप है। चलिए माना कि आप अज्ञानतावश डर रहे हैं कि इतनी प्रख्यात परंपरा हम कैसे तोड़ दें तो करिए विसर्जन । लेकिन गोबर के गणेश को बनाकर विसर्जन करिए और उनकी प्रतिमा 1 अंगुष्ठ से बड़ी नहीं होनी चाहिए ।

!!: प्रश्न: क्या #गणेश_प्रतिमा_विसर्जन_शास्त्र_सम्मत है ?

उतर: हाँ बिल्कुल

अभी एक ह्वाट्सएप मैसेज में देखा कि गणपति जी का विसर्जन नहीं करना चाहिए..!!! अब ये मैसेज कहां से चलते हैं , कभी हनुमान जयंती पर कभी दही हांडी की ऊंचाई पर तो कभी श्रावण मास के दुग्धाभिषेक पर ..यह तो वही जानें किंतु भाव प्रतिष्ठा , प्राण प्रतिष्ठा के, चल , अचल , कालातीत और पूजन की समय सीमा के अनुसार अलग अलग विधान हैं ,,
जो विधि विधान पहले से पुराणों में वर्णित है , उसमें प्राकृतिक सामग्री से गणपति बप्पा की प्रतिमा निर्माण का निर्देश दिया गया है, घरों में गोमय से गणपति बनाए जाते थे , इनका विसर्जन पूर्णतः पर्यावरण की रक्षा करने वाला होता है, अत: रासायनिक घटकों से मुक्त शुद्ध प्राकृतिक वस्तुओं से गणपति बप्पा की प्रतिमा बनाएं ,,
एक नया ही मैसेज चल रहा है कि गणपति जी महाराष्ट्र में मेहमान बन कर गए थे बाकी जगह विसर्जन न करें .. किस आधार पर ये टूलकिट रचना हुई यह तो इसको प्रचारित करने वाले ही जानें .. मध्य काल की बर्बरता में ये उत्सव सार्वजनिक रूप से नहीं मना पाते थे, जिस परंपरा का पुनरुत्थान लोकमान्य तिलक जी ने किया था।

#श्री गणेशपुराण_उपासना_खण्ड में भाद्रपद मास की श्री गणेश चतुर्थी से पूजन का विधान और अंत में विसर्जन का स्पष्ट उल्लेख है ।

मृत्तिकां सुन्दरां स्निग्धां क्षुद्रपाषाणवर्जिताम् ।
सुविशुद्धामवल्मीकां जलसिक्तां विमर्दयेत् ॥९॥
कृत्वा चारुतरां मूर्तिं गणेशस्य शुभां स्वयम् ।
सर्वावयवसंपूर्णां चतुर्भुजविराजिताम् ॥१.४९.१०॥
परश्वादि स्वायुधानि दधतीं सुन्दरां घनाम् ।
स्थाप्य पीठे ततः पाणी प्रक्षाल्य मेलयेत्सुधीः ॥११॥
पूजाद्रव्याणि सर्वाणी जलादीनि प्रयत्नतः ।
अष्टगंधानक्षतांश्च रक्तपुष्पाणि गुग्गुलुम् ॥१२॥
त्रिपंचसप्तभिः पत्रैर्युतान् दूर्वांकुरान् शुभान् ।
अष्टोत्तरशतं नीलाऽन् श्वेतानानीय सुन्दरान ॥१३॥
घृतदीपं तैलदीपं नैवेद्यं विविधं शुभम् ।
मोदकापूप लड्डूकान् पायसं शर्करायुतम् ॥१४॥
सूक्ष्मं च तंदुलान्न च व्यंजनानि बहूनि च ।
सचन्द्रपूगचूर्णाढ्यं खाद्यखादिरसंयुतम् ॥१५॥
एलालवंगसंमिश्रं ताम्बूलं केसरान्वितम् ।
जम्ब्वाम्रपनसादीनि द्राक्षारम्भा बलानि च ॥१६॥
तत्तदृतुभव नीशे नारिकेलानि चानयेत् ।
बहुप्रकारमार्तिक्यं कांचनीं दक्षिणां तथा ॥१७॥
एवं संभृतसंभार एकान्तस्थलमास्थितः ।
चैलाजिने कुशमये आसने च कृतासनः ॥१८॥
भूतशुद्धिं प्रकुर्वीत प्राणानां स्थापनं तथा ।
दिग्बंध पूर्वं देवांश्च गणेशादीन्नमेत्पुरा ॥१९॥
अन्तर्बहिर्मातृकाश्च न्यसेदागम मार्गतः ।
सन्निधामादिका मुद्रा दर्शयेद्गुरु मार्गतः ।
मन्त्रन्यासं ततः कृत्वा षडंगन्यासमेव च ॥१.४९.२०॥
×××××××××××

सर्वरोगप्रपीडासु मूर्तीनां त्रयमुत्तमम् ।
नवाहं पूजयेद्यस्तु सर्वपीडां व्यपोहति ॥२१॥
सौवर्णी राजती ताम्री रीतिकांस्यसमुद्भवा ।
मौक्तिकी च प्रवाली च सर्वमेतत्प्रयच्छति ॥२२॥
एवं कृते व्रते देवि सर्वान्कामानवाप्स्यसि ।
यावद्भाद्रपदे मासि चतुर्थी परिलभ्यते ॥२३॥
तस्यां महोत्सवः कार्यो यथाविभवमादरात् ।
रात्रौ जागरणं कार्यं तत्कथावाद्यगायनैः ॥२४॥
प्रभाते विमले स्नात्वा पूर्ववत्पूजयेद्विभुम् ।
गणेशं वरदं देवं ततो होमं समारभेत् ॥२५॥
कुंडे सांगं स्थंडिले वा हूयाज्जप दशांशतः ।
पूर्णाहुतिं ततः कुर्याद् बलिदानपुरःसरम् ॥२६॥
आचार्यं पूजयेत् पश्चाद् गोभ्वासोधनादिभिः ।
ब्राह्मणां स्तोषयेत् पश्चाद्धोमशेषं समापयेत् ॥२७॥
तर्पयेत्तद्दशांशेन तद्दशांशेन भोजयेत् ।
ब्राह्मणान्वेदविदुषः सपत्नीकांश्च कांश्चन ॥२८॥
तेभ्यो भूषणवासांसि दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम् ।
दद्यात् स्त्रीणामलंकारान् योषिद्भ्यश्च सकुंचुकान् ॥२९॥
तुष्टये गणनाथस्य सिद्धिबुद्धियुतस्य ह ।
वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यथाविभवमाचरेत् ॥१.५०.३०॥
ततः सुहृज्जनयुतः स्वयं भुंजीत सादरम् ।
अपरस्मिन्दिने मूर्तिं नृयाने स्थापयेन्मुदा ॥३१॥
छत्रध्वजपताकाभिश्चामरैरुपशोभिताम् ।
किशोरैर्दण्डयुद्धेन युध्यद्भिश्च पुरःसरम् ॥३२॥

"""महाजलाशयं गत्वा विसृज्य निनयेज्जले। ""
वाद्यगीतध्वनियुतो निजमन्दिरमाव्रजेत् ॥३३॥ ( २१६२)

❗जय महादेव❗
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

इति श्री गणेशपुराण उपासनाखंडे हिमवद्गिरिजा संवादे चतुर्थीव्रतकथनं नाम पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥

05/09/2026

श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान शिव की महिमा का अद्भुत गुणगान करते हुए इस दिव्य चौपाई में लिखते हैं —

कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥

भावार्थ : जिनका शरीर कुंद के फूल और चंद्रमा के समान गौरवर्ण का है, जो उमा (पार्वती जी) के प्रियतम हैं, दया के साक्षात् स्वरूप हैं और जिनका दीनों पर अत्यंत स्नेह है — वे कामदेव का दमन करने वाले भगवान शिव मुझ पर कृपा करें।

यह चौपाई केवल शिव महिमा का वर्णन नहीं है, बल्कि यह उस निर्मल करुणा के पुंज का स्मरण है, जो भक्त के थोड़े से प्रेम पर भी संपूर्ण कृपा बरसा देते हैं। भोलेनाथ का स्वरूप जितना शांत है, उतना ही उनके हृदय में दीनों के लिए प्रेम और संवेदना है।

शिव वह हैं जो संसार की माया का मर्दन कर देते हैं और भक्ति से ओतप्रोत हृदय में अपने आप प्रकट हो जाते हैं।उनके ध्यान से मन स्थिर होता है और जीवन में भय, मोह और काम का विनाश होता है।

विडियो - सोमनाथ महादेव चर चित्रकूट धाम उत्तर प्रदेश में रुद्राभिषेक सम्पन्न हुआ
आचार्य - श्री सुधीर पाण्डेय जी
यजमान - वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

03/09/2026

#पाचक_वटी पेट के सभी लोगों की एक ही औषधि
पाचक वटी के सेवन से पाचक अग्नि की शिथिलता दूर हो पुनः उसमें चेतना आ जाती है अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन करने से अजीर्ण हो गया हो तो पाचक वटी की दो गोली खा लेने से भोजन जल्दी पच जाता है पाचक वटी के सेवन से अम्लपित्त में मुंह में खट्टा या कड़वा पानी आना बंद हो जाता है और अन्न का परिपाक भली-भांति होने लगता है पेट के दर्द को कम करने के लिए पाचक वटी की गोली गर्म जल के साथ खा लेने से दर्द में आराम हो जाता है। यह मंदाग्नि, अजीर्ण, अम्लपित्त, उदरशूल और वायूगोला आदि का शीघ्र नाश करती है। अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन, बासी आदि भोजन करने से उत्पन्न मंदाग्नि कब्जियत आदि इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं। यह मंदाग्नि को नष्ट कर जठराग्नि को प्रदीप्त करती है। इसकी दो तीन खुराक खाने से ही भूख खूब खुलकर लगती है और भोजन भी ठीक-ठीक पचने लग जाता है। किसी भी तरह का अजीर्ण हो उसे नष्ट करने के लिए पाचक वटी का प्रयोग अवश्य करें। मात्रा से अधिक भोजन कर लिया हो तो उसे भी यह पचा देती है। पेट में वायु भर जाने से पेट फूल जाता हो उस समय शोभान्जन वटी की दो गोली गर्म जल के साथ देने से तत्काल लाभ होता है। पाचक वटी बड़ी आंत तथा छोटी आंत की विकृति को नष्ट करती है। किसी भी कारण से अग्नि मन्द होकर भूख ना लगती हो, अन्न में अरुचि हो, जी मिचलाता हो, पेट भारी रहता हो, वमन की इच्छा हो या वमन हो जाता हो, अपच दस्त होते हों, या कब्ज रहता हो आदि उपद्रव होने पर पाचक वटी अद्भुत कार्य करती है। इसके सेवन से भोजन पच कर खूब भूख लगती है और दस्त साफ आता है। जिन्हें बार बार भूख कम लगने की शिकायत हो उन्हें पाचक वटी अवश्य लेनी चाहिए। अजीर्ण की शिकायत अधिक दिनों तक बनी रहने पर पित्त कमजोर हो जाता है और कफ तथा आंव की वृद्धि हो जाती है इसमें हृदय भारी हो जाना, पेट में भारीपन बना रहना, शरीर में आलस्य, किसी भी काम में उत्साह नहीं होना की गति और नाड़ी की चाल मंद हो जाना आदि लक्षण होने पर पाचक वटी देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। पाचक वटी पित्त को जागृत कर कफ और आंव के दोष को पचाकर बाहर निकाल देती है और पाचक रस की उत्पत्ति कर भूख जगा देती है। यह दीपक पाचक तथा वायुनाशक है। अजीर्ण के कारण पेट में वायु भर जाती है जिससे डकारें आने लगती हैं इस वायु को पचाने तथा डकारों को बंद करने के लिए पाचक वटी बहुत उपयोगी है। पेट में वायु कुपित होकर उर्ध्व गति हो जाती है, सामान्य लोग इसे गोला बनना कहते हैं। दिमागी काम करने वालों को यह शिकायत बहुत होती है।इसमें जी मिचलाना, सिर भारी रहना, दिल धड़कना, भ्रम, चक्कर आना, खट्टी डकार आना, पेट फूलना या अफरा आदि लक्षण होते हैं। पाचक वटी के प्रयोग से उर्ध्ववात का शमन शीघ्र ही हो जाता है। पाचक वटी आम को पचाती तथा अजीर्ण मन्दाग्नि पेट दर्द-परिणाम-शूल, पित्तज शूल आदि रोगों को दूर करती है। इसके नियमित सेवन से पेट-सम्बन्धी किसी व्याधि(रोग) के होने का डर नहीं रहता है, क्योंकि उदर सम्बन्धी व्याधियों का मूल अजीर्ण और कब्ज, इसके सेवन से ना तो अजीर्ण ही हो सकता है और न कब्ज ही होता है। इसलिए उदर सम्बन्धी व्याधियों से रक्षा के लिए पाचक वटी का नियमित प्रयोग करना अति श्रेष्ठ उपाय है।

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

02/09/2026

#मोती_युक्त_मधुरान्तक_वटी :- इस वटी के सेवन से २५ दिन का मुदतीताप (Typhoid fever) मधुरा के दाने जल्दी निकलकर भर तथा ढल जाते है। यह वटी मोतीझरा (Typhoid fever) की सबी अवस्थाओं में उपयोगी है। यह रसायन अन्तडी (आतों) को बलवान बनाती है और दाह को शांत करती है।

#घटकों_के_कार्य :-

#मुक्तापिष्टी :- मुक्तापिष्टी कफ, पित्त, क्षय, श्वास, अग्निमांध, दाह, वातरोग, नपुंशकता आदि रोगों को दूर कर शरीर को पुष्ट बनाती है और आयु की वृद्धि करती है।

#जायंत्री :- ज्वर (Fever) की विशेषतः ज्वरातीसार में प्रयोग करते हैं।

#केसर :- यह ज्वर में विशेषतः विस्फोटयुक्त ज्वरो (Typhoid fever) में उपयोग होता है। मसूरिका (Small Pox) में इसका प्रयोग करने से दाने कम निकलते है और उपद्रव भी कम होते हैं।

#जायफल :- ज्वघ्न है। ज्वर विशेषतः ज्वरातीसार में प्रयोग करते है।

#लौंग :- यह तिक्त होने से आमपाचन और ज्वरघ्न है। ज्वर (Fever) में इसका प्रयोग होता है। इससे आमदोष का पाचन होता है तथा तृष्णा, छर्दि आदि उपद्रय शान्त होता है।

#तुलसीपत्र :- यह ज्वरघ्न (Antipyretic) तथा, शीतप्रशमन है । वातश्लेमष्मिक ज्वर, प्रतिश्याय (Cold) आदि में तुलसी प्रसिद्ध औषधि है। विषमज्वर (Typhoid fever) या शीतप्रधान ज्वर (Malaria) विशेष रूप मे लाभकर है।

#अभ्रक_भस्म_निश्चंद्र :- अभ्रक भस्म जीर्ण ज्वर (Chronic fever) शारीरिक उन्माद तथा ज्वर की गर्मी में लाभदायक है।

#भावना:
#सुण्टी :- सामान्य एवं सन्निपात (Typhus fever) उबरो में सुण्ठी का रस अनुपान के रूप में दिया जाता है, शुण्ठी विषम एवं जीर्ण ज्वरों में लाभकर है।

मोती युक्त मधुरांतक वटी मधुरा (Typhoid) के विष (Toxin) को बाहर निकालने के लिये अति उपयोगी है। मधुरा में लक्षमीनारायण रस के साथ इस वटी का सेवन करने से सत्वर लाभ पहुंचता है एवं सगर्भा स्त्रियों और बालको का ताप उतारने के लिये निर्भयतापूर्वक दी जाती है।

#मधुरान्तक_वटी_के_फायदे :-

#सुबह_आने_वाले_बुखार_में :-
यदि किसी व्यक्ति को केवल सुबह के समय बुखार रहता हैं तो इस वटी का उपयोग किया जा सकता हैं| व्यक्ति के शरीर में कफ की मात्रा में कमी होने के कारण सुबह सुबह बुखार आती रहती हैं| इस अवस्था में इस वटी का प्रभाव बहुत अच्छा पड़ता हैं|

#रात्री_में_आने_वाले_बुखार_में :-
जब व्यक्ति के शरीर में पित्त की मात्रा घाट जाती हैं तो ऐसे में केवल रात को बुखार आती रहती हैं| इस ज्वर में मधूरान्तक वटी के साथ यदि लक्ष्मीनारायण रस का सेवन कराया जाये तो काफी अच्छा लाभ मिलता हैं|

:टायफाइड_में :-
बच्चो से लेकर बुजुर्गो तक सभी इस औषधि का उपयोग कर सकते हैं यहाँ तक की गर्भवती महिला को भी यदि टायफाइड हो गया हो तो इसका उपयोग बिना किसी डर के किया जा सकता हैं| सरल शब्दों में किसी भी व्यक्ति को यदि टायफाइड हो या कोई अन्य ज्वर हो तो वह इसका उपयोग कर सकता हैं|

#विष_को_खत्म_करें :-
शरीर में किसी भी प्रकार के ज्वर का कारण शरीर में पनप रहा विष होता हैं| यह विष ज्वर के साथ साथ और भी कई रोग उत्पन्न कर देता हैं| ऐसे में शरीर से विष को बाहर निकालने के लिए इस औषधि का उपयोग बहुत उत्तम होता हैं|

• Typhoid fever, की सभी अवस्था में उपयोगी है।
• सूतशेखर रस तथा प्रवालपिष्टी योग्य मात्रा में मिला देने से मोतीझरा (आंत्रिक ज्वर) के रोगी थोड़े ही दिनों में स्वस्थ हो जाते हैं।
• ज्वर में दाह को शांत करती है।

#मात्रा_और_सेवन_विधि :-

१/२ रती से २ रती तक दिन में ३ या ४ समय तीन तीन घण्टे के अन्तर से अदरक के रस व मधु के साथ दें अथवा वैद्य की सलाह से दें।

आयुर्वेद चिकित्सक तय कर ले कि वह अपनी चिकित्सा अपने सिद्धांत पर करेगा तो निश्चित रूप से जनकल्याण के साथ साथ धन व यश दोनों की वृद्धि होती है।

स्वस्थ रहना है 100 साल तो अपने आयुर्वेद को अपनाना पड़ेगा। बिमारी कोई और मिले उससे पहले आयुर्वेद की शरण में आना पड़ेगा।। आज महेंद्र सिंह धोनी जैसी शख्सियत जो किसी भी तरह की चिकित्सा पद्धति को अपनाकर के महंगी से महंगी चिकित्सा पद्धति को ले करके अपना इलाज करा सकता था लेकिन आया आयुर्वेद के शरण में और उन्हें पूर्ण रूप से आराम मिला है ऐसे ही आयुर्वेद अपनाएं जीवन को स्वस्थ बनाएं और सुंदर बनाएं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितने चमत्कार आज तक हुए है उनमें से 90% आयुर्वेद व देशी तौर तरीकों से ही हुए है लेकिन फिर लोग न जाने क्यो लुटेरों की तरफ ही भागते है

स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है और उम्र कम होती जा रही है। आयुर्वेद और निसर्गोपचार से स्वास्थ्य का संतुलन बनाए रखें।

”आयुर्वेद कहता है कि उसकी पद्धति आपको उस बीमारी से तो लड़ने में मदद करेगी ही बल्कि हर बीमारी को हराने की कोशिश करेगी, आप जानते हैं ऐसा क्यूँ, ऐसा इसलिए क्यूंकि आयुर्वेद कभी भी शरीर के केवल उस हिस्से का उपचार नहीं करता बल्कि वह हर हिस्से का उपचार करता है।” ”आयुर्वेद की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसका उपचार हमेशा अन्य फायदे लेकर आता है अन्य नुकसान नहीं।”

आयुर्वेदिक चिकित्सा में एक ऐसी शक्ति है जो अन्य चिकित्सा की तुलना में सुरक्षित रूप से किसी भी बीमारी को ठीक कर सकती है।

*ग्राम्य आयुर्वेद भवन संस्थान द्वारा संचालित जड़ी बूटी स्वदेशी चिकित्सा केंद्र में आपका स्वागत है*

*अपने शरीर को किसी भी प्रकार की बीमारी से मुक्त करने के लिए आयुर्वेदिक उपचार अपनाएं।*

*स्वस्थ रहना है तो भारतीय चिकित्सा पद्धति को अपनाना ही होगा अन्यथा एक बार एलोपैथी चिकित्सा के चक्कर में फंसे तो बिमारियों के जाल से निकलना मुश्किल होगा*

स्वास्थ्य से संबंधित कोई समस्या या बीमारी है और आप उसका आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा समाधान चाहते हैं तो इनबॉक्स में या

#अभी_आर्डर_करने_के_लिए
👇WhatsApp मैसेज भेजें या कॉल करें
वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

आयुर्वेद चिकित्सा भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति है।
आयुर्वेद को अपनाने में परहेज क्यों ?
आयुर्वेद को अपनाकर स्वास्थ्य को और बेहतर बनाएं।।

इलाज से बेहतर बचाव है
स्वदेशी बने 🙏

टायफाइड बुखार की आयुर्वेदिक औषधि वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी मो०- 093360 55537
02/09/2026

टायफाइड बुखार की आयुर्वेदिक औषधि
वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

Enjoy the videos and music you love, upload original content, and share it all with friends, family, and the world on YouTube.

02/09/2026

तीन दिनों से लगातार मूसलाधार बारिश हो रही है चित्रकूट धाम उत्तर प्रदेश में

1.  एक हेक्टर भांग 25 हेक्टर जंगल जितना ऑक्सीजन छोड़ती है। भांग 4 महीने में और पेड़ 20-50 साल में ।2. एक हेक्टेयर भांग स...
01/09/2026

1. एक हेक्टर भांग 25 हेक्टर जंगल जितना ऑक्सीजन छोड़ती है। भांग 4 महीने में और पेड़ 20-50 साल में ।
2. एक हेक्टेयर भांग से 4 हेक्टेयर जंगल उतने ही कागज मिलते हैं।
3. पेड़ 3 बार रीसाइक्लेबल पेपर बनाते हैं जबकि भांग 8 बार रीसाइक्लेबल पेपर बनाता है। हेम्प पेपर सबसे अच्छा और सबसे टिकाऊ है।
5. भांग के पौधे एक विकिरण जाल हैं। भांग के पौधे हवा को शुद्ध करते हैं।
Vo)) LTE2
6. दुनिया में कहीं भी भांग पैदा हो सकती है, इसे पानी की बहुत जरूरत है। इसके अलावा, क्योंकि यह परजीवी से खुद को बचा सकता है, इसे कीटनाशक की आवश्यकता नहीं है।
7. हेम्प टेक्सटाइल अपनी खुद की प्रॉपर्टीज पर फ्लैक्स उत्पादों का प्रदर्शन करते हैं।
48%
8. भांग किनारे, रस्सियों, बैग, जूते, टोपी के उत्पादन के लिए एक आदर्श पौधा है...
9. बुल्गारिया में भांग बैन है। लेकिन तकनीकी भांग में एक दवा नहीं है और इसकी खेती स्वतंत्र रूप से की जा सकती है।
10. भांग के बीज का प्रोटीन वैल्यू बहुत ज्यादा है और उसमें निहित दो फैटी एसिड प्रकृति में कहीं और नहीं है। 11. भांग का उत्पादन सोया से बहुत सस्ता है।
12. जिन जानवरों को भांग खाते हैं उन्हें हार्मोन सप्लीमेंट की जरूरत नहीं है।
13. सभी प्लास्टिक उत्पादों को भांग के साथ बनाया जा सकता है, भांग प्लास्टिक पर्यावरण के अनुकूल और पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है।
14. इमारतों के थर्मल इन्सुलेशन के लिए भी भांग का उपयोग किया जा सकता है, यह टिकाऊ, सस्ता और लचीला है।
15. भांग साबुन और भांग प्रसाधन सामग्री पानी को प्रदूषित नहीं करते, इसलिए वे पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल हैं।

01/09/2026

6 घंटों से लगातार मूसलाधार बारिश हो रही है चित्रकूट धाम उत्तर प्रदेश में

 #शोभान्जन_वटी के सेवन से पाचक अग्नि की शिथिलता दूर हो पुनः उसमें चेतना आ जाती है अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन करने से अजीर्...
30/08/2026

#शोभान्जन_वटी के सेवन से पाचक अग्नि की शिथिलता दूर हो पुनः उसमें चेतना आ जाती है अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन करने से अजीर्ण हो गया हो तो शोभान्जन वटी की दो गोली खा लेने से भोजन जल्दी पच जाता है शोभान्जन वटी के सेवन से अम्लपित्त में मुंह में खट्टा या कड़वा पानी आना बंद हो जाता है और अन्न का परिपाक भली-भांति होने लगता है पेट के दर्द को कम करने के लिए शोभान्जन वटी की गोली गर्म जल के साथ खा लेने से दर्द में आराम हो जाता है। यह मंदाग्नि, अजीर्ण, अम्लपित्त, उदरशूल और वायूगोला आदि का शीघ्र नाश करती है। अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन, बासी आदि भोजन करने से उत्पन्न मंदाग्नि कब्जियत आदि इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं। यह मंदाग्नि को नष्ट कर जठराग्नि को प्रदीप्त करती है। इसकी दो तीन खुराक खाने से ही भूख खूब खुलकर लगती है और भोजन भी ठीक-ठीक पचने लग जाता है। किसी भी तरह का अजीर्ण हो उसे नष्ट करने के लिए शोभान्जन वटी का प्रयोग अवश्य करें। मात्रा से अधिक भोजन कर लिया हो तो उसे भी यह पचा देती है। पेट में वायु भर जाने से पेट फूल जाता हो उस समय शोभान्जन वटी की दो गोली गर्म जल के साथ देने से तत्काल लाभ होता है। शोभान्जन वटी बड़ी आंत तथा छोटी आंत की विकृति को नष्ट करती है। किसी भी कारण से अग्नि मन्द होकर भूख ना लगती हो, अन्न में अरुचि हो, जी मिचलाता हो, पेट भारी रहता हो, वमन की इच्छा हो या वमन हो जाता हो, अपच दस्त होते हों, या कब्ज रहता हो आदि उपद्रव होने पर शोभान्जन वटी अद्भुत कार्य करती है। इसके सेवन से भोजन पच कर खूब भूख लगती है और दस्त साफ आता है। जिन्हें बार बार भूख कम लगने की शिकायत हो उन्हें शोभान्जन वटी अवश्य लेनी चाहिए। अजीर्ण की शिकायत अधिक दिनों तक बनी रहने पर पित्त कमजोर हो जाता है और कफ तथा आंव की वृद्धि हो जाती है इसमें हृदय भारी हो जाना, पेट में भारीपन बना रहना, शरीर में आलस्य, किसी भी काम में उत्साह नहीं होना की गति और नाड़ी की चाल मंद हो जाना आदि लक्षण होने पर शोभान्जन वटी देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। शोभान्जन वटी पित्त को जागृत कर कफ और आंव के दोष को पचाकर बाहर निकाल देती है और पाचक रस की उत्पत्ति कर भूख जगा देती है। यह दीपक पाचक तथा वायुनाशक है। अजीर्ण के कारण पेट में वायु भर जाती है जिससे डकारें आने लगती हैं इस वायु को पचाने तथा डकारों को बंद करने के लिए शोभान्जन वटी बहुत उपयोगी है। पेट में वायु कुपित होकर उर्ध्व गति हो जाती है, सामान्य लोग इसे गोला बनना कहते हैं। दिमागी काम करने वालों को यह शिकायत बहुत होती है।इसमें जी मिचलाना, सिर भारी रहना, दिल धड़कना, भ्रम, चक्कर आना, खट्टी डकार आना, पेट फूलना या अफरा आदि लक्षण होते हैं। शोभान्जन वटी के प्रयोग से उर्ध्ववात का शमन शीघ्र ही हो जाता है। शोभान्जन वटी आम को पचाती तथा अजीर्ण मन्दाग्नि पेट दर्द-परिणाम-शूल, पित्तज शूल आदि रोगों को दूर करती है। इसके नियमित सेवन से पेट-सम्बन्धी किसी व्याधि(रोग) के होने का डर नहीं रहता है, क्योंकि उदर सम्बन्धी व्याधियों का मूल अजीर्ण और कब्ज, इसके सेवन से ना तो अजीर्ण ही हो सकता है और न कब्ज ही होता है। इसलिए उदर सम्बन्धी व्याधियों से रक्षा के लिए शोभान्जन वटी का नियमित प्रयोग करना अति श्रेष्ठ उपाय है।

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

Address

Chitrakoot
210206

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share