Yog Sadhan Ashram Bani

Yog Sadhan Ashram Bani ॐ नमः श्री राम लाल प्रभु जी परब्रह्मणे नमः !!

With  जय श्री सदगुरुदेव जी की जी कोटि कोटि  प्रणाम, वन्दन, नमन  जी Shrimadbhagwadgeeta Prachar and Janjagran Sabha - Reg...
05/06/2026

With जय श्री सदगुरुदेव जी की जी कोटि कोटि प्रणाम, वन्दन, नमन जी Shrimadbhagwadgeeta Prachar and Janjagran Sabha - Regd. – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

"शिष्य  को गुरु से क्या  मिलता  है"यह विषय हर किसी की सन्तोषजनक जीवन रुपी यात्रा में अतुलनीय, अवर्णनीय स्थान रखता है। इस...
02/06/2026

"शिष्य को गुरु से क्या मिलता है"

यह विषय हर किसी की सन्तोषजनक जीवन रुपी यात्रा में अतुलनीय, अवर्णनीय स्थान रखता है। इस सन्दर्भ में विस्तार से अवलोकन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि हर जीव को इस सफर में जो कुछ भी चाहिए वो सव श्री सदगुरुदेव के मार्ग दर्शन से ही मिलता है।अर्थात यहां यह कहना अत्याधिक उचित होगा कि गुरु जी के सानिध्य में दो ऐसी चीजें मिलती हैं जिनमें जीवन के लिए जो आवश्यक है सव कुछ समाया है।
1) धृति
2) मति
1)यहां धृति से तात्पर्य है साहस,हौसला / हिम्मत यह सव कुछ मिलता है।फलस्वरूप हम हर कार्य को हाथ में लेने से संकोच नहीं करते यहां चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियां क्युं न हो।यहां गुरु जी का सानिध्य होने से सफलता शिष्य के लिए स्वागत करती है।
2)
मति से तात्पर्य है कि ऐसी विलक्षण बुद्ध मिलती है कि जीवन के हर लम्हे में सही निर्णय लेने में कोई विलम्ब नहीं होता,परिणाम स्वरूप जीवन में सारे निर्णय सन्तोषजनक और हर मापदंड, पैमाने की कसोटि पर एक समुचित एहसास प्रदान करते हैं। यह सव एक सफल सन्तोषजनक सफर के लिए अत्याधिक आवश्यक है और यही श्री सदगुरुदेव जी के सानिध्य से प्राप्त होता है। इस सव का अगर हम वचपन से ही अवलोकन करें तो यह विषय और अधिक सरल हो जाता है।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

"सर्वे भवन्तु सर्वे सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय।
सर्वे भद्राणी पशुयनतु,मा कशिचददुख भाग भवेत"।

भुक्ति ओर मुक्ति इससे तात्पर्य  है कि संसार में जीवन रुपी यात्रा को भोगने/जीने के लिए वो सभी आवश्यक पदार्थो, वस्तुओं की ...
23/05/2026

भुक्ति ओर मुक्ति
इससे तात्पर्य है कि संसार में जीवन रुपी यात्रा को भोगने/जीने के लिए वो सभी आवश्यक पदार्थो, वस्तुओं की उपलब्धि होना ही भुक्ति है।जो कि हर जीव की आवश्यकता है तथा यह योगयुक्त जीवन होने पर ही संम्भव है।इस सब के लिए योगी योगी सदगुरु का सानिध्य परम आवश्यक है।

मुक्ति से तात्पर्य कि अपने मूल में विलय होना/मिलना है। यहां इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे एक लोहे का टुकडा चुंम्बक के सानिध्य अपना अस्तित्व खो कर चुंम्बक वन जाता है ठीक इसी प्रकार जव कोई जीव जो कि सभी उस परम शक्तिमान परमातमा के अंश मात्र है तथा
प्रभु के पास पहुंच कर अपना अस्तित्व खो कर प्रभु स्वरूप हो कर इस संसार रुपी यात्रा से मुक्त हो जाता है अर्थात आवागमन समाप्त हो जाता है। यही इस जीवन की वास्तविकता है।यह सारा जीवन इसी भुक्ति और मुक्ति का ही ताना वाना है।
योग निष्ठ जीवन ही उचित मार्ग है जो इस चक्र से मुक्त कर सकता हैं।

इसको भगवान श्री कृष्ण ने श्री मदभगवत गीता में ऐसे चरितार्थ किया है।

योगी बनो कुन्ती के जाए,योगी के सव कारज पूरे योग विना सव काज अधूरे।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी।"

15/05/2026

"कण कण में वह वैठा स्वामी, करे करावे अन्तर्यामी। चित मेरे मैं उसकी थाप,सोचे सोच करावे आप।ऐसा ज्ञान प्रभु वतलावें,मूढ मती हम क्या कथ पावें।वचन प्रभु के सुन मम मीत,होती जन मन दृढ प्रतीत ।प्रभु के मुख से श्रवण कर उपजे तत्क्षण ज्ञान, मनन करे जो प्रेम से होय एकाग्र ध्यान"।

नित्य युक्त
ऐसा जीव जो हर पल प्रभु गुण गावे ,हर पल प्रभु जी को नमन करे,हर पल प्रभु को धयावे।ऐसा जीव नित्य युक्त कहलाता है।अर्थात नित्य युक्त ही ऐसी विधि है जो कि जीव को इस जीवन रुपी यात्रा का लक्ष्य पाने का पात्र वनाती है।ऐसे जीव का कुशल क्षेम प्रभु स्वयंम देखते हैं।नित्य युक्त हो कर जीव हर रहस्य को जानने का सामर्थवाहन हो जाता है। अर्थात जीव के हर संशय का निर्वाण हो जाता है।यही योगयुक्त जीवन का मूल आधार है।नित्य युक्त हमारे जीवन की अमृत धारा है,जो हमें इस जीवन की यात्रा का भरपूर आनंदमय,खुशहाल वनाती है। यही इस संसारिक यात्रा की वास्तविकता है।यहां पहुंच कर जीव सन्तोष धन की प्राप्ति होती है।

"जय श्री प्रभु जी की जी"।

"सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्रराणि पशुयनतु मा कशिचंददुख भाग भवेत"।

जिंदे चल योगाश्रम चलिए, द्वार योगी गुरां दा मलिए।गुरु चमन जगत नूं तारदे,तपे ह्रदय अनेकों ठारदे।होर झल न खलार झलिए।जिंदा ...
06/05/2026

जिंदे चल योगाश्रम चलिए, द्वार योगी गुरां दा मलिए।
गुरु चमन जगत नूं तारदे,तपे ह्रदय अनेकों ठारदे।
होर झल न खलार झलिए।
जिंदा चल योगाश्रम चलिए, द्वार योगी गुरां दा मलिए।

यहां से एहसास होता है कि योगाश्रम क्यूं जाना चाहिए, वहां क्या मिलता है। योगाश्रम जाने से योगाअनुकूल जीवन का रास्ता मिलता है।परिणाम स्वरुप ऋतमभरा प्रज्ञा/ ईश्वरीय ज्ञान से वुद्धि भर जाती है। इसी क्रम में स्थित प्रज्ञा होती है/ दूसरे शब्दों में हमारी वुद्धि उस परम शक्ति में स्थित हो जाती है। यही वो अवस्था है जहां इस सृष्टि का ज्ञान होता है तथा इस जीवन रुपी सफर का लक्ष्य प्राप्त होता है। यही तो सारा रहस्य है।अर्थात यह सव अविद्या व माया का खेल है जीस कारण जीव इस सारे रहस्य से अनभिज्ञ रहता है। इस अविद्या और माया से योगाअनुकूल जीवन ही नितांत दिला सकता है। इसीलिए योगाश्रम में ही हम स्थित प्रज्ञा हो सकते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय।सर्वे भद्राणी पशुयनतु मा कशिचंददुख भाग भवेत।

जय श्री प्रभु जी की जी।

"योग में निश्चय  जो धरे,और योग से प्रीत। सचमुच वह जन धन्य  है,सुन्दर  उसकी नीत"।।उपरोक्त  पंक्तियों  में छिपा है योग का ...
03/05/2026

"योग में निश्चय जो धरे,और योग से प्रीत।
सचमुच वह जन धन्य है,सुन्दर उसकी नीत"।।

उपरोक्त पंक्तियों में छिपा है योग का गूढ़ रहस्य, जो हमें इंगित करती हैं कि योग में जब निश्चय हो जाए तो इससे अच्छी जीवन रुपी सफर को आनंदमय वनाने की कोई भी रीत नहीं हैं।योग मानवता के लिए अदभुत उपहार है तथा इस सृष्टि में कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए कहना उचित होगा कि योग एक जीवन धारा है,अमृत है जो जीवन के हर पल एहसास दिलाता है कि सर्वोत्तम सेवा सम्पूर्ण मानव सेवा है और वो तभी मुमकिन है जब हम स्वयंम इसके काबिल हों। इसके लिए केवल योग से ही हम खुद को सक्षम वना सकते हैं। इस वास्तविकता को श्री प्रभु जी ने,स्वामी जी ने तथा श्री सदगुरुदेव जी ने अपने जीवन रुपी यात्रा में प्रत्यक्ष प्रमाण दे दे कर यथार्थ किया।आज आवश्यकता है अभ्यास, दरिढ संकल्प और अटूट विश्वास की,यही इस जीवन रुपी सफर की सचाई है जो लक्ष्य कि ओर अग्रसर करती है।

सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणि पशुयनतु मा कशिचददुख भाग भवेत।

जय श्री सदगुरुदेव जी की जी।

"सदगुरु के प्रताप  से वने,शिष्य  के काम। शिष्य  के मन आ वसें,बस राम  राम, राम,राम श्री प्रभु राम"।।उपरोक्त  पंक्तियाँ  स...
28/04/2026

"सदगुरु के प्रताप से वने,शिष्य के काम।
शिष्य के मन आ वसें,बस राम राम, राम,राम श्री प्रभु राम"।।

उपरोक्त पंक्तियाँ स्मरण कराती हैं कि मनुष्य जीवन में सदगुरु का क्या महत्व है। इसका अवलोकन करने पर पाया गया कि मानव जन्म से लेकर जीवन रुपी सफर के हर पल में यह एहसास होता है कि हर पल,हर लम्हे हमें मार्ग दर्शन कि आवश्यकता होती है,सही मार्ग दर्शक न मिलने पर हम इस जीवन रुपी यात्रा की मंजिल अथवा लक्ष्य के आस पास से भी वंचित रह जाते हैं।ऐसी अवस्था में हमें पछतावे के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता है।इसलिए श्री प्रभु जी के भक्ति स्वरुप वंधुओ,भाइयो,बहनो आप सभी के श्री चरणों में विनम्र विनय है कि समय रहते उपयुक्त मार्ग दर्शक/श्री सदगुरुदेव जी का चयन करके अपने जीवन के लक्ष्य की ओर अग्रसर रहें।यही एकमात्र इस जीवन की वास्तविकता है। इस सवका एकमात्र उतर सम्पूर्ण योगी सदगुरु ही है।योगी सदगुरु ही सही मार्ग दर्शन करने में सक्षम होते हैं,यह सब तथ्य आदिकाल से ही प्रमाणित है हमें आवश्यकता है उचित निर्णय लेकर अपनी इस यात्रा को सुगम,सन्तोषजनक सुनिश्चित करें जी।

"सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्व सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणी पशुयंतु मा कशिचददुख भाग भवेत"।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"।

"जीवन की जो उलझने,देते प्रभु सुलझाए। सेवक  का जीवन  भया सव विध से सुखदाय"।।उपरोक्त  शव्द स्मरण कराते हैं श्री प्रभु  जी ...
25/04/2026

"जीवन की जो उलझने,देते प्रभु सुलझाए। सेवक का जीवन भया सव विध से सुखदाय"।।

उपरोक्त शव्द स्मरण कराते हैं श्री प्रभु जी के जीवन काल की अनन्य लीलाऐं।जिनके स्वाध्याय से यह शव्द प्रमाणित होते हैं तथा वो सारी लीलाऐं हमें इस जीवन रुपी सफर की वास्तविकता को समझने में साक्षी हैं।यह सभी हमारे जीवन में एक विशेष जगह वनाती हैं तथा इनके प्रभाव से जीवन की उलझने खुद वखुद ही सुलझने लगती हैं।परिणाम स्वरुप सन्तोष और उत्साहपूर्ण /सकून एहसास होता है।इन्हीं सकून भरे पलों की तलाश हम सभी जीवन भर भिन्न भिन्न योजनाएं वना कर प्रयास करते हैं। इसी क्रम में हमें जीवन की समस्त उलझनों से निजात मिल जाता है।

"सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणी पशुयंतु मा कशिचददुख भाग भवेत"।।

"जय श्री प्रभु जी की जी"।

"योग विना न मुक्ति है,और नहीं कल्याण। प्रभु जी ने समझाया,स्वामी जी ने समझाया,सदगुरुदेव जी ने भी समझाया दे दे कर प्रमाण"।...
23/04/2026

"योग विना न मुक्ति है,और नहीं कल्याण।
प्रभु जी ने समझाया,स्वामी जी ने समझाया,सदगुरुदेव जी ने भी समझाया दे दे कर प्रमाण"।।

उपरोक्त शव्द प्रमाण हैं कि मानव जीवन में योग का क्या स्थान है। जिसका समय समय पर श्री प्रभु जी ने स्वयंम व श्री प्रभु स्वरुप महान आत्माओं ने मानवता के उत्थान हेतु याद दिलाया कि योग विना जीवन रुपी सफर गन्तव्य रहित सफर है।योग ही हमें सामर्थ्य प्रदान कर्ता है,जिससे हमारी यह जीवन की यात्रा सुगम, सन्तोषजनक और आनन्दमयी वन जाती है।यही तो है इस जीवन की वास्तविकता तथा इसके उपरान्त फिर उस परम पिता कि पहचान साक्षात्कार, मिलन। इस जीवन में हम सबकी यह कामना रहती है।योगयुक्त जीवन ही एक मात्र विकल्प है जो हमारी जिज्ञासा की पूर्ति करने में सक्षम है।हम सबका सम्पूर्ण मानवता के कल्याण हेतु दायित्व है कि इसी क्षण से सुनिश्चित करें कि हमारी जीवन शैली योगयुक्त हो,यही श्री प्रभु जी को सचाई उपहार होगा और इसी में समस्त मानवता का कल्याण है।

सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय,सर्वे भद्राणी पशुयंतु मा कशिचंददुख भाग भवेत।

"जय श्री प्रभु जी की जी।"

Address

Khadwana, Bani
Dehra Gopipur
177108

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Yog Sadhan Ashram Bani posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share