Liver & Gastro science Delhi

Liver & Gastro science Delhi Endoscopy, Colonoscopy, ERCP, MRCP, MRI AND CT-Scan, EVL banding , OPD, Surgery and all tpyes of medical services available. 24/7 hrs Admission.

Cashless mediclaim facilities and Health insurance available.

19/08/2026

बिहार में लिवर ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि सामने आई है। AIIMS पटना ने पहली बार Living Donor Liver Transplant सफलतापूर्वक किया।

54 वर्षीय मरीज गंभीर लिवर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी पत्नी ने अपने स्वस्थ लिवर का एक हिस्सा दान किया। मरीज और डोनर, दोनों की बड़ी सर्जरी हुई और पूरी प्रक्रिया में करीब 14–16 घंटे लगे।

इस उपलब्धि से बिहार और आसपास के राज्यों के गंभीर लिवर रोगियों को अपने राज्य में ही आधुनिक ट्रांसप्लांट सुविधा मिलने की उम्मीद बढ़ी है।

जानिए लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट कैसे होता है और किन मरीजों को इसकी जरूरत पड़ सकती है।

13/08/2026
20/07/2026
24/06/2026

सीलिएक रोग पर रिसर्च के लिए एमडीयू को मिली 25 लाख की ग्रांट
- प्रो. अमिता सुनेजा डंग के नेतृत्व में ग्लूटेन तोड़ने वाले बैक्टीरिया और आनुवंशिक कारणों पर होगा अध्ययन

रोहतक। ग्लूटेन एलर्जी के कारण होने वाली गंभीर बीमारी सीलिएक रोग की समय रहते पहचान और बेहतर उपचार की दिशा में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) के वैज्ञानिक महत्वपूर्ण शोध करने जा रहे हैं। हरियाणा राज्य विज्ञान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने इस शोध परियोजना के लिए 25 लाख रुपए का अनुदान स्वीकृत किया है।

तीन वर्षों तक चलने वाली इस परियोजना का नेतृत्व सेंटर फॉर मेडिकल बायोटेक्नोलॉजी की प्रो. अमिता सुनेजा डंग करेंगी, जबकि माइक्रोबायोलॉजी विभाग की अध्यक्ष प्रो. पूजा सुनेजा और पीजीआईएमएस, रोहतक के गैस्ट्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष एवं सीनियर प्रोफेसर डॉ. प्रवीण मल्होत्रा सह-अन्वेषक के रूप में शामिल हैं।

स्क्रीनिंग प्रोलिडेज ऐज बायोमार्कर एंड सैलिवरी माइक्रोबायोम थेरेप्यूटिक्स फॉर सीलिएक डिजीज शीर्षक से स्वीकृत यह परियोजना ऐसे समय में सामने आई है, जब उत्तर भारत में सीलिएक रोग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ उत्तर भारत को सीलिएक बेल्ट मानते हैं क्योंकि यहां गेहूं आधारित भोजन का सेवन अधिक होता है।

सीलिएक रोग एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें ग्लूटेन युक्त भोजन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को छोटी आंत पर हमला करने के लिए प्रेरित करता है। शुरुआत में यह बीमारी पेट फूलना, दस्त, कमजोरी और लगातार थकान जैसे लक्षणों के रूप में दिखाई देती है, लेकिन समय रहते पहचान न होने पर यह हड्डियों को कमजोर कर सकती है, प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है और तंत्रिका तंत्र को भी नुकसान पहुंचा सकती है। कई मामलों में यह टाइप-1 डायबिटीज जैसी अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों का जोखिम भी बढ़ा देती है।

भारत में इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसका समय पर निदान न हो पाना है। कुपोषण, एनीमिया और बच्चों में रुकती हुई वृद्धि जैसे लक्षण अक्सर सामान्य स्वास्थ्य समस्याएं समझ लिए जाते हैं, जिससे बड़ी संख्या में मरीज वर्षों तक बीमारी से अनजान रहते हैं।

इसी समस्या के समाधान के लिए एमडीयू की शोध टीम ऐसे बायोमार्कर्स की खोज करेगी, जिनकी मदद से भविष्य में बिना बायोप्सी के रोग की पहचान संभव हो सके। परियोजना के तहत प्रोलिडेज एंजाइम की भूमिका का अध्ययन किया जाएगा और पीईपीडी जीन में मौजूद आनुवंशिक बदलावों की जांच कर बीमारी की आनुवंशिक संवेदनशीलता को समझने का प्रयास किया जाएगा।

शोध का सबसे अभिनव पहलू लार में मौजूद सूक्ष्मजीवों का अध्ययन है। वैज्ञानिक ऐसे प्राकृतिक बैक्टीरिया की पहचान करेंगे जो ग्लूटेन को तोड़ने की क्षमता रखते हैं। यदि यह प्रयास सफल रहा तो भविष्य में प्रोबायोटिक आधारित ऐसी सहायक थेरेपी विकसित की जा सकेगी, जो सीलिएक रोगियों के लिए जीवनभर की सख्त ग्लूटेन-फ्री डाइट के बोझ को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।

प्रो. अमिता सुनेजा डंग ने बताया कि वर्तमान में सीलिएक रोग का कोई दवा-आधारित उपचार उपलब्ध नहीं है और मरीजों को पूरी जिंदगी ग्लूटेन-मुक्त आहार पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में यह शोध न केवल रोग की शुरुआती पहचान को आसान बना सकता है, बल्कि उपचार की नई संभावनाओं का भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

एमडीयू के कुलपति प्रो. मिलाप पूनियाँ ने कहा कि 25 लाख रुपये का यह शोध अनुदान विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि सीलिएक रोग पर केंद्रित यह परियोजना केवल शैक्षणिक शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों मरीजों के जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। कुलपति ने कहा कि एमडीयू में स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी और समाजोपयोगी अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जा रहा है और इस तरह की परियोजनाएं विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला रही हैं। उन्होंने शोध दल को शुभकामनाएं देते हुए आशा व्यक्त की कि अध्ययन के परिणाम भविष्य में रोग के बेहतर निदान और उपचार का आधार बनेंगे।

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