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आजकल लोग ज्यादातर जंक फूड ही खाते हैं और रोजाना हम जो खाना खाते है उसका असर हमारे पाचन पर पड़ता है. जिसे गट हेल्थ भी कहते...
08/09/2026

आजकल लोग ज्यादातर जंक फूड ही खाते हैं और रोजाना हम जो खाना खाते है उसका असर हमारे पाचन पर पड़ता है. जिसे गट हेल्थ भी कहते है. हमारी आतों में कई तरह के बैक्टीरिया मौजूद होते है, जो पाचन को सही रखने में मदद करते हैं .जब गट हेल्थ ठीक रहती है तो खाना पचाने में आसानी होती है. और पेट से जुडी कुछ समस्याएं जैसे गैस और पेट फूलना भी गट हेल्थ अच्छी के होने के कारण ठीक हो सकती है. इसलिए रोज डाइट में ऐसी चीजें शामिल करना जरूरी है. जो आंतो यानी गट हेल्थ के लिए अच्छी हो. सुबह के नाश्ते में पोष्टिक खाना खाने से पेट को अच्छा सपोर्ट मिल सकता है. आइए जानते हैं ऐसी 5 चीजों के बारे में जो आप नाश्ते में शामिल कर सकते हैं.
दही को नाश्ते में करें शामिल
दही गट हेल्थ के लिए एक अच्छा विकल्प है. इसमें प्रोबायोटिक्स पाए जाते हैं, जो आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को सपोर्ट करने में मदद करते हैं. सुबह के नाश्ते में एक कटोरी दही किसी भी लिया जा सकता है आप इसे पोहा, पराठे या दूसरे नाश्ते के साथ भी खा सकते हैं. अगर दही आपको आसानी से पचता है तो इसे आप इसे अपनी रोज की डाइट में भी शामिल कर सकते हैं.
ओट्स से करें दिन की शुरुआत
ओट्स में फाइबर बहुत ही अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो पाचन तंत्र के लिए जरूरी है. सुबह नाश्ते में ओट्स खाने से गट हेल्थ पर भी अच्छा असर पड़ता है और डाइट में फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका भी मिल जाता है. इसे दूध या दही के साथ बनाकर इसमें केला, सेब या कुछ ड्राईफ्रूट्स भी मिला सकते हैं. इससे आपका नाश्ता स्वादिष्ट होने के साथ ज्यादा पोष्टिक भी हो जाता है.
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दलिया है हेल्दी नाश्ते का विकल्प
दलिया भी गट हेल्थ के लिए अच्छा नाश्ता होता है. इसमें फाइबर पाया जाता है, जो पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है. आप सुबह दूध वाला दलिया या फिर सब्जियों के साथ नमकीन दलिया बना सकते हैं. तो नाश्ते के लिए एक अच्छा आप्शन होगा. इसमें गाजर, मटर, बीन्स जैसी सब्जियां डालने से इसका पोषण और बढ़ जाता है. रोज की डाइट में फाइबर वाली चीजें शामिल करना पेट के लिए अच्छा होता है.
अंकुरित मूंग है अच्छा विकल्प
अंकुरित मूंग में फाइबर और प्रोटीन दोनों पाए जाते हैं, इसलिए यह एक पौष्टिक नाश्ता होता है. इसे सुबह सलाद की तरह खाया जा सकता है. इसमें खीरा, टमाटर, नींबू और थोड़े मसाले डालकर आप इसका स्वाद बढ़ा सकते हैं. फाइबर वाली चीजों को डाइट में शामिल करने से पाचन तंत्र को सही तरीके से काम करने में मदद मिलती है और गट हेल्थ भी अच्छी रहती है.
केला भी डाइट में करें शामिल
केला आसानी से मिलने वाला फल है और इसमें फाइबर भी पाया जाता है. सुबह नाश्ते में केला खाने से कुछ समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है. इसे आप सीधे खा सकते हैं या फिर ओट्स और दही के साथ मिलाकर खा सकते हैं. अगर आप सुबह जल्दी में रहते हैं और कुछ आसान खाना चाहते हैं तो केला एक अच्छा आप्शन हो सकता है.
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गट हेल्थ यानी आंतों की सेहत का असर पाचन पर पड़ता है. आपके नाश्ते में फाइबर और प्रोबायोटिक्स से भरपूर चीजें शामिल कर....

Why Iodine Is Essential For Thyroid Health: आयोडीन शरीर के लिए जरूरी खनिजों में से एक है, जिसकी मात्रा भले ही कम चाहिए ह...
07/09/2026

Why Iodine Is Essential For Thyroid Health: आयोडीन शरीर के लिए जरूरी खनिजों में से एक है, जिसकी मात्रा भले ही कम चाहिए होती है, लेकिन इसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है. यह शरीर में थायरॉइड हार्मोन बनाने में मदद करता है. ये हार्मोन मेटाबॉलिज्म, एनर्जी के स्तर और शरीर की सामान्य वृद्धि जैसे कई जरूरी कामों को प्रभावित करते हैं. खासकर बच्चों के ब्रेन विकास और सीखने-समझने की क्षमता के लिए पर्याप्त आयोडीन जरूरी माना जाता है. गर्भावस्था के दौरान भी आयोडीन की जरूरत पर खास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह भ्रूण के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, शरीर में आयोडीन की कमी लंबे समय तक बनी रहे तो इसका असर स्वास्थ्य पर अलग-अलग तरीकों से दिखाई दे सकता है. आयोडीन की कमी से गले में थायरॉइड ग्रंथि बढ़ने की समस्या हो सकती है, जिसे घेंघा कहा जाता है. इसके अलावा थायरॉइड हार्मोन का स्तर कम होने से थकान, वजन बढ़ना और ठंड ज्यादा महसूस होना जैसी परेशानियां हो सकती हैं. बच्चों में इसकी कमी विकास और मानसिक क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है. एकाग्रता और याददाश्त से जुड़ी दिक्कतें भी आयोडीन की कमी से जुड़ी हो सकती हैं. गर्भावस्था में पर्याप्त आयोडीन न मिलना भी चिंता का विषय हो सकता है.
आयोडीन शरीर के लिए क्यों है इतना जरूरी?
आयोडीन का सबसे अहम काम थायरॉइड हार्मोन के निर्माण में मदद करना है. ये हार्मोन शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने के साथ ऊर्जा के इस्तेमाल और सामान्य विकास में भी भूमिका निभाते हैं. बच्चों के विकास के दौरान इसका महत्व और बढ़ जाता है. गर्भावस्था में पर्याप्त आयोडीन भ्रूण के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी होता है. इसलिए रोजाना के भोजन में आयोडीन के पर्याप्त सोर्स शामिल करना जरूरी है.

आयोडीन की कमी से बचने के लिए क्या खाएं?
आयोडीन पाने का सबसे आसान तरीका आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करना है. रोजाना खाना बनाते समय सामान्य नमक की जगह आयोडीन युक्त नमक चुनकर शरीर की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है. हालांकि नमक का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा करना सही नहीं है, इसलिए आयोडीन पाने के लिए नमक की मात्रा बढ़ाने के बजाय सही प्रकार का नमक चुनना बेहतर तरीका है.
समुद्री खाद्य पदार्थ भी आयोडीन के अच्छे स्रोतों में शामिल हैं. समुद्री शैवाल में प्राकृतिक रूप से आयोडीन की मात्रा काफी अधिक हो सकती है. मछली और दूसरे समुद्री खाद्य पदार्थों से भी आयोडीन मिल सकता है. इन्हें अपनी सामान्य खानपान की आदतों और उपलब्धता के अनुसार आहार में शामिल किया जा सकता है.

दूध और उससे बने उत्पाद भी आयोडीन देने वाले खाद्य पदार्थों में शामिल हैं. दूध, दही और चीज जैसे डेयरी उत्पादों को संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है. अंडे भी आयोडीन का एक अच्छा सोर्स हैं और इनमें प्रोटीन भी मिलता है, इसलिए इन्हें भोजन में शामिल करना एक उपयोगी विकल्प हो सकता है.
आलू में भी कुछ मात्रा में आयोडीन पाया जाता है. हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग खाद्य स्रोतों को मिलाकर संतुलित आहार लेना बेहतर रहता है. इनके साथ ही अंडे भी आयोडीन का अच्छा सोर्स माने जाते हैं. अंडे में आयोडीन के अलावा प्रोटीन भी मिलता है, इसलिए यह रोजाना के संतुलित आहार में उपयोगी विकल्प हो सकता है.
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आयोडीन युक्त नमक को कैसे रखें सुरक्षित?
आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करना जितना जरूरी है, उसे सही तरीके से रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. आयोडीन नमी, गर्मी और लंबे समय तक रोशनी के संपर्क में रहने से कम हो सकता है. इसलिए नमक को खुले बर्तन में रखने के बजाय सूखे और अच्छी तरह बंद डिब्बे में रखना बेहतर है. खाना बनाते समय भी नमक को जरूरत से बहुत पहले डालने के बजाय खाना लगभग तैयार होने के आसपास डालना आयोडीन को बनाए रखने में मदद कर सकता है.
कुछ खाद्य पदार्थों को लेकर क्यों बरतें सावधानी?
कुछ खाद्य पदार्थों को गोइट्रोजेनिक खाद्य पदार्थ कहा जाता है, जो थायरॉइड से जुड़ी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं. इनमें पत्तागोभी, फूलगोभी और सोयाबीन जैसी चीजें शामिल हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि इन्हें पूरी तरह खाना बंद कर देना चाहिए. संतुलित मात्रा में इनका सेवन सामान्य आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन आयोडीन की कमी से जूझ रहे लोगों को अपने खानपान को लेकर एक्सपर्ट की सलाह लेना उपयोगी हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Thyroid Health: शरीर में आयोडीन की कमी लंबे समय तक बनी रहे तो इसका असर स्वास्थ्य पर अलग-अलग तरीकों से दिखाई दे सकता है.इसकी कम.....

आज के जीवन में धूल, धुआं, प्रदूषण और सिगरेट का धुआं काफी आम बात है. और इनके कारण शरीर के और अंगो के साथ फेफड़ों की सेहत ...
07/09/2026

आज के जीवन में धूल, धुआं, प्रदूषण और सिगरेट का धुआं काफी आम बात है. और इनके कारण शरीर के और अंगो के साथ फेफड़ों की सेहत पर भी असर पड़ता है. ऐसे में कई लोग फेफड़ों को डिटॉक्स करने के लिए अलग-अलग तरह की ड्रिंक पीने लगते हैं. हालांकि, शरीर में फेफड़ों को साफ करने का काम किसी एक ड्रिंक से नहीं होता.
यह मददगार तो होता है पर हमारे फेफड़े खुद एक प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया के जरिए धूल और दूसरी चीजों को बाहर निकालते हैं. लेकिन पर्याप्त पानी पीना और पौष्टिक चीजों को डाइट में शामिल करना शरीर और सांस की सेहत के लिए अच्छा हो सकता है. अगर आप घर पर फेफड़ों को देतोक्स करने के लिए कोई आसान ड्रिंक लेना चाहते हैं तो कुछ ड्रिंक्स के विकल्प रोज की डाइट का हिस्सा बन सकते हैं.
गुनगुना पानी फेफड़ों को हाइड्रेट रखने में सहायक
गुनगुना पानी पीना शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ फेफड़ों और सांस की नली में मौजूद चिपचिपे पदार्थ को पतला रखने में मदद करता है. इससे बलगम को बाहर निकालना आसान हो सकता है और सांस की नली साफ रखने में मदद मिलती है. रोज पर्याप्त मात्रा में पानी पीना फेफड़ों की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को सपोर्ट करने वाली आसान आदत है.
अदरक की ड्रिंक
अदरक में मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर में सूजन कम करने में मदद करते हैं. अदरक को गुनगुने पानी में डालकर पीने से गले को आराम मिलता है और सांस से जुड़ी हल्की परेशानी में भी राहत मिल सकती है. और यह अदरक वाली ड्रिंक फेफड़ों की सेहत को सपोर्ट करने वाली आसान डाइट का हिस्सा बन क्र फेफड़ो को डिटॉक्स करने में भी मदद क्र सकती है.
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नींबू पानी
नींबू में विटामिन C पाया जाता है, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करता है. नींबू पानी शरीर में पानी की कमी पूरी करने का भी आसान तरीका है. अच्छी हाइड्रेशन शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया में मदद करती है, इसलिए नींबू पानी को फेफड़ों की सेहत के लिए फायदेमंद ड्रिंक में भी गिना जाता है.
भाप फेफड़ों से बलगम निकालने में सहायक
गर्म पानी की भाप सांस की नली में जमा बलगम को कमजोर करने में मदद करती है. इससे बलगम बाहर निकालना आसान होता है और बंद नाक या गले की परेशानी में राहत मिलती है. फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए भाप को एक आसान घरेलू उपाय मान कर अपनाया जा सकता है.
फेफड़ों के डिटॉक्स के लिए धुएं से रहें दूर
फेफड़ों की प्राकृतिक सफाई को बेहतर रखने के लिए सबसे जरूरी है कि उन्हें नुकसान पहुंचाने वाली चीजों से बचाया जाए. सिगरेट और तंबाकू के धुएं से दूरी रखें और ज्यादा प्रदूषण वाली जगहों पर मास्क का इस्तेमाल करें. इसके साथ रोज थोड़ी शारीरिक गतिविधि करें पर्याप्त पानी और पौष्टिक खाना फेफड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करता है.
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फेफड़ों को स्वस्थ रखने और उनकी प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को सपोर्ट करने के लिए रोज पिएं ये ड्रिंक, साथ ही भाप और कुछ ...

भारत में इस्तेमाल होने वाली रेबीज वैक्सीन Abhayrab के एक बैच को लेकर ड्रग रेगुलेटर ने राज्यों को सतर्क किया है. जांच में...
06/09/2026

भारत में इस्तेमाल होने वाली रेबीज वैक्सीन Abhayrab के एक बैच को लेकर ड्रग रेगुलेटर ने राज्यों को सतर्क किया है. जांच में इस बैच का एक सैंपल जरूरी potency test में फेल पाया गया. इसके बाद इसे Not of Standard Quality यानी तय गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरने वाला बताया गया है. साथ ही, इसके नकली होने की भी जांच की जा रही है.
मामला Abhayrab के बैच नंबर KE25012 से जुड़ा है. अधिकारियों के मुताबिक, इस बैच के कुछ वाइल्स दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित एक बिना लाइसेंस वाले परिसर से बरामद किए गए थे. इसके बाद इन सैंपल को जांच के लिए सरकारी प्रयोगशाला भेजा गया. केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कसौली में किए गए परीक्षण में सैंपल potency की जरूरी शर्तों को पूरा नहीं कर पाया.
कंपनी ने कहा- ये वैक्सीन हमने नहीं बनाई
Abhayrab बनाने वाली कंपनी Indian Immunologicals Limited ने साफ किया है कि जांच में मिले वाइल्स उसकी ओर से तैयार नहीं किए गए थे. कंपनी के मुताबिक, बरामद वायल पर Abhayrab का नाम और KE25012 बैच नंबर लिखा था, लेकिन जब इन्हें कंपनी के रिकॉर्ड और सुरक्षित रखे गए असली सैंपल से मिलाया गया तो कई अंतर सामने आए.
कंपनी ने बताया कि लेबल, पैकेजिंग, QR कोड, कैप के रंग, लाइसेंस से जुड़ी जानकारी और पैकेज पर लिखे विवरण में अंतर मिला हैं. कंपनी के अनुसार, जांच में कुल 17 अंतर सामने आए हैं. इसी वजह से इस बात की जांच की जा रही है कि बरामद वैक्सीन नकली तरीके से तैयार कर बाजार में तो नहीं पहुंचाई गई.
DCGI ने राज्यों को निगरानी के निर्देश दिए
मामले को देखते हुए Drugs Controller General of India ने राज्यों के ड्रग कंट्रोलर्स को Abhayrab के बैच KE25012 की बिक्री और वितरण पर कड़ी नजर रखने को कहा है. अधिकारियों को जरूरत के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं.
CDSCO के मुताबिक, इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए चार लोगों को गिरफ्तार किया है. जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि ये वाइल्स कहां से आए और इन्हें कहां-कहां पहुंचाया गया.
कंपनी के मुताबिक अधिकृत सप्लाई प्रभावित नहीं
Indian Immunologicals ने कहा है कि उसके अधिकृत चैनल से सप्लाई की गई Abhayrab वैक्सीन इस मामले से प्रभावित नहीं है. कंपनी के अनुसार हर बैच को बाजार में भेजे जाने से पहले सरकारी स्तर पर भी जांच से गुजरना होता है.
कंपनी ने यह भी कहा कि KE25012 के मूल बैच में 83,370 वायल थे, जिन्हें अधिकृत चैनलों के जरिए वितरित किया गया था. हालांकि, सरकार की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जांच के दायरे में आए वाइल्स की कुल संख्या कितनी थी और इनमें से कितने बाजार तक पहुंचे.
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दो साल में दूसरी बार सामने आया ऐसा मामला
Abhayrab को लेकर यह पहली बार नहीं है जब नकली वैक्सीन की चिंता सामने आई है. जनवरी 2025 में भी कंपनी ने ड्रग रेगुलेटर को एक दूसरे बैच KA24014 के नाम से नकली Abhayrab बाजार में आने की जानकारी दी थी. इसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत कुछ देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों ने भारत से लौटने वाले यात्रियों को लेकर अलर्ट जारी किया था.
भारत में रेबीज के कारण हर साल हजारों लोगों की मौत होती है. 2024 के एक रिसर्च के मुताबिक देश में हर साल करीब 5,726 लोगों की मौत रेबीज से होती है. ऐसे में संक्रमित जानवर के काटने के बाद प्रभावी वैक्सीन की उपलब्धता बेहद जरूरी मानी जाती है. Abhayrab का इस्तेमाल रेबीज से बचाव के लिए एक्सपोजर से पहले और एक्सपोजर के बाद दोनों स्थितियों में किया जाता है.
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ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ने रेबीज के इलाज में काम आने वाली Abhayrab वैक्सीन के एक बैच को सब-स्टैंडर्ड घोषित कर अलर्ट जारी कि.....

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक ऐसा अनोखा कारनामा हुआ है, जिसने दुनिया भर के डॉक्टरों और किडनी के मरीजों को एक नई उम्म...
06/09/2026

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक ऐसा अनोखा कारनामा हुआ है, जिसने दुनिया भर के डॉक्टरों और किडनी के मरीजों को एक नई उम्मीद दी है. अमेरिका में डॉक्टरों ने एक 66 वर्षीय मरीज टिम एंड्रयूज के शरीर में सूअर की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट किया था. इस सूअर की किडनी ने मरीज के शरीर में रिकॉर्ड 271 दिनों तक सफलता के साथ काम किया.
चिकित्सा इतिहास में किसी जानवर के अंग का इंसान के शरीर में इतने लंबे समय तक काम करने का यह अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है. इस पूरी प्रक्रिया और इसके नतीजों से जुड़ी रिपोर्ट मशहूर मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित हुई है.
टिम एंड्रयूज को डायलिसिस से मिली 9 महीने की आजादी
मरीज टिम एंड्रयूज टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित थे, जिसके कारण उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह खराब हो चुकी थीं. डॉक्टरों ने उन्हें बताया था कि उन्हें एक इंसानी किडनी मिलने में कम से कम 7 साल तक का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. आमतौर पर डायलिसिस पर रहने वाले मरीज इतना लंबा इंतजार नहीं कर पाते हैं.
ऐसे मुश्किल समय में मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने उन्हें जेनोट्रांसप्लांटेशन यानी जानवर के अंग को इंसान में लगाने की सलाह दी. 25 जनवरी 2025 को डॉक्टरों ने टिम के शरीर में सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की. इस ट्रांसप्लांट के बाद टिम को कई महीनों तक अस्पताल जाकर डायलिसिस मशीन से खून साफ कराने की जरूरत नहीं पड़ी और उन्होंने एक सामान्य जीवन जिया.
क्या है जेनोट्रांसप्लांटेशन
जब किसी जानवर के अंग, कोशिका या टिश्यू को इंसान के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाता है, तो इस पूरी चिकित्सा प्रक्रिया को विज्ञान की भाषा में जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है. डॉक्टरों का कहना है कि इंसानी अंगों की बनावट से मेल खाने के कारण सूअर को इस प्रक्रिया के लिए सबसे सही जानवर माना जाता है.
सूअर की किडनी ही क्यों ट्रांसप्लांट की जा सकती है?
जेनोट्रांसप्लांटेशन के लिए सूअर को सबसे बेहतर जानवर माना जाता है. क्योंकि उसके अंगों का आकार काफी हद तक सही है और उन्हें पालने का इंसानों के पास कई सालों का अनुभव भी है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप सीधे किसी फार्म पर जाएं, सूअर की किडनी निकालकर उसे किसी इंसान के शरीर में लगा दें. ऐसा करने पर इंसान का इम्यून सिस्टम तुरंत उस बाहरी अंग पर हमला कर उसे कुछ ही मिनटों में नष्ट कर देता है.

इसी समस्या से बचने के लिए वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से युकाटन मिनिएचर पिग विकसित किए. डॉक्टरों ने इस सूअर की किडनी के जीन में 69 खास तरह के जेनेटिक बदलाव किए. इन बदलावों के जरिए सूअर की कोशिकाओं से उन चीजों को हटाया गया जिन पर इंसान का इम्यून सिस्टम हमला करता है.

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किडनी को 271 दिनों के बाद क्यों निकालना पड़ा?
ट्रांसप्लांट के बाद शुरुआती महीनों में टिम का शरीर बिल्कुल स्वस्थ था. शुरुआत में जब इम्यून सिस्टम ने अंग को अस्वीकार करने की कोशिश की, तो डॉक्टरों ने दवाइयों में बदलाव करके स्थिति को संभाल लिया. लेकिन लगभग 6 महीने बीत जाने के बाद, सूअर की किडनी की रक्त वाहिकाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगीं, जिससे अंग में सूजन आ गई. अक्टूबर 2025 में इस किडनी ने काम करना बंद कर दिया, जिसके बाद डॉक्टरों को सर्जरी करके इस किडनी को बाहर निकालना पड़ा.
सूअर के अंग ने किया 'ब्रिज' का काम
मास जनरल ब्रिघम के सेंटर फॉर ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज के डॉक्टर लियोनार्डो रिएला ने बताया कि सूअर की इस किडनी ने मरीज के लिए एक ब्रिज के रूप में काम किया. सूअर की किडनी निकालने के बाद टिम को सिर्फ 82 दिनों तक दोबारा डायलिसिस पर रहना पड़ा. इसके ठीक बाद जनवरी 2026 में उन्हें एक मृत डोनर से इंसानी किडनी मिल गई. डॉक्टरों के मुताबिक, टिम एंड्रयूज के शरीर में अब वह इंसानी किडनी अच्छी तरह काम कर रही है.
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चिकित्सा इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार, 69 जेनेटिक बदलावों वाली सूअर की किडनी ने मरीज को 271 दिनों तक डायलिसिस से रखा पू.....

मशहूर साइंस जर्नल साइंस एडवांसेज में छपी एक रिसर्च ने पूरी दुनिया के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है. इस स्ट...
06/09/2026

मशहूर साइंस जर्नल साइंस एडवांसेज में छपी एक रिसर्च ने पूरी दुनिया के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है. इस स्टडी के मुताबिक, मसूड़ों की गंभीर बीमारी पैदा करने वाला एक बैक्टीरिया अल्जाइमर यानी भूलने की बीमारी से पीड़ित मरीजों के दिमाग में पाया गया है. इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मसूड़ों की बीमारी ही अल्जाइमर की मुख्य वजह है? आइए जानते हैं कि इस पूरी रिसर्च का सच क्या है और वैज्ञानिकों का इस पर क्या कहना है.
मसूड़ों के बैक्टीरिया का दिमाग से क्या है कनेक्शन?
इस पूरी रिसर्च के केंद्र में पोर्फिरोमोनस जिंजिवैलिस नाम का एक खतरनाक बैक्टीरिया है. यह बैक्टीरिया मसूड़ों की एक गंभीर और पुरानी बीमारी पीरियडोन्टाइटिस के लिए जिम्मेदार होता है. वैज्ञानिकों ने जब अल्जाइमर से मरने वाले लोगों के दिमाग के टिश्यूज की जांच की, तो उन्हें चौंकाने वाले नतीजे मिले. अल्जाइमर के करीब 96 प्रतिशत ब्रेन सैंपल्स में इस बैक्टीरिया द्वारा पैदा किए जाने वाले जहरीले एंजाइम्स मौजूद थे. इसके अलावा, कुछ जीवित मरीजों के ब्रेन फ्लूइड में भी इस बैक्टीरिया के डीएनए के अंश पाए गए हैं.
मुंह का बैक्टीरिया दिमाग तक पहुंचता कैसे है?
डॉक्टरों का कहना है कि जब हमारे मसूड़ों में गंभीर सूजन या संक्रमण होता है, तो वहां की महीन रक्त वाहिकाएं कमजोर हो जाती हैं. ब्रश करते समय या खाना चबाते समय ये बैक्टीरिया खून के बहाव में शामिल हो जाते हैं. खून के जरिए तैरते हुए ये बैक्टीरिया शरीर के बाकी हिस्सों और आखिरकार हमारे दिमाग तक पहुंच जाते हैं. दिमाग में पहुंचकर ये जहरीले एंजाइम्स न्यूरॉन्स को नुकसान पहुंचाते हैं और सूजन पैदा करते हैं, जिससे याददाश्त कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है.
चूहों पर किए गए प्रयोग में क्या दिखा?
वैज्ञानिकों ने इस थ्योरी को जांचने के लिए चूहों पर भी एक एक्सपेरिमेंट किया. जब चूहों के मुंह में इस बैक्टीरिया का इन्फेक्शन फैलाया गया, तो कुछ समय बाद यह बैक्टीरिया उनके दिमाग तक पहुंच गया. चूहों के दिमाग में जाते ही इसने एमाइलॉयड बीटा नाम के एक खराब प्रोटीन का निर्माण तेज कर दिया. बता दें कि यही वह प्रोटीन है जो अल्जाइमर के मरीजों के दिमाग में गुच्छे या प्लाक बनाता है. हालांकि, जब चूहों को इस एंजाइम को ब्लॉक करने वाली दवाएं दी गईं, तो उनके दिमाग में सूजन कम हो गई और कोशिकाएं सुरक्षित रहीं.
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क्या मसूड़ों की बीमारी ही अल्जाइमर का असली कारण है?
रिसर्च के ये आंकड़े सुनकर ऐसा लग सकता है कि दांत साफ न रखने से अल्जाइमर हो जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है. मसूड़ों के बैक्टीरिया और अल्जाइमर के बीच एक संबंध जरूर मिला है, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि यही अल्जाइमर की मुख्य या इकलौती वजह है.
अल्जाइमर एक बेहद जटिल बीमारी है, जो बुढ़ापे, हाई ब्लड प्रेशर और दिमाग में प्रोटीन का संतुलन बिगड़ने जैसे कई कारणों से मिलकर होती है. इंसानों पर किए गए बड़े क्लिनिकल ट्रायल में इस बैक्टीरिया को मारने वाली दवाएं अल्जाइमर के मरीजों को पूरी तरह ठीक करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाईं.
क्यों महत्वपूर्ण है यह नई रिसर्च?
भले ही यह सीधे तौर पर मुख्य कारण न हो, लेकिन इस रिसर्च ने मेडिकल साइंस के लिए एक नया रास्ता खोल दिया है. अब वैज्ञानिक इस बात की गहराई से जांच कर रहे हैं कि क्या शरीर के अंदरूनी इन्फेक्शन और सूजन को कंट्रोल करके दिमाग की सेहत को बेहतर रखा जा सकता है.
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मसूड़ों में इन्फेक्शन फैलाने वाले बैक्टीरिया और अल्जाइमर के बीच मिला सीधा संबंध, जानें कैसे ओरल हेल्थ खराब होने स....

बुखार अक्सर संक्रमण के दौरान शरीर की एक सामान्य प्रतिक्रिया के रूप में आता है और कुछ दिनों में दवा लेने और आराम करने से ...
06/09/2026

बुखार अक्सर संक्रमण के दौरान शरीर की एक सामान्य प्रतिक्रिया के रूप में आता है और कुछ दिनों में दवा लेने और आराम करने से ठीक भी हो जाता है. लेकिन अगर आपको बुखार उतरने के बाद भी सीने में जकड़न, भारीपन, खांसी या सांस लेने में परेशानी बनी रहती है तो ऐसे लक्षणों को केवल बुखार के बाद होने वाली कमजोरी मानना सही नहीं है.
सीने में जकड़न कई कारणों से हो सकते हैं. वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण के बाद श्वसन तंत्र में सूजन और बलगम जमा होने से सांस लेने में असहजता महसूस होती है. वहीं कुछ लोगों में संक्रमण के बाद लंबे समय तक खांसी या छाती में भारीपन भी बना रहता है.
निमोनिया के हो सकते हैं लक्षण
फ्लू, वायरल संक्रमण या अन्य श्वसन संक्रमण के दौरान फेफड़ों और सांस की नलियों पर असर पड़ता है. कभी-कभी संक्रमण कम होने के बाद भी सूजन कुछ समय तक बनी रहती है, जिसकी वजह से छाती में जकड़न, सांस फूलना या खांसी की शिकायत रहती है. ऐसी स्थिति में कुछ मामलों में ब्रोंकाइटिस या निमोनिया जैसी समस्या भी हो सकती है. खासकर यदि बुखार दोबारा आने लगे, खांसी बढ़ रही हो या सांस लेने में परेशानी पहले से ज्यादा हो रही हो तो डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए.
किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान दें?
अगर सीने में जकड़न के साथ सांस लेने में ज्यादा परेशानी, तेज सीने का दर्द, होंठ या चेहरा नीला पड़ना, बेहोशी, अत्यधिक कमजोरी या खून वाली खांसी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. इसी तरह, यदि बुखार उतरने के बाद फिर से तेज बुखार आता है, सांस लेने में तकलीफ बढ़ती है या सामान्य गतिविधियों के दौरान भी सांस फूलने लगती है तो इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है.
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किन बातों का ध्यान रखें?
पर्याप्त आराम और पानी पीना रिकवरी में मदद करता है. बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक या स्टेरॉयड जैसी दवाएं शुरू न करें. संतुलित आहार खाएं और एक्टिव लाइफस्टाइल को अपनाएं. आज के समय में काम की वजह से लोगों को स्ट्रेस भी होता है. ऐसे में शारीरिक गतिविधि पर ध्यान दें और समय मिलने पर बाहर घूमने जाएं. वहीं बुखार उतरने के बाद भी अगर कोई गंभीर संक्रमण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें.
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बुखार ठीक होने के बाद भी अगर सीने में जकड़न या सांस लेने में परेशानी महसूस हो रही है तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजर...

Why Do I Feel Thirsty After Drinking Water: प्यास लगना शरीर का एक सामान्य संकेत है. गर्मी, ज्यादा पसीना आने या एक्सरसाइज...
04/09/2026

Why Do I Feel Thirsty After Drinking Water: प्यास लगना शरीर का एक सामान्य संकेत है. गर्मी, ज्यादा पसीना आने या एक्सरसाइज करने के बाद पानी पीने से आमतौर पर राहत मिल जाती है. लेकिन अगर पानी पीने के कुछ देर बाद भी गला सूखा महसूस हो या बार-बार पानी पीने का मन करे, तो इसे सिर्फ ज्यादा गर्मी का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार इसके पीछे शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स के संतुलन से जुड़ी वजह हो सकती है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ परिस्थितियों में बहुत ज्यादा पानी पीने के बाद भी प्यास का एहसास बना रह सकता है. आखिर ऐसा क्यों होता है और शरीर इस तरह का संकेत क्यों देता है? इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं.
ज्यादा पानी पीने से भी बिगड़ सकता है संतुलन
शरीर को सिर्फ पानी की जरूरत नहीं होती. सोडियम, पोटैशियम और क्लोराइड जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स भी शरीर में पानी के स्तर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं. जब कोई व्यक्ति कम समय में बहुत ज्यादा पानी पी लेता है, तो शरीर में मौजूद इलेक्ट्रोलाइट्स, खासकर सोडियम, जरूरत से ज्यादा डील्यूट हो सकते हैं. ऐसे में शरीर के अंदर पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन प्रभावित हो सकता है. शरीर इस बदलाव को महसूस करके प्यास का संकेत दे सकता है, ताकि संतुलन दोबारा सामान्य हो सके. यानी हर बार ज्यादा पानी पीना ही प्यास बुझाने का सही तरीका हो, यह जरूरी नहीं है.

बहुत ज्यादा पानी पीना भी हो सकता है समस्या
बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने की एक दुर्लभ स्थिति को हाइपोनेट्रेमिया या वॉटर इंटॉक्सिकेशन कहा जाता है. इसमें जरूरत से ज्यादा पानी पीने के कारण खून में सोडियम की मात्रा काफी कम हो सकती है. सोडियम शरीर के फ्लूइड बैलेंस के लिए जरूरी है. इसकी मात्रा बहुत कम होने पर सेल्स में सूजन जैसी समस्या हो सकती है और शरीर का सामान्य फ्लूइड बैलेंस प्रभावित हो सकता है. ऐसे मामलों में प्यास समेत दूसरे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. हालांकि, यह स्थिति आम नहीं है. इसलिए सिर्फ कभी-कभार पानी पीने के बाद प्यास लगने को वॉटर इंटॉक्सिकेशन से जोड़ना सही नहीं होगा. समस्या तब ज्यादा गंभीर मानी जाती है जब बहुत ज्यादा पानी पीने की आदत के साथ लगातार असामान्य प्यास या दूसरे परेशान करने वाले संकेत भी मौजूद हों.
हर पानी से एक जैसा हाइड्रेशन?
पानी का मुख्य काम शरीर में तरल की कमी को पूरा करना है, लेकिन पानी में मौजूद मिनरल्स भी शरीर के इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस में भूमिका निभाते हैं. कुछ पानी में प्राकृतिक रूप से कैल्शियम, मैग्नीशियम और दूसरे मिनरल्स मौजूद होते हैं, जबकि कुछ तरह के पानी में इनकी मात्रा कम हो सकती है. हालांकि, सिर्फ पानी में मिनरल्स की मात्रा को लगातार प्यास का एकमात्र कारण मानना ठीक नहीं है. शरीर की हाइड्रेशन जरूरत कई चीजों पर निर्भर करती है और हर व्यक्ति की स्थिति अलग हो सकती है.

गर्मी और एक्सरसाइज के बाद क्यों बढ़ सकती है प्यास?
अगर आपने तेज गर्मी में काफी समय बिताया है या एक्सरसाइज के दौरान बहुत पसीना आया है, तो शरीर से सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि कुछ इलेक्ट्रोलाइट्स भी बाहर निकलते हैं. ऐसे में पानी पीने के बाद भी प्यास कुछ समय तक बनी रह सकती है. इसी वजह से प्यास को शरीर का एक संकेत माना जाता है. खासकर गर्म मौसम में पसीना ज्यादा आने पर शरीर के फ्लूइड बैलेंस में बदलाव हो सकता है और आपको सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा पानी की जरूरत महसूस हो सकती है.
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कुछ दवाइयां भी बढ़ा सकती हैं प्यास
बार-बार प्यास लगने की वजह हमेशा पानी की कमी नहीं होती. कुछ दवाइयां, खासकर ऐसी दवाएं जो शरीर से ज्यादा तरल बाहर निकालती हैं, शरीर के फ्लूइड बैलेंस को प्रभावित कर सकती हैं. इसके चलते पानी पीने के बावजूद प्यास का एहसास बना रह सकता है. अगर किसी दवा को शुरू करने के बाद लगातार प्यास बढ़ी है, तो अपनी तरफ से दवा बंद करने के बजाय डॉक्टर से इस बारे में बात करना बेहतर है.
कब इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें?
गर्मी में, पसीना आने के बाद या लंबे समय तक शारीरिक मेहनत करने के बाद प्यास लगना सामान्य हो सकता है. लेकिन अगर आपको बिना किसी स्पष्ट वजह के लगातार बहुत ज्यादा प्यास लगती रहती है और पानी पीने के बाद भी राहत नहीं मिलती, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में सिर्फ बार-बार पानी पीते रहना समाधान नहीं है. खासकर अगर यह समस्या लगातार बनी हुई है या इसके साथ दूसरे असामान्य बदलाव भी महसूस हो रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर रहेगा.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Drinking Water: शरीर को सिर्फ पानी की जरूरत नहीं होती. सोडियम, पोटैशियम और क्लोराइड जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स भी शरीर में पानी के...

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