Vedic Power Yoga

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21/03/2026

राष्ट्रीय सद्भाव और एकता का संदेश — ईदगाह पर डॉ. दिनेश शर्मा का शानदार उद्बोधन 🤝🌙
आज ईदगाह में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. दिनेश शर्मा जी ने राष्ट्रीय सद्भाव, भाईचारे और एकता पर प्रेरणादायक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता है और सभी धर्मों के पर्व हमें प्रेम, सहयोग और आपसी सम्मान का संदेश देते हैं।
उन्होंने सभी को ईद की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि समाज में सौहार्द बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उनके विचारों का जोरदार स्वागत किया। 🇮🇳✨

14/03/2026

सादर आभार आपका 💝🙏🇮🇳✅✌️🙏 विद्वत राजनेता माननीय डॉ (प्रोफेसर) दिनेश शर्मा जी दिल की गहराइयों से पुनः साधुवाद आपका ✌️🙏

11/03/2026

आज राज्यसभा में शून्य काल में सनातन परंपरा के रक्षण हेतु निम्न बिंदुओं पर प्रश्न उठाया। 👇👇

जो भारत के लाखों सनातनी
कर्मचारियों के जीवन में एक विकट संकट बन गई है। जब कोई अपने माता-पिता को खो देता है, तो उसे एक असंभव विकल्प का
सामना करना पड़ता है: अपने धर्म का पालन करे या अपनी नौकरी बचाए।
इसका मुख्य कारण यह है कि भारत के वर्तमान श्रम कानूनों में सवैतनिक शोक अवकाश (Paid Bereavement Leave) के लिए
कोई प्रावधान या दिशानिर्देश नहीं हैं। दुनिया भर में अन्य देशों में करीबी पारिवारिक सदस्य के लिये कनाडा मे 10 दिन, इंग्लैंड में
जैक लॉ के अंतर्गत 18 वर्ष तक के पुत्र-पुत्री के शोक के लिये दो सप्ताह तथा जापान, चीन, फ्रांस आदि देशों में शोक अवकाश से
संदर्भित पॉलिसी है।
मैं सदन के सामने तीन प्रमुख आधार रखना चाहता हूँ:
पहला -हमारे शास्त्रों में माता-पिता की सेवा और उनकी मृत्यु के बाद के कर्तव्यों को 'पितृ ऋण' से मुक्ति का एकमात्र मार्ग बताया
गया है। भारतवर्ष ज्ञान परम्परा के साथ धर्म निष्ठपूर्ण समाज़ के रूप मे भी जाना जाता है।
· ऋग्वेद अग्नि को 'जातवेदस' के रूप में संबोधित करता है, जो मृतक के सूक्ष्म शरीर को पितरों तक पहुँचाने के लिए उसे
'संस्कारित' करती है।
· गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद के प्रथम 10 दिन 'प्रेतत्व' की अवस्था होती है। 13वें दिन की 'तेरहवीं' वीं और 'शुद्धि हवन' के
बाद ही परिवार पुनः समाज में लौटने योग्य होता है।
· अथर्ववेद के 18वें कांड में मृत्यु के बाद के अनुष्ठानों का विस्तृत विवरण दिया गया है जिससे स्पष्ट है कि पुत्र को माता-पिता का
अंतिम संस्कार करना अनिवार्य है। यह केवल परिवार की भावना का विषय नहीं है, यह धर्म है—हमारे शास्त्रों द्वारा निर्धारित
अनिवार्य कर्तव्य है।
दूसरा—'हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू' की रिपोर्ट कहती है कि शोक में डूबा कर्मचारी 50% तक कम उत्पादक होता है। इस प्रतिस्पर्धी युग
में, विशेषकर सरकारी नौकरी, बहुराष्ट्री य कंपनियों (MNCs) यों और निजी क्षेत्र में, एक डरावना 'ट्रेंड' उभर रहा है। काम के भारी बोझ
और 'ऑलवेज ऑन' डिजिटल संस्कृति के कारण, बच्चे अपने माता-पिता के अंतिम संस्कारों को मात्र 2 या 3 दिनों में समेटने को
मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल धार्मिक दृष्टि से विनाशकारी है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी घातक है। जब वह अधूरी रस्मों
के साथ लौटता है, तो वह केवल शरीर से वहाँ होता है, मन से वह ग्लानि और अपराधबोध में दबा होता है। हम इंसान तैयार कर रहे
हैं या मशीनें?
मानव जीवन सिर्फ धन उपार्जन या संसारिक संसाधनों के उपभोग करने के लिये नहीं मिला है अपितु अपने कर्तव्य, धर्म के पालन
क़े साथ भावी पीढ़ी को सामाजिक मूल्यों, ल्यों संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी को हस्तांतरण का बीड़ा भी घर के वरिष्ठ सदस्य का होता है। वह जो आचरण करेंगे भावी पीढ़ी वही सीखेगी।
और तीसरा—संवैधानिक अधिकार: अभी हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है कि माता-पिता का अंतिम संस्कार करना
संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत एक 'मौलिक अधिकार' है। महोदय, जब न्यायालय एक कैदी को रस्मों के लिए 'पैरोल' दे सकता
है, तो देश के विकास में लगे ईमानदार कर्मचारी को इस हक से वंचित क्यों रखा जा रहा है?
5वीं संसदीय वेतन समिति ने अपनी रिपोर्ट के आइटम 93 में 'शोक
अवकाश' की सिफारिश भी की थी।
अत: मैं भारत सरकार से यह मांग करता हूँ कि:
1. भारत सरकार सभी क्षेत्रों (त्रों सरकारी, MNC और निजी) के लिए अंतिम संस्कार करने वाले कर्मचारी को 13 दिनों का अनिवार्य
सवैतनिक शोक अवकाश घोषित करे।
2. इस अवकाश को आकस्मिक अवकाश (CL) या अर्जित अवकाश (EL) से अलग रखा जाए, ताकि कोई भी भारतीय अपनी
आजीविका और अपने धर्म के बीच चुनाव करने को विवश न हो।
Pranav Kumar Trivedi Visionary Goals Lalit Bajpai YogaKaro

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