31/05/2020
!! सूर्यदेव एवं जीवनज्योति !!
🎯सूर्य क्या है ??
सूर्य एक महातारा है जिससे हमारी आकाशगंगा में उपस्थित समस्त गृह प्रकाशित हैं और हमारी पृथ्वी सहित अन्य ग्रहों पर भी अगर जीवन है , तो सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित है , जीवनदायी ऊष्मा एवं ऊर्जा देने के कारण ही हमने इन्हें देव कहा अर्थात सूर्यदेव कहा !
हमारे संसार का प्रत्येक जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सूर्यदेव की इस प्राणदायी ऊर्जा से प्रभावित है , जो वास्तव में एक बड़े आग के गोले के रूप में स्थिर हैं !
🎯जीवनज्योति क्या है ??
हमारे ऋषियों-मुनियों(वैज्ञानिकों-मनोवैज्ञानिकों) ने लाखों वर्ष पूर्व घोषणा कर दी थी कि यत्र पिंडे , तत्र ब्रह्मांडे अर्थात जो हमारे इस छोटे से शरीर में हैं वैसा ही इस महा ब्रह्मांड में है...कोई भेद नही है !
इस तुच्छ से शरीर की प्राणशक्ति अग्नि ही है अर्थात अग्नि शांत तो मनुष्य परलोकवासी हो जाता है , देह धरी रह जाती है जिसे मिट्टी कहा जाता है !
तुच्छ शरीर में सूक्ष्म अग्नि को ही जीवनज्योति कहा गया है , जिसका रंग , रूप , आकार एवं गुण सूर्यदेव की दैनिक कलाओं से प्रभावित होकर घटता अथवा बढ़ता है...अर्थात सूर्योदय के पश्चात जैसे जैसे सूर्यदेव ऊपर चढ़ते हैं ठीक वैसे वैसे हमारे शरीर की गर्मी भी बढ़ती है और जैसे जैसे सूर्यदेव सूर्यास्त की ओर बढ़ते हैं ठीक वैसे ही हमारी जीवनज्योति भी धीमी पड़ती चली जाती है ! इसे समझने के लिए सूर्य और चंद्र के मध्य निर्भरता का सिद्धांत याद कीजिये , वही सिद्धांत यहां भी लागू होता है कि सूर्य की रोशनी से चंद्र जगमग है , अन्यथा चंद्र की स्वयं की कोई रोशनी नही है !
अब यहां कोई यह भी न समझे कि मैं सूर्य को चलायमान कह रहा हूँ , बस जो प्रत्यक्ष अनुभव होता है वैसा ही लिखने का सुख उठा रहा हूँ....अर्थात घूर्णन तो पृथ्वी का ही होता है , सूर्यदेव का नही !
शास्त्रों एवं आयुर्वेद के अनुसार यही 1 जीवन ज्योति हमारे शरीर में 13 रूपों में व्यक्त है !
🎯१...जठराग्नि
🎯२...5 भूताग्नि
🎯३...7 धातवाग्नि
आज हम यहां बात करेंगे 🎯 #जठराग्नि की...
इस मशीन रूपी शरीर को चलायमान रखने के लिए ईंधन रूप में भोजन , पानी और हवा की आवश्यकता होती है ! जिन्हें पचाने और पचाकर शरीर हेतु आवश्यक विटामिन्स , खनिज , लवण आदि की पूर्ति यही अग्नि करती है , जिसे हम जठराग्नि कहते हैं !
इसका भेद खोलना बहुत आवश्यक है , क्योंकि अधिकतर इसे जानते नही और बहुत से जानकर मानते नही हैं , और ईश्वर की मनुष्य को दी सबसे बड़ी भेंट स्वयं उसके वास्तविक मंदिर को समय से पहले नष्ट कर रहे हैं , अनावश्यक रोग..दोष आज के जीवन के महत्वपूर्ण अंग हो चलें हैं ! विडंबना यह है कि बहुतों के लिए तो रोग और उसके कीमती उपचार सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बन चुकें हैं !
हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि हमारा पाचन तंत्र #कमलपुष्प के समान है , जैसे , कमल सूर्योदय से खिलना शुरू करता है फिर सूर्य की बढ़ती कला के साथ-साथ कमल में निखार आता चला है और सूर्यास्त के साथ ही कमल भी मुरझा जाता है ठीक वैसे हमारे शरीर की जीवनज्योति , उसमें , भी विशेषकर जठराग्नि का व्यवहार समान होता है !
सूर्योदय के समय से इसमें तेजी आई शुरू होती है और फिर सूर्यदेव के चढ़ते चढ़ते यह प्रबल होती जाती है और फिर सूर्य की घटती कला के साथ साथ यह मंद होने लगती है ! इसी गुण को हमारे ऋषियों ने परखा और हमारे भोजन के नियम-सन्नियम तय किये !
जिनमें प्रमुख हैं....
🎯सुबह-सवेरे आपका भोजन राजा सा होना चाहिए अर्थात भरपेट , गरिष्ठ भी चलेगा , दोपहर का भोजन राजकुमार सा अर्थात मध्यम , अपेक्षाकृत हल्का एवं रात्रि का भोजन रंक के समान करना चाहिए अर्थात नाममात्र का और प्रकृति में बिल्कुल हल्का ! इस प्रकार से लिया गया भोजन आपको कभी हानि नही पहुंचा सकता , शरीर को रोगी नही बनाएगा !
इस नियम का कारण सूर्य से प्रेरित जठराग्नि का व्यवहार है , जब सांझ होते होते आपकी जठराग्नि मंद हो जाती है तब आपके द्वारा पाया गया भरपेट गरिष्ठ भोजन पचना बंद हो जाता है , जिससे आप अनेक रोगों की चपेट में आना शुरू कर देते हैं !
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी के झूठे दावों के चक्कर में लोगों ने अपना दैनिक जीवन बिलकुल उलट नियमों के साथ जीना अपनी मजबूरी बताया है जबकि मेरा मानना है कि स्वयं मैं ही क्यों न हूँ एक बहुत बड़ी आबादी के लिए यह केवल बहाने हैं , निपट फट्टे हैं ! मजबूरों की संख्या बहुत बड़ी नही है , बड़ी भी है तो वे फिर भी शरीर को अहमियत देते हैं जैसे मजदूर...अनपढ़ सही लेकिन गुणी हैं !
मैंने इस नियम को अब जीवन में उतारा है , लाभ अनुभव हो रहे हैं कुछ शुरुआती परेशानियों के बाद !...इसलिए कहता अच्छा लग रहा हूँ ! साथ ही अपने जानकारों को भी संदेश दे रहा हूँ कि जिद मत कीजियेगा , बुरा न मानियेगा अगर मैं रात्रि भोजन आपके साथ न कर पाऊं तब !
🎯पानी एवं इसके समकक्ष तरल पदार्थों को लेने के भी तरीके बनाए गए , बताए गए कि सुबह की शुरुआत आप फलों के रसों से करो , दोपहर को छाछ और रात्रि में दूध लो ! इसके पीछे भी यही कारण है कि पाचन का संबंध भी रसों से ही होता है अर्थात हमारा भोजन रस के रूप में ही पचता है , जबकि सीधा रस लेने से हमें दोहरे फायदे होते हैं पहला अंगों की मेहनत कम होती है और दूसरा सीधा पोषण प्राप्त होता है !
दोपहर को छाछ लेने का कारण यही है कि जठराग्नि तीव्रतम होती है अतः उसे नियंत्रित किया जाना आवश्यक है जिसका काम छाछ बेहतर रूप से कर पाती है ! और सांझ को आप कम भोजन लेते हैं अतः आवश्यक तत्वों की पूर्ति दूध जैसे हल्के सुपाच्य पेय से हो जाती है !
यही बात पानी पर भी लागू होती है कि पानी और अग्नि में शत्रुभाव है अतः पानी सोच-समझकर प्रयोग में लाना चाहिए !
व्यायाम के बाद ,भोजन के बाद और संभोग के तुरंत बाद पानी नही पीना चाहिए ! यह कार्य कम से कम डेढ़ से दो घँटे बाद ही करना चाहिए ! Chilled bottels से दूर रहिये ! और साधारण तापमान के पानी को भी घूंट घूंट करके लार का मिश्रण करके गले से नीचे उतारना चाहिए !
🎯ऐसे ही हवा(ऑक्सीजन) का काम अग्नि को भड़काना अतः आपको आदेश है कि सुबह व्यायाम करने चाहिए , जिसके कारण अग्नि आपकी अतिरिक्त वसा का नाश करेगी ही , साथ ही आपकी जठराग्नि को भी प्रबलता प्रदान करेगी ! श्वांस संबंधी यौगिक क्रियाएं इसी कारण सुबह करनी चाहिए ! अनेक योद्धा जो घँटों शाम को gym में जाकर लोहे से माथा फोड़ते हैं वे यही गलती करके रोगों के शिकार होते हैं कि जैविक घड़ी के अनुसार जिस समय जठराग्नि मंद हो जानी चाहिए वह उसे उसी समय भड़काते हैं !
यह उनके लिए सही है जो मंदाग्नि रोग से पीड़ित हैं !
अगर आप इन नियमों से चलेंगे तो आपको पेट संबंधी अनेक रोग पकड़ नही पाएंगे ! कब्ज , एसिडिटी , bp , गठिया , मधुमेह जैसे अनेक साध्य-असाध्य रोग केवल आपकी गलत जीवनशैली का परिणाम हैं ! साथ ही इन नियमों के बलबूते न केवल आपकी immunity strong अपितु आपको corona जैसे झंडू रोगों से भी डरने की आवश्यकता नही पड़ेगी , चेहरे पर तेज आएगा सो अलग...वह तेज जो कभी ऋषियों के चेहरे पर था !
यही अतुल्य भारत को पुनर्जीवित करने का उपाय है कि पुरातन भारत को पुनः गढ़ना भी तो पड़ेगा !
🎯ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
🙏नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
✍️Baba Thakur
🚩भोलेनाथ आपकी रक्षा करें !!