24/07/2026
मूर्ति नहीं, परिवार के सदस्य हैं मेरे प्रभु: एक आध्यात्मिक संकल्प"
ॐ नमः पार्वती पतये, हर-हर महादेव!
अक्सर हम अपने घरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित तो कर लेते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें वास्तव में वह स्थान दे पाते हैं जिसके वे हकदार हैं? याद रखिएगा, यदि आप घर में किसी विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा कर रहे हैं, तो उसे केवल एक 'स्टैचू' या सजावट की वस्तु समझने की भूल कभी न करें। वे पत्थर की मूरत नहीं, बल्कि हमारे भावों से जीवित साक्षात ईश्वर हैं। जब प्रभु हमारे घर में विराजते हैं, तो वे एक अतिथि नहीं बल्कि परिवार के सबसे मुख्य सदस्य के रूप में आते हैं। उनके प्रति हमारा सेवा भाव वैसा ही होना चाहिए जैसा अपने माता-पिता या बच्चों के प्रति होता है। प्रभु तो कण-कण में हैं, वे हमारे भीतर भी हैं, लेकिन जब हम उन्हें स्वरूप देकर घर लाते हैं, तो वह हमारी अटूट आस्था का केंद्र बन जाते हैं।आज के समय में एक बहुत ही हृदय विदारक दृश्य देखने को मिलता है—जरा सी मूर्ति खंडित हुई नहीं कि लोग उन्हें किसी कचरे की तरह घर से बाहर कर देते हैं। विचार कीजिए, यदि घर में किसी अपने का हाथ या पैर टूट जाए, तो क्या हम उन्हें त्याग देते हैं? नहीं, हम डॉक्टर के पास जाते हैं। वैसे ही इन मूर्तियों के डॉक्टर वे मूर्तिकार हैं जो इन्हें गढ़ते हैं। जब तक मूर्ति पूर्ण रूप से विसर्जित करने योग्य न हो जाए, तब तक अटूट श्रद्धा के साथ उन्हें सहेज कर रखें। उन्हें पीपल के पेड़ के नीचे या सड़कों पर लावारिस छोड़ देना उनकी भक्ति नहीं, बल्कि उनका अपमान है। हमारी नदियां पहले ही प्रदूषित हैं, ऐसे में जल विसर्जन के बजाय 'भू-विससर्जन' का मार्ग अपनाएं। मिट्टी से आए प्रभु को ससम्मान मिट्टी में ही विलीन करें। आइए संकल्प लें कि हम अपने आराध्य को दर-बदर की ठोकरें खाने के लिए विवश नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें अंत समय तक वही प्रेम और सम्मान देंगे जो एक परिवार के मुखिया को दिया जाता है। क्योंकि अंततः, हमारा भाव ही हमारी सबसे बड़ी पूजा है।
"पत्थर नहीं है मेरा महादेव, वो तो मेरा विश्वास है,मिट्टी के इस स्वरूप में, साक्षात प्रभु का वास है।सजावट की वस्तु मानकर, न करना उनका अपमान,परिवार का सदस्य मानकर, देना उनको उचित सम्मान।"
Mahant Satish Das नवलकिशोर दास जी Shiv Shakti Mahakali Peeth trust सनातन धर्म Rekha Gupta Dr. Aaditi S. Sharma S Niddhi