Saambhavi

Saambhavi Saambhavi one of the Maa Durga's name, literally means the one who makes everything possible, this i

our organization is working in the field of providing education ,rehabilitation , treatment to mentally & physically challenged people & children and also helping weaker sections, especially women & girls. For this purpose we have established five centers across Delhi & NCR. Apart from said activities at these centres we also sponsor treatments in different Govt. / charitable hospitals / clinics / Schools & provide equipment aids to poor people in Delhi & other states of India .

30/07/2026

उत्तराखंड की एक ऐसी शख्सियत जिनके बारे में सुनकर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन्हें अपने आवास पर मिलने बुलाया और ना सिर्फ इनसे मिलीं बल्कि इनके काम से इतनी प्रभावित हुई कि इनाम भी दे डाला !

मुझे नहीं पता उत्तराखंड में कितने लोगों को इनके बारे में पता होगा, मगर खुशी है कि पंजाब बोर्ड की बारहवीं के अंग्रेजी विषय में इनके ऊपर पूरा एक चैप्टर है। पंजाब के बच्चों को इनके बारे में पढ़ाया जाता है।

जिनकी में बात कर रहा हूँ उनका नाम चंद्रशेखर लोहुमी था। पेशे से एक शिक्षक थे, मगर नाम पड़ा लोक-वैज्ञानिक... अब आप सोचेंगे कि लोक वैज्ञानिक क्यों ? वो इसलिए क्योंकि विज्ञान की पढ़ाई किए बिना भी इन्होंने एक ऐसे कीट (कीड़े) की खोज की जो किसानों की आफ़त बन चुके लैंटाना की झाड़ी (जिसे कुमाऊं में कुरी भी कहते हैं) को जड़ से मिटा देता था।

वर्ष 1904 में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के ताकुला क्षेत्र के पंत गांव (बीना) के एक गरीब किसान श्री बचीराम लोहनी के घर जन्मे चन्द्र शेखर लोहुमी जी ने मात्र सातवीं तक की शिक्षा प्राप्त की थी मगर इन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा से वह कर दिखाया, जो साधन संपन्न वैज्ञानिकों के लिये एक चुनौती बन गया।

पेशे से एक शिक्षक रहे लोहुमी जी ने वर्ष 1967 में लेन्टाना (कुरी घास) को नष्ट करने वाले कीट की खोज कर तहलका मचा दिया। 1978 में जैव विज्ञान चयनिका के पहले अंक में इन्होंने लिखा था कि "1807 में कुछ पुष्प प्रेमी अंग्रेज अपने साथ मैक्सिको से एक फूलों की झाड़ी साथ लाये थे। इसके कुछ पौधे नैनीताल और हल्द्वानी के पास कंकर वाली कोठी में लगाये गये थे। धीरे-धीरे यह झाड़ी पूरे भाबर क्षेत्र और पहाड़ों में भी फैल गई। आज तो स्थिति यह है कि लेन्टाना उत्तराखण्ड के घाटी इलाकों में भी फैल गया है। हजारों एकड़ जमीन इस घास के प्रभाव में आने के कारण कृषि विहीन हो गई है"

इसकी शुरुआत ऐसे ही कि एक ग्रामीण ने उन्हें बताया कि कहीं पर लेंटाना (कुरी) की झाड़ियां स्वतः पीली पड़ रही हैं। यह सुनकर लोहुमी जी को लगा कि ज़रूर कोई कीट इस पेड़ पर लगा होगा। उत्सुकता से उन्होंने उन झाड़ियों को टटोला और कई प्रयासों के बाद उन्हें कुछ छोटे-छोटे कीट दिखाई दिए। इसके बाद उन्होंने कुछ कीटों इकठ्ठा कर स्वस्थ कुरी की झाड़ियों में डाल दिया और कुछ ही दिन में उन कीड़ों ने उन झाड़ियों को भी नष्ट करना शुरू कर दिया था। इस प्रयोग को उन्होंने अन्यत्र दोहराया।

उन्होंने 4 साल तक इस कीट के अथक प्रयोग किया। इसके लिये उन्होंने कीट का 24 किस्म के अनाज, 6 फूलों, 18 फलों, 23 तरकारियों, 24 झाड़ियों, 37 वन वृक्षों और 25 जलीय पौधों पर परीक्षण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि जो कीट लेंटाना (कुरी) को खाता है वो अन्य किसी पौधे या पेड़ को नुकसान नहीं पहुंचाता। अपनी शोध में इन्होंने उस कीट के जीवन काल के बारे में भी बताया और कहा कि इसका जीवन काल केवल बीस दिन का होता है, उन्होंने इसके पैदा होने से लेकर मरने तक के एक एक एक्टिविटी और व्यवहार को नोटडाउन किया। इनके इस शोध को विश्व भर के सभी कीट विज्ञानियों और वनस्पति शाष्त्रियों ने एकमत से स्वीकार किया।

इनके शोध के बारे में जब अमेरिका के टाइम्स मैगजीन में आर्टिकल छपा तो ये पूरे देश के लिए एक चर्चा का विषय बन गया कि गांव के एक सरकारी मासाप ने जिन्हें वैज्ञानिकों की तुलना में अंग्रेजी और विज्ञान का ना के बराबर ज्ञान था उन्होंने आखिर जैव वैज्ञानिकों से भी बढ़कर काम कैसे कर दिया ?

बाद में इस जैवकीय परीक्षण के लिए आई०सी०ए०आर० (इण्डियन काउन्सिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च) ने इन्हें उस जमाने में 15,000 का पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके बाद इन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने भी 1976 में अपने आवास पर बुलाया जहां उनके साथ में डॉ. एन. सी. पन्त भी थे जो ICAR में कीट विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष। इस दौरान इंदिरा गांधी ने लोहुमी जी के काम को देखकर इन्हें 5000 का जबकि पंतनगर विश्व विद्यालय ने 18,000 का नकद पारितोषिक दिया।

लेकिन दुख की बात ये है कि उत्तराखंड की ऐसी महान शख्सियत के बारे आज गिने चुने लोग जानते हैं, जिनके बारे में प्रदेश के स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए था उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं ये हमारे उत्तराखंड का दुर्भाग्य है।

मुझे उम्मीद है Gaon Wala पेज के इस पोस्ट के माध्यम से कई लोगों को पहली बार ऐसी शख्सियत के बारे में पता चला होगा। अगर आपको भी इनकी कहानी दिलचस्प लगी हो तो प्लीज इस पोस्ट को आगे शेयर जरूर करें। धन्यवाद 🙏

तस्वीरो में इंदिरा गांधी के बगल में लोहुमी जी है, नीचे जो फूलों वाली झाड़ी है वह लेंटाना है उसके बगल में कीट और लोहुमी जी की वो तस्वीर है जो अमेरिका के टाइम मैग्जीन में छपी थी।

पोस्टकर्ता - राजेंद्र नेगी (गांव वाला)

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