04/08/2026
पटना से करीब 100 किलोमीटर दूर गया ज़िले के एक ऐसे डॉक्टर, जो सचमुच ‘धरती के भगवान’ कहलाने योग्य हैं—डॉ. संकेत नारायण सिंह।
डॉ. संकेत नारायण सिंह एक अनुभवी चर्म रोग विशेषज्ञ हैं, लेकिन उन्हें खास बनाता है उनका पेशा नहीं, बल्कि उनकी सेवा भावना। जहाँ आज चिकित्सा को अक्सर कमाई का साधन माना जाने लगा है, वहीं डॉ. संकेत नारायण ने इसे मानव सेवा का माध्यम बना रखा है। वे ज़रूरतमंदों से इलाज के बदले कोई शुल्क नहीं लेते और वर्षों से निस्वार्थ भाव से गरीबों की सेवा कर रहे हैं।
संघर्ष से सेवा तक का सफर
डॉ. संकेत नारायण सिंह का जन्म वर्ष 1952 में छपरा ज़िले के खैरा थाना अंतर्गत डुमरी गांव में हुआ। महज़ छह वर्ष की उम्र में पोलियो की चपेट में आने से वे दिव्यांग हो गए। माता-पिता ने भरसक इलाज कराया, परंतु वे पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सके। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई जारी रखी।
उन्होंने मगध मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1980 में उन्हें मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल में नौकरी मिली, लेकिन सरकारी व्यवस्था की खामियों से निराश होकर उन्होंने एक वर्ष के भीतर ही इस्तीफा दे दिया। उसी दौरान माता-पिता से किया गया एक वादा उनके जीवन की दिशा तय कर गया—
👉 वे जीवनभर असहाय, वृद्ध और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का निःशुल्क इलाज करेंगे।
सरकारी नौकरी छोड़, मानवता की राह
1982 में वे ईएसआई में मेडिकल ऑफिसर बने, लेकिन वहां भी अधिक समय तक नहीं टिक सके। अंततः 1984 में उन्होंने गया में एक किराए के मकान से अपनी निजी चिकित्सा सेवा शुरू की, जो आज तक लगातार जारी है।
आज स्थिति यह है कि
प्रतिदिन लगभग 300 मरीज उनके यहां इलाज कराते हैं
इनमें से 200 मरीजों से कोई फीस नहीं ली जाती
करीब 100 असहाय वृद्ध और दिव्यांग मरीजों को मुफ्त दवाइयां भी दी जाती हैं
फीस भी सेवा का साधन
जो मरीज शुल्क देते हैं, उनसे ली जाने वाली फीस दो श्रेणियों में होती है—
₹10 से शुरू
₹100 से शुरू
इस राशि को वे चार हिस्सों में बांटते हैं—
तीन हिस्से समाज सेवा, गरीबों की मदद और जरूरतमंदों पर खर्च
एक हिस्सा अपने न्यूनतम जीवन और क्लिनिक खर्च के लिए
निजी दुख, लेकिन सेवा का विस्तार
कुछ वर्ष पहले डॉ. संकेत नारायण के इकलौते पुत्र आदित्य नारायण और उनकी पत्नी मगरिता सिंह का असमय निधन हो गया। इस गहरे आघात के बाद भी वे टूटे नहीं, बल्कि मानव सेवा में और अधिक समर्पित हो गए।
उन्होंने 80 से अधिक अनाथ बच्चों की परवरिश का जिम्मा उठाया और दर्जनों गरीब बच्चों की शिक्षा का पूरा खर्च संभाला। आज उनमें से कई बच्चे इंजीनियर, डॉक्टर और समाज के जिम्मेदार पदों पर कार्यरत हैं।
आदर्श और आस्था
भगवान बुद्ध और मदर टेरेसा उनके प्रेरणास्रोत हैं
भविष्य में वृद्धाश्रम और अनाथालय खोलने का सपना
पर्ची लिखते समय गायत्री मंत्र का जाप, माता-पिता और ईश्वर का स्मरण
फौज, पुलिस, पत्रकार, बौद्ध भिक्षु, पर्यटक और 75 वर्ष से अधिक आयु वालों से कोई फीस नहीं
सेवा का अद्भुत अनुशासन
शाम 5 बजे से मरीज देखना शुरू करते हैं
कई बार सुबह 5 बजे तक लगातार इलाज
रोज़ रात में दूर-दराज़ से आए 70 मरीजों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था
जब तक अंतिम मरीज को देख न लें, उठते नहीं
समाज के लिए और भी योगदान
पिछले 30 वर्षों से अपने गांव डुमरी और पंचायत के
100 वृद्ध व दिव्यांग लोगों को हर महीने ₹300 पेंशन
उनके इलाज का पूरा खर्च
मंदिर निर्माण में भी अपनी कमाई का एक हिस्सा समर्पित
डॉ. संकेत नारायण सिंह के पास पुराने से पुराने चर्म रोगों का भी सफल उपचार उपलब्ध है। वे न सिर्फ एक डॉक्टर हैं, बल्कि जीवित उदाहरण हैं कि सेवा, संकल्प और संवेदना से ही सच्ची चिकित्सा जन्म लेती है।
ऐसे लोग ही समाज की असली पूंजी होते है
🙏