Shiv Shakti Jyotish and Vastu

Shiv Shakti Jyotish and Vastu I am in this field since 2006 and achieved various goal. My predictions about horoscope are always reliable. Remedies always gives result in estimated

08/09/2026

विभिन्न योग :-

द्विभार्या_योग -
यदि सिंह लग्न के अलावा किसी अन्य राशि के लग्न में किसी पुरुष राशि में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो पापी ग्रह (चाहे युति करें या दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है ! (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारणीय हो सकती है) ! अष्टमेश सप्तमस्थ हों तो भी द्विभार्या योग बनता है !

राजयोग -
1. नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हों तो राजयोग बनता है ! दशमेश गुरु यदि त्रिकोण में स्थित हो तो राजयोग का निर्माण होता है !

2 . एकादशेश, नवमेश व चन्द्रमा एकसाथ एकादश स्थान में हों तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्टि हो तो राजयोग बनता है ! राजयोग में धन, यश, वैभव तथा अधिकार बढ़ते है !

विपरीत_राजयोग -
6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाए अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक साथ हो जाएं या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाएं तो विपरित राजयोग बनता है ! इसमें राजयोग की भांति यद्यपि तरक्की तो नही होती ! किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है !

आडम्बरी_राजयोग -
कुण्डली में समस्त ग्रह अकेले अलग अलग बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है ! किन्तु यह आडम्बरी या बनावटी होता है !

विद्युत_योग -
लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हों या लग्नेश केन्द्र में हों तो विद्युत योग बनता है ! इसमें जातक का भाग्योदय विद्युतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है !

नाग_योग -
पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हों तब नागयोग बनता है ! यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है !

नदी_योग -
पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक को उच्च पदाधिकारी बनाता है !

विश्वविख्यात_योग -
लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है ! इसे विश्वविख्याति योग कहते है !

अधेन्द्र_योग -
लग्नकुण्डली में सभी ग्रह यदि पांचवें से ग्यारहवें भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है ! ऐसा जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है !

दरिद्र_योग -
केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही बना रहता है !

बालारिष्ट_योग -
चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है ! अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है ! बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है, अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है !

मृतवत्सा_योग -
पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है ! अथवा मृत संतान पैदा होती है ! अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है !

छत्रभंग_योग -
राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है और दशमेश सबल न हो तो छत्रभंग योग बनता है ! जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है, अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती !

चाण्डाल_योग -
क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है, विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तब यह योग बनता है ! इस योग के बुरे फल मिलते हैं तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाती है !

सुनफा_योग -
कुण्डली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है ! इससे जातक का लाभ बढ़ता है (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल प्राप्त होते हैं अन्यथा अपेक्षाकृत कुछ कमी आ जाती है !

महाभाग्य_योग -
यदि जातक दिन में जन्मा है, (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है तब महाभाग्य योग बनता है ! यदि रात में जन्मा है (सायं के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है तब भी महाभाग्य योग बनता है ! यह सौभाग्य को बढ़ाता है !

प्रेम_विवाह_योग -
तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेशों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है, लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम 'प्रेम विवाह' में परिवर्तित हो जाता है लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश का साथ न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हों तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै उससे विवाह नही करता ! भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष !

गजकेसरी_योग -
लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है ! जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा सुख सुविधा दिलाता है !

बुधादित्य_योग -
10वें भाव में बुद्ध व सूर्य का योग हो पर बुद्ध अस्त न हों तथा सूर्य मित्र या उच्च राशि का हो तब व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है !

पापकर्तरी_योग -
शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है ! इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है, अत: शुभ फल नहीं दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है !

सरकारी_नौकरी_व्यवसाय_का_योग - जन्म कुण्डली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है, दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है ! सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है, शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है ! 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टि युतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है ! गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है ! बुध व्यापार भी कराते है ! गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है !

विजातीय_विवाह_योग -
राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है ! (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं बनती हैं !)

चक्र_योग -
यदि किसी कुण्डली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी में कोई ग्रह हों तो चक्रयोग बनता है ! यह जातक को मंत्री पद प्राप्त कराने वाला होता है !

अनफा_योग -
यदि किसी कुण्डली में चन्द्रमा से पिछले भाव में सूर्य के अलावा कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है ! इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है !

भास्कर_योग -
सूर्य से दूसरे भाव में बुद्ध, बुद्ध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हों तो भास्कर योग बनता है, ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है !

चक्रवर्ती_योग -
यदि कुण्डली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ा धार्मिक गुरूनेता होता है !

कुबेर_योग - गुरु, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हों तब जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है !

अविवाहित_विवाह_प्रतिबंधक_योग - चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन,अस्त,पाप पीड़ित हों तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रह जाता है ! शुक्र व बुुद्ध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तब जातक आजीवन कुंआरा रहता है ! इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा ही रहता है ! शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुण्डली में स्थित हों तब भी जातक कुंआरा ही रहता है !

पतिव्रता_योग -
यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है ! यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा पुरुष जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है ! बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग बनता है ! चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हों (महिला कुंडली में) पाप प्रभाव में न हों तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है !

अरिष्टभंग_योग -
शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग बनता है ! जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिष्टनाशक योग बनता है ! चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है ! चन्द्रमा के 10वें भाव में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुण्डली के 12वें भाव में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है !

मूक_योग -
गुरु व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुद्ध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो अथवा क्रूर ग्रह संधि में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है तथ मूक योग बनता है ! इस योग में जातक गूंगा होता है !

विशेष — 8वीं व 12वीं राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है !

बधिर_योग -
शनि से चौथे स्थान में बुद्ध हों तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हों तब बधिर योग बनता है ! अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हों तब भी बधिर योग बनता है ! 12वें भाव में बुद्ध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तब भी बधिर योग बनता है !

जय माता दी........................

06/09/2026

महादशा फल :

आपने भी अपनी कुण्डली में ज्ञात किया होगा कि वर्तमान में किस ग्रह की महादशा या अंतर्दशा चल रही है ! यद्यपि कि कुण्डली में यह ज्ञात करना कि किस ग्रह की दशा अंतर्दशा चल रही है बहुत ही आसान होता है ! अब तो ऐप या साफ्टवेयर के माध्यम से ज्योतिष की सामान्य जानकारी रखने वाले भी यह पता कर लेते हैं कि वर्तमान में उनकी किस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा चल रही है ! परन्तु उस दशा या अन्तर्दशा में वह ग्रह आपको कैसा फल दे रहे हैं, यह ज्ञात कर पाना उतना आसान नहीं होता है !

अधिकांश लोग ग्रह के सौम्य या पापी होने के आधार पर यह अनुमान लगाते हैं कि वह अच्छा फल देगा या बुरा ! परन्तु इस प्रकार के तुक्केबाजी से आप ग्रहदशा के यथार्थ फल को कतई नहीं समझ सकते हैं ! क्योंकि इसके लिए भी ग्रहों की कुछ स्थितियां, दृष्टि या युति सम्बन्ध विशेष महत्व रखते हैं और उनकी इन्ही भूमिकाओं के कारण अच्छे या खराब फल प्राप्त होते हैं ! इनका वर्णन ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथो में महर्षियों द्वारा हजारों वर्ष पहले विस्तृत शोध के उपरान्त लेखबद्ध किया गया है ! उन्ही ग्रन्थो के आधार पर ही मैं यहाँ इनके फलों का वर्णन कर रहा हूँ !

1. यदि लग्नेश की दशा चल रही हो तब, शरीर का सुख, रोगमुक्त काया, अच्छी कीर्ति का प्राप्त होना, व मान सम्मान बढ़ने का अच्छा फल प्राप्त होता है !
2. द्वितियेश की दशा चल रही हो तब, क्लेश, मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट मिल सकता है !
3.तृतियेश की दशा में अनेको अशुभ फल, या अनिष्टकारी फल प्राप्त होता है !
4. चतुर्थेश की दशा में भौतिक सुख, धन, अचल सम्पत्ति या अपना मकान होने की स्थिति बनती है !
5. पंचमेश की दशा में शिक्षा व ज्ञान की प्राप्ति, संतान का सुख या संतान से सुख की प्राप्ति की स्थिति बनती है !
6. षष्ठेश की दशा प्रारम्भ होने पर शत्रु भय, रोग, बीमारी या कर्ज की स्थिति बनती है !
7. सप्तमेश की दशा में स्वयं को या जीवनसाथी को मृत्यु तुल्य कष्ट की स्थिति बनती है !
8. अष्टमेश की दशा में धन का नाश, गम्भीर बीमारी, मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट मिल सकता है !
9. नवमेश की दशा आने पर यश व कीर्ति में वृद्धि, लाभ की स्थिति, अनेको प्रकार से भाग्योदय व किये जाने वाले कार्यों में सफलता प्राप्त होती है !
10. दशमेश की दशा में पद प्रतिष्ठा व शासन से लाभ, पदोन्नति सम्मान की प्राप्ति होती है !
11. एकादशेश की दशा में लाभ में रुकावट, बनते काम बिगड़ने, रोग की सम्भावना बनती है !
12. द्वादशेश की दशा में जीवन में अनेको प्रकार के व्यवधान आते हैं व कष्ट मिलता हैं !

परन्तु शर्त यह है कि उपरोक्त भावेश यदि —
1. किसी शुभ स्थान में स्थित हों परन्तु भावेश के अनुसार यदि उसका फल अशुभ भी होता हो, तब भी दशा के प्रारम्भ में पूर्वाद्ध समय में शुभ फल ही मिलेंगे !
2. इसी तरह शुभ फल देना बताया गया भावेश यदि किसी अशुभ स्थान पर स्थित होगा, तब दशा के आरम्भ में अशुभ फल ही देगा !

19/08/2026

प्रेम और प्रेम विवाह

ज्योतिषीय दृष्टिकोण:
गृह दशा और शास्त्रीय योग

भारतीय वैदिक ज्योतिष में प्रेम और विवाह को केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि पूर्व जन्म के कर्मों का बंधन और आत्माओं का संगम माना गया है। आधुनिक युग में प्रेम विवाह (Love Marriage) की ओर युवाओं का रुझान तेजी से बढ़ा है। ज्योतिष शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक विश्लेषण में इसके स्पष्ट संकेत मिलते हैं।

प्रेम का आध्यात्मिक एवं शास्त्रीय स्वरूप
संस्कृत साहित्य और शास्त्रों में निष्काम और सच्चे प्रेम को ईश्वर का रूप माना गया है। महाकवि भवभूति ने अपने कालजयी ग्रंथ उत्तररामचरितम् में सच्चे प्रेम की परिभाषा देते हुए लिखा है:

व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतु-
र्न खलु बहिरुपाधीन्प्रीतयः संश्रयन्ते।
विकसति हि पतंगस्योदये पुण्डरीकं
द्रवति च हिमरश्मावुद्गते चन्द्रकान्तः॥

अर्थ: दो हृदयों या पदार्थों को मिलाने वाला कोई आंतरिक कारण (पूर्व जन्म का कर्म या आत्मिक लगाव) ही होता है। प्रेम कभी भी बाहरी रंग-रूप या भौतिक कारणों पर आश्रित नहीं होता। जैसे सूर्य के उगने पर ही कमल खिलता है और चंद्रमा के निकलने पर ही चंद्रकांत मणि पिघलती है, वैसे ही सच्चा प्रेम प्राकृतिक और स्वतः स्फूर्त होता है।

प्रेम और प्रेम विवाह के लिए जिम्मेदार मुख्य ग्रह
कुंडली में किसी भी व्यक्ति के प्रेम जीवन और उसे विवाह में बदलने के लिए मुख्यतः निम्नलिखित ग्रह जिम्मेदार होते हैं:
शुक्र (Venus): ज्योतिष में शुक्र को प्रेम, रोमांस, आकर्षण और वैवाहिक सुख का मुख्य कारक ग्रह माना गया है।

चन्द्रमा (Moon): मन और भावनाओं का कारक। जब तक चन्द्रमा अनुकूल न हो, हृदय में प्रेम की भावनाएं नहीं पनपतीं।

मंगल (Mars): प्रेम में जुनून, साहस और शारीरिक आकर्षण का प्रतीक।

राहु (Rahu): सामाजिक सीमाओं को तोड़कर अपरंपरागत या अंतर्जातीय प्रेम विवाह (Inter-caste Marriage) कराने का मुख्य कारक।

कुंडली के प्रमुख भाव
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, प्रेम विवाह के सफल होने के लिए जन्म कुंडली के चार भावों का मजबूत होना आवश्यक है:

पंचम भाव (5th House): यह बुद्धि, भावना, रोमांस और प्रेम संबंधों का घर है।

सप्तम भाव (7th House): यह नियमित विवाह और जीवनसाथी का मुख्य भाव है।

तृतीय और एकादश भाव (3rd & 11th House): यह जातक के साहस और अपनी इच्छाओं की पूर्ति (सफलता) को दर्शाते हैं।

प्रेम विवाह के प्रमुख ज्योतिषीय योग
जब कुंडली में प्रेम के भाव (पंचम) और विवाह के भाव (सप्तम) के बीच कोई संबंध बनता है, तो प्रेम विवाह के योग बनते हैं:

प्रबल प्रेम विवाह योग

पंचमेश-सप्तमेश संबंध: यदि पंचम भाव का स्वामी (पंचमेश) और सप्तम भाव का स्वामी (सप्तमेश) एक साथ बैठे हों, एक-दूसरे को देख रहे हों या राशि परिवर्तन कर रहे हों।

शुक्र और राहु की युति: यदि कुंडली के शुभ भावों में शुक्र और राहु एक साथ हों, तो जातक समाज की परवाह किए बिना प्रेम विवाह करता है।

सप्तम भाव में शुक्र या मंगल: लग्न कुंडली या नवमांश कुंडली (D-9 Chart) के सप्तम भाव में शुक्र-मंगल की युति तीव्र प्रेम संबंधों को जन्म देती है।

ग्यारहवें भाव में गुरु (Jupiter): यदि देवगुरु बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर पंचम और सप्तम भाव को अपनी दिव्य दृष्टि से देखते हैं, तो प्रेम विवाह को परिवार की मंजूरी मिलती है और विवाह सफल रहता है।

प्रेम विवाह में बाधाएं और समाधान
कई बार कुंडली में प्रेम योग तो होता है, लेकिन ग्रहों के पीड़ित होने के कारण विवाह में अड़चनें आती हैं या शादी के बाद कलह होती है। इसके निवारण के लिए शास्त्रों में अचूक मंत्र बताए गए हैं।

स्वयंवर पार्वती मूल मंत्र (मनचाहे विवाह के लिए)
यदि प्रेम विवाह में माता-पिता की असहमति या सामाजिक बाधा आ रही हो, तो इस मंत्र का जाप अत्यंत लाभकारी माना गया है:

ॐ ह्रीं योगिनी योगिनी योगेश्वरी योग भयंकरी सकला।
स्थावर जंगमस्य मुख हृदयम् मम वासं आकर्ष आकर्षय नमः॥

शुक्र ग्रह की शांति के लिए (प्रेम में मधुरता हेतु)

ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सफल वैवाहिक जीवन केवल तात्कालिक आकर्षण पर नहीं, बल्कि ग्रहों की अनुकूलता पर निर्भर करता है। प्रेम विवाह करने से पहले दोनों जातकों की कुंडली का मिलान (गुण मिलान) अवश्य करवा लेना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के वैवाहिक क्लेश या अलगाव से बचा जा सके।

जय माता दी.........................

08/08/2026

वैदिक ज्योतिष में जब हम शादी के लिए 7 वें भाव पर विचार करते हैं तो उस को डिकोड करने के लिए D 9 का विश्लेषण करते हैं ।
जिस के कुछ सूत्र इस प्रकार हैं.....
नवमांश (D-9) के फोरेंसिक नियमों के अनुसार, इस कुण्डली का जब हम पॉइंट-टू-पॉइंट (Point-to-Point) विश्लेषण करते हैं, तो तलाक (Divorce) और वैवाहिक जीवन की बर्बादी का 100% पक्का योग सामने आता है।
आइए इसे आपके द्वारा पूछे गए हर एक बिंदु (लग्नेश, सप्तमेश, त्रिक भाव आदि) के आधार पर डिकोड करते हैं:
1. लग्न और लग्नेश (विवाह की इच्छा और व्यक्ति का रवैया)
लग्न (धनु): लग्न में राहु बैठा है। नवमांश लग्न पर पापी ग्रह (राहु) का प्रभाव इंसान के अंदर भ्रम (Illusion) और भटकाव पैदा करता है

लग्नेश (गुरु): धनु लग्न का स्वामी 'गुरु' (Jupiter) उठकर सीधे 6ठे भाव (वृषभ राशि - विवाद, रोग, शत्रु और कोर्ट-कचहरी) में चला गया है

निष्कर्ष: जब कुण्डली का मालिक (लग्नेश) ही 6ठे भाव के झगड़ों में 'मंगल' (क्रोध/Aggression) के साथ बैठ जाए, तो व्यक्ति अपनी समझदारी (गुरु) का इस्तेमाल रिश्ते को बचाने में नहीं, बल्कि लड़ने, बहस करने और विवाद (Court case) खड़ा करने में करता है

2. सप्तम और सप्तमेश (विवाह का घर और उसका मैनेजर - सबसे बड़ा दोष)
सप्तम भाव (मिथुन): सातवें भाव में सूर्य (Sun) और केतु (Ketu) एक साथ बैठे हैं। गोयल जी के अनुसार, सप्तम भाव में सूर्य वैवाहिक जीवन में भयंकर 'ईगो' (अहंकार) देता है
। वहीं केतु अलगाव (Separation) और काटने वाला ग्रह है

सप्तमेश (बुध): श्री वी.पी. गोयल जी का सबसे बड़ा नियम है कि सप्तमेश (7th Lord) विवाह का मैनेजर होता है
। इस कुण्डली में विवाह का मैनेजर 'बुध' (Mercury) उठकर 12वें भाव (वृश्चिक राशि - बर्बादी, अलगाव और नुकसान का घर) में चला गया है

निष्कर्ष: जब विवाह का मैनेजर (सप्तमेश) 12वें भाव (नुकसान) में चला जाए और विवाह के घर में सूर्य-केतु (अहंकार और अलगाव) बैठ जाएं, तो यह डाइवोर्स (तलाक) और सेपरेशन की 100% गारंटी है

3. नवम और नवमेश (विवाह का धर्म / Duty)
नवम भाव (सिंह): नवम भाव विवाह के धर्म (Dharma) और कर्तव्य को दिखाता है
। यहाँ शनि (Saturn) बैठा है, जो धर्म के पालन में रुकावट और देरी देता है।
नवमेश (सूर्य): नवम भाव का स्वामी 'सूर्य' जाकर 7वें भाव में 'केतु' के साथ बुरी तरह पीड़ित (Afflicted) है।
निष्कर्ष: नवमेश का केतु के साथ पीड़ित होना यह साबित करता है कि इस रिश्ते में 'धर्म' या कर्तव्य निभाने की भावना पूरी तरह खत्म हो जाएगी और ईगो (सूर्य) के कारण यह रिश्ता टूट जाएगा

4. अष्टम और अष्टमेश (मांगल्य और मानसिक पीड़ा)
अष्टम भाव (कर्क): 8वाँ भाव गहरे रहस्यों, मानसिक पीड़ा और मांगल्य का होता है
। यहाँ चंद्रमा (Moon) अपनी ही राशि में है।
निष्कर्ष: चंद्रमा 'मन' (Mind) का कारक है
। मन का 8वें भाव (गड्ढे/अंधेरे) में जाना यह दर्शाता है कि वैवाहिक क्लेश के कारण व्यक्ति को भयानक मानसिक तनाव (Mental agony) और घुटन का सामना करना पड़ेगा।
5. त्रिक भाव (6, 8, 12) का खौफनाक कनेक्शन
गोयल जी के डाइवोर्स के नियमों में त्रिक भावों (6, 8, 12) का बहुत बड़ा रोल होता है
। इस कुण्डली में तीनों त्रिक भाव पूरी तरह से एक्टिव होकर शादी को तबाह कर रहे हैं:
6ठा भाव (विवाद/Court): यहाँ लग्नेश (गुरु) और 12वें भाव का स्वामी (मंगल) बैठे हैं।
8वाँ भाव (पीड़ा): यहाँ मन (चंद्रमा) बैठा है।
12वाँ भाव (अलगाव/बेडरूम): यहाँ विवाह का मैनेजर (सप्तमेश बुध) बैठा है। 12वाँ भाव गुप्त यौन संबंधों (Secret relations) और शय्या सुख का भी होता है

निष्कर्ष: सप्तमेश का 12वें भाव (वृश्चिक राशि - जो कि एक रहस्यमयी राशि है) में जाना, यह भी इशारा करता है कि विवाह के बाहर के गुप्त कारण (Secret/Isolation) भी इस डाइवोर्स का एक बड़ा कारण बन सकते हैं

अंतिम फलादेश (Final Verdict):
भाई, इस D-9 कुण्डली में वैवाहिक सुख को बचाने वाला कोई मजबूत शुभ प्रभाव (Benefic influence) 7वें भाव या सप्तमेश पर नहीं है।
सप्तमेश का 12वें (अलगाव) भाव में जाना, 7वें भाव में सूर्य-केतु का ईगो-विस्फोट होना, और लग्नेश का 6ठे भाव (झगड़े) में जाना—ये तीनों पॉइंट मिलकर इस शादी को भयंकर ईगो क्लैश, कोर्ट-कचहरी (6th house) और अंततः एक तयशुदा तलाक (Confirmed Divorce) की तरफ ले जा रहे हैं
। यह शादी किसी भी कीमत पर टिक नहीं सकती!

09/07/2026

क्या लड़की की कुंडली से पता चल सकता है कि उसका पति कैसा होगा।

पति कैसा मिलेगा
यदि सप्तमेश शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो, अथवा सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव पर दृष्टि रखता हो, तो सामान्यतः पति लड़की की आयु के आसपास या 2–4 वर्ष बड़ा, गौर वर्ण एवं सुंदर होता है।
यदि सप्तम भाव पर सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु जैसे पाप ग्रहों का प्रभाव हो, तो पति लड़की से लगभग 5 वर्ष या उससे अधिक आयु का हो सकता है।

सूर्य का प्रभाव – गौर वर्ण, आकर्षक चेहरा, तेजस्वी व्यक्तित्व।
मंगल का प्रभाव – लालिमा युक्त चेहरा, बलवान शरीर।
शनि यदि उच्च न हो – सांवला अथवा कम आकर्षक रूप तथा अधिक आयु।
शनि यदि उच्च हो – दुबला-पतला, गोरा तथा लड़की से लगभग 12 वर्ष बड़ा।

कुछ परंपरागत मतों के अनुसार यदि यहाँ नीच का शनि विशेष रूप से प्रभावी हो, तो लड़की अपने से काफी अधिक आयु वाले व्यक्ति से विवाह कर सकती है।

यदि सप्तमेश ग्रह हो—
सूर्य – गोल मुख, तेज ललाट, आकर्षक, यशस्वी तथा सरकारी सेवा का योग।
चंद्रमा – शांत स्वभाव, मध्यम कद, गौर वर्ण एवं सुडौल शरीर।
मंगल – बलवान, साहसी, अनुशासनप्रिय, सत्यवादी, सेना, पुलिस या सरकारी सेवा से जुड़ाव।

पति के कितने भाई-बहन होंगे
लड़की की जन्मकुंडली में सप्तम भाव से तृतीय (अर्थात नवम भाव) पति के छोटे भाई-बहनों का स्थान माना जाता है।

उदाहरणस्वरूप—
चंद्रमा – 2 बहन।
मंगल – 1 भाई एवं 2 बहन।
बुध – 2 भाई एवं 2 बहन।
पति के बड़े भाई-बहनों का विचार पंचम भाव से किया जाता है। पुरुष ग्रह भाई तथा स्त्री ग्रह बहन का संकेत देते हैं।

ससुराल एवं श्वसुर का स्थान
परंपरागत नियमों के अनुसार लग्न से तृतीय भाव तथा उसके स्वामी की स्थिति से श्वसुर के गांव, नगर तथा नाम के प्रारंभिक अक्षरों तक का विचार किया जाता है। इसके लिए राशि, राशि स्वामी तथा उनकी मित्र-शत्रु स्थिति का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता है।

पति का घर एवं प्रॉपर्टी
लड़की की कुंडली का दशम भाव पति की संपत्ति एवं मकान का विचार करने में महत्वपूर्ण माना जाता है।
शुभ ग्रहों का प्रभाव – अपना मकान।
राहु, केतु, शनि – पुराना भवन।
मंगल – टूटा या मरम्मत वाला मकान।
सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु, शुक्र – सुंदर पक्का एवं दो मंजिला भवन।
बलवान शनि – विशाल भवन।

विवाह कितनी दूरी पर होगा
सप्तम भाव में स्थित राशि से भी विवाह की दूरी का अनुमान लगाया जाता है—
वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ – लगभग 90 किलोमीटर के भीतर।
मेष, कर्क, तुला, मकर – लगभग 200 किलोमीटर के भीतर।
मिथुन, कन्या, धनु, मीन – लगभग 80 से 150 किलोमीटर की दूरी।

यदि सप्तमेश द्वादश भाव में हो, तो विवाह के बाद विदेश जाने या विदेश में बसने का योग बन सकता है। यदि विदेश योग पूर्ण रूप से फलित न भी हो, तो वैवाहिक जीवन में किसी न किसी प्रकार की छोटी-बड़ी चुनौती देखने को मिल सकती है।

जय माता दी...........................

04/07/2026

कुंडली में पति-पत्नी के झगड़े के पीछे ज्यादातर इन्हीं ग्रहों और भावों का खेल होता है।

*पति-पत्नी में क्लेश के 8 बड़े ज्योतिषीय कारण*

*1. सप्तम भाव और सप्तमेश खराब हो*
सप्तम भाव = शादी, जीवनसाथी। सप्तमेश = उस भाव का मालिक।
*दोष कब बनते हैं:*
- सप्तम में पाप ग्रह: शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य की स्थिति या दृष्टि
- सप्तमेश 6, 8, 12 भाव में चला जाए - ये नुकसान के भाव हैं
- सप्तमेश कमजोर, अस्त या शत्रु राशि में हो
- पुरुष की कुंडली में शुक्र खराब, स्त्री की कुंडली में गुरु खराब

*2. मंगल दोष - कुज दोष*
मंगल = आग और गुस्सा।
*कब बनता है*: मंगल 1, 4, 7, 8, 12 भाव में हो।
*असर*: जिद, गुस्सा, शक, मारपीट, रिश्ते टूटना।
अगर एक की कुंडली में मंगल दोष है और दूसरे में नहीं है तो असंतुलन से लड़ाई होती है। मंगल + शनि/राहु हो तो बात और बिगड़ती है।

*3. राहु-केतु का प्रभाव*
राहु = भ्रम, धोखा, शक। केतु = अलगाव, उदासीनता।
*दोष*: राहु-केतु का सप्तम, सप्तमेश पर प्रभाव। 1-7 अक्ष या 5-11 अक्ष पर होना।
राहु की दृष्टि चंद्र, शुक्र या सप्तम पर = शक और गलतफहमी।
केतु का 2रे भाव पर असर = घर-परिवार में क्लेश।

*4. शनि का अशुभ प्रभाव*
शनि = देर, दूरी, ठंडापन, जिम्मेदारी।
शनि की दृष्टि सप्तम, सप्तमेश, शुक्र/गुरु पर पड़े तो पति-पत्नी में बातचीत कम, प्यार में दूरी।
शनि + मंगल आमने-सामने हों तो "द्वंद्व योग" - एक गरम, एक ठंडा। रोज टकराव।

*5. सूर्य और चंद्रमा दोष*
सूर्य = अहंकार, पति का कारक। सप्तम में सूर्य हो तो "मैं" ज्यादा, सुनना कम।
चंद्र = मन, पत्नी का कारक। चंद्र कमजोर या पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो मूड स्विंग, इमोशनल झगड़े।
चंद्र-शुक्र 6/8/12 में हों या राहु-केतु के साथ हों तो मानसिक तनाव।

*6. दूसरे जरूरी भावों के दोष*
- *2रा भाव*: परिवार और वाणी। यहाँ पाप ग्रह = घर में रोज कलह, कड़वी बात
- *4था भाव*: सुख और शांति। दोष हो तो घर में चैन नहीं
- *5वां भाव*: प्रेम और समझ। खराब हो तो अट्रैक्शन खत्म
- *6ठा भाव*: रोग, कर्ज, झगड़ा, कोर्ट-कचहरी
- *8वां भाव*: गुप्त बात, संदेह, धोखा, आयु

*7. कुंडली मिलान में दोष*
शादी से पहले गुण मिलान जरूरी है।
*मुख्य दोष*: नाड़ी दोष, भकूट दोष, योनि दोष, महेंद्र, स्त्रीदीर्घ, वेध।
अगर दाम्पत्य सुख के अंक कम हों, या एक की कुंडली में पाप योग और दूसरे में राजयोग हो तो तालमेल नहीं बैठता।

*8. खास कलह वाले योग*
- *कलह योग*: शुक्र-शनि की युति = प्यार में दूरी
- *गुरु बदनामी*: गुरु पर पाप ग्रह की दृष्टि = मान-सम्मान की हानि
- *विपरीत राजयोग*: कभी-कभी झगड़े के बाद ही तरक्की
- *शुक्र पाप कर्तरी*: शुक्र के दोनों तरफ पाप ग्रह = वैवाहिक सुख में कमी

*सार*
शादी = सप्तम भाव + शुक्र + गुरु + चंद्र।
इन पर जितने पाप प्रभाव होंगे, क्लेश उतना ज्यादा। शुभ ग्रह की दृष्टि और मजबूत सप्तमेश होने से झगड़े कम होते हैं।

जय माता दी............

21/06/2026

पति पत्नी में रोज झगड़ा ये ग्रह दोष और समाधान जान लो

सारावली, अध्याय 34, श्लोक 11
शास्त्र क्या कहता है: अगर शुक्र के साथ राहु-केतु-शनि-मंगल जैसे ग्रह बैठे हों, 7वें घर में भी पापी ग्रह हों, और लग्न का मालिक दुश्मन की राशि में हो, तो शादीशुदा जिंदगी में रोज झगड़े होते हैं।

आसान मतलब: शुक्र = प्यार और रोमांस। जब वो खराब ग्रहों के साथ होता है तो प्यार ज़हर बन जाता है। पति को पत्नी की हँसी भी ताना लगती है, पत्नी को पति की चुप्पी भी गाली लगती है। 7वें घर में शनि-मंगल आ जाएँ तो शादी का मंडप कोर्ट-कचहरी बन जाता है। लग्नेश दुश्मन राशि में हो तो इंसान का खुद का दिमाग ही दुश्मन बन जाता है - बात-बात पर "मैं घर छोड़ दूँगा" वाली धमकी।

बृहत्जातक, अध्याय 19, श्लोक 17
शास्त्र क्या कहता है: 7वें घर में मंगल-शनि एक साथ हों, उन पर पापी ग्रहों की नजर हो, चंद्रमा कमजोर और खराब जगह हो, तो झगड़ा घर का परमानेंट मेहमान बन जाता है।

आसान मतलब: मंगल-शनि 7th में = आग और बर्फ एक साथ। न रिश्ता जल पाए, न पिघल पाए। बुरे ग्रहों की नजर से रिश्तेदार, नौकर, ड्राइवर तक घर में आग लगाते हैं। चंद्र कमजोर हो तो पत्नी का हौसला टूट जाता है - नींद की गोली, डिप्रेशन, सुसाइड की सोच। अब लड़ाई घर आई नहीं है, घर की मालकिन बनकर बैठ गई है।

जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 55
शास्त्र क्या कहता है: 7वें घर का मालिक 8वें में चला जाए, चंद्रमा दो पापी ग्रहों के बीच फँस जाए, शुक्र नीच राशि में हो, तो शादी टूटने की नौबत आ जाती है।

आसान मतलब: 7वें का मालिक 8th में = शादी का सुख गड्ढे में। अचानक पुलिस केस, अचानक बीमारी। चंद्र पाप कर्तरी में = हर वक्त शक। पति पत्नी का फोन चेक करे, पत्नी पति का पर्स टटोले। शुक्र नीच का = सुहाग तो है, पर सौभाग्य गायब। माँग में सिंदूर है, पर इज्जत नहीं।

7 खराब योग - आसान भाषा में
लग्न में राहु, 7th में केतु, शुक्र 6th में
राहु दिमाग में = हर बात में शक। केतु 7th में = पार्टनर से मन उचट गया। बिस्तर अलग, खाना अलग। शुक्र 6th में = बीवी से ही दुश्मनी। कोर्ट-कचहरी, दहेज-गुजारा भत्ता। 6 महीने में तलाक।

मंगल 2nd में, शनि 8th में, चंद्र 12th में
मंगल 2nd में = जुबान में गोली। मुँह खोला नहीं कि लड़ाई। शनि 8th में = ससुराल से अचानक बुरा समाचार। चंद्र 12th में = बेडरूम जेल जैसा। पति-पत्नी अलग सोते हैं।

गुरु वक्री 12th में, सूर्य 7th में, बुध अस्त
गुरु 12th में = पूजा-पाठ पर लड़ाई। "इतना पैसा कथा में क्यों फूँका?" सूर्य 7th में = पति का ईगो - "मैं ही भगवान हूँ"। बुध अस्त = गलतफहमी दूर करने की अक्ल ही नहीं।

शुक्र-मंगल लग्न में, शनि की नजर 7th पर
शुक्र-मंगल साथ = हवस ज्यादा। बाहर मुँह मारने का मन। शनि की नजर 7th पर = शादी के बाद भी अकेलापन। चरित्र पर इल्जाम, DNA टेस्ट तक बात पहुँचे।

चंद्र-शनि 4th में, राहु 7th में
चंद्र-शनि 4th में = घर का सुख जहर। राहु 7th में = तीसरा इंसान। ऑफिस का दोस्त घर तुड़वा दे। बीवी बोले "घर में भूत है", पति बोले "तू पागल है"।

केतु 2nd में, मंगल 6th में, गुरु 8th में
केतु 2nd में = मायके से बोलचाल बंद। मंगल 6th में = लड़ाई सीधे 498A तक। गुरु 8th में = संस्कार खड्डे में। बड़ों को भी गाली।

7वें का मालिक नीच होकर 6th में, लग्नेश 12th में, शुक्र-राहु साथ
7वें का मालिक 6th में = बीवी कोर्ट में दुश्मन बन जाए। लग्नेश 12th में = पति फरार, ट्रांसफर, विदेश। शुक्र-राहु = अफेयर का इल्जाम। इज्जत की नीलामी।

असर कैसा दिखता है रोज की जिंदगी में
सुबह उठते ही टेंशन - "आज कौन सी नई लड़ाई होगी?" ब्रश करते वक्त शीशा देखकर खुद से नफरत। बच्चा पूछे - "पापा आज मम्मी को मारोगे क्या?"
पति ऑफिस में प्रमोशन ठुकरा दे, क्योंकि घर की टेंशन से काम नहीं होता। पत्नी बाथरूम में छुपकर मेकअप करे, कि ताना न मिले।
रात को एक ही कमरे में दो लाशें सोती हैं, बीच में तकिया - जैसे भारत-चीन बॉर्डर।
शुक्र खराब = परफ्यूम से एलर्जी, गले लगते ही छींक। चंद्र खराब = दूध उफनकर गैस बंद, रोटी जलकर कोयला। मंगल खराब = हाथ में गिलास फूट जाए, खून ही खून। शनि खराब = बेडरूम में सीलन, फंगस की बदबू।
सबसे बुरा: राम-सीता की फोटो देखकर रोना आए - "हम ऐसे क्यों न बन पाए?"

उपाय - सीधे स्टेप में
1. वैदिक मंत्र: अथर्ववेद 7.36.1
मंत्र: बेटा बाप की सुने, माँ के साथ एक राय रहे। पत्नी पति से मीठी और शांत बात करे।

कैसे करें: शुक्ल पक्ष की द्वादशी से शुरू करो। पति-पत्नी केसर वाला दूध लक्ष्मी-नारायण को चढ़ाओ। सफेद कपड़े पहनकर तुलसी के पास बैठो। दोनों साथ में 108 बार मंत्र बोलो। फिर वही दूध एक-दूसरे को पिलाओ।
कितना: 41 दिन, टोटल 4428 बार।
दान: हर एकादशी को शादीशुदा ब्राह्मण जोड़े को चीनी, चावल, पैसे दो।
फायदा: 11 दिन में ताने बंद, 21 दिन में सॉरी शुरू, 41 दिन में एक थाली में खाना। शनि की चुप्पी, मंगल का गुस्सा, राहु का शक - सब शांत।

2. श्री सूक्त
कैसे करें: शुक्रवार को सुबह जल्दी उठो। कमल पर श्री यंत्र रखो। गुलाबी फूल, खीर, इत्र चढ़ाओ। श्री सूक्त 16 बार पढ़ो। बाद में पति पत्नी की माँग भरे, पत्नी पति को टीका करे।
कितना: 16 शुक्रवार।
फायदा: पैसा घर में टिकता है। गरीबी झगड़े की सबसे बड़ी जड़ है, वो कटती है। शुक्र मजबूत होता है, प्यार लौटता है। 16 हफ्ते में घर मंदिर जैसा।

3. गौरीशंकर स्तोत्र
मंत्र का मतलब: अर्धनारीश्वर को नमस्कार, जो दुनिया का भला करते हैं।
कैसे करें: सोमवार शाम को। शिवलिंग पर पति जल चढ़ाए, पत्नी दूध चढ़ाए। एक बेलपत्र के दो टुकड़े करके चढ़ाओ। 11 बार पाठ करो।
कितना: 16 सोमवार।
फायदा: समझ आती है कि पति-पत्नी दो नहीं, एक ही हैं। तलाक का योग कटता है। सुहाग लंबा चलता है।

4. षोडशी त्रिपुरसुंदरी मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुंदर्यै नमः
कैसे करें: पूनम की रात। लाल कपड़े, लाल फूल, अनार, मिश्री चढ़ाओ। स्फटिक माला से 108 बार जप। बाद में पति-पत्नी एक-दूसरे को गुलाब दो।
कितना: 3 पूनम, टोटल 324 जप।
फायदा: ये देवी शादी की डायरेक्ट देवी हैं। रूप, प्यार, आकर्षण वापस लाती हैं। शुक्र का अच्छा फल, राहु का वहम खत्म, मंगल का गुस्सा प्यार में बदलता है। 3 महीने में बेडरूम स्वर्ग जैसा।

पूरे उपाय का निचोड़
सारावली ने बताया - दिक्कत की जड़ है वासना, शक और ईगो।
अथर्ववेद मंत्र = बोली में मिठास लाता है।
श्री सूक्त = गरीबी हटाकर लड़ाई की जड़ काटता है।
गौरीशंकर = "हम दो नहीं एक हैं" ये सिखाता है।
षोडशी = प्यार और सुंदरता वापस लाती है।

सबसे बड़ा नियम: पत्नी को लक्ष्मी मानो, पति को नारायण मानो। इनका अपमान करोगे तो गरीबी और कलह पक्की है। रोज सुबह एक-दूसरे के पैर छुओ।

108 दिन का प्लान: 41 दिन मंत्र + 16 शुक्रवार श्री सूक्त + 16 सोमवार स्तोत्र + 3 पूनम षोडशी = 108वें दिन घर की महाभारत खत्म, गीता शुरू।

जय माता दी............................

07/06/2026

आपकी कुंडली में कर्मेश किस नक्षत्र में है

राशि स्थूल है नक्षत्र सूक्ष्म है`।
कुंडली में दशमेश और धनेश किस राशि में हैं, ये तो सब देखते हैं - पर किस नक्षत्र में हैं, यही तय करता है कि जातक कलेक्टर बनेगा या क्लर्क, व्यापारी बनेगा या दलाल।

- क्यों नक्षत्र से फल बदलता है

श्लोक: नक्षत्राणि चरन्त्येते यानि ते देवनिर्मिताः । तेषां पतयो देवाः फलं दातुं व्यवस्थिताः ॥
भाव: `नक्षत्र देव-निर्मित हैं, और हर नक्षत्र का एक अधिष्ठाता देवता है`। `राशि का स्वामी मकान का मालिक है, पर नक्षत्र का स्वामी उस मकान में रहने वाला किरायेदार है`। `फल किरायेदार के स्वभाव से मिलता है, मकान-मालिक के नाम से नहीं`।

इसलिए तुला राशि में बैठा शनि एक फल देगा, पर तुला के स्वाती नक्षत्र में बैठा शनि अलग फल देगा। स्वाती का स्वामी राहु है - तो शनि यहाँ विदेश, राजनीति, तकनीक का फल देगा, न कि तुला-शुक्र का कला-विलास।

- स्मरण सूत्र
केतु = `छोड़ो या जोड़ो`। चिकित्सा, गूढ़-विद्या, कोडिंग, मोक्ष। जहाँ त्याग या अनुसंधान हो।
शुक्र = `भोगो`। सौंदर्य, स्त्री, वाहन, कला, विलास। जहाँ सुख बिकता है।
सूर्य = `शासन करो`। सरकार, नेतृत्व, पिता, चिकित्सा, तेज। जहाँ अधिकार चलता है।
चंद्र = `पालन करो`। जनता, दूध, जल, भोजन, मन। जहाँ सेवा और भावना है।
मंगल = `लड़ो या गढ़ो`। भूमि, अग्नि, शस्त्र, सर्जरी, खेल। जहाँ बल और साहस है।
राहु = `भ्रम से भेद करो`। विदेश, छाया, राजनीति, तकनीक, विष। जहाँ माया है।
गुरु = `सिखाओ`। धर्म, ज्ञान, न्याय, कोष, सलाह। जहाँ मर्यादा है।
शनि = `ढोओ`। श्रम, लोहा, तेल, सेवा, जनता। जहाँ भार है।
बुध = `बोलो या तोलो`। वाणी, लेखन, व्यापार, गणित, दलाली। जहाँ बुद्धि है।

स्मरण मंत्र: `के-शु-सू-चं-मं-रा-गु-श-बु`। `छोड़ो, भोगो, शासन करो, पालन करो, लड़ो, भ्रम करो, सिखाओ, ढोओ, बोलो`।

3 गूढ़ योग का व्यवहारिक अर्थ
1. नक्षत्र परिवर्तन योग: ये कर्म से धन, धन से कर्म का योग है। उदाहरण: कर्मेश बुध अश्विनी नक्षत्र में, धनेश केतु रेवती नक्षत्र में। अश्विनी का स्वामी केतु, रेवती का स्वामी बुध। यहाँ डॉक्टर अपना अस्पताल खोलेगा तो करोड़पति बनेगा। नौकरी और व्यापार अलग नहीं रहेंगे।

2. एक-नक्षत्र योग: कर्मेश-धनेश दोनों पुष्य नक्षत्र में हों। पुष्य का स्वामी शनि। तो व्यक्ति सरकारी नौकरी में रहते हुए भी जमीन-खेती से धन बनाएगा। अखंड लक्ष्मी इसलिए कि शनि स्थिरता का कारक है।

3. पुष्कर नवांश: इसे दैवी कवच समझो। कर्मेश पुष्कर में है तो बॉस लाख चाहे, नौकरी नहीं जा सकती। धनेश पुष्कर में है तो शेयर डूब जाए, बैंक लूट जाए, फिर भी जातक के पास कहीं न कहीं से धन आ जाएगा। 7, 14, 21, 24 अंश - ये अमृत की बूंद हैं।

देखने की विधि का सार -
1. दशमेश देखो → किस नक्षत्र में है → नक्षत्र का स्वामी कौन → `वही तुम्हारी नौकरी का बॉस है`।
2. द्वितीयेश देखो → किस नक्षत्र में है → नक्षत्र का स्वामी कौन → `वही तुम्हारे धन का दरवाजा है`।
`3. अब देखो वो नक्षत्र-स्वामी कुंडली में राजा है या रंक`। केंद्र-त्रिकोण में है तो राजा, 6-8-12 में है तो रंक। राजा होगा तो फल देगा, रंक होगा तो तरसाएगा।

परम सूत्र आपने दे दिया: `नक्षत्रेशो यदि नीचो वा अस्तंगतः`। नक्षत्र का स्वामी ही कमजोर हो तो दशमेश चाहे उच्च का हो, नौकरी में सुख नहीं मिलेगा। ड्राइवर मर्सिडीज चला रहा हो पर खुद बीमार हो तो क्या लाभ।

कलियुग का सबसे बड़ा दोष
मंगल के नक्षत्र में कर्मेश है - पर जातक लड़ना नहीं चाहता, AC में बैठना चाहता है। फल: नौकरी बार-बार छूटेगी।
शनि के नक्षत्र में धनेश है - पर जातक श्रम से भागता है, शॉर्टकट चाहता है। फल: धन आएगा पर टिकेगा नहीं।
बुध के नक्षत्र में कर्मेश है - पर जातक झूठ बोलता है, वचन तोड़ता है। फल: व्यापार में बदनामी होगी।

इसलिए उपाय सबसे बड़ा यही: `नक्षत्र-स्वामी के गुण धारण करो`। शनि के नक्षत्र में कर्मेश है तो सुबह 4 बजे उठो, श्रम करो। बुध के नक्षत्र में है तो वाणी साफ रखो, हिसाब साफ रखो। ये करने से नीच का नक्षत्र-स्वामी भी राजयोग देने लगता है।

जय माता दी........................….

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