08/09/2026
विभिन्न योग :-
द्विभार्या_योग -
यदि सिंह लग्न के अलावा किसी अन्य राशि के लग्न में किसी पुरुष राशि में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो पापी ग्रह (चाहे युति करें या दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है ! (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारणीय हो सकती है) ! अष्टमेश सप्तमस्थ हों तो भी द्विभार्या योग बनता है !
राजयोग -
1. नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हों तो राजयोग बनता है ! दशमेश गुरु यदि त्रिकोण में स्थित हो तो राजयोग का निर्माण होता है !
2 . एकादशेश, नवमेश व चन्द्रमा एकसाथ एकादश स्थान में हों तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्टि हो तो राजयोग बनता है ! राजयोग में धन, यश, वैभव तथा अधिकार बढ़ते है !
विपरीत_राजयोग -
6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाए अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक साथ हो जाएं या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाएं तो विपरित राजयोग बनता है ! इसमें राजयोग की भांति यद्यपि तरक्की तो नही होती ! किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है !
आडम्बरी_राजयोग -
कुण्डली में समस्त ग्रह अकेले अलग अलग बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है ! किन्तु यह आडम्बरी या बनावटी होता है !
विद्युत_योग -
लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हों या लग्नेश केन्द्र में हों तो विद्युत योग बनता है ! इसमें जातक का भाग्योदय विद्युतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है !
नाग_योग -
पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हों तब नागयोग बनता है ! यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है !
नदी_योग -
पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक को उच्च पदाधिकारी बनाता है !
विश्वविख्यात_योग -
लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है ! इसे विश्वविख्याति योग कहते है !
अधेन्द्र_योग -
लग्नकुण्डली में सभी ग्रह यदि पांचवें से ग्यारहवें भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है ! ऐसा जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है !
दरिद्र_योग -
केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही बना रहता है !
बालारिष्ट_योग -
चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है ! अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है ! बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है, अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है !
मृतवत्सा_योग -
पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है ! अथवा मृत संतान पैदा होती है ! अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है !
छत्रभंग_योग -
राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है और दशमेश सबल न हो तो छत्रभंग योग बनता है ! जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है, अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती !
चाण्डाल_योग -
क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है, विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तब यह योग बनता है ! इस योग के बुरे फल मिलते हैं तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाती है !
सुनफा_योग -
कुण्डली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है ! इससे जातक का लाभ बढ़ता है (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल प्राप्त होते हैं अन्यथा अपेक्षाकृत कुछ कमी आ जाती है !
महाभाग्य_योग -
यदि जातक दिन में जन्मा है, (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है तब महाभाग्य योग बनता है ! यदि रात में जन्मा है (सायं के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है तब भी महाभाग्य योग बनता है ! यह सौभाग्य को बढ़ाता है !
प्रेम_विवाह_योग -
तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेशों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है, लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम 'प्रेम विवाह' में परिवर्तित हो जाता है लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश का साथ न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हों तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै उससे विवाह नही करता ! भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष !
गजकेसरी_योग -
लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है ! जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा सुख सुविधा दिलाता है !
बुधादित्य_योग -
10वें भाव में बुद्ध व सूर्य का योग हो पर बुद्ध अस्त न हों तथा सूर्य मित्र या उच्च राशि का हो तब व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है !
पापकर्तरी_योग -
शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है ! इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है, अत: शुभ फल नहीं दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है !
सरकारी_नौकरी_व्यवसाय_का_योग - जन्म कुण्डली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है, दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है ! सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है, शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है ! 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टि युतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है ! गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है ! बुध व्यापार भी कराते है ! गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है !
विजातीय_विवाह_योग -
राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है ! (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं बनती हैं !)
चक्र_योग -
यदि किसी कुण्डली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी में कोई ग्रह हों तो चक्रयोग बनता है ! यह जातक को मंत्री पद प्राप्त कराने वाला होता है !
अनफा_योग -
यदि किसी कुण्डली में चन्द्रमा से पिछले भाव में सूर्य के अलावा कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है ! इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है !
भास्कर_योग -
सूर्य से दूसरे भाव में बुद्ध, बुद्ध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हों तो भास्कर योग बनता है, ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है !
चक्रवर्ती_योग -
यदि कुण्डली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ा धार्मिक गुरूनेता होता है !
कुबेर_योग - गुरु, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हों तब जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है !
अविवाहित_विवाह_प्रतिबंधक_योग - चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन,अस्त,पाप पीड़ित हों तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रह जाता है ! शुक्र व बुुद्ध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तब जातक आजीवन कुंआरा रहता है ! इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा ही रहता है ! शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुण्डली में स्थित हों तब भी जातक कुंआरा ही रहता है !
पतिव्रता_योग -
यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है ! यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा पुरुष जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है ! बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग बनता है ! चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हों (महिला कुंडली में) पाप प्रभाव में न हों तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है !
अरिष्टभंग_योग -
शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग बनता है ! जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिष्टनाशक योग बनता है ! चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है ! चन्द्रमा के 10वें भाव में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुण्डली के 12वें भाव में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है !
मूक_योग -
गुरु व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुद्ध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो अथवा क्रूर ग्रह संधि में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है तथ मूक योग बनता है ! इस योग में जातक गूंगा होता है !
विशेष — 8वीं व 12वीं राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है !
बधिर_योग -
शनि से चौथे स्थान में बुद्ध हों तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हों तब बधिर योग बनता है ! अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हों तब भी बधिर योग बनता है ! 12वें भाव में बुद्ध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तब भी बधिर योग बनता है !
जय माता दी........................