Vedic Sanskaram Trust

Vedic Sanskaram Trust वैदिक संस्कारम ट्रस्ट, एक परमार्थिक ट?

27/05/2023

श्री राधे जी आप सब कैसे है आशा करता हु की ठाकुर जी की कृपा से आप सब कुशल मंगल होंगे *आप सब को एक पुण्य कार्य के लिए निवेदित करते हुए यह बात आप के सामने रख रहा हु की हम ने गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में हर 2.500 मीटर की दूरी गायों व वहां रह रहे वन्य जीवों के पानी के लिए इस तरह की टैंकी रखवा रहे है अगर आप मैं से कोई टैंकी अपने नाम से रखवाना चाहते हो तो आप के नाम से रख देंगे नही तो वैदिक संस्कारम ट्रस्ट के नाम से ये टेंकिया रखी जायेगी व इन टेंकियो को भरने के लिए ट्रस्ट को एक टैंकर की भी आवस्यकता है तो जिन का भी मन हो वो वैदिक संस्कारम ट्रस्ट के अकाउंट नंबर

Vedic Sanskaram Trust
A/c No.34021246018
IFS Code :SBIN0010313
Goverdhan ( mathura )U.P

को एड कर के उस में सहियोग राशि डाल सकते है एक टैंकी 2200 रुपए की है व टैंकर 150000 का है ऑडर दे दिया है बस आप यथा शक्ति यथा भक्ति इस पुण्य कार्य में सहियोग करे ताकि हम उन के लिए कुछ कर सके जो कह नही अपनी पीड़ा को

🙏🙏🙏🙏 धन्यवाद

वैदिक संस्कारम ट्रस्ट, एक परमार्थिक ट?

https://youtu.be/vQ5QJPx5ddY
23/04/2022

https://youtu.be/vQ5QJPx5ddY

समाज को अद्यत की ओर ले जाने का एक छोटा सा प्रयास

05/05/2020

आप सभी से एक सहियोग की अपील करता हु की हमारे पूरे गांव मे एक ही घर है बर्तन बनाने वाले भाई का उन को हम लोग प्यार से डूल्ला (प्रजापत यानी लोक भाषा मे कुम्हार)चाचा कहते है ये बहुत बीमार है और इनका इलाज पी.एस. हॉस्पिटल महोली रोड मथुरा में चल रहा है आप से 🙏जोड़ कर मैं राधे भइया उन की मदद के लिए आप सभी से विनिति करता हु कृपा आप से जितना हो सके उन की मदद के लिए उतनी मदद करे
नोट :- अभी मेरे पास उन का अकाउंट नंबर नही आया है जैसे ही आएगा में उन सब लोगो को बताऊंगा जो भी सज्जन मदद करना चहाते है
वो उन के भाई से भी संपर्क कर सकते है
9756630667
आप का आभारी
राधे भइया
जो भी भाई मदद करना चाहते है वो इस नम्बर पर सम्पर्क करें
9810379333

02/05/2020

सब एक दूसरे को दवाने मैं लगे हए है क्या भी वैसे ही है
सोचना चाहिए हम बदले तो सब बदलेंगे

02/05/2020

व्यक्ति अगर अपने अंदर के अंधकार को मिटा ले तो उसे बाहर के जुठे प्रकाश की आवश्यकता नही पड़ती

20/04/2020
15/04/2020

" उधार का अमीर " 100 नम्बर की एक गाड़ी मेन रोड पर एक दो मंजिले मकान के बाहर आकर रुकी।
कांस्टेबल हरीश को फ़ोन पर यही पता लिखाया गया था।पर यहां तो सभी मकान थे। यहां पर खाना किसने मंगवाया होगा?
यही सोचते हुए हरीश ने उसी नम्बर पर कॉल बैक की।
"अभी दस मिनट पहले इस नम्बर से भोजन के लिए फोन किया गया था।आप जतिन जी बोल रहे हैं क्या? हम मकान न0 112 के सामने खड़े हैं, कहाँ आना है।"
दूसरी तरफ से जबाब आया ,"आप वहीं रुकिए, मैं आ रहा हूं।"
एक मिनट बाद 112 न0 मकान का गेट खुला और करीब पैंसठ वर्षीय सज्जन बाहर आए।
उन्हें देखते ही हरीश गुस्से में बोले,"आप को शर्म नही आई, इस तरह से फोन करके खाना मंगवाते हुए,गरीबों के हक का जब *आप जैसे अमीर* खाएंगे तो गरीब तक खाना कैसे पहुंचेगा।"
मेरा यहां तक आना ही बर्बाद गया।"
साहब ! ये शर्म ही थी जो हमें यहां तक ले आयी।
सर्विस लगते ही शर्म के मारे लोन लेकर घर बनवा लिया।आधे से ज्यादा सेलरी क़िस्त में कटती रही और आधी बच्चों की परवरिश में जाती रही।
अब रिटायरमेंट के बाद कोई पेंशन नही थी तो मकान का एक हिस्सा किराये पर दे दिया।अब लाक डाउन के कारण किराया भी नही मिला।बेटे की सर्विस न लगने के कारण जो फंड मिला था उससे बेटे को व्यवसाय करवा दिया और वो जो भी कमाता गया व्यवसाय बड़ा करने के चक्कर में उसी में लगाता गया और कभी बचत करने के लिए उसने सोचा ही नही। अब 20 दिन से वो भी ठप्प है।पहले साल भर का गेंहू -चावल भर लेते थे पर बहू को वो सब ओल्ड फैशन लगता था तो शर्म के मारे दोनो टँकी कबाड़ी को दे दीं।अब बाजार से दस किलो पैक्ड आटा और पांच किलो चावल ले आते हैं।राशन कार्ड बनवाया था तो बच्चे वहां से शर्म के मारे राशन उठाने नही जाते थे कि कौन लाइन लगाने जाय इसलिए वो भी निरस्त हो गया।जन धन अकाउंट हमने ही बहू का खोलवा दिया था ,पर उसमें एक भी बार न तो जमा हुआ न ही निकासी हुई और खाता बन्द हो गया।इसलिये सरकार से आये हुए पैसे भी नही निकाल सके।मकान होने के कारण शर्म के मारे किसी सामाजिक संस्था से भी मदद नही मांग सकते थे।कल से जब कोई रास्ता नहीं दिखा और सुबह जब पोते को भूख से रोते हुए देखा तो सारी शर्म एक किनारे रख कर 112 डायल कर दिया।इन दीवारों ने हमको अमीर तो बना दिया साहब ! पर अंदर से खोखला कर दिया।मजदूरी कर नहीं सकते थे और आमदनी इतनी कभी हुई नही की बैंक में इतना जोड़ लेते की कुछ दिन बैठकर जीवन व्यतीत कर लेते।आप ही बताओ ! मैं क्या करता।कहते हुए जतिन जी फफक पड़े।
हरीश को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले।वो चुपचाप गाड़ी तक गया और लंच पैकेट निकालने लगा। तभी उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने कल राशन व घर का जो भी सामान मंगवाया था वो कल से घर न जा पाने के कारण डिग्गी में ही पड़ा हुआ है।उसने डिग्गी खोली, सामान निकाला और लंच पैकेट के साथ साथ सारा सामान जतिन के गेट पर रखा और बिना कुछ बोले गाड़ी में आकर बैठ गया।गाड़ी फिर किसी ऐसे ही भाग्यहीन अमीर का घर ढूंढने जा रही थी। ये आज के मध्यम वर्ग की वास्तविक स्थिति है।

घटना सत्य पर नाम न पूछे।

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Govardhan
281502

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