Kalyug Puran

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Kalyug  Puran KALIYUGA PURAN ME AAJ KE SAMAY ME GYAN KO KAISE LIYA JAYE

29/09/2026

🌿 क्या आपका भी कहीं श्राद्ध हो रहा है?

यह प्रश्न चौंकाता है, लेकिन जीवन और रिश्तों पर सोचने का अवसर भी देता है।

श्रीमद्भगवद्गीता कहती है—जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है।

पुनर्जन्म की इस मान्यता पर विचार करें, तो क्या पिछले जन्म के हमारे प्रियजन भी हमें याद करते होंगे? क्या कोई हमारा भी श्राद्ध करता होगा? यह एक चिंतन है, निश्चित दावा नहीं।

🙏 कलियुग पुराण का मेरा संदेश है—पितरों के प्रति कृतज्ञता को सेवा में उतारें।

🍲 किसी भूखे को सम्मान से भोजन कराएँ।
💊 किसी जरूरतमंद की दवा या उपचार में मदद करें।
👕 किसी की कपड़ों की आवश्यकता पूरी करें।
❤️ अकेले बुजुर्ग के पास बैठें, उनकी बात सुनें।
🏡 अपने जीवित माता-पिता और बड़ों की देखभाल करें।

पूरे पितृपक्ष में स्वयं को आशीर्वाद मुद्रा में रखें। केवल हाथों से नहीं, अपने विचारों, शब्दों और व्यवहार से भी सबके कल्याण की कामना करें।

कुछ पल शांत बैठकर पितृ ध्यान करें। अपनों को प्रेम से याद करें और उनके अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में अपनाएँ।

हमारे पितरों की स्मृति किसी के भोजन, उपचार या मुस्कान का कारण बने—यही श्रद्धा की सुंदर मानवीय अभिव्यक्ति है। 🌸

आप अपने पितरों की स्मृति में कौन-सा सेवा कार्य करना चाहेंगे?

— कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’
अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक

#पितृपक्ष #पितृपक्ष2026 #कलियुगपुराण #पितृसेवा #मानवसेवा

**गणेश आरती का मानवीयकरण—जब मनुष्य किसी के जीवन का विघ्नहर्ता बनता है 🙏**गणेश चतुर्थी 2026 पर कुष्ठ सेवा सदन, इंदौर में ...
15/09/2026

**गणेश आरती का मानवीयकरण—जब मनुष्य किसी के जीवन का विघ्नहर्ता बनता है 🙏**

गणेश चतुर्थी 2026 पर कुष्ठ सेवा सदन, इंदौर में लगातार आठवें वर्ष भगवान गणेश की स्थापना की गई।

लगभग 15 वर्षों से कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों की सेवा कर रहीं **सुश्री यामिनी निवासकर** को **“कोढ़न को काया देत—कुष्ठ सेवा सम्मान”** के अंतर्गत **विघ्नहर्ता अवॉर्ड 2026** प्रदान किया गया।

मेरे लिए सच्चा गणपति वही है, जो किसी पीड़ित को सहारा देकर उसके जीवन का विघ्न दूर करे।

**त्योहार तभी सार्थक होते हैं, जब उनकी खुशियाँ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें।**

पूरा ब्लॉग और कार्यक्रम का वीडियो देखें 👇
https://krishnaguruji.com/kushth-seva-sadan-vighnaharta-award-2026/

— **कृष्णा कांत मिश्रा (कृष्णा गुरुजी)**
जीवन आपका, सुझाव मेरा। 🙏

कृष्णा गुरुजी ने गणेश चतुर्थी 2026 पर कुष्ठ सेवा सदन में आठवें वर्ष गणेश स्थापना की और यामिनी निवासकर को “कोढ़न को का....

14/08/2026

🇮🇳 This Independence Day, let patriotism go beyond flags, songs and greetings.

Every year, our hearts fill with pride on 15 August and 26 January. But why should our love for India remain limited to these two days?

Through the five-year-old “Do For Nation = Donation” campaign, Krishna Guruji appeals to Indian citizens and NRIs to contribute any amount they can to the Prime Minister’s National Relief Fund.

The amount may be small, but the national feeling behind it is great. Let us turn patriotism into action and make contribution to the nation a civic tradition.

According to Krishna Guruji’s spiritual interpretation, this noble act also connects the positive symbolism of the Sun, Saturn and Rahu—the government, the people and the digital medium.

👉 Read the complete message:
https://krishnaguruji.com/do-for-nation-donation-independence-day/

Do For Nation = Donation
A small contribution. A great national feeling.

Jai Hind! 🇮🇳

क्या मृत्यु अंत है या एक नई शुरुआत?यदि मृत्यु अंत नहीं है, तो फिर उसके बाद क्या होता है?क्या हम केवल शरीर हैं, या हमारे ...
17/07/2026

क्या मृत्यु अंत है या एक नई शुरुआत?
यदि मृत्यु अंत नहीं है, तो फिर उसके बाद क्या होता है?
क्या हम केवल शरीर हैं, या हमारे भीतर कुछ ऐसा भी है जो कभी नष्ट नहीं होता?
आइए, यजुर्वेद के उपनिषद के माध्यम से इस गहन प्रश्न पर विचार करें।
🕣 प्रतिदिन रात्रि 8:30 बजे (IST)
💻 Zoom Meeting ID: 98260-7-0-286
ज्ञान की इस यात्रा में आपका हार्दिक स्वागत है।

13/03/2025

कलयुग पुराण – संपादकीय

स्वयं के मुख से

मेरा नाम कृष्णा कांत मिश्रा है, लेकिन आध्यात्मिक जगत में लोग मुझे कृष्णा गुरुजी के नाम से जानते हैं।

रामायण की एक चौपाई है:
"संत, बिटप, सरिता, गिरी, धरनी।
पर हित हेतु इनकी करनी।।"

अर्थात् संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और धरती अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए होते हैं। यह एक कटु सत्य है, लेकिन न जाने क्यों आज अधिकांश संत परहित के स्थान पर संस्थागत स्वार्थ में उलझ गए हैं। इसके परिणामस्वरूप, हमारे वैदिक रीति-रिवाजों ने अपना मूल अस्तित्व खो दिया और वे भय व लालच के माध्यम बन गए। इस स्थिति के लिए केवल संत ही नहीं, बल्कि हम सभी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने बिना कारण जाने इन परंपराओं को स्वीकार कर लिया और उन्हें उसी रूप में ढोते चले गए।

समय के साथ सब कुछ बदल गया—युग बदले, सोच बदली, परंतु हमारी परंपराओं को समझने का तरीका नहीं बदला। मैं एक साधारण गृहस्थ व्यक्ति हूँ, दिव्यांग भी हूँ, लेकिन अपनी दिव्यांगता को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।

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कलयुग पुराण क्यों?

इस पुस्तक का उद्देश्य यह है कि आज के युवाओं तक आध्यात्मिक परंपराओं और उत्सवों को तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाए। आज का युवा हर बात को तर्क और लॉजिक के आधार पर परखता है। बिना ठोस कारण के वह किसी भी परंपरा को स्वीकार नहीं करता। इसी कारण कलयुग पुराण में सभी त्योहारों, योग, प्रथाओं और धार्मिक अनुष्ठानों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक में आपको हर प्रश्न का उत्तर मिलेगा—क्यों त्योहार मनाए जाते हैं, उनका तात्त्विक और व्यावहारिक महत्व क्या है, और वे समाज सेवा से कैसे जुड़े हो सकते हैं।

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परंपराएँ और उनकी बदलती प्रासंगिकता

एक पुरानी कथा है:

प्राचीन काल में एक आश्रम में एक गुरुजी रहते थे। उनके आश्रम में एक बिल्ली थी जो गुरुजी के निकट रहती थी। जब भी वे साधना करते, बिल्ली उनके पास आकर बाधा उत्पन्न कर देती। इसलिए, उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि जब तक साधना चले, बिल्ली को पेड़ से बाँध दिया जाए। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा।

कुछ समय बाद गुरुजी का निधन हो गया, और आश्रम में नए गुरुजी आए। उन्होंने शिष्यों से पूछा कि साधना की क्या विधि है? शिष्यों ने कहा कि हमारे पूर्व गुरुजी पहले बिल्ली को बाँधकर ही साधना करते थे, इसलिए यह परंपरा बनी रही।

समय बीतता गया, एक दिन वह बिल्ली मर गई। आश्रम में हड़कंप मच गया—अब साधना कैसे होगी? तत्काल एक नई बिल्ली लाकर उसे पेड़ से बाँध दिया गया, ताकि गुरुजी की साधना बिना बाधा जारी रह सके।

इस कथा का मूल संदेश यह है कि हमने भी अपने समाज में अनेक ऐसी परंपराएँ स्वीकार कर ली हैं, जिनकी आज कोई प्रासंगिकता नहीं है। समय के साथ रीति-रिवाजों का रूप बदला जाना चाहिए, लेकिन हम आज भी पुरानी परंपराओं को कारण जाने बिना निभाते चले आ रहे हैं।
कलयुग का अर्थ
अगर हम अतीत की ओर देखें तो—
सतयुग में देवताओं और असुरों के लोक अलग-अलग थे।
त्रेतायुग में दोनों के देश अलग हुए—श्रीराम भारत में और रावण श्रीलंका में।
द्वापरयुग में देवता और असुर एक ही परिवार में आ गए—अर्जुन और दुर्योधन।
अब कलयुग में क्या हुआ?
भागवत गीता के अनुसार, कलयुग में एक ही व्यक्ति के भीतर देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियाँ दोनों होती हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि कल कौन देवता बन जाएगा और कौन असुर।
आज के समय में बाहरी दिखावे, बनावट और सजावट पर अधिक ध्यान दिया जाता है, लेकिन व्यक्ति के आंतरिक मूल्यों में गिरावट आती जा रही है।
कलयुग पुराण का उद्देश्य
परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
इस पुस्तक का लक्ष्य है—हर आध्यात्मिक उत्सव और त्योहार को समाज सेवा से जोड़ना। जब तक हमारी धार्मिक परंपराएँ समाज के कल्याण से नहीं जुड़ेंगी, वे केवल एक दिखावा बनकर रह जाएँगी।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी परंपराओं को केवल निभाएँ नहीं, बल्कि उन्हें समझें और तर्कसंगत रूप से आत्मसात करें। यही कलयुग पुराण का उद्देश्य है—धर्म और तर्क का संतुलन बनाना।
हर पुरानी मान्यता को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए आपका स्वागत है।.

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