28/08/2026
बच्चे को मोटा देखकर घर में अक्सर एक बात बड़े प्यार से कही जाती है—“बच्चा है, जितना खाएगा उतना बढ़ेगा… अभी तो बढ़ने की उम्र है।” लेकिन क्या हर बार ज्यादा खिलाना सच में प्यार है? या कभी-कभी यही प्यार अनजाने में बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है?
#बच्चोंकीसेहत
सबसे पहले एक बात साफ समझिए—हर गोल-मटोल बच्चा मोटापे का शिकार नहीं होता और हर दुबला दिखने वाला बच्चा स्वस्थ हो, यह भी जरूरी नहीं। बच्चों में वजन का आकलन केवल देखकर नहीं किया जाता। उम्र, लिंग, लंबाई और वजन के आधार पर growth chart/BMI-for-age जैसे मानकों से बच्चे की growth को देखा जाता है। भारत में Indian Academy of Pediatrics (IAP) भी बच्चों की उम्र के अनुसार growth charts और BMI-for-age का इस्तेमाल करने की सलाह देती है।
अब जरा उस प्यार की बात करते हैं जो खाने की प्लेट में दिखाई देता है—“एक रोटी और खा लो”, “दूध पूरा खत्म करो”, “सब्जी नहीं खाई तो मिठाई नहीं मिलेगी”, “बच्चा कमजोर लग रहा है, इसे कुछ भी खिलाओ”… और सबसे खतरनाक लाइन—“मना मत करो, बच्चा है, खाने दो।”
बच्चे की भूख को समझना भी parenting का हिस्सा है। बच्चा हर दिन एक जैसी मात्रा में नहीं खाएगा। कभी ज्यादा भूख लगेगी, कभी कम। लेकिन अगर हम हर बार बच्चे के भूख और पेट के संकेतों को नजरअंदाज करके उसे खाने के लिए मजबूर करते रहें, तो उसकी natural appetite regulation प्रभावित हो सकती है। इसलिए लक्ष्य यह होना चाहिए कि बच्चे को पौष्टिक भोजन मिले, न कि बस ज्यादा भोजन मिले।
और एक बहुत जरूरी तथ्य—बच्चों में मोटापा सिर्फ “ज्यादा खाना” या “कम खेलना” भर नहीं है। WHO इसे एक जटिल समस्या मानता है, जिसमें खान-पान, physical activity, नींद, environment, genetics और सामाजिक परिस्थितियां सभी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए किसी मोटे बच्चे या उसके माता-पिता को दोष देना medically सही approach नहीं है।
लेकिन ज्यादा calorie वाले processed foods, sugary drinks, बार-बार snacks और physical activity की कमी निश्चित रूप से जोखिम बढ़ा सकते हैं। WHO बच्चों के भोजन में फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और अन्य nutrient-rich foods को प्राथमिकता देने तथा ज्यादा sugar और energy-dense foods को सीमित करने की सलाह देता है।
एक और चौंकाने वाली बात—बच्चे का मोटापा केवल आज की समस्या नहीं हो सकता। Childhood obesity आगे चलकर type 2 diabetes, high blood pressure, abnormal cholesterol, fatty liver disease, sleep apnea और हड्डियों-जोड़ों की समस्याओं जैसे स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है। साथ ही बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और quality of life पर भी असर पड़ सकता है।
लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि बच्चे को diet पर डाल दें, खाना बंद करा दें या बार-बार उसका वजन तौलकर उसे “मोटा” कहें। बच्चे को शर्मिंदा करना इलाज नहीं है। American Academy of Pediatrics स्वस्थ वजन के लिए पूरे परिवार को साथ लेकर lifestyle और behavior में बदलाव करने पर जोर देती है, सिर्फ वजन कम करने पर नहीं।
तो माता-पिता क्या करें?
बच्चे की प्लेट में variety रखें—दाल, सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दूध/दही और उम्र के अनुसार protein-rich foods। मीठे पेय और अत्यधिक processed snacks को रोजमर्रा की आदत न बनने दें। बच्चे को रोज सक्रिय खेल और physical activity का मौका दें। पर्याप्त नींद भी उतनी ही जरूरी है। WHO बच्चों और किशोरों में नियमित physical activity और healthy sleep habits को obesity prevention का हिस्सा मानता है।
और सबसे जरूरी—बच्चे को खिलाइए जरूर, लेकिन हर बार “ज्यादा” नहीं; सही भोजन, सही मात्रा और सही आदतें दीजिए।
क्योंकि असली प्यार यह नहीं कि बच्चा हर बार प्लेट साफ करे…
असली प्यार यह है कि हम उसे ऐसी खाने-पीने और जीवनशैली की आदतें दें, जिन्हें वह स्वस्थ रहते हुए पूरी जिंदगी अपने साथ लेकर चले। ❤️
अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे का वजन उम्र और लंबाई के हिसाब से ज्यादा बढ़ रहा है, तो केवल देखकर फैसला न करें। Pediatrician से growth chart/BMI-for-age का सही assessment करवाएं।
- डॉ सुमन कुमार झा एमबीबीएस डीएनबी 🩺
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