Trance Meditation Junnar

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20/05/2020

*भोजनातील हानिकारक संयोग*
म्हणजेच *विरुद्ध आहार*

बऱ्याच आजारांचे कारण कळत नाही. पण विरुद्ध आहार हे एक कारण असू शकते. *यामुळे प्रामुख्याने पोटाचे विकार, त्वचेचे विकार व अन्य विकार होत असतात* त्यामुळे विरुद्ध आहार जाणून घेणे फार महत्वाचे आहे.

तांबे, पीतळ, किंवा काश्याच्या भांड्यात ठेवलेल्या वस्तु उदा. तूप, तेल, ताक, लोणी, रसदार, भाज्या, इत्यादि विषाक्त होतात.

दुधा सोबत : दही, मीठ, आंबट वस्तु, चिंच, डांगर, मुळा, मुळ्यांची पाने, दोडका, बेल, आंबट फळे, सातु हानिकारक असतात. दुधात गूळ टाकून सेवन करू नये. फणस किंवा तळलेले पदार्थ पण दुधासोबत हानिकारक आहेत. दूध शक्यतो रात्री प्यावे. जेवणानंतर लगेच दूध पिऊ नये, साधारण दोन तासांनी प्यावे व दूध पिल्यानंतर साधारण एक तासाने झोपावे.

दह्या सोबत : खीर, दुध, पनीर, गरम जेवण, केळी, डांगर (खरबूज), मूळा इत्यादि घेऊ नये.

तुपा सोबत : थंड दुध, थंड पाणी तसेच समप्रमाणात मध हानिकारक असते. म्हणूनच पंचामृतात तूप व मध विभिन्न प्रमाणात असतो.

मधा सोबत : मूळ, खरबूज, समप्रमाणात तूप, द्राक्षे, पावसाचे पाणी व गरम पाणी हानिकारक असतात.

फणसा नंतर : पान खाणे हानिकारक असते.

मुळ्या सोबत : गुळ खाणे नुकसानदायक असते.

खीरी सोबत : खिचडी, आंबट पदार्थ, फणस व सातु घेऊ नये.

गरम पाण्याबरोबर : मध घेऊ नये तसेच मध गरमही करु नये.

थंड पाण्याबरोबर : शेंगदाणे, तूप, तेल, खरबूज, पेरु, जांभळे, काकडी, गरम दुध किंवा गरम भोजन घेऊ नये.

कलिंगडा बरोबर : पुदीना किंवा थंड पाणी घेऊ नये.

चहा सोबत : काकडी, थंड फळे किंवा थंड पाणी घेऊ नये.

माशा सोबत : दुध, उसाचा रस, मध, पाण्याच्या काठावर राहणाऱ्या पक्ष्यांचे मांस खाऊ नये.

मांस बरोबर : मध किंवा पनीर घेतल्याने पोट खराब होते.

गरम जेवणा बरोबर : थंड जेवण, थंड पेय हानिकारक असतात. तसेच जेवणानंतर आईस्क्रीम खाणेही विरुद्ध आहार आहे.

खरबुजा बरोबर : लसूण, मुळा, मुळ्यांची पाने, दुध किंवा दही नुकसानकारक असते.

तांबे, पीतळ, किंवा काश्याच्या भांड्यात ठेवलेल्या वस्तु उदा. तूप, तेल, ताक, लोणी, रसदार, भाज्या, इत्यादि विषाक्त होतात. अशा भांड्यात बराच वेळ ठेवलेला पदार्थ खाऊ नयेत. अ‍ॅल्यूमिनियम आणि प्लस्टिकच्या भांड्यात पातळ पदार्थ ठेवल्याने, उकळल्याने किंवा खाल्याने अनेक प्रकारचे रोग होऊ शकतात.

11/12/2019

किचन (भाग 11)): जेवतानाची दिशा -मास्टर संजय पाटील

जेवण करताना पूर्वेला तोंड असणं चांगलं असलं तरी अन्य दिशांत तोंड करून जेवलं तरी चालतं असं मनुस्मृती म्हणते. मात्र लहान मुलं व विद्यााथ्र्यांची तोंडं पूर्वेला राहतील असं पाहावं.

मनुस्मृतीच्या अनुशासनपर्वात म्हटलंय...
आयुष्यं पाडमुखो भुङक्ते यशस्यं दक्षिणामुख:
श्रियं प्रत्यङमुखो भुङक्ते ऋतं भुङक्ते ह्याुदङ्मुख:
अर्थात... नित्याच्या भोजनक्रियेत पूर्वेकडे मुख करून भोजन केल्यास आयुष्य, दक्षिणेकडे मुख करून भोजन केल्यास यश, पश्चिमेकडे लक्ष्मी व उत्तरेकडे सत्य यांची प्राप्ती होते.

मनुस्मृती हा मला प्रचंड आवडणारा ग्रंथ असल्यानं ऋषी मनु काय म्हणतात ते पहिल्यांदा नमूद केलं. मात्र बºयाच ग्रंथांमध्ये मनुस्मृतीपेक्षा वेगळी मतं आढळतात. या ग्रंथांनी पश्चिम व दक्षिणेला मुख करून भोजन करणं निषिध्द सांगितलंय.

विष्णुपुराण, वसिष्ठस्मृती, वामनपुराण, स्कन्दपुराण, महाभारत, पद्मापुराण यांनी दक्षिणेकडे मुख करून भोजन करण्यास निषिध्द सांंगितलंय.
प्राङमुखोदङ्मुखो वापि
(विष्णुपुराण )
प्राङमुखन्नानि भञ्जाीत
(वसिष्ठस्मृती )
अर्थात ... भोजन करताना मुख पूर्वेला असावं.

भुञ्जाीत नैवेह च दक्षिणामुखो
न च प्रतीच्यामभिभोजनीयम
तद् वै रक्षांसि भुञ्जाते
(पाराशरस्मृती , वामनपुराण्)
अर्थात... दक्षिण व पश्चिमेला मुख करून भोजन करू नये. असं केल्यास अन्नात राक्षसी प्रभाव येतो.

प्राच्यां नरो लभेदायुर्याम्यां प्रेतत्वमश्रुते
वारुणे च भवेद्रोगी आयुर्वित्तं तथोत्तरे
(पद्मापुराण )
अर्थात...पूर्वेकडे मुख करून भोजन केल्यास आयुष्य वाढतं, दक्षिणेकडे मुख करून भोजन केल्यास ते प्रेतांना मिळतं, पश्चिमेकडे मुख करून भोजन केल्यास आजारपण तर उत्तरेकडे मुख करून भोजन केल्यास आयु व धन यांची प्राप्ती होते.

जेवताना डोक्यावर आच्छादन (टोपी, फेटा) ठेवणं, पायात चपला घालून जेवणं, पाय न धुता जेवायला बसणं यो गोष्टीही वास्तुप्रथेनं निषिध्द मानल्यायत.
अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ््क्ते दक्षिणमुखङ्म
यो वेष्टितशिरा भुङ््क्ते प्रेता भुञ्जान्ति नित्यशङ्म
(स्कन्दपुराण )
अर्थात...जो पाय न धुता जेवतो, जो दक्षिणेला मुख करून जेवतो जो डोकं आच्छादून जेवतो त्याचं अन्न प्रेतांना प्राप्त होतं.

यद् वेष्टितशिरा भुङ््कते यद् भुङ््क्ते दक्षिणामुखङ्म
सोपानत्कश्च यद्् भुङ््क्ते सर्वं विद्याात तदासुरम
(महाभारत अनुशासन पर्व )
अर्थात...जो डोकं आच्छादून जेवतो, जो पायात चपला घालून जेवतो, जो दक्षिणेकडे तोंड करून जेवतो त्याचं जेवण राक्षसी भोजन समजावं.

मनुस्मृतीनुसार नित्य भोजनक्रियेत दक्षिणेला मुख केलेलं चालत असलं तरी श्राद्धविधीत मात्र दक्षिणेकडे मुख न करण्याचा नियम आहे.
यद्वेष्टितशिरा भुङक्ते यभ्दुङक्ते दक्षिणामुख
सोपानत्कश्च यदभुङक्ते तद्वै राक्षसि भुञ्चाते
(मनुस्मृती )
अर्थात... श्राध्दविधीत मस्तक आच्छादून, दक्षिणेकडे मुख करून, पादत्राण घालून भोजन केलं असता अन्नाची प्राप्ती पितरांना न होता राक्षसांना होेते.

अनायुष्यं त्वैवंमुखस्य भोजनं मातुरित्युयदिशान्त
(आपस्तंब धर्मसूत्र )
अर्थात... श्राद्धविधीच्या वेळी यजमानानं जेवताना दक्षिणेकडे मुख केल्यास आईचं आयुष्य कमी होतं. (मात्र जेवणाºयाची आई जिवंत असल्यास दक्षिणेकडे मुख करून जेवण्यास हरकत नाही, असाही उल्लेख विष्णु धर्मसूत्र व आपस्तंब धर्मसूत्रात आढळतो.)

जेवताना गप्पा मारू नयेत. टीव्ही तर मुळीच पाहू नये. वास्तुशांती झालेली असो वा नसो. जेवणापूर्वी एक घास वास्तुपुरुषासाठी नैवेद्या म्हणून ठेवावा. त्यानंतर अग्नीत अन्नाचा बळी द्याावा. (गॅसच्या ज्योतीवर किंचित अन्न घालावं.) त्यावेळी
'प्राणाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा, प्रपानाय स्वाहा'
या मंत्राचा स्पष्ट उच्चार करावा. हे झाल्यानंतरच जेवायला बसावं.

क्या बोले इस सिद्धासन पर:-जैसा कि इसके बारे में बताया गया है कि यह कैसे किया जाता है...."आसन पर बैठकर पैर खुले छोड़ दें।...
27/10/2019

क्या बोले इस सिद्धासन पर:-

जैसा कि इसके बारे में बताया गया है कि यह कैसे किया जाता है....
"आसन पर बैठकर पैर खुले छोड़ दें। अब बाँयें पैर की ऐड़ी को गुदा और जनेन्द्रिय के बीच रखें। दाएँ पैर की ऐड़ी को जनेन्द्रिय पर इस प्रकार रखें कि जनेन्द्रिय और अण्डकोष के ऊपर दबाव ना पड़े। दोनों पैरों के तलवें जंघा के मध्य भाग में ही रहे। हथेली ऊपर की ओर रहे इस प्रकार दोनों हाथ एक दूसरे के ऊपर गोद में रखें।
अथवा दोनों हाथों को दोनों घुटने के ऊपर ज्ञान मुद्रा में रखें।"
सिद्धासन के बारे में इससे अधिक कोई भी नही जानता है। गुरु शिष्य परंपरा में इस आसन का बहुत ही बड़ा महत्व है। और जैसा कि साक्षात महादेव ने भी उपदेशित किया है कि योगी को इस आसन को गुप्त रखना चाहिए। अगर महादेव जहाँ एक तरफ बता भी रहे हैं समझाने के दृष्टिकोण से वही दूसरी ओर वह गुरु शिष्य परंपरा की मर्यादा का ताला भी लगा रहे हैं मतलब साफ़ और स्पष्ट है कि यह सिर्फ सारांश ही है विस्तृत व्याख्या नहीं है कुछ ऐसा हैं जो जानबूझकर कर उपदेशित कर नहीं लिखा गया है।

सबसे पहली बात यह है कि गुदा और जनेन्द्रिय के बीच में बाँयें पाँव की ऐड़ी को ही लगाने के लिए महादेव ने उपदेशित किया है आखिर बाँयें अंग का क्या महत्त्व है और इसी का प्रयोग ही क्यों किया जाता है।
दूसरी सबसे अहम् बात यह है कि बैठने के इसी पैटर्न को सिद्धासन क्यों क्या गया है। मतलब साफ़ है कि यह सिद्ध+आसन है यानी कुछ ना कुछ इसकी व्याख्या में छोड़ा गया है जो इसे सिद्ध होने से रोक रहा है।
तीसरी सबसे अहम् बात यह है कि इसे सिद्धासन ही क्यों कहा गया है क्योंकि यह सिद्धों का आसन है तो आखिर सिद्ध करते तो करते क्या हैं यह कोई भी इंसान आज तक नहीं जान पाया है।
आखिर इस रूप में ही अभ्यास को सिद्धासन क्यों गया है तो यह तो एक निश्चित पैटर्न में बैठने की अवस्था हो गई है तो अभ्यास किस चीज का किया जाता है।

"संविदं लभतेअभ्यात् योगोअभ्यात्प्रवर्त्ते।
मुद्राणां सिद्धिरभ्यासात् अभ्यासाद् वायुसाधनम्।।
कालवञ्चनमभ्यासात्तथा मृत्युञ्जयो भवेत्।
वाक् सिद्धिः कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः।।"
अर्थात:-
अभ्यास से ज्ञान की प्राप्ति होती है, अभ्यास से योग सिद्ध होता है, अभ्यास से मुद्राओं की सिद्धि होती है, अभ्यास से ही प्राणायाम सिद्ध होता है(अभ्यासात् वायुसाधनम्), अभ्यास से काल को जीत सकते हैं (अभ्यासात् कालवञ्चनम्), अभ्यास से मृत्यु को जीता जाता है (अभ्यासात् मृत्युञ्जयः भवेत्), वाणी की सिद्धि और इच्छानुसार जल थल नभ में विचरण की शक्ति सभी अभ्यास से सिद्ध होती है (वाक् सिद्धि कामचारित्वम्)।।
मुझे संस्कृत भाषा का तो कोई ज्ञान नहीं है मगर अपनी बात को विस्तार देने के लिए गुरु कृपा से प्राप्त यह श्लोक जो पोस्ट लिखते समय अचानक मेरे सामने आ गया था।
अष्टांग योग के जितने भी योग साधक है उन्हें सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान के अलावा कोई भी ज्ञान नहीं है। क्योंकि योग जिसे योगा कहा है जो हकीकत में यह योग नहीं योगा है जो शारीरिक कसरत के अलावा कुछ भी नही है। क्योंकि यह गुरु शिष्य परंपरा का गूढ़ ज्ञान है जो जिस किसी को भी मिलता है सालों साल के बाद ही मिलता है।
यह रहस्य सालों साल बाद मिलने के पीछे जो कारण महादेव ने उपदेशित किया है वह है.....

"सिद्धासनम् परं गोप्या न देया यस्या कस्याचित्।
सर्वथा नैव दातव्यामं प्राणैः कण्ठगातैरपि।।"
अर्थात:-
सिद्धासन अत्यन्त गोपनीय है (सिद्धासनम् परं गोप्या), जिस किसी को भी इसका उपदेश नहीं करना चाहिए(कस्याचित् नैव दातव्या), प्राण संकट उपस्थित पर भी (प्राणैः कण्ठगतैः अपि), बिल्कुल भी नही देना चाहिए (सर्वथा नैव दातव्या)।

सिद्धासन का अभ्यास शब्द का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। सिद्धासन के पैटर्न में बैठना एक सामान्य सी बात है कि आपको आसन लगाना है तो निश्चित बैठना पड़ेगा और प्रत्येक बैठने के तरीके को एक नए नाम से संबोधित किया गया है। मगर सबसे उलझा हुआ शब्द अभ्यास ही है। आखिर यह शब्द कहना क्या चाहता है और क्या करने के लिए अभ्यास शब्द का संकेत रूप में प्रयोग कर रहा है। क्योंकि अभ्यास शब्द का प्रयोग चेतना की लेजर के रूप में किया जाता है। वो भी साऊंड की एक वेव बनाकर जैसा कि सभी लोग भलीभाँति रूप से जानते हैं कि अगर कहीं परमाणु बम का धमाका कर दिया जाए तो नुकसान धमाके से अधिक उस धमाके से निकलने वाली वेव से पैदा होगा। ठीक यही सिद्धांत सिद्धासन पर लागू होता है मगर जिस प्रकार परमाणु ऊर्जा को विध्वंसकारी बनाने के लिए एक नियत टेक्निक यूज होती है ठीक उसी प्रकार से सिद्धासन को सिद्ध करने के लिए भी चेतना शक्ति को साऊंड की वेव बनाकर एक निश्चित पैटर्न में यूज किया जाता है।
यह रहस्य सालों साल आसन लगाकर बैठने का नहीं है। यह गुरु कृपा हो तो एक क्षण में ही हर रहस्य पर पर्दा उठ जाता है। क्योंकि गुरु ही इसे विस्तार से क्लीयर कर सकता है।
क्योंकि यह योगियों का विषय है योग मतलब जोड़ करने वाले लोगों का विषय है। सिद्धासन में बैठने को सिद्धासन या फिर सिद्धासन का अभ्यास नही कहा जाता है। अगर यह योग का विषय है तो निश्चित केवल इस मुद्रा में लगातार बैठने को योग नहीं कहा जा सकता है नीयत ही इसमें कुछ ना कुछ शामिल किया जाएगा जिससे कि यह योग के रूप में कन्वर्ट हो सके।
आप सिद्धासन में बैठे तो अपने आप में यह एक स्वतंत्र संख्या है मगर एक अपने आप में कभी योग नहीं हो सकता है। क्योंकि योग होने के लिए उसके पास दूसरी संख्या का होना बहुत ही ज्यादा जरूरी है और यही दूसरी संख्या महादेव ने उपदेशित करते हुए छिपा दी थी।
सिद्धासन का अभ्यास शब्द में एक के बाद एक का योग किया जाता है जिसे अभ्यास शब्द कहकर बुरी तरह से उलझा दिया है।
आप सिद्धासन में एक दो तीन कितने ही साल बैठे रहिए शुरुआत में आपकी बैठने की अवस्था कम होगी मगर धीरे धीरे यह बढ़ती जाएगी। मगर आप अभ्यास किस चीज का कर रहे हैं जो सिद्धासन को सिद्ध कर सके यह बात आपको सालों साल बाद भी समझ में नहीं आएगा क्योंकि लगातार बैठने से आपके बैठने के समय में वृद्धि हुई है मगर सिद्ध क्या हुआ यह यक्ष प्रश्न सदैव ही आपके सामने मुँह खोले खड़ा रहेगा जिसका सिवाय कुछ वाइब्रेशन झनझनाहट या प्रकाश दिखाई देने अलावा कोई भी जवाब नहीं होगा आप और मैं स्वयं को तो संतुष्ट कर सकते हैं मगर यह प्रश्न अनुभूति के जवाब से शांत होने वाला नहीं है कि यह आखिर सिद्धासन से सिद्ध क्या हुआ है।
आदेश आदेश आदेश आदेश

08/10/2019

ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन क्या है?
आप अक्सर "दुनिया भर में लाखों लोग इसका अभ्यास करते हैं" जैसे बयान सुनते हैं। और इसके लाभ पर "सैकड़ों वैज्ञानिक शोध अध्ययन" हैं। लेकिन ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन (TM) तकनीक क्या है?

दाविद लिंच ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन
यह क्या कर रहे हैं? जुड़वां चोटियों के दूरदर्शी निर्देशक डेविड लिंच 45 से अधिक वर्षों से दिन में दो बार टीएम का अभ्यास कर रहे हैं। लिंच ध्यान के बारे में क्या कहता है, इस पर और पढ़ें , या उन 101 हस्तियों की सूची देखें जो टीएम दैनिक करते हैं।

यहाँ संक्षेप में टीएम का सार है।

टीएम तकनीक
संक्षिप्त रूप में - और जो नाम स्वयं सुझा सकता है, उसके विपरीत - ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन तकनीक एक बहुत ही सरल, प्राकृतिक और सरल तरीका है जिससे आप अपने दिमाग को शांत और समझदार अवस्था में रख सकते हैं। सर्वोत्तम प्रभाव दिन में दो बार बीस मिनट के नियमित अभ्यास के साथ उत्पन्न होते हैं।

हम एक सेकंड में "शांत" और "बुद्धिमान" भाग में वापस आएंगे।

लेकिन पहले मंत्रों का मुद्दा।

मंत्र, एक ध्वनि जो उद्धार करती है
यद्यपि टीएम इस अर्थ में मंत्र-आधारित ध्यान नहीं है कि इसका मुख्य मूल और दिशा पारगमन की ओर उन्मुख है, इसमें मंत्रों का उपयोग शामिल है।

भारत के महान शिक्षक महर्षि महेश योगी ने टीएम तकनीक को व्यापक दुनिया के सामने पेश किया, उन्होंने कहा: “मंत्र एक विशिष्ट विचार है जो हमें सूट करता है, हमारे लिए एक उपयुक्त ध्वनि है जो हमें ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन के प्रशिक्षित शिक्षक से प्राप्त होती है।

टीएम के ट्रान्सेंडैंटल ध्यान तकनीक लाभ क्या है
महर्षि महेश योगी (1917-2008), भारतीय ऋषि।

इस मंत्र का उपयोग करने से, चिकित्सक उस ध्वनि के विचार का अनुभव करता है और उस विचार के महीन अवस्थाओं का अनुभव करने के लिए उस विचार को कम करना शुरू कर देता है - जब तक कि विचार का स्रोत थाह न लिया जाए और चेतन मन अस्तित्व के क्षेत्र में पहुँच जाता है। ”

योग्य शिक्षक
जैसा कि आप देख सकते हैं, हालांकि तकनीक ने खुद को आनंद लेना और अभ्यास करना आसान बना लिया है क्योंकि आपने इसे सीखा है, यह हजारों साल पुरानी परंपराओं के आधार पर काफी बारीक-बारीक सामान है।

यह मुख्य कारण है कि यह इसे बजाने के लिए समझ में आता है और इसे एक योग्य टीएम शिक्षक (यहां महाद्वीप और देश द्वारा शिक्षण केंद्रों के लिए संपर्क जानकारी की सूची) से सीखना है। यह सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका है कि आपको अपने पैसे का मूल्य मिले।

टीएम सीखने में कितना खर्च होता है?
टीएम सीखने का शुल्क देशों में भिन्न होता है, लेकिन यह आमतौर पर 4-दिवसीय पाठ्यक्रम के अनुसार सैकड़ों डॉलर तक पहुंच जाता है। उदाहरण के लिए, यूएस में आप लगभग 1,000 USD के लिए पाठ्यक्रम ले सकते हैं - छात्रवृत्ति और भुगतान के कई विकल्प उपलब्ध हैं।

अभी भी महँगा लगता है, पहली नज़र में?

ट्रान्सेंडैंटल ध्यान संगठन tm तकनीक
गुणवत्ता की गारंटी: टीएम संगठन का आधिकारिक लोगो।

हालांकि, भले ही यह इसकी मामूली लागत के संदर्भ में महंगा हो (यानी, इस राशि के लिए आप कितने आइस क्रीम खरीद सकते हैं, या आप अपने पिलेट्स स्टूडियो में कितनी कक्षाएं ले सकते हैं), यह शायद isn है 'गणना जो सबसे अधिक मायने रखती है।

दिन के अंत में, यह आपके सौदे के लायक है जो मायने रखता है: यह आपके पैसे के लिए आपको जो मिलता है उसके बारे में है। एक दाने के लिए एक नए फेरारी ब्रांड को खरीदना इतना बुरा सौदा नहीं होगा, है ना?

और इस संदर्भ में, TM अच्छी तरह से सबसे उपयोगी निवेश हो सकता है जिसे आप संभवतः अपने जीवन में बना सकते हैं। यहाँ पर क्यों।

क्या कर रही है टीएम आपको
norman rosenthal पारगमन ध्यान पुस्तक की समीक्षा
"यह अक्सर मेरे साथ हुआ है कि अगर ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन को एक कैप्सूल में रखा जा सकता है और दवा की तरह विपणन किया जा सकता है, तो यह एक बिलियन डॉलर ब्लॉकबस्टर होगा।" - डॉ। नॉर्मन ई। रोसेन्थल , पुरस्कार विजेता मनोचिकित्सक (जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी)

जैसा कि पहले कहा गया है, टीएम नियमित रूप से करने से आपका मन-शरीर तंत्र स्वाभाविक रूप से शांत और बुद्धिमान हो जाएगा।

यह इसे CALM बना देगा क्योंकि इसमें आपके तंत्रिका तंत्र को गहन विश्राम की स्थिति में बसने का एक सुविचारित प्रभाव होता है। यह स्वचालित रूप से आपके तनाव के स्तर पर पायदान को नीचे कर देगा ।

और जैसा कि आप अपनी त्वचा में आसानी से अधिक से अधिक महसूस करना शुरू करते हैं, और उन सभी असंख्य परियोजनाओं और जीवन की छोटी समस्याओं के बारे में झल्लाहट को रोकना शुरू करते हैं, बाकी सब कुछ भी जगह में क्लिक करने के लिए जाता है। इसलिए टीएम आपके रक्तचाप, प्रतिरक्षा प्रणाली, खाने की आदतों, रात की अच्छी नींद आदि पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाला साबित होता है ।

अशुद्ध वनस्पति का एक अच्छा, स्वस्थ राज्य? नहीं। आपको शांत करते हुए, TM अभ्यास आपको WISE और EFFICIENT भी करेगा।

जैसा कि हमारे दैनिक न्यूरोसिस की धूल बसती है, हमारा मन स्वाभाविक रूप से अधिक खुला, स्पष्ट और व्यावहारिक होगा। टीएम के साथ, कलाकार अधिक रचनात्मक हो जाएंगे, छात्र अधिक सक्षम और समझदार होंगे, व्यापारी बेहतर निर्णय लेंगे और खिलाड़ी अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचेंगे। आप इस तरह के सैकड़ों प्रशंसापत्र और कहानियों के माध्यम से जा सकते हैं ।

हालाँकि इस प्रक्रिया के बारे में कुछ भी रहस्यमय, धार्मिक या जादुई नहीं है; हमारे दिमाग की बुद्धि बस मौका मिलने पर खुद को प्रकट करना शुरू कर देती है।

टीएम अन्य ध्यान तकनीकों से कैसे अलग है?
भारोत्तोलन, टेनिस और बॉलरूम नृत्य के रूप में विशिष्ट मांसपेशियों को मजबूत करता है और शरीर में विभिन्न समग्र प्रभाव उत्पन्न करता है, इसलिए एक मोमबत्ती की रोशनी पर ध्यान केंद्रित करें, मंत्र दोहराएं या किसी की मानसिक सामग्री के परिणाम को अलग-अलग परिणामों के अनुसार देखने की कोशिश करें।

क्या है टीएम ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन तकनीक मंत्र यह कैसे करना है
ध्यान और मस्तिष्क: ध्यान अभ्यास के प्रभावों पर सबसे अच्छा, सबसे खुलासा शोध में से कुछ में न्यूरोफिज़ियोलॉजिकल मस्तिष्क इमेजिंग के विभिन्न तरीकों को शामिल किया गया है। फोटो: इलिनोइस विश्वविद्यालय

शोध के अनुसार, ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन का अभ्यास कई अर्थों में अद्वितीय है।

एक के लिए, टीएम पूरे मस्तिष्क को चालू करता है और इसे एक समग्र इकाई के रूप में कार्य करता है। यह उन लोगों की एक सामान्य विशेषता है जो व्यवसाय, कला या खेल में चरम प्रदर्शन की रिपोर्ट करते हैं।

टीएम तकनीक की एक और ख़ासियत यह है कि विशेषज्ञों और शुरुआती लोगों के दिमाग के बीच कोई अंतर नहीं है - एक इसे जल्दी से पूरा करता है। वास्तव में, अभ्यास के सकारात्मक प्रभाव आमतौर पर पहले ही टीएम सत्र से पहले से ही स्पष्ट हैं।

टीएम के लिए सबसे अच्छा वीडियो परिचय
यदि आप एक श्रव्य शिक्षार्थी हैं, तो आपको यह परिचयात्मक वीडियो बेहद उपयोगी लग सकता है।

ट्रान्सेंडैंटल ध्यान तकनीक - एक पूर्ण परिचय
ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन तकनीक - एक संपूर्ण परिचय
यह बॉब रोथ द्वारा दर्ज किया गया है, जो चारों ओर के सबसे योग्य टीएम शिक्षकों में से एक है - और 20 मिनट के वीडियो में टीएम के दौरान होने वाले सभी महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है, हम कैसे जानते हैं कि यह वास्तव में काम करता है या नहीं, मस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। , आदि।

आगे पढ़ने के लिए
जैसा कि पुरानी पुरानी चीनी कहावत है, चित्र अक्सर हजारों शब्दों के लायक होते हैं। तो यहाँ दस तस्वीरों से बना एक पोस्ट है जो इस पृष्ठ पर बुनने की कोशिश की गई कहानी को सबसे अच्छी तरह से प्रस्तुत करता है। एक नज़र डालें और अपने आप को देखें!
ध्यान के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान एक सतत प्रक्रिया है। यह पृष्ठ आपको सभी सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन और अत्याधुनिक परिणाम देगा । स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से जैसे कि व्यसन, हृदय रोग और मल्टीपल स्केलेरोसिस से लेकर विभिन्न कौशल और अनुभव (क्या आपका आईक्यू बढ़ाता है? कैसे "पारलौकिक अनुभव" और "चेतना की उच्च अवस्था" मापा जा सकता है?)
उन लाखों TM चिकित्सकों में से कौन लोग हैं जिन्हें आप पहले से जानते हैं? शायद व्यक्तिगत रूप से नहीं, लेकिन उन्हें स्क्रीन पर या मंच पर देखा, या दावोस में वार्षिक विश्व आर्थिक मंच में फैंसी सूट में चारों ओर घूमते हुए? टी सेलेब्रिटीज़ की लगातार अपडेट की गई सूची , ए से ज़ेड तक ।
टीएम के बारे में दस सबसे उपयोगी पुस्तकों का एक चुना हुआ चयन । वैज्ञानिक अनुसंधान से लेकर प्रथम हाथ के खातों तक, बुनियादी परिचय से लेकर सड़क पर अधिक उन्नत स्तरों की ओर इशारा करते हैं।
कुछ उपयोगी वेबसाइट
टीएम संगठन का आधिकारिक होम पेज
YouTube पर ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन चैनल
डेविड लिंच फाउंडेशन : भीतरी शहर के स्कूलों, युद्ध के दिग्गजों, एचआईवी / एड्स समुदाय में आदि लोगों के लिए टीएम सीखने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करता है
महिलाओं के लिए TM (ध्यान दें कि तकनीक अपने आप में बिल्कुल एक जैसी है; वेबसाइट सिर्फ और सिर्फ महिला चिकित्सकों के लिए ही जानकारी देती है)
फेसबुक पर नवीनतम टीएम से संबंधित समाचार और कहानियां

30/09/2019

वास्तुपुरुष कथा आणि अन्नदान -

प्राचीन काळी भार्गव ऋषींनी यज्ञ करून 'अंधकासुर' नावाचा महापराक्रमी कूर राक्षस निर्माण केला होता. त्याच्या पीडे पासून प्रजा, देवता यांची सुटका करण्याकरिता शंकराने अक्राळविक्राळ रूप धारण करून अंधकासुराशी युद्धात शर्थीचे प्रयत्न केले. या तुंबळ युद्धात अंधकासुराचा वध झाला. युद्धातील अथक परिश्रमानंतर भगवान शंकराच्या भाल प्रदेशातून ओघळलेल्या घामाच्या थेबातील एक थेब पृथ्वीतलावर पडला. यातुन एका अदभूत , अतिक्रूर, करालमुख पुरुषाचा जन्म झाला. तो जन्मत भुकेने व्याकूळ झाला होता. प्रथम त्या अंधकारसुराचे रक्त प्राशन केले. असे करूनही त्याची भूक शमली नाही. त्याने शिवशंकराला प्रसन्न करून घेतले. आपल्या भुकेच्या शमनार्थ तो त्रिलोक पृथ्वी, आकाश, पाताळ गिळंकृत करण्याचा वर मागितला. घोर तपाने भगवान शंकर प्रसन्न झाले व तथास्तु म्हणाले. आपल्या चरणी लीन झालेल्या या व्याकूळ पुरुषाला मग भगवंतानी तुला त्रैलोक्यभक्षणाचा वर प्राप्त होईल असे म्हणून तथास्तु केले वराच्या प्राप्तीनंतर या पुरुषाने दिसेल त्या प्राण्याला, ऋषिमुनींना खाण्यास सुरुवात केली. यामुळे त्रित्रभुवनातील देवदानव भयभीत झाले व या देव-दानवांनी एकत्र येऊन चर्चा करून व आपली सर्व शक्ती एकवटून शंकराची कृपाछाया लाभलेल्या या अद्भुत करालपुरुषाला पालथे पाडले व त्याच्या सर्वागावर स्वार होऊन त्यास जखडून ठेवले शेवटी या करालपुरुषाने ब्रह्मदेवाकडे शरणागती पत्करली. यावेळी असे ठरले की, या पृथ्वीतलावरील सर्व लोक भोजनग्रहण करताना एक ग्रास वैश्वदेवाचा म्हणून या पुरुषाला नित्य अर्पण करतील. त्याचप्रमाणे नवीन वास्तू बांधल्यानतर त्यानिमित्त जे भोजन तयार होईल तेही या पुरुषास नैमित्तिक नैवेद्य म्हणून समर्पित करावे. मला देण्यात येणाऱ्या नैवेद्याच्या बदल्यात वास्तूमध्ये घडणा-प्रत्येक घटनेला मी तथास्तु म्हणेन.

वरील कथेचा मतितार्थ पाहता कोणत्याही प्रकारच्या वास्तु दोषावर नित्य अन्नदान हा एक प्रभावी उपाय आहे.

दान हे दातृत्वशक्ती किंवा आर्थिक स्थितीवर अवलंबून नसते तर,अर्थिक मोहावर,व आसक्तीवर अवलंबून असते. दान हे सत्पात्री व गरज असणाऱ्यांना व्यक्तिंना दिलेपाहिजे.(संस्कृत-वृथा दानम् समर्थस्य)

ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते |

द्वापरे यज्ञमेवाहु: दानमेव कलौ युगे || कूर्म पुराण २७.१७

कृतयुगात ध्यान, त्रेतायुगात ज्ञान, द्वापरयुगात यज्ञ आणि कलियुगात दान ही सर्वश्रेष्ठ साधने आहेत.

कोणत्याही प्रकारचे दान देताना ते सत्पात्री आहे कि नाही हे ठरविताना सध्याच्या काळात अनेक प्रकारे संभ्रम उत्त्पन्न होउ शकतो. परंतु श्री साईच्या उपदेशप्रमाणेअन्नदानात मात्र असा संभ्रम राहत नाही. चराचर सृष्टीत सर्व प्राणिमात्रांना भूक लागणे हा सामान्य गुण आहे, आणि भूक लागलेल्या कोणत्याही प्राण्याला अन्न खाउघालणे ह्यात फारसा विचार करावा लागत नाही

अन्नदानाचे महत्व - अन्नदानासारखे श्रेष्ठ दुसरे दान नाही

· अन्नदान करणाऱ्याच्या २१ पिढ्यांचा उद्धार होतो, तिन्ही लोकात अन्नदानासारखे श्रेष्ठ दान नाही.

· अन्नदान हे असे दान आहे जेथे दाता-भोक्ता असे दोघेही प्रत्यक्ष रूपात संतुष्ट होतात. इतर सर्व दानाचे फळ अप्रत्यक्ष असते. जो पर्यंत दान देणारा व दानघेणारा यांना तहान भुखेच्या भावनेचा अनुभव येत आहे तो पर्यंत अन्नदानापेक्षा श्रेष्ठ असे दुसरे कोणतेही दान नाही.

· संसारात अन्नदानासारखे श्रेष्ठदान पूर्वीही नव्हते व पुढेही नसेल. अन्नामुळेच शरीराचे बल वाढते. अन्नाच्या आधारेच आपले प्राण टिकून राहतातम्हणून अन्नदान करणारा प्राणदाता सर्वस्व देणारा समाजाला जातो.

· शेकडो मनुष्यात एखादा शूर असतो, हजारात एखादा पंडित असतो, लाखात एखादा वक्ता असतो, परंतु या सर्वात एखादाच दाता असतो किंवा नसतो.

· भुकेलेल्याला अन्न देणे आणि भगवंताच्या नामाचे स्मरण करणे या दोनच गोष्टी परलोकात उपयोगी पडतात.

30/09/2019

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*तुमची राशी तुमचा स्वभाव*
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_*ज्योतिषशास्त्रानुसार एकूण १२ राशी आहेत.*_
_*प्रत्येक राशीचा एक विशिष्ट असा स्वभाव असतो. तुमच्या राशीनुसार तुमचा स्वभाव ठरत असतो.*_

1. *वृश्चिक राशी* चा
राशीस्वामी मंगळ असल्याने
वृश्चिक राशीची माणसं अत्यंत शूर,
साहसी, पराक्रमी ,
महत्वाकांक्षी , चपळ , आक्रमक,
तामसी , जिद्दी असतात.
आक्रमक व डूख धरून सूड उगविणारी रास.
हे अतिशय
दीर्घोद्योगीही
असतात तुमचे प्रभावी सद्गुण म्हणजे तुमच्या
अंगी असलेला लढवय्या बाणा
कोण्त्याही प्रसंगात न डगमगता संघर्षात्मक
टक्कर देण्याची ताकत असते. ती
तुमच्याकडून घेण्यासारखी असते. तुमच्या
मनातील सुखदुःखाच्या भावना आणि
हाती घेतलेले कार्य यामध्ये सतत संघर्ष सुरू
असतो.
इच्छाशक्ती प्रबळ असते. त्यामुळे गोंधळलेल्या
अवस्थेत घाईगडबडीत तुम्ही
कधीच काम करत नाहीत.
तुम्ही सामर्थ्यशील असल्यामुळे
कोणाच्या ताब्यात राहत नाही. तुमच्या या
स्वभावामुळे तुमच्या घराला तुमच्या कुटुंबातील
प्रत्येक व्यक्तीला तुमचा पहाडासारखा आधार
असतो हे नक्की.
अहो तुमची शारीरिक
आणखी मानसिक शक्ती इतरांना
लाजवेल अशी असते. कठीण
प्रसंगात हार न मानणे. नाराज न होणे. हेच सद्गुण तुमचे
आयुष्य तारायला संकटाना मारायला पुरेसे असते. म्हणूनच
तुमच्या धाडसाचा इतरांना हेवा वाटतो.
पहिला हार्ट अटॅक येऊन गेल्यावर अजून दोन शिल्लक
आहेत, तोपर्यंत इकडची दुनिया तिकडे करून
ठेवीन असे म्हणणारे तुम्ही दुःखात
खचून न जाता मरणालाही हसत सामोरे
जाण्याची धडाडी ठेवतात.
इतरांवरती टीका करणे, राग आवरणे,
दुसऱ्यांचे मन जाणून घेणे, तडजोड हा प्रकार तुमच्याकडे थोडा
कमीच. स्वतः बद्दल आत्मविश्वास त्यामुळे काय
होते इतरांचे दोष दिसतात. त्यामुळे तुमची
एकाकी होण्याची दाट शक्यता असते.

२. ही माणसं आतल्या
गाठीची असतात. स्वतःच्या मनातलं
झटकन सांगत नाहीत. दुसऱ्याकडून मात्र
ही मंडळी
कुठलीही गोष्ट कौशल्याने काढून
घेतात. दुसऱ्यांच्या व्यक्तिगत व गोपनीय
गोष्टी ऐकायची यांना खूप उत्सुकता
असते
३. कठोर बोलण्यामुळे ते कळत नकळत अनेकांना दुखावून
जातात. ही माणसं परखड बोलतात. मात्र
स्वतःच्या बोलण्याने विनाकारण दुसऱ्याचा रोष ओढवून घेतात.
वेळ साधून अचूक बोलतात. मात्र त्या बोलण्याने समोरचा
घायाळ झाल्याशिवाय राहत नाही.
सापासारखी डुख धरून राहणारी
असतात.
४. वृश्चिक राशीची माणसं एकत्र
कुटुंबात रमणारी असतात. ही
माणसं एकांतातही रमतात. ही
माणसं प्रसंगी मतभेद बाजूला ठेवून दुसऱ्याला
मदत करणारी असतात. ज्या
व्यक्तीला जीव लावतात
तिच्यासाठी जान
देण्याचीही त्यांची
तयारी असते. दुसऱ्यांना आपलेसे करून
घेण्याच्या कलेत मात्र ते निष्णात असतात. ते अत्यंत
मूडी असतात. अहंकारी
असतात. गर्विष्ठपणा त्यांच्यात असतो.
५. त्यांना संशोधन कार्याची आवड असते.
त्यांची इच्छा शक्ती प्रबळ
असते. ही माणसं
महत्वाकांक्षी आणि व्यवहार चतुर
असतात. दुसऱ्यावर वर्चस्व गाजविण्याची
त्यांची वृत्ती असते.
भानगडीच्या गोष्टीत , उद्योगात
त्यांना अधिक रस असतो.
६. यांना वयाच्या २८व्या वर्षांपर्यंत थोडा त्रास सहन
करावा लागतो. पण त्यानंतर मेहनत व कष्टाळू
वृत्तीमुळे भविष्यात ते अद्भुत
प्रगती करतात.
७. यांचे आरोग्य सामान्य असते. वाढत्या वयासोबत वाढत्या
वजनाचा त्रास होतो. रक्तदाबाचा, डिप्रेशनचा, पित्ताविकाराचा
त्रास संभवतो.
८. ही माणसं अत्यंत कामुक असतात. या
व्यक्तींना लैंगिक संबंधांबद्दल एक विशेष ओढा
असतो. यांच्या वैवाहिक जीवनात अनेकदा
तणाव दिसून येतात पण समजूतदारपणे या
व्यक्ती त्यावर नियंत्रण ठेवतात.
यांनी मेष, सिंह, मकर व मेष या आक्रमक
राशींच्या व्यक्तींशी
विवाह टाळावा.
९. त्यांना आयुष्यात अनेक चणचणींना तोंड
द्यावे लागत असले तरीही
कोणी यांना सहजपणे खरेदी करू
शकत नाही. ते कोणाला सहजी
फसवत नाहीत. त्यांना कराव्या लागणाऱ्या
संघर्षांमुळे त्यांचे गुण सोन्याप्रमाणे तावून सुलाखून निघतात.
१०. सामाजिक आयुष्यात सन्मान प्राप्त करणाऱ्या या
व्यक्तींचे नातेवाईकांबरोबर मात्र ताणतणावाचे
संबंध असतात. या राशींच्या
व्यक्तींना गणपती तसेच इष्ट
देवतेची उपासना केल्यास फलदायी
ठरते.
११.शुभ करिअर : इंटीरिअर डिझायनर,
इंजिनीअर, मेडिकल, अभिनय, रिसर्च व
डेव्हलपमेंट, कन्स्ट्रक्शन, डिटेक्टिव्ह
एजन्सी, औषधक्षेत्र, सुगंधी
पदार्थ, राजकारण.
सुपारी, लोखंड, उस, गूळ याच्याशी
संबंधित व्यापारउद्योग.
१२) राशी :- वृश्चिक
स्वामी :-
मंगळ
देवता :-
जानकी
जी
जप मंत्र :- ॐ
श्री
क्लीं
जानकीरामाय
नमः
उपास्यदेव :- श्री गणेश
रत्न :- पोवळे
जन्माक्षर :- तो न ना नृ नि नी नुनू नो नौ य या
यी यू
या राशीवर मंगळ (ज्योतिष) ग्रहाचा अंमल आहे.
ही जलतत्त्वाची आणि
स्थिरस्वभावाची आहे. ही
चंद्राची नीच रास आहे. ही
रास असणारी माणसे शारीरिक दृष्ट्या
चिवट, काटक व स्पष्टवक्ती असतात. त्यांच्यात
प्रतिकूल परिस्थितीत टिकून राहण्याची
क्षमता असते. त्यांना जबरदस्त इच्छाशक्ती असते
आणि ती कुटुंबावर अतिशय प्रेम करतात.

11/02/2019

भावातीत ध्यान-सिद्धि कार्यक्रम
भावातीत ध्यान सिद्धि कार्यक्रम चेतना के उच्चतर स्तर, ग्राह्य क्षमता, सृजनात्मकता एवं स्नायुतंत्राीय प्रवीणता को विकसित करता है। वैज्ञानिक शोध अध्ययन संकेत करते हैं कि भावातीत ध्यान सिद्धि कार्यक्रम के दौरान मस्तिष्क में अधिकतम तरंगे व्यवस्थित होती हैं और मस्तिष्क अपनी अधिकतम संभव कार्यशक्ति प्रदर्शित करता है, ऐसा ई.ई.जी. द्वारा मस्तिष्क तरंगों के माप से ज्ञात होता है। सिद्धि कार्यक्रम के दौरान शुद्ध चेतना की जागृति अधिकतम होकर, मस्तिष्क की अधिकतम कार्यशक्ति प्राप्त होकर, व्यक्ति की पूर्ण रचनात्मक बुद्धिमत्ता को प्रकट करने के लिए आधार प्रदान करती है ।

भावातीत ध्यान सिद्धि कार्यक्रम चेतना के शांत स्तर से मन, बुद्धि, इन्द्रियों एवं संपूर्ण भौतिक संरचना, शरीर एवं इसकी कार्यप्रणाली के स्तरों तक संपूर्ण तंत्रिका प्रणाली में संतुलन निर्मित करता है। न केवल विचार समन्वित, सृजनात्मक एवं शक्तिशाली, इच्छाओं को पूर्ण करने की क्षमता प्रदान वाले हो जाते हैं, बल्कि इसके साथ-साथ संपूर्ण वातावरण में सुव्यवस्था निर्मित होती है, जो समाज की सामूहिक चेतना में, राष्ट्र में एवं विश्व में सामन्जस्य निर्मित करने में योगदान करती है ।

योगिक उड़ान

योगिक उड़ान की प्रक्रिया मन एवं शरीर के पूर्ण समन्वय को प्रदर्शित करती है। यह मस्तिष्क की अधिकतम सुसंबद्धता से संबंधित है, जो मन व मस्तिष्क की अधिकतम सुव्यवस्था एवं कार्यप्रणाली के सामन्जस्य का अनोखा उदाहरण है । मन और मस्तिष्क की सुसंबद्धता भावातीत चेतना, प्राकृतिक विधानों के एकीकृत क्षेत्र से कार्य का प्रमाण है, जहां अनन्त संगठनात्मक शक्ति जीवंत है ।

योगिक उड़ान के प्रथम चरण में भी, जब शरीर धीरे-धीरे ऊपर उठता है, यह अभ्यास व्यक्ति के लिए अत्यधिक आनंद का अनुभव प्रदान करता है एवं पर्यावरण के लिए सुसंबद्धता, सकारात्मकता, एवं समन्वय निर्मित करता है ।

वैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा यह स्पष्टतया प्रमाणित भी किया गया है कि जब किसी क्षेत्र की जनसंख्या के एक प्रतिशत का वर्गमूल सामूहिक रूप से भावातीत ध्यान (टी.एम.) सिद्धि तकनीक एवं योगिक उड़ान का अभ्यास करता है, तब यह शांति एवं समन्वय निर्मित करता है एवं संपूर्ण क्षेत्र से नकारात्मकता को समाप्त करता है, आंतक में कमी लाता है, संघर्ष एवं हिंसा में कमी करता है ।

वर्ष 1976 में टी.एम. सिद्धि कार्यक्रम और योगिक उड़ान के प्रयोग के बाद सामूहिक चेतना में सुसंबद्धता के एक अधिक शक्तिशाली प्रभाव की अपेक्षा की गयी थी । इस भविष्यवाणी का प्रथम मुख्य परीक्षण वर्ष 1978 में 108 देशों के ‘‘महर्षि विश्वव्यापी आदर्श समाज अभियान’’ के दौरान घटित हुआ, सर्वत्रा अपराध दरों में कमी आई । इस वैश्विक शोध ने एक नये सिद्धांत को प्रदर्शित कियाः जनसंख्या के एक प्रतिशत के वर्गमूल द्वारा भावातीत ध्यान एवं टी.एम. सिद्धि कार्यक्रम का प्रातः एवं सायं एक साथ एक स्थान में अभ्यास करना संपूर्ण जनसंख्या से नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने एवं सकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त है ।

समस्त उपरोक्त लाभों के लिये टी.एम. सिद्धि कार्यक्रम को केवल कुछ ही सप्ताहों में सरलता से सीखा जा सकता है, इसके लिए सप्ताह में 2 से 3 दिन अत्यन्त सरल, स्वाभाविक एवं प्रयासरहित तरीके से देने होते हैं ।

भावातीत ध्यान (टी.एम.) एवं सिद्धि कार्यक्रम भावातीत ध्यान की एक उन्नत तकनीक है। यह तकनीक व्यक्ति को भावातीत चेतना के स्त...
11/02/2019

भावातीत ध्यान (टी.एम.) एवं सिद्धि कार्यक्रम भावातीत ध्यान की एक उन्नत तकनीक है। यह तकनीक व्यक्ति को भावातीत चेतना के स्तर से विचार करने एवं कार्य करने के लिए प्रशिक्षित करती है, मन एवं शरीर के मध्य समन्वय को वृहत रूप से बढ़ाती है एवं व्यक्ति की इच्छाओं को परिपूर्ण करने के लिए जीवन के समस्त क्षेत्रों में सहयोग हेतु प्राकृतिक विधान को जागृत करने की क्षमता को विकसित करती है। यह उन्नत कार्यक्रम उन लोगों के लिए है, जिन्होंने भावातीत ध्यान का अभ्यास कुछ माह तक नियमित रूप से किया हो। यह कार्यक्रम पतंजलि योगसूत्रों पर आधारित है ।

भावातीत ध्यान सक्रिय मन को भावातीत चेतना का अनुभव प्राप्त करने के लिए स्थिर करता है एवं भावातीत ध्यान सिद्धि कार्यक्रम मन एवं शरीर को शांति के उस स्तर से-समस्त संभावनाओं के क्षेत्र से-प्रकृति के समस्त नियमों के स्रोत से कार्यशील होने के लिए प्रेरित करता है। मन एवं शरीर के मध्य उचित समन्वय, कार्य में पूर्ण फल प्रदायक होता है ।

हजारों वर्षों में पहली बार महर्षि जी ने चेतना की उच्चतर अवस्थाओं को विकसित करने एवं भावातीत ध्यान सिद्ध कार्यक्रम के अभ्यास द्वारा नित्य जीवन की क्रिया में प्रकृति के समस्त नियमों के एकीकृत क्षेत्र की सुव्यवस्था एवं सृजनात्मकता को लाने के लिए वैदिक पाठ्य पुस्तकों से योगिक सिद्धांतों को व्यावहारिक प्रयोग में लाने की तकनीक प्रदान की है ।

08/02/2019

जय गुरुदेव

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