27/11/2025
■ MBBS में सबसे पहले क्लास लगी और विषय पढ़ाया गया ग्रॉस एनाटॉमी...फिर अप्पर लिम्ब थोरेक्स...फिर लोअर लिम्ब एब्डॉमिन एन्ड पेल्विस...हेड एन्ड नेक...अंत में ब्रेन न्यूरो एनाटॉमी 🙄
अब अगला आग का दरिया था जिसका नाम था फिजियोलॉजी...के आपने अब तक जो जो देखा सीखा समझा वो सब अंग कैसे करतें हैं 😞 एक रोज ब्रेन न्यूरो एनाटॉमी की कक्षा चल रही थी और टीचर जी पूछ बैठे की मोर देखा है आपने ? हम सब जोर से बोले कि हाँ 😂
टीचर ने बोर्ड पर लिखा MORs 🙄 ये कौनसा मोर था हम सब हैरान थे... इतने में दूजा सवाल पूछे के हिंदी में आत्मसम्मान शब्द सुना है ? हम बोले हाँ ! उन्होंने बोर्ड पर लिखा ACC हम सब हैरान थे कि आत्मसम्मान को ACC कब लिखा जाता है 😞 हमें क्या पता था अभी सवाल और पूछे जाएंगे और जवाब हमको क्या देना है समझ न आ रहा था...अब टीचर महोदय ने सवाल पूछे हम सबसे :-
👉 कभी बच्चों को देखा है ? भागते भागते गिर जाते है...हँसी एक ही पल में आंसुओ में बदल जाती है ?
👉 उनके हाथ से कोई चॉकलेट छीन ले तो ?
👉 तुम किसी से बाइक/पैसा लेने जाओ और मना कर दे ?
👉 जब कोई आपका प्रपोजल ठुकरा दे ?
👉 ऑफिस में अचानक आपको नोकरी से निकाल दे ?
👉 कोई इंटरव्यू में आप रिजेक्ट हो गये ?
👉 या हम किसी भी क्षेत्र में रिजेक्ट हो जाते है ?
👉 आपके साथ अचानक कोई दुर्व्यवहार कर ले ?
👉 आपके साथ रहकर आपको कोई धोखा दे दे ?
हम सब चुप थे...मास्टर जी बोले कि रिजेक्ट होने का दिल पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक हो, या व्यक्तिगत क्षेत्र, हम में से कोई भी ठुकराया जाना नहीं चाहता। लेकिन हमें नहीं पता होता की ठुकराए जाने का दर्द शारीरिक पीड़ा जैसी ही होती है, और यह केवल मानसिक दर्द न होकर शरीर पर भी असर दिखाता है। क्योंकि हमारा मस्तिष्क ( ब्रेन ) रिजेक्शन को शारीरिक दर्द, पीड़ा और तकलीफ के बराबर मानता है, इसलिए रिजेक्ट होने पर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया भी वैसी ही होती है।
रिजेक्शन से, मस्तिष्क के उन्ही भागों में ज्यादा असर होता है, जो शारीरिक चोट से प्रभावित होते है। एम आर आई स्टडी से हमें पता चलता है, कि मस्तिष्क रिजेक्ट होने पर वैसी ही प्रतिक्रिया देता है, जैसा शारीरिक चोट लगने पर देता है।
ठोकर ज्यादा तकलीफ देती है क्योंकि हमारी यादाश्त उसे समर्थन करती है - शरीर के ज़ख्म दवाई से भर जाते हैं, और उसकी पीड़ा दूर हो जाती है, लेकिन मस्तिष्क पर लगी ठोकर की चोट इंसान को बार-बार याद आती रहती है, वह क्षण, वह हादसा उसे भविष्य में भी सताता रहता है। मस्तिष्क उस दर्द को भूलना नहीं चाहता, इसलिए दर्द ज्यादा होता है।
ठुकराए जाने पर हमारे आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचती है - आत्मविश्वास टूटने पर तकलीफ ज्यादा होता है। ठुकराए जाने पर हमारा खुद पर से गुरूर मिट जाता है, और अंदर का इंसान मर जाता है।
👉 मोर MORs देखे हो कभी ? रोते हुए भी नाचता रहता है ? बोले हाँ ! तो क्या हुआ उसके आत्मसम्मान ACC का ?
कैसे निकले आँसू उसके ?
बोले MORs को mu-opioid receptors (MORs) कहना चालू कर देना ! और आत्मसम्मान को anterior cingulate cortex (ACC) समझना चालू कर देना और आँसुओं को एमिगडाला समझना !!
क्योंकि ठोकर कैसी भी हो...ठुकराए जाने पर आपके मस्तिष्क में एमिगडला और एन्टीरीयर सिंगुलेट कोर्टेक्स के वेंट्रल पार्ट में mu-opioids रसायन का अत्याधिक बनने से भूचाल आता है। लेकिन शरीर शारीरिक/मानसिक ठोकर की चिकित्सा खुद ब खुद करता है। कमाल की बात है यही रसायन बनने से पीड़ा का अनुभव होता है और यही रसायन धीरे धीरे उस जख्म को ही भर देते है जिससे आपके जज्बात कुछ दिन बाद शांत हो जाते है।
डॉ मोनिका जौहरी