Nature Global Healthcare

Nature Global Healthcare Nature Global Healthcare Multi specialty Polyclinic is a unit of Divine global foundation .

14/08/2026
फैटी लीवर फैटी लीवर के लिए यह काढ़ा बहुत प्रभावी है। सामग्री और मात्रा नीचे दी गई है​सामग्री व  मात्रा ​भूमि आंवला 3 ग्र...
01/07/2026

फैटी लीवर

फैटी लीवर के लिए यह काढ़ा बहुत प्रभावी है। सामग्री और मात्रा नीचे दी गई है

​सामग्री व मात्रा

​भूमि आंवला
3 ग्राम

​गिलोय 3 ग्राम
(सूखी या ताजी डंडी)

​पुनर्नवा 3 ग्राम

​कुटकी 2 ग्राम (यह स्वाद में कड़वी होती है)

​भृंगराज 3 ग्राम

*♦️​बनाने की विधि♦️*

​सभी जड़ी-बूटियों को 400 मिलीलीटर पानी में डालें।

​इसे धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक पानी 100 मिलीलीटर (एक चौथाई) न रह जाए।

​इसे छान लें और हल्का गुनगुना होने पर पिएं।

*♦️​सेवन का तरीका♦️*

​इसे खाली पेट सुबह और शाम के खाने से एक घंटा पहले लें। बेहतर परिणामों के लिए इसे नियमित रूप से 1-2 महीने तक लें।

​फैटी लिवर में चीनी, शराब और मैदा ओर तली चीजों का पूरी तरह परहेज करें।

*♦️​इन चीजों से बचें♦️*

​मीठा कोल्ड ड्रिंक, मिठाई, सोडा और पैकेट बंद जूस।

​तली-भुनी चीजें समोसे, पकोड़े, पूड़ी और ज्यादा तेल वाला खाना।

​रिफाइंड कार्ब्स सफेद चावल, मैदा, पास्ता और सफेद ब्रेड।

​सैचुरेटेड फैट मक्खन, घी (सीमित मात्रा में),
नॉन वेज बिल्कुल ना खाए

​नमक पैकेट वाले चिप्स और नमकीन का सेवन कम करें।

25/06/2026

VITAMIN B 12

👉*विटामिन B12 क्या है, शरीर में इसका महत्व, शाकाहारी स्रोत और दुर्लभ तथ्य*

विटामिन B12 को “नसों और रक्त का रक्षक” कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आज के समय में थकान, चक्कर, याददाश्त कमजोर होना और झनझनाहट जैसी समस्याओं के पीछे अक्सर एक ही कारण छिपा होता है— विटामिन B12 की कमी। चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में शाकाहारी आबादी में इसकी कमी सबसे अधिक पाई जाती है।

विटामिन B12 क्या है?

विटामिन B12 एक वॉटर-सॉल्युबल विटामिन है, जिसे कोबालामिन भी कहा जाता है। यह शरीर में खुद नहीं बनता, बल्कि भोजन या सप्लीमेंट से ही मिलता है। यह डीएनए निर्माण, रेड ब्लड सेल्स बनने और नर्व सिस्टम के सही काम के लिए अनिवार्य है।

*शरीर में विटामिन B12 का महत्व*

B12 सिर्फ खून के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे नर्वस सिस्टम के लिए जीवनरेखा है।

यह नसों की मायलिन शीथ को सुरक्षित रखता है

मस्तिष्क को ऑक्सीजन पहुंचाने वाले RBCs के निर्माण में मदद करता है

हार्मोन संतुलन और मूड स्टेबिलिटी में योगदान देता है

थकान, डिप्रेशन और ब्रेन फॉग को कम करता है

आयुर्वेद में इसे मज्जा धातु पोषक तत्व के रूप में देखा जाता है।

विटामिन B12 की कमी से क्या होता है?

कमी धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर करती है।

लगातार थकान और कमजोरी

हाथ-पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन

याददाश्त कमजोर होना

चक्कर आना, सांस फूलना

जीभ में जलन और मुंह के छाले

लंबे समय तक कमी रहने पर नसों को स्थायी नुकसान भी हो सकता है।

♦️♦️♦️♦️♦️♦️

*शाकाहारी लोगों के लिए विटामिन B12 के स्रोत*

यह सच है कि B12 मुख्यतः एनिमल फूड्स में पाया जाता है, लेकिन कुछ शाकाहारी विकल्प भी उपलब्ध हैं

दूध और दही सीमित मात्रा में

पनीर और चीज़

फोर्टिफाइड अनाज और सोया मिल्क

मक्खन (सीमित मात्रा)

फोर्टिफाइड न्यूट्रिशनल यीस्ट

ध्यान दें

सब्जियों में प्राकृतिक रूप से B12 लगभग नहीं होता।

रोज़ कितनी मात्रा चाहिए?

वयस्क व्यक्ति को औसतन 2.4 माइक्रोग्राम प्रतिदिन विटामिन B12 की आवश्यकता होती है।
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को थोड़ी अधिक मात्रा चाहिए।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद के अनुसार B12 की कमी अग्नि मंदता और धातु क्षय से जुड़ी होती है।
सही पाचन, गुनगुना दूध, और समय पर भोजन B12 के अवशोषण में मदद करता है।

दुर्लभ लेकिन सत्य तथ्य (Rare but True Facts)

🔹शरीर B12 को 5–7 साल तक स्टोर कर सकता है

🔹 B12 की कमी से डिप्रेशन और एंग्जायटी भी हो सकती है

🔹 सिर्फ खाने से नहीं, एब्जॉर्प्शन प्रॉब्लम से भी कमी होती है

🔹 उम्र बढ़ने के साथ B12 का अवशोषण कम हो जाता है

🔹 एसिडिटी की दवाएं लंबे समय तक लेने से B12 घट सकता है

समाधान क्या है?

शाकाहारी लोग नियमित रूप से फोर्टिफाइड फूड लें

फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ (Fortified Foods) वे होते हैं जिनमें विटामिन और खनिज जैसे पोषक तत्व मिलाए जाते हैं, ताकि उनका पोषण मूल्य बढ़ जाए और लोगों में पोषक तत्वों की कमी (जैसे आयरन, विटामिन डी) को पूरा किया जा सके. ये भोजन में स्वाभाविक रूप से कम या अनुपस्थित पोषक तत्वों को जोड़ने या उन्हें फिर से जोड़ने की प्रक्रिया है, जिससे समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है।।

जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लें

पाचन को मजबूत रखें

अत्यधिक चाय-कॉफी से बचें

निष्कर्ष

विटामिन B12 की कमी को नजरअंदाज करना भविष्य की बड़ी बीमारियों को न्योता देना है। समय पर जांच, सही आहार और जागरूकता से इस समस्या से आसानी से बचा जा सकता है।

09/06/2026

कफ संतुलन

कफ रोग में परहेज ही आधी दवा

*आयुर्वेद में एक बहुत सीधी बात कही गई है—“परहेज ही आधी दवा है।”*

अगर आपको यह समझ आ जाए कि कफ बढ़ने पर क्या नहीं खाना है और क्या सीमित करना है, तो आधी समस्या वहीं खत्म हो जाती है। बाकी आधा काम दवा करती है।

कफ यानी शरीर में जल और पृथ्वी तत्व का बढ़ना। जब शरीर में पानी, बलगम, भारीपन और चिपचिपाहट बढ़ती है, तब कफ विकार पैदा होते हैं।

*♦️कफ रोग क्या होते हैं?♦️*

कफ बढ़ने पर शरीर में ये समस्याएं दिखती हैं:

बार-बार खांसी, जुकाम, बलगम
नाक बहना, छींक आना
अस्थमा जैसी समस्या
शरीर में सूजन या पानी भरना
मोटापा और ज्यादा फैट

यह सब संकेत हैं कि शरीर में जल तत्व ज्यादा हो गया है।

*♦️कफ में क्या ना खाएं♦️*

3 मुख्य नियम

1 ज्यादा पानी वाले (जल तत्व वाले) खाद्य पदार्थ

जो चीजें बहुत ज्यादा पानी से भरी होती हैं, वो कफ को बढ़ाती हैं।

*♦️उदाहरण♦️*

नारियल पानी
गन्ने का रस
तरबूज
ज्यादा जूस

*♦️समझने की ट्रिक♦️*

जिस चीज में “पानी ज्यादा” और “गरमाहट कम” - वो कफ बढ़ाएगी

*♦️सही तरीका♦️*

अगर वही चीज पकाई जाए (जैसे सूप), तो उसमें अग्नि (heat) जुड़ जाती है
मसाले डालने से भी उसका असर संतुलित हो जाता है

*2 ♦️ठंडी तासीर वाली चीजें♦️*

कफ रोग में ठंडी चीजें सबसे ज्यादा नुकसान करती हैं।

*♦️उदाहरण♦️*

आइसक्रीम
ठंडे ड्रिंक्स
कतीरा (गोंद)
ठंडा दूध

*♦️समझने की ट्रिक♦️*

जो शरीर को ठंडा करे - कफ को और जमा करे

*♦️सही तरीका♦️*

गर्म या गुनगुनी चीजें लें
मौसम के हिसाब से शरीर को गर्म रखें

3 ♦️भारी और मुश्किल से पचने वाला खाना♦️

जो चीजें पचने में भारी हैं, वो कफ को और बढ़ाती हैं।

*♦️उदाहरण♦️*

केला (खासकर पका हुआ)
मैदा और बाहर का खाना
तला-भुना खाना
रात में साबुत दाल

*♦️समझने की ट्रिक♦️*

जो पेट में देर तक रहे - वही कफ बढ़ाए

दूध, दही और घी – कैसे लें?

दूध और दही में जल तत्व ज्यादा होता है, इसलिए ये कफ बढ़ा सकते हैं।

*♦️लेकिन सही तरीका♦️*

दूध में हल्दी, अदरक या काली इलायची डालकर उबालें
दही दिन में लें, रात में नहीं
मक्खन से बचें
अच्छी तरह पका हुआ घी (बिना पानी वाला) ले सकते हैं

कब थोड़ा ले सकते हैं?

कफ का असर सुबह और शाम (सूरज ना होने के समय) ज्यादा होता है।

इसलिए

सुबह-सुबह और रात में ठंडी/पानी वाली चीजें बिल्कुल ना लें
दोपहर में, जब सूर्य तेज हो, तब थोड़ी मात्रा में ले सकते हैं

अनाज भी सही चुनें
नया गेहूं या नया चावल भारी होता है
2-3 महीने पुराना अनाज हल्का और पचने में आसान होता है

पानी पीने का सही तरीका
हमेशा पानी उबालकर पिएं (हल्का गुनगुना)
इससे पानी में “अग्नि तत्व” जुड़ता है
कॉपर (तांबे) के बर्तन का पानी कफ में फायदेमंद होता है

*आसान घरेलू उपाय (कफ कम करने के लिए)*

1 सुबह गुनगुना पानी + शहद

2 दिन में अदरक + काली मिर्च + तुलसी की चाय

3 खाने के बाद अजवाइन + काला नमक

4 रात में हल्दी वाला दूध (अगर कफ ज्यादा हो तो कम मात्रा)

5 बॉडी के लिए सरसों तेल से हल्की मालिश

*सबसे जरूरी बात*

हर चीज को पूरी तरह छोड़ना नहीं है, समझदारी से लेना है।
जहां “पानी ज्यादा, ठंडक ज्यादा, भारीपन ज्यादा” — वहां सावधान रहना है।

*♦️Conclusion♦️*

कफ रोग में इलाज सिर्फ दवाइयों से नहीं होता, बल्कि सही खान-पान और परहेज से होता है।
अगर आपने ये तीन नियम पकड़ लिए —
जल तत्व कम, ठंडा कम, भारी कम —
तो आप खुद ही अपनी सेहत संभाल सकते हैं।

आपकी सबसे बड़ी गलती क्या है—ठंडी चीजें, भारी खाना या मीठा?

09/06/2026

🟣🔴🔴

*लकवा (पैरालिसिस)*

आजकल लकवा , ब्रेन हैमरेज के केस अचानक से बढ़ गए हैं , पहले बड़ी उम्र के लोगों को ही ये देखने में आता था लेकिन अब 30 – 35 के लोग भी इसके शिकार हो रहे हैं , पैरालिसिस को लकवा, पक्षाघात, अधरंग, ब्रेन अटैक या ब्रेन स्ट्रोक के नाम से भी जाना जाता है। सही जानकारी न होने समय पर इलाज न मिलने से बहुत से लोगों की मौत हो जाती है, लोग अपंग हो जाते हैं। ऐसे में इन्हें अपने परिवार वालों पर आश्रित होना पड़ता है। करीब एक-तिहाई लोग खुशकिस्मत होते हैं, जो वक्त पर सही इलाज मिलने से पूरी तरह ठीक हो जाते हैं और पहले की तरह की ही नॉर्मल जिंदगी जीने लगते हैं।

*♦️पैरालिसिस क्यों होता है? ♦️*

ब्रेन हमारे शरीर का सबसे अहम हिस्सा है और पैरालिसिस का सीधा संबंध दिमाग से है। शरीर के सभी अंगों और कामकाज का नियंत्रण दिमाग से होता है। बोलने, चलने-फिरने, देखने जैसे सभी काम दिमाग से ही कंट्रोल होते हैं। जब दिमाग की खून की नलियों में कोई खराबी आ जाती है तो ब्रेन स्ट्रोक होता है, जो पैरालिसिस की वजह बनता है।

शरीर के दूसरे हिस्सों की तरह ही दिमाग में भी दो तरह की खून की नलियां होती हैं। एक जो दिल से दिमाग तक खून लाती हैं और दूसरी, जो दिमाग से वापस दिल तक खून लौटाती हैं। जो नलियां खून लाती हैं, उन्हें धमनी (आर्टरी) कहते हैं और जो दिमाग से वापस खून दिल तक ले जाती हैं, उन्हें शिरा (वेन) कहते हैं। यों तो पैरालिसिस धमनी या शिरा में से किसी की भी खराबी से हो सकता है, लेकिन ज्यादातर लोगों में यह समस्या आर्टरी में खराबी के कारण होती है।

दिल से दिमाग तक चार मुख्य नलियों से खून जाता है - दो गर्दन में आगे से और दो पीछे से। अंदर जाकर ये पतली-पतली नलियों में बंट जाती हैं ताकि दिमाग के हर हिस्से में खून पहुंच सके। इसे हम पाइपलाइन के उदाहरण के जरिए भी समझ सकते हैं। घरों में पानी पहुंचाने के लिए पाइपलाइन का इस्तेमाल होता है। इनमें से कुछ पाइप मोटे होते हैं तो कुछ पतले। पानी के पाइप में कोई खराबी आएगी तो वह अमूमन दो नतीजे हो सकते हैं

पानी के दबाव के कारण या तो पाइप फट जाएगा या फिर लीक करेगा। इसी तरह दिमाग तक खून ले जाने वाली आर्टरी में अगर खराबी आएगी तो वह या तो फट जाएगी या फिर लीक करेगी।

अगर दिमाग के अंदर नली फट जाती है तो खून बाहर निकलकर जम जाता है। इसे ब्लड क्लॉट (खून का थक्का) कहते हैं। जैसे-जैसे खून की मात्रा बढ़ती जाती है क्लॉट का साइज बढ़ता जाता है और जल्द ही यह खून की नली या उसके जख्म को बंद कर देता है जिससे खून का निकलना बंद हो जाता है। लेकिन बहुत-से मरीजों में तब तक इतना खून निकल चुका होता है कि सिर के अंदर दबाव बढ़ जाता है और इससे दिमाग काम करना बंद करने लगता है। इस बढ़ते दबाव की वजह से सिरदर्द या उलटी होने लगती है। ज्यादा बढ़ने पर दबाव बेहोशी, पैरालिसिस, सांस अटकने आदि का कारण बनता है।

खून की नली के बंद होते ही दिमाग का वह हिस्सा ऑक्सिजन के अभाव में भूखा-प्यासा तड़पने लगता है और काम करना बंद कर देता है। अगर दिमाग के इस भाग को आसपास से भी खून नहीं मिल पाता या खून की नली का क्लॉट ज्यों का त्यों पड़ा रहता है तो दिमाग के इस भाग को नुकसान पहुंचता है। यह स्ट्रोक का ज्यादा बड़ा और मुख्य कारण है। स्ट्रोक की स्थिति में ब्लड क्लॉट खून की नली के अंदर होता है और खून के बहाव को बंद या कम कर देता है। ऐसे में दो काम अहम होते हैं: पहला, जहां नली के फटने के कारण खून बाहर निकला है, वहां से जल्दी-से-जल्दी थक्के को हटाना और दूसरा, आर्टरी जहां खून लेकर जा रही थी, वहां जल्द-से-जल्द खून पहुंचाना। अगर समय रहते ऐसा न हो तो दिमाग पर असर पड़ता है और समस्या बढ़ने पर जान भी जा सकती है। यही वजह है कि पैरालिसिस के इलाज में टाइम बहुत अहम चीज हो जाती है। जल्दी इलाज मिल जाए तो ज्यादा नुकसान होने से बच जाता है।

*♦️ब्रेन हेमरेज और स्ट्रोक में फर्क♦️*

ब्रेन हेमरेज में खून की नली दिमाग के अंदर या बाहर फट जाती है। अगर अचानक या बहुत तेज सिरदर्द होता है या उलटी आ जाए, बेहोशी छाने लगे तो हेमरेज होने की आशंका ज्यादा होती है। ब्रेन हेमरेज से भी पैरालिसिस होता है। इसमें दिमाग से बाहर खून निकल जाता है और इसे हटाने के लिए सर्जरी की जाती है और क्लॉट को हटाया जाता है। अगर किसी भी रुकावट की वजह से दिमाग को खून की सप्लाई में कोई रुकावट आ जाए तो उसे स्ट्रोक कहते हैं। स्ट्रोक और हेमरेज, दोनों से पैरालिसिस हो सकता है।

*♦️कैसे होता है ♦️*

चाहे हेमरेज हो या स्ट्रोक, दिमाग का प्रभावित हिस्सा काम करना बंद कर देता है। दिमाग के अंदर बना क्लॉट आसपास के हिस्से को दबाकर निष्क्रिय कर देता है, जिससे वह काम करना बंद कर देता है। ऐसे में उस हिस्से का जो भी काम है, उस पर असर पड़ता है। हाथ-पांव चलने बंद हो सकते हैं, दिखने और खाना निगलने में दिक्कत हो सकती है, बोलने में परेशानी हो सकती है और बात समझने में मुश्किल आ सकती है। अगर दिमाग का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो तो स्ट्रोक जानलेवा भी साबित हो सकता है।

पैरालिसिस अचानक होता है। अक्सर पीड़ित रात में खाना खाकर ठीक-ठाक सोने जाता है। सुबह उठता है तो पता चलता है कि हाथ-पांव नहीं चल रहा। खड़े होने की कोशिश करता है तो गिर जाता है। कई बार दिन में ही काम करते या खड़े-खड़े या बैठे-बैठे अचानक पैरालिसिस हो जाता है। हेमरेज अक्सर तेज सिरदर्द और उलटी से शुरू होता है। फिर शरीर का कोई अंग काम करना बंद कर देता है और बेहोशी आने लगती है।

फेशियल पैरालिसिस भी बहुत कॉमन है। यह चेहरे की मसल्स के कमजोर होने से होता है। यह वायरल इंफेक्शन या उसके बाद भी हो सकता है। मरीज में इस तरह का कोई लक्षण या हिस्ट्री नहीं होने के बावजूद यह हो सकता है।

*♦️नोट♦️*

दिमाग का दायां हिस्सा बाईं ओर के अंगों को कंट्रोल करता है और बायां हिस्सा दाईं ओर के अंगों को। ऐसे में अगर दिमाग के दाएं हिस्से में दिक्कत हुई है तो बाएं हाथ-पैरों पर असर पड़ेगा और बाएं में गड़बड़ी हुई है तो दाएं हाथ-पैरों पर।

*♦️क्या हैं वजहें ♦️*

हाई ब्लड प्रेशर डायबीटीज स्मोकिंग दिल की बीमारी मोटापा बुढ़ापा जैसे कारणों से ब्रेन स्ट्रोक हेमरेज की सम्भावना रहती है ,

महिलाओं की तुलना में पुरुषों को खतरा ज्यादा है। बीमारी की फैमिली हिस्ट्री है तो 40-45 साल की उम्र में जांच के जरिए पता लगाना चाहिए कि हमें बीमारी का खतरा है या नहीं। उम्र बढ़ने पर इसका खतरा बढ़ जाता है। हालांकि हमारे देश में युवा मरीज ज्यादा हैं। यहां आमतौर पर 55-60 साल की उम्र में खतरा बढ़ना शुरू हो जाता है, जबकि पश्चिमी देशों में इसके चपेट में आने की औसत उम्र 70-75 साल है। इसकी वजह जिनेटिक और खराब लाइफस्टाइल है।

बचाव के लिए हमें 20-25 साल की उम्र से ही सावधानियां बरतनी चाहिए। अगर हार्ट की बीमारी है तो उसकी उचित जांच और इलाज कराएं। 20-25 साल की उम्र से ही नियमित रूप से ब्लड प्रेशर चेक कराएं। डॉक्टर की सलाह पर खाने में परहेज करें और एक्सरसाइज बढ़ाएं। अगर आपका ब्लड प्रेशर 120/ 80 है तो अच्छा है। ज्यादा है तो 135/85 से कम लाना लक्ष्य होना चाहिए। अगर ब्लड प्रेशर की कोई दवा लेते हैं तो उसे नियमित रूप से लें। ब्लड प्रेशर ठीक हो जाए, तब भी डॉक्टर की सलाह पर दवा लेते रहें, वरना यह फिर बढ़ जाएगा। डॉक्टर से बिना पूछे न कोई दवा लें, न ही बंद करें। 35-40 साल की उम्र के बाद साल में एक बार शुगर और कॉलेस्ट्रॉल की जांच जरूर कराएं। अगर बढ़ा हुआ हो तो डॉक्टर की सलाह से दवा लें और परहेज करें। वजन कंट्रोल में रखें। 18 से कम और 25 से ज्यादा बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई (BMI) न हो। कोई बीमारी न हो तो भी 40 की उम्र के बाद ज्यादा नमक और फैट वाली चीजें कम खाएं।

स्मोकिंग , शराब न लें ज्यादा-से-ज्यादा ताजे फल और हरी सब्जियां खाएं , नमक कम-से-कम पैकेज्ड फूड या अचार न लें क्योंकि इनमें नमक अधिक होता है , महीने में एक शख्स को आधा किलो से ज्यादा घी-तेल नहीं खाना चाहिए, पानी खून के बहाव को बढ़ाता है इसलिए रोजाना कम-से-कम 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं।

नियमित रूप से एक्सरसाइज और प्राणायाम करें। रोजाना कम-से-कम तीन से चार किमी ब्रिस्क वॉक करें। 10 मिनट में एक किलोमीटर की रफ्तार से 30-40 मिनट रोज चलें। साइक्लिंग, स्वीमिंग, जॉगिंग भी बढ़िया एक्सरसाइज हैं। आधा घंटा प्राणायाम और ध्यान जरूर करें। इनसे मन शांत रहता है।

ठंड में, खासकर जनवरी में इसका खतरा ज्यादा होता है। ऐसा अक्सर एक्सरसाइज में कमी के कारण होता है। ऐसे में घर पर ही सही, एक्सरसाइज जरूर करें।

रात में खाना खाने के बाद और सुबह में पैरालिसिस का अटैक ज्यादा होता है। अगर बोलने में अचानक समस्या होने लगे, शरीर का एक तरफ का हिस्सा भारी महसूस हो, चलने में दिक्कत हो, चीज उठाने में परेशानी हो, एक आंख की रोशनी कम होने लगे, चाल बिगड़ जाए , सुबह अचानक आँख और मस्तक पर सुजन दिखे तो फौरन डॉक्टर के पास जाएं, सबेरे गरम कमरे से ठन्डे में न जाये ये सबसे बड़ा कारन स्ट्रोक का है.

*♦️अगर पैरालिसिस हो जाए तो करें क्या ♦️*

अगर किसी को अचानक हाथ-पैर चलाने में, देखने में, बोलने में या बात समझने में दिक्कत हो या अचानक ऐसा दर्द हो जैसा कभी न हुआ हो, तो जल्द-से-जल्द उसे हॉस्पिटल पहुंचाना चाहिए। इसके इलाज में अटैक के बाद के 6 घंटे बहुत अहम होते हैं। इलाज में देरी होने से अपंग होने से लेकर जान जाने तक की आशंका रहती है।

अगर खून की नली के अंदर ब्लड क्लॉट खून के दौरे को रोक रहा है तो उसको खत्म करने की दवा तकलीफ शुरू होने के तीन घंटे के अंदर मिल जानी चाहिए। इसके पहले सीटी स्कैन, एमआरआई, खून की जांच, ब्लड प्रेशर आदि की जांच करनी पड़ती है।

इस दौरान अगर मरीज बेहोश हो जाए तो उसको एक करवट लिटा देना चाहिए ताकि मुंह की लार फेफड़े में न जा पाए।

इस बीमारी में मरीज को फिजियोथेरपी से बहुत मदद मिलती है। अस्पताल से घर आने पर भी फिजियोथेरपी कराएं। जितना दिन डॉक्टर कहें, उतने दिन फिजियोथेरपी जरूर कराएं।

पैरालिसिस के मरीजों को दूसरे अटैक से बचने के लिए पहले अटैक के एक साल तक ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। पहले एक साल तक मरीजों में दूसरा अटैक होने का खतरा ज्यादा रहता है। दवाएं डॉक्टर से बिना पूछे बंद न करें। ब्लड प्रेशर और डायबीटीज कंट्रोल में रखें। कॉलेस्ट्रॉल सामान्य रखें। ब्लड क्लॉट न बने, इसके लिए अगर एस्प्रिन (Aspirin) या दूसरी कोई दवा दी गई है तो बिना डॉक्टरी सलाह के उसे बंद न करें। जिस कारण स्ट्रोक हुआ है, उसकी नियमित जांच करानी चाहिए और उस कारण को कंट्रोल में रखना चाहिए।

सबसे पहले मरीज का सीटी स्कैन किया जाता है। जरूरत पड़ने पर एमआरआई भी करते हैं। इसके अलावा, ड्रॉप्लर टेस्ट, सीटी एंजियोग्राफी, हार्ट इको, ईसीजी, शुगर, थायरॉयड आदि जांच करते हैं। खून की नली में अगर ब्लॉकेज है तो स्टंट लगाकर उसे खोलते हैं। इसके बाद लगातार मरीज को निगरानी में रखा जाता है।
अगर मरीज को कम नुकसान हुआ है तो अस्पताल से जल्दी छुट्टी मिल जाती है। आमतौर पर इलाज के तीन महीने में नतीजे सामने आने लगते हैं। हालांकि कई बार रिकवरी में दो-तीन साल का समय भी लग जाता है।

स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरपी बहुत अहम है। अगर मरीज फिजियोथेरपी की एक्सरसाइज खुद सही से नहीं कर पा रहा हो तो परिवार को इसमें मदद करना चाहिए। मरीज की हालत धीरे-धीरे ही सुधरती है। ऐसे में परिवार वालों को सब्र रखना चाहिए।

दिन में दो-तीन बार मालिश करें। यह फिजियोथेरपी का ही एक हिस्सा है। इससे खून का दौरा बढ़ता है।

आमतौर पर अटैक आने पर हमें किसी अच्छे अस्पताल ही जाना चाहिए क्योंकि इसमें समय का खयाल रखना बहुत अहम होता है और इसमें देरी होने से नुकसान हो सकता है। बाद में रिकवरी के लिए आयुर्वेद होमियोपैथी , प्राकृतिक चिकित्सा की सहायता ले सकते हैं. बेहतर है कि मरीज को एयर मेट्रेस पर रखें। इसमें प्रेशर अपनेआप कम-ज्यादा होता है।

अगर यूरीन की पाइप लगी है तो उसकी साफ-सफाई बहुत जरूरी है। मरीज को तब तक मुंह से खाना न दें जब तक कि डॉक्टर न कहें।

अगर कोई बिस्तर से उठ नहीं सकता तो उसे लगातार एक ही स्थिति में न लिटाकर रखें। उसे हर 2-3 घंटे में करवट बदलवा देनी चाहिए। सारे प्रेशर पॉइंट्स (कुहनी, घुटने आदि) को सपोर्ट दें ताकि उन पर लगातार दबाव न रहे। जिस तरफ पैरालिसिस हुआ है, उस ओर के हिस्से को चलाते रहें। ऐसा दिन में कम-से-कम 3-4 बार करें वरना मसल्स में अकड़न हो जाती है।

आयुर्वेद में पैरालिसिस , ब्रेन स्ट्रोक , हैमरेज का बहुत अच्छा ट्रीटमेंट होता है , जो इसके खतरे की परिधि में आते हैं उन्हें होमियोपैथी ट्रीटमेंट पहले से ही लेते रहना चाहिए जिससे अटैक की कोई सम्भावना ही नहीं बचे कुछ मेडिसिन तो ऐसी होती हैं जो तुरंत देने से मरीज की जान बच सकती है,

लकवे के जो मरीज सालों साल तक परेशान है और अंग काम नहीं करते वो हमारे द्वारा बनाई गई लकवे की दवाई इस्तेमाल कराए और अपने रोगी को उपचार करा कर ठीक करे।

28/05/2026

On this sacred day, may your heart be filled with gratitude, your mind with peace, and your soul with love. May this Eid bring you prosperity, and success in all your endeavours.
May Allah's blessings be with you and your loved ones always. Have a blessed Eid filled with happiness and joy......

Eid Mubarak to you and your family.....Dr Mohammad Khalid

27/02/2026

🟠🔴
*श्वास रोग*

यह अत्यंत कष्टकारी होता है। बहुत सारे लोग इस श्वास रोग से पीड़ित हैं और कोई अच्छा उपचार चाहते हैं। ऐसे में हम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि की बात कर रहे हैं, जिसके बारे में आचार्य वाग्भट ने बहुत स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट दिया है।

"श्वास और कास यानी पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट की बीमारियों में बाकी सारी दवाइयाँ एक तरफ, और ये एक औषधि एक तरफ।"

अगर आपको सांस फूलने की समस्या है, सूखी या बलगम वाली खांसी रहती है, गले में खराश, बार-बार कफ जमा होना, ब्रोंकाइटिस, पुराना टीबी, निमोनिया के बाद कमजोर फेफड़े, या स्मोकिंग की वजह से सांस की दिक्कत है तो,यह औषधि आपके लिए बहुत गुणकारी है।

आचार्य वाग्भट ने अष्टांग हृदय, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3 के श्लोक 172 में कहा है—

“सर्वेषु श्वासकासेषु केवलं विभीतकी”

अर्थात श्वास और कास की सभी बीमारियों में केवल विभीतकी (बहेड़ा) ही पर्याप्त है।

इतना बड़ी ख्याति आयुर्वेद में बहुत कम दवाओं के लिए मिलती है।

यहां जिस औषधि की बात हो रही है, वह है विभीतकी, जिसे आम भाषा में बहेड़ा कहते हैं।

*♦️लाभ♦️*

☑️सांस फूलना
☑️सूखी खांसी या कफ वाली खांसी
☑️गले में बार-बार खराश या भारीपन
☑️ब्रोंकाइटिस
☑️स्मोकिंग के बाद सांस की दिक्कत
☑️पुराने टीबी या निमोनिया के बाद कमजोर लंग्स
☑️रात में कफ जम जाना, सुबह गला पूरी तरह भरा हुआ लगना
☑️नाक से ज्यादा पानी गिरना, साइनस की समस्या

*♦️सेवन विधि♦️*

गुड़ के साथ गोली बनाकर
बहेड़ा पाउडर एक चुटकी
पुराना देसी गुड़ थोड़ा सा
दोनों मिलाकर चना दाने जितनी छोटी गोली बना लें।
दिन में 4–5 बार, खाने के बाद चूसने की तरह लें।

इसे एक बार में निगलना नहीं है, धीरे-धीरे मुंह में घुलने देना है।

क्योंकि श्वास रोग में आयुर्वेद बार-बार अल्प मात्रा में औषधि लेने को कहता है।

*♦️पाउडर + गर्म पानी♦️*

आधा चम्मच बहेड़ा पाउडर
हल्के गुनगुने पानी के साथ
खासकर रात में सोने से पहले

यह तरीका उन लोगों के लिए खास है जिनका गला रात में बंद हो जाता है और सुबह भारी कफ निकलता है।

*अब आयुर्वेदिक लॉजिक समझिए*

श्वास रोग की जड़ कहाँ है?
आयुर्वेद के अनुसार श्वास रोग सीधे फेफड़ों से शुरू नहीं होता।
सबसे पहले गड़बड़ी होती है:

आमाशय (पेट) में
अग्नि (डाइजेस्टिव फायर) कमजोर होती है
रस धातु ठीक से नहीं बनती
रस धातु का मल = कफ, जो ज़्यादा बनने लगता है
यही कफ ऊपर जाकर छाती और लंग्स में जमा हो जाता है
यानी अगर पेट ठीक नहीं, तो सांस भी ठीक नहीं।

*♦️बहेड़ा के आयुर्वेदिक गुण♦️*

लघु – हल्का, कफ को तोड़ने वाला
रूक्ष – अतिरिक्त चिकनाई हटाता है
उष्ण – गर्म प्रकृति, वात-कफ शमन

विपाक
मधुर विपाक – यानी पाचन के बाद शरीर को संतुलन देता है

दोषों पर प्रभाव
वात को अनुलोमन करता है
कफ को विशेष रूप से कम करता है
पित्त को संतुलित रखता है

धातुओं पर प्रभाव: क्यों फेफड़ों के लिए खास है?

*विभीतकी का प्रभाव इन धातुओं पर बताया गया है:*

रस धातु
रक्त धातु
मांस धातु
मेद धातु

आयुर्वेद कहता है कि फेफड़ों (फुफ्फुस) की उत्पत्ति रक्त धातु से होती है।
जब रक्त धातु शुद्ध और मजबूत होती है, तो लंग्स भी मजबूत होते हैं।

*♦️बहेड़ा♦️*

पाचन सुधारता है
रस और रक्त धातु को शुद्ध करता है
कफ का एक्सेस प्रोडक्शन रोकता है
सीधे नाक से लेकर लंग्स तक काम करता है

किन मरीजों में असर सबसे ज्यादा दिखता है?
जिनके सीने में भारी कफ भरा रहता है

जिनको पीला या सफेद गाढ़ा बलगम निकलता है
जिनकी खांसी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही
जिनको रात में सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होती है
ऐसे मामलों में बहेड़ा को आयुर्वेद “मोर देन हाफ ट्रीटमेंट” मानता है।
इसे श्वास रोग के लिए बहुत उत्तम माना गया है क्योंकि
यह पाचन की जड़ से इलाज करती है

कफ को सिर्फ दबाती नहीं, बनने से रोकती है
लंग्स, गला, नाक—पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट पर काम करती है
शास्त्रों में इसका स्पष्ट और स्ट्रॉन्ग उल्लेख है

*इसीलिए आचार्य वाग्भट ने कहा—*
श्वास रोग में अगर एक औषधि चुननी हो, तो विभीतकी पर्याप्त है।
विशेष परिस्थितियों में कुशल वैद्य के परामर्श से ही सेवन करें।

*खट्टी डकारें और मुंह में वापस आता खाना*क्या यह महज एसिडिटी है या किसी बड़ी बीमारी का संकेत?क्या आपने कभी गौर किया है कि ...
10/02/2026

*खट्टी डकारें और मुंह में वापस आता खाना*

क्या यह महज एसिडिटी है या किसी बड़ी बीमारी का संकेत?

क्या आपने कभी गौर किया है कि भरपेट भोजन करने के बाद अचानक गले में जलन महसूस होती है और खाया हुआ खाना वापस मुंह तक आ जाता है? चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे GERD (Gastroesophageal Reflux Disease) या आम भाषा में 'एसिड रिफ्लक्स' कहा जाता है। उत्तर भारत की बदलती जीवनशैली और मसालों के शौकीन समाज में यह समस्या अब महामारी की तरह फैल रही है।

अक्सर लोग इसे 'मामूली गैस' समझकर एक ईनो या एंटासिड खाकर टाल देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह अनदेखी आपके भोजन नली को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर सकती है? आइए जानते हैं इस समस्या के गहरे कारण, इसके गंभीर कॉम्प्लीकेशन्स और विज्ञान द्वारा प्रमाणित उपचार।

*♦️क्यों आता है खाना वापस?♦️*

*♦️मुख्य कारण♦️*

हमारे शरीर में भोजन नली (Esophagus) और पेट के बीच एक दरवाज़ा होता है जिसे LES (Lower Esophageal Sphincter) कहते हैं। इसका काम भोजन को पेट में जाने देना और फिर कसकर बंद हो जाना है ताकि एसिड वापस ऊपर न आए।

*♦️LES का ढीला पड़ना♦️*

जब यह वॉल्व कमजोर हो जाता है, तो पेट का एसिड और अधपचा भोजन वापस गले की ओर भागने लगता है।

*♦️हाइयटल हर्निया♦️ (Hiatal Hernia)*

यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पेट का ऊपरी हिस्सा डायाफ्राम (पेट और छाती को अलग करने वाली मांसपेशी) के माध्यम से छाती में ऊपर की ओर खिसक जाता है।

*♦️मंदाग्नि ♦️(Slow Digestion)*

आयुर्वेद के अनुसार, यदि आपकी जठराग्नि कमजोर है, तो भोजन पेट में पड़ा-पड़ा सड़ने लगता है और गैस के दबाव से ऊपर की ओर धकेला जाता है।

*दुर्लभ लेकिन सच कुछ चौंकाने वाले तथ्य दांतों का सड़ना*

क्या आप जानते हैं कि बार-बार मुंह में खाना वापस आने से आपके दांत खराब हो सकते हैं? पेट का एसिड दांतों के 'इनेमल' को गला देता है, जिससे सेंसिटिविटी और कैविटी बढ़ जाती है।

*♦️रात की खांसी♦️*

कई बार लोग सूखी खांसी का इलाज करवाते रहते हैं, जबकि उसका असली कारण एसिड रिफ्लक्स होता है जो सोते समय फेफड़ों की नली में सूक्ष्म जलन पैदा करता है।

*♦️सलाइवा टेस्ट ♦️*

यदि खाना वापस आने के साथ आपके मुंह में अचानक बहुत ज्यादा थूक (Saliva) बनने लगता है, तो यह शरीर का एक सुरक्षा तंत्र है जो एसिड को बेअसर करने की कोशिश कर रहा होता है।

*क्या इसके कोई कॉम्प्लिकेशन्स (जटिलताएं) हैं?*

जी हाँ, इसे नजरअंदाज करना जानलेवा हो सकता है। लंबे समय तक एसिड रिफ्लक्स रहने पर ये समस्याएं हो सकती हैं:

*एसोफैगल स्ट्रक्चर (Esophageal Stricture)*

बार-बार एसिड के संपर्क में आने से भोजन नली में घाव (Scar tissue) बन जाते हैं, जिससे नली संकरी हो जाती है और खाना निगलने में तकलीफ होती है।

*बैरेट का अन्नप्रणाली*
(Barrett’s Esophagus)

यह सबसे खतरनाक स्थिति है।
इसमें भोजन नली की कोशिकाएं बदल जाती हैं, जो भविष्य में एसोफैगल कैंसर का कारण बन सकती हैं।

*अस्थमा और निमोनिया*

एसिड के छोटे कण सांस नली में जाकर फेफड़ों में संक्रमण पैदा कर सकते हैं।

*प्रमाणित उपचार और बचाव के टिप्स (Proven Treatment)*

विज्ञान और आयुर्वेद दोनों ही इस समस्या के समाधान के लिए जीवनशैली में बदलाव को प्राथमिकता देते हैं:

*1 'लेफ्ट साइड' सोने का नियम*

विज्ञान कहता है कि बाईं करवट (Left side) सोने से पेट भोजन नली के नीचे रहता है, जिससे गुरुत्वाकर्षण के कारण एसिड ऊपर नहीं आ पाता।

*2 भोजन के बाद 'वज्रासन'*

भोजन के तुरंत बाद लेटने के बजाय 10-15 मिनट वज्रासन में बैठें। यह पाचन क्रिया को तेज करता है और गैस के दबाव को कम करता है।

*3 खाने के बीच पानी का त्याग*

भोजन के दौरान बहुत अधिक पानी पीने से पेट का एसिड पतला हो जाता है, जिससे पाचन धीमा होता है। खाना खाने के 45 मिनट बाद ही पानी पिएं।

*4 'सौंफ और मिश्री' का जादू*

भोजन के बाद एक चम्मच सौंफ चबाना केवल माउथ फ्रेशनर नहीं है; सौंफ में ऐसे तेल होते हैं जो पेट की मांसपेशियों को शांत करते हैं और LES को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

*5 रात का भोजन और सोने के बीच का अंतर*

सोने से कम से कम 3 घंटे पहले खाना खा लें। लेटने से पहले पेट खाली होना चाहिए ताकि रिफ्लक्स की संभावना शून्य हो जाए।

*♦️निष्कर्ष♦️*

मुंह में खाना वापस आना केवल एक असहज स्थिति नहीं, बल्कि आपके शरीर की एक चेतावनी है। सही खान-पान, तनाव प्रबंधन और समय पर डॉक्टरी सलाह लेकर आप अपनी भोजन नली को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचा सकते हैं। याद रखें, पेट स्वस्थ है तो पूरा शरीर स्वस्थ है।

डायबिटीज़ में नसों की जलन👉 (Neuropathy) अगर समय पर संभाल ली जाए, तो बढ़ने से रोकी जा सकती है। घरेलू उपाय अलग-अलग और पूरा...
30/01/2026

डायबिटीज़ में नसों की जलन

👉 (Neuropathy) अगर समय पर संभाल ली जाए, तो बढ़ने से रोकी जा सकती है।

घरेलू उपाय अलग-अलग और पूरा सेफ प्लान

नसों की जलन क्यों होती है? (संक्षेप में)

लंबे समय तक शुगर ज़्यादा रहना

Vitamin B12 / D की कमी
उम्र के साथ नसों की कमजोरी
पैरों में ब्लड सर्कुलेशन कम होना

घरेलू उपाय (रोज़ करने योग्य)

*1 पैरों की सही देखभाल (सबसे ज़रूरी)*

गुनगुने पानी से पैर धोएँ (गरम नहीं)

अच्छे से सुखाएँ

रात को नारियल तेल / तिल का तेल हल्का सा लगाएँ

नंगे पाँव बिल्कुल न चलें।

*2 डाइट से नसों को ताक़त*

दूध / दही

हरी सब्ज़ियाँ

मूंग दाल

अखरोट (1–2)

अलसी (1 चम्मच)

शराब, तंबाकू = नसों की सबसे बड़ी दुश्मन

*3 हल्की एक्सरसाइज़*

20–30 मिनट धीमी वॉक
कुर्सी पर बैठकर पैर ऊपर-नीचे
पंजों को गोल-गोल घुमाना

ब्लड फ्लो बढ़ता है = जलन कम होती है।

*4 रात की जलन में राहत*

सोने से पहले पैर ऊँचे रखें
ठंडी हवा सीधे पैरों पर न लगे
ढीले कॉटन मोज़े पहनें।

मेडिकल उपाय (डॉक्टर की सलाह से)

1 Vitamin सपोर्ट
Vitamin B12 / B-Complex

Vitamin D (अगर कमी हो)

B12 की कमी में जलन बहुत बढ़ जाती है।

2 नसों की दवाएँ

3 शुगर का स्थिर कंट्रोल

HbA1c 7–7.5% (60+ में)
बहुत कम शुगर भी नसों को नुकसान देती है

*क्या न करें*

गरम पानी में पैर डुबोना

हीटर / गरम बोतल पैरों पर लगाना

दर्द सहते रहना

खुद से दवा बदलना

कब तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ?

जलन रोज़ बढ़ रही हो

सुन्नपन बढ़ने लगे

पैरों में छाले / घाव

रात में नींद न आए

कमजोरी या चलने में लड़खड़ाहट

7- दिन का आसान “नसों की देखभाल रूटीन”

सुबह: हल्की वॉक
दोपहर: संतुलित खाना
शाम: पैर की एक्सरसाइज़
रात: तेल से हल्की मालिश + पैर ऊँचे

याद रखने का गोल्डन नियम

*“शुगर कंट्रोल + विटामिन + पैर की देखभाल = नसों की सुरक्षा”*

Address

Lucknow
226010

Opening Hours

Monday 10am - 1pm
5pm - 7pm
Tuesday 10am - 1pm
5pm - 7pm
Wednesday 10am - 1pm
5pm - 7pm
Thursday 10am - 1pm
5pm - 7pm
Saturday 10am - 1pm
5pm - 7pm
Sunday 10am - 1pm

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Nature Global Healthcare posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share