Love Guru Mohinder Kumar

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गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं ?पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्...
27/02/2021

गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं ?
पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है। श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है।
जब मां गंगा ने पूछा यह प्रश्‍न
एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली,” प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?” इस पर श्री हरि बोले,”गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।”
कहां जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियां
गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?
इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं पाया जा सका।
धार्मिक पहलु
सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियांं सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो स्वभाविक है।
वैज्ञानिक पहलु
वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्सियम और फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है।
इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।
——–हर हर गंगे!!!!

पुष्य नक्षत्र के महत्वपूर्ण अचुक उपाय ।ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र के उपाय, बहुत ही महत्वपूर्ण माने गए है । धन सम्...
25/02/2021

पुष्य नक्षत्र के महत्वपूर्ण अचुक उपाय ।

ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र के उपाय, बहुत ही महत्वपूर्ण माने गए है । धन सम्बन्धी प्रयोगों , माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु उनकी साधना करने के लिए, आर्थिक संकटो को दूर करने के लिए और अपनी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए पुष्य नक्षत्र एक श्रेष्ठ दिन है ।
मान्यता है कि धन सम्बन्धी किये गए पुष्य नक्षत्र के उपाय शीघ्र ही फलीभूत होते है ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि कुंडली के योग विरुद्ध हों, तो भी पुष्य नक्षत्र में किया गया कार्य निश्चित ही सिद्ध हो जाता है ।
25 फरवरी गुरुवार को सभी कार्यो में सिद्धि देने वाला अति शुभ “गुरु पुष्य नक्षत्र” है ।
पुष्य नक्षत्र अन्य सभी योगों के दोषों को समाप्त कर देता है। बहुत से ज्योतिष यह भी मानते है कि पुष्य नक्षत्र के गुण किसी भी बुरे योगो द्वारा नष्ट ही नहीं हो सकते है ।
पुष्य नक्षत्र के उपाय,
इस दिन किये गए पुष्य नक्षत्र के उपाय से धन वैभव में वृद्धि होती है, कार्य क्षमता बढ़ती है जातक के प्रभाव में वृद्धि होती है।
पुष्य नक्षत्र के उपाय में सबसे महत्वपूर्ण उपाय है की, पुष्य नक्षत्र के दिन “हत्था जोड़ी”(एक विशेष पेड़ की जड़ जो सभी पूजा की दुकान में मिलती है) को “चाँदी की डिबिया में सिंदूर डालकर” अपनी तिजोरी में स्थापित करें । ऐसा करने से घर में धन की कमी नहीं रहती है । ध्यान रहे कि इसे नित्य धुप अगरबत्ती दिखाते रहे और हर पुष्य नक्षत्र में इस पर सिंदूर चढ़ाते रहे ।
पुष्य नक्षत्र में “शंख पुष्पी की जड़ को “चांदी की डिब्बी में भरकर उसे घर के धन स्थान / तिजोरी में रख देने से उस घर में धन की कभी कोई भी कमी नहीं रहती है ।
इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी पूजा करें। गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन भगवान श्री विष्णु जी को पीले पुष्प और चने की दाल अर्पित करके विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। इस दिन माँ लक्ष्मी को केसर अर्पित करके माथे पर केसर का तिलक लगाएं।
पुष्य नक्षत्र के उपाय में बहुत ही अजमाया हुआ उपाय है की बरगद के पत्ते को भी पुष्य नक्षत्र में लाकर उस पर हल्दी से स्वस्तिक बनाकर उसे चांदी की डिब्बी में घर में रखें, यह बहुत ही शुभ माना जाता है ।
पुष्प नक्षत्र के दिन दक्षिणावर्ती शंख में केसर मिला दूध भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। इससे धन लाभ मिलेगा। माता लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान विष्णु की पूजा करने से भी मां की कृपा आप पर बनी रहती है ।

शास्त्रों के अनुसार माँ लक्ष्मी श्री सूक्त के पाठ से अति प्रसन्न होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जो जातक पुष्य नक्षत्र के दिन श्री सूक्त एवं श्री महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करते है करते है माँ लक्ष्मी की उस घर परिवार पर पीढ़ियों तक कृपा बनी रहती है।
वह जातक इस जन्म में तो ऐश्वर्य का भोग करता ही है इस पुण्य के कारण अगले कई जन्मो तक भी उस धन की कोई भी कमी नहीं रहती है।

पुष्य नक्षत्र के योग में मां लक्ष्मी का विधि-विधान से पूजन करते हुए उन्हें गुलाब के फूल और पानी वाला नारियल अर्पित करके मां लक्ष्मी के चरणों में सात लक्ष्मीकारक कौड़ियां भी रखें। आधी रात के बाद इन कौड़ियों को घर के किसी कोने में चुपचाप गाड़ दें और माँ से अपने यहाँ स्थाई रूप से निवास करने की प्रार्थना करें । इस उपाय से धन लाभ होने के योग बनते हैं।
,पुष्य नक्षत्र (के दिन पूजा घर में संध्या के समय माँ लक्ष्मी के सामने दीपक में लाल कलावे की बत्ती डालकर घी का दीपक जलाएं । इससे घर में लक्ष्मी का नियमित रूप से आगमन होने लगता है। इसके बाद नियम पूर्वक माँ के सामने रुई की जगह कलावे की बत्ती डालकर ही घी का दीपक जलाया करें ।
पुष्य नक्षत्र के दिन गाय को घी से रोटी चुपड़कर उस पर गुड़ रखकर खिलाने से धन लाभ होता है, सुख- समृद्दि आती है।
पुष्य नक्षत्र के दिन मंदिर में दीपक अवश्य जलायें इससे कार्य में आने वाली अड़चने समाप्त होती है।

पुष्य नक्षत्र के दिन माँ लक्ष्मी को लाल पुष्प अर्पित करें । इस दिन सांयकाल किसी भी लक्ष्मी मंदिर / मंदिर में माँ को सुगन्धित धूप अगरबत्ती, मिठाई चढ़ाने से माँ अपने भक्त से अति प्रसन्न होती है, सुख सौभाग्य आता है । यह पुष्य नक्षत्र के उपाय में बहुत ही सिद्ध उपाय है।
पुष्य नक्षत्र के दिन घर में सुख – समृद्धि, ऐश्वर्य और परिवार में प्रेम के लिए माँ लक्ष्मी को सबूतदाने की खीर अथवा हलुवे का भोग अवश्य ही लगाएं फिर घर के सभी लोग माँ के इस प्रशाद को प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करें। प्रत्येक पुष्य नक्षत्र को इस उपाय को करने से माँ लक्ष्मी उस घर से कभी भी नहीं जाती है।
पुष्य नक्षत्र के दिन लक्ष्मी की पूजा करते समय चांदी का सिक्का रखें। बाद में इस सिक्के को अपनी तिजोरी में रख दें। इससे आपकी तिजोरी हमेशा पैसों से भरी रहेगी । यह पुष्य नक्षत्र के टोटके में बहुत ही प्रभावशाली है।
पुष्य नक्षत्र के टोटके में इस उपाय की भी बहुत मान्यता है, गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन स्फुटिक की माला से माँ लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाकर यहाँ दिए गए मन्त्र का जाप करने से धन हानि बंद होती है, व्यापार – कारोबार में लाभ मिलने लगता है , बेरोजगारों को रोजगार की प्राप्ति होती ।

आर्थिक संकटो का निवारण करने का मन्त्र :“ऊं श्रीं ह्रीं दारिद्रय विनाशिन्ये धनधान्य समृद्धि देहि देहि नम:”।।
माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने का मन्त्र :-

“ऊंं श्री विघ्नहराय पारदेश्वरी महालक्ष्यै नम:”।।

जीवन में सभी सुख समृद्धि और ऐश्वर्य के लिए श्रीलक्ष्मी-नारायण जी को शहद का भोग लगाएं और उस चढ़ी हुई शहद को रोटी पर रखकर गाय को खिलाएं।
पारिवारिक कलह से मुक्ति, परिवार में प्रेम और सहयोग हेतु पूजा के बाद कर्पूर से पीली सरसों जलाकर लक्ष्मी-नारायण की आरती करें।
घर में स्थाई धन-धान्य की संपन्नता हेतु श्री लक्ष्मी नारायण जी पर हल्दी चढ़ाकर उस चढ़ी हल्दी पर थोड़ा पानी मिलाकर उससे अपनी तिजोरी पर “श्रीँ” लिखें।

कब है फुलेरा दूज 2020, बिना मुहूर्त पूरे दिन करें शुभ काम।हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन ...
25/02/2020

कब है फुलेरा दूज 2020, बिना मुहूर्त पूरे दिन करें शुभ काम।
हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन (द्वितीय तिथि) को फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाता है। इस साल यानि 2020 में यह त्यौहार 25 फरवरी (मंगलवार) को मनाया जा रहा है। यह 24 फरवरी को 23:16:40 से शुरू होकर 26 फरवरी 01:39:36 तक रहेगा।
ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार मार्च या फरवरी के महीने में मनाया जाता है। फुलेरा दूज का त्यौहार बसंत पंचमी और होली के बीच फाल्गुन में मनाया जाता है। ज्योतिष जानकारों की मानें तो फुलेरा दूज पूरी तरह दोष मुक्त दिन है। इस दिन का हर पल शुभ माना जाता है। इसलिए इस दिन किसी शुभ काम को करने के लिए मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं होती।
क्या है फुलेरा दूज

इसे एक शुभ और सर्वोच्च त्यौहार माना जाता है। इस त्यौहार को उत्तर भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह त्यौहार भगवान कृष्ण को समर्पित है। शाब्दिक अर्थ में फुलेरा का मतलब होता है ‘फूल’ जो फूलों को दर्शाता है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण फूलों से खेलते हैं और फुलेरा दूज की शुभ पूर्व संध्या पर होली के त्यौहार में भाग लेते हैं। ‘
फुलेरा दुज का महत्व
आकाशीय और ग्रह संबंधी भविष्यवाणियों के अनुसार, इस त्यौहार को सबसे महत्वपूर्ण और शुभ दिनों में से एक माना जाता है। आइए जानते हैं क्या है फुलेरा दूज का महत्व-

फुलेरा दूज मुख्य रूप से बसंत ऋतु से जुड़ा त्यौहार है।

वैवाहिक जीवन या प्रेम संबंधों में किसी भी परेशानी को दूर करने के लिए इससे अच्छा दिन कोई नहीं हो सकता है।

फुलेरा दूज को साल का ‘अबूझ मुहूर्त’ भी माना जाता है क्योंकि यह दिन किसी भी हानिकारक प्रभाव और दोषों से प्रभावित नहीं होता। इस दिन आप विवाह, संपत्ति की खरीद आदि जैसे सभी तरह के शुभ कार्यों को अंजाम दे सकते हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए इस दिन को सबसे पवित्र माना गया है। इस दिन आपको किसी शुभ मुहूर्त का इंतजार करने की जरूरत नहीं है, ना ही किसी पंडित से परामर्श लेने की जरूरत है

इस दिन मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की पूजा की जाती है।

अगर किसी की कुंडली में प्रेम का अभाव हो तो उन्हें इस दिन राधा-कृष्ण की पूजा करनी चाहिए।
ज्योतिष के जानकारों की मानें तो किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए या किसी नए काम की शुरुआत के लिए इससे अच्छा दिन कोई हो ही नहीं सकता है। इस दिन जो भी भक्त प्रेम और श्रद्धा से राधा-कृष्ण की उपासना करते हैं उनके जीवन में भगवान श्री कृष्ण प्रेम और ख़ुशियाँ बरसाते हैं।

कैसे मनाते हैं फुलेरा दूज-

इस विशेष दिन पर भक्त भगवान कृष्ण की पूजा अर्चना करते हैं। यह पर्व उत्तरी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भव्य उत्सव की तरह मनाया जाता है।

भक्त इस दिन घरों और मंदिरों में देवता की मूर्तियों को सजाते हैं। राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को सुंदर फूलों से सजाते हैं।

इस खास दिन पर अनुष्ठान सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसमें भगवान श्री कृष्ण और राधा के साथ रंग-बिरंगे फूलों से होली खेलते हैं।

मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है और भगवान कृष्ण-राधा की मूर्ति को सजाकर रंगीन मंडप में रखते हैं।

भगवान कृष्ण-राधा को सुंगध और अबीर-गुलाल भी अर्पित करते हैं।

प्रसाद में सफेद मिठाई, पंचामृत और मिश्री चढ़ाएं।

प्रसाद के बाद ‘मधुराष्टक’ का पाठ करें या ‘राधा कृपा कटाक्ष’ का पाठ करें, अगर आपको पाठ करना कठिन लगे तो बस ‘राधेकृष्ण’ का जाप कर सकते हैं।

देवताओं के सम्मान में भजन-कीर्तन किया जाता है।

पूजा खत्म करने के बाद श्रृंगार की चीजों का दान करें और प्रसाद ग्रहण कर लें।

कृष्ण भक्त इस दिन को बड़े उत्सव की तरह मनाते हैं। उनमें इस दिन को लेकर काफी उत्साह होता है। वे राधे-कृष्ण को गुलाल लगाते हैं, भोग लगाते हैं और भजन-कीर्तन करते हैं। फुलेरा दूज का दिन भगवान कृष्ण के प्रेम को जीतने का दिन है। मानते हैं कि इस दिन भक्त कान्हा पर जितना प्रेम बरसाते हैं, उतना ही प्रेम कान्हा भी अपने भक्तों पर लुटाते हैंं।

फुलेरा दूज मनाने के समय रखें इन बातों का ध्यान

इस दिन पूजन करने के लिए शाम का समय सबसे उत्तम माना जाता है।

पूजा के समय रंगीन और साफ कपड़े पहनें।

अगर आप प्रेम संबंधी परेशानी के लिए पूजा कर रहे हैं तो गुलाबी कपड़े पहनें और अगर वैवाहिक जीवन में आ रही परेशानियों को खत्म करने के लिए पूजा कर रहे है तो पीले रंग के कपड़े पहनें।

"ऊँ ह्यं हृीं हृौं सः सूर्याय नमःआज फाल्गुन  की अमावस्या दिन रविवार के अति विशिष्ट अद्भुत अचुक सरल उपाय पुरी पोस्ट पढ़े।...
23/02/2020

"ऊँ ह्यं हृीं हृौं सः सूर्याय नमः
आज फाल्गुन की अमावस्या दिन रविवार के अति विशिष्ट अद्भुत अचुक सरल उपाय पुरी पोस्ट पढ़े।
भृगु संहिता विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य पंडित महेंद्र कुमार जी के अनुसार जीवन में मान प्रतिष्ठा और कार्यो में श्रेष्ठ सफलता के लिए नित्य ताम्बे के बर्तन से उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दे एवं रविवार कोआदित्य ह्रदय स्रोत्र का पाठ अवश्य करें।
अमावस्या के दिन घर के मुखिया को जल में काले तिल डाल कर पितरो का तर्पण,व पितरों के निमित ब्राह्मण को भोजन कराकर दान अवश्य करना चाहिये। पिंगल वाडा में नगद धन राशि दान दें । गुप्त दान करें। नाम की राशिद या पर्ची अपने नाम की ना कटवाएं। जानिए राशि अनुसार उपाय।

धन व मिन राशि वाले जातकों को श्मशान घाट में पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

मेंष व तुला राशि वाले जातकों को श्मशान भूमि में शव के लिए लकड़ी की व्यवस्था करनी चाहिए।

कन्या व मिथुन राशि वाले जातकों को श्मशान घाट में बिजली बिल का भुगतान करना चाहिए।

कर्क व सिंह राशि वाले जातकों को श्मशान घाट में शव वाहन चलाने के लिए डिजल वह पट्रोल की व्यवस्था करनी चाहिए।

वृष व वृश्चिक राशि वाले जातकों को श्मशान घाट में स्टेशनरी की व्यवस्था करनी चाहिए।

कुंभ व मकर राशि वाले जातकों को श्मशान घाट में पेड़ पौधे की सेवा करें व पेड़ पौधे की दवाईयां तथा नये पेड़ पौधे लगाने चाहिए।

हर अमावस्या को गहरे गड्ढे या कुएं में एक चम्मच दूध डालें इससे कार्यों से बाधायें दूर होती है।

रविवार को तुलसी, दूर्वा तोड़ना एवं अदरक, मसूर की दाल का सेवन करना मना है।
लाल पेज पर लिखे सुर्य अष्टलक्ष्मी पाठ को पढ़कर अपने दिन की शुरुआत करने वाले जातकों को की दुनिया हि निराली होती है।
ज्यादा जानकारी के लिए हमारे संस्थान जन कल्याण ज्योतिष आश्रम के भृगु संहिता ज्योतिष विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य से संपर्क करें।
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23 फरवरी रविवार को फाल्गुन माह की अमावस्या है।शास्त्रो में अमावस्या की तिथि को बहुत महत्व दिया गया है।अमावस्या के उपाय इ...
22/02/2020

23 फरवरी रविवार को फाल्गुन माह की अमावस्या है।
शास्त्रो में अमावस्या की तिथि को बहुत महत्व दिया गया है।
अमावस्या के उपाय इतने महत्वपूर्ण इतने दिव्य है कि इनको करने से दुर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल जाता है।
अमावस्या के दिन अपने जीवन की समस्त अस्थिरताओं को दूर करने, सुख सौभाग्य एवं आरोग्य की प्राप्ति के लिए अवश्य ही करें ये उपाय।
भृगु संहिता विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य पंडित महेंद्र कुमार जी से जानिए । अमावस्या के महत्वपूर्ण उपाय। पिला मक्की का आटा व नारीयल का बुरादा सफेद तथा लोहे की चार किल या जंग लगा लोहे का टुकड़ा काले कपड़े में बांध कर त्रिवेणी के पेड़ के पास रखकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। त्रिवेणी का पेड़ मतलब निम पिंपल और बैंड़ का पेड़ तिनों एक ही जगह पर हो वहां पर प्रार्थना करें। हे मेरे पितर देवता मेरे कृष्ठो का निवारण करें। मैं आप ही का अन्न वंश हूं। मेरे पर आप दया दृष्टि बनाएं रखें। फिर उस कपड़े का समान खोलकर चिंटियों को डालकर आना है। ध्यान रहे उस दिन पर घर का कुछ भी नहीं खाना पिना है। और मांस मदिरा व पत्नी के साथ संभोग करने से बचना चाहिए।
ज्यादा जानकारी के लिए गुरु जी संपर्क करें। संपर्क सूत्र :- 9815102954

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26 दिसंबर को ग्रहण और 6 ग्रहों का संयोग, जानें राशियों पर इसका असर !साल का अंतिम सूर्यग्रहण 26 दिसंबर को लगेगा। यह ग्रहण...
22/12/2019

26 दिसंबर को ग्रहण और 6 ग्रहों का संयोग, जानें राशियों पर इसका असर !
साल का अंतिम सूर्यग्रहण 26 दिसंबर को लगेगा। यह ग्रहण पूरे भारत में दिखाई देगा। भारत में सूर्य ग्रहण पूरे 2 घंटे 52 मिनट तक रहेगा। सूर्य ग्रहण 26 दिसंबर की सुबह लगभग 8 बजे से शुरू हो जाएगा जो 10 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगा।
सूर्य ग्रहण के दिन 6 ग्रह धनु राशि में
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह ग्रहण 26 दिसंबर को मूल नक्षत्र और धनु राशि में होगा। ग्रहण पर सूर्य, बुध, गुरु, शनि, चंद्रम और राहु-केतु धनु राशि में एक साथ रहेगा।
सूर्य ग्रहण के दिन 6 ग्रह धनु राशि में
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह ग्रहण 26 दिसंबर को मूल नक्षत्र और धनु राशि में होगा। ग्रहण पर सूर्य, बुध, गुरु, शनि, चंद्रम और राहु-केतु धनु राशि में एक साथ रहेगा।

सूतक काल- 26 दिसंबर 2019
सूर्य ग्रहण पर सूतक काल 12 घंटे पहले और चंद्र ग्रहण पर 5 घंटे पहले से सूतक आरंभ हो जाता है। सूतक काल को अशुभ माना जाता है। 25 दिसंबर की रात 8 बजे से ही सूतक काल शुरू हो जाएगा, जो ग्रहण के मोक्ष के साथ समाप्त होगा।

सभी 12 राशियों पर असर
इस ग्रहण का लगभग सभी राशियों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

साल 2020 के ग्रहण कब- कब

पहला चंद्र ग्रहण
10 जनवरी को लगेगा जो भारत में देखा जा सकेगा।

दूसरा चंद्र ग्रहण
साल 2020 का दूसरा चंद्र ग्रहण 5 जून को लगेगा। इस चंद्र ग्रहण की दृश्यता भारत में रहेगी।

तीसरा चंद्र ग्रहण
5 जुलाई 2020 को पड़ेगा।

चौथा चंद्र ग्रहण
30 नवंबर को साल का आखिरी चंद्र ग्रहण पडेगा। यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा।

पहला सूर्य ग्रहण
21 जून को लगने वाला है। भारत में दिखाई देगा।

दूसरा सूर्य ग्रहण
14 दिसंबर 2020 को लगने वाला है।

सोमवार व्रत कथा के पाठ से पाएं शिव-पार्वती का वरदान !भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा पाने लिए सोमवार का व्रत फलदायी है...
08/12/2019

सोमवार व्रत कथा के पाठ से पाएं शिव-पार्वती का वरदान !
भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा पाने लिए सोमवार का व्रत फलदायी है. इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करने के लिए जानें पूजन का तरीका और कथा...
बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए आप भी सोमवार का व्रत कर रहे हैं, तो शिव व्रत कथा को पढ़कर या सुनकर इस उपवास को पूर्ण करें...

सोमवार व्रत की विधि:

नारद पुराण के अनुसार सोमवार व्रत में व्यक्ति को प्रातः स्नान करके शिव जी को जल और बेल पत्र चढ़ाना चाहिए तथा शिव-गौरी की पूजा करनी चाहिए. शिव पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए. इसके बाद केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए. साधारण रूप से सोमवार का व्रत दिन के तीसरे पहर तक होता है. मतलब शाम तक रखा जाता है. सोमवार व्रत तीन प्रकार का होता है प्रति सोमवार व्रत, सौम्य प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार का व्रत. इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि होती है.

व्रत कथा:
एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था.

उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि 'हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.' लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई.!
माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा.

कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना.

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची.
साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी.
उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि 'तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.'

जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ.!
शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें.
जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे.!

शनि 2020: ऐसे लोगों पर शनि की रहती है टेढ़ी नजर, कहीं आप पर तो नहीं शनि की छाया !शनि एक क्रूर ग्रह है। किसी व्यक्ति के ऊ...
01/12/2019

शनि 2020: ऐसे लोगों पर शनि की रहती है टेढ़ी नजर, कहीं आप पर तो नहीं शनि की छाया !
शनि एक क्रूर ग्रह है। किसी व्यक्ति के ऊपर इसकी टेढ़ी नजर पड़ जाए तो उस व्यक्ति के जीवन में समस्याओं का भंडार लग जाता है। इसकी चाल धीमी है इसलिए जातकों के जीवन पर इसका असर लंबे समय तक रहता है। जन्म कुंडली में शनि का स्थान यह बताता है कि उसके प्रभाव जातक के ऊपर शुभ पड़ेंगे या अशुभ। क्योंकि अगर कुंडली शनि का स्थान शुभ नहीं होता है तो यह जातक की कुंडली में शनि दोषों का निर्माण करता है जो व्यक्ति के लिए समस्याकारक होता है।
कुंडली में 12 भाव होते हैं। ये भाव व्यक्ति के संपूर्ण जीवन की व्याख्या करते हैं। इन भावों में शनि कहां शुभ और कहां अशुभ होता है, ये जानने की कोशिश करते हैं। सबसे पहले कुंडली का चौथा भाव जिसे सुख भाव कहते हैं इस भाव में शनि का होना अच्छा नहीं माना जाता है। यानि यहां शनि की उपस्थिति से व्यक्ति के सुखों में ग्रहण लग जाता है।
शनि का राहु और मंगल के साथ होने से दुर्घटना का प्रचंड दुर्योग बनता है। ऐसी स्थिति में जातक को संभल कर वाहन चलाना चाहिए और यात्रा करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए ।
शनि का सूर्य के साथ संबंध होने से कुंडली में दोष पैदा होता है। इस दोष के कारण पिता-पुत्रों के संबंध खराब रहते हैं। दोनों के बीच मतभेद रहता है। दरअसल शनि देव सूर्य देव के पुत्र हैं और दोनों के बीच शत्रुता का भाव है।
शनि का वृश्चिक राशि या चंद्रमा से संबंध होने पर कुंडली में विष योग का निर्माण होता है। इस दोष के कारण व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में असफल होता है।
शनि अगर अपनी नीच राशि मेष में हो तो भी जातक को इसके नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं।
शनिवार के दिन करें शनि दोषों से बचने के उपाय !
प्रत्येक शनिवार को शनि देव का उपवास रखें।
शाम को पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
शनि के बीज मंत्र ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः, का १०८ बार जाप करें।
काले या नीले रंग के वस्त्र धारण करें।
भिखारियों को अन्न-वस्त्र दान करें।
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प्रेम विवाह के लिए माता पिता को समझाने के टोटके !प्रेम विवाह के लिए माता पिता को समझाने के टोटके, प्रेम विवाह के लिए अड़च...
04/11/2019

प्रेम विवाह के लिए माता पिता को समझाने के टोटके !
प्रेम विवाह के लिए माता पिता को समझाने के टोटके, प्रेम विवाह के लिए अड़चनों की शुरूआत या कहें अधिक विरोध घर-परिवार से ही हाती है। ज्यादातर मामलों में लड़की को जबरदस्त विरोध झेलना पड़ता है। कभी जाति-विरादरी, तो कभी धर्म और अमीरी-गरीबी के ऊंच-नीच को लेकर प्रेमी युगल को मुश्किलों के दौर से गुुजरना होता है।
उनके द्वारा कई विकट परिस्थतियां पैदा कर दी जाती हैं। वे अपनी मनमर्जी की शादी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में माता-पिता को शादी के लिए राजी करने के कई टोटके बताए गए हैं। इसके अचूक प्रभाव से मां-बाप का मन पसीज जाता है और वे अपनी संतान की खुशी की खातिर अंततः प्रेम-विवाह के लिए राजी हो जाते हैं। टोटके पूजा-पाठ, मंत्र जाप और विभिन्न वस्तुओं के साथ किए जाते हैं।
तीन माह तक मंत्र-जाप

विरोधी तेवर अपनाए हुए नाराज चल रहे मां-बात का मनाने के लिए तीन माह तक लगातार मंत्र जाप करना चाहिए। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की तस्वीर के आगे प्रातः सूर्योदय से पहले बैठकर उनकी पूजा शुक्ल पक्ष के गुरुवार से करनी चाहिए। दोनों एक ही समय में उनको खुश करने के मंत्र ऊँ लक्ष्मी नारायणाय नमः! का जाप स्फटिक की माला से 324 बार करें।

मंत्र-जाप पूरे होने पर मंदिर में जाकर प्रसाद चढ़ाएं और विवाह के सफलता की प्रार्थना करें। लड़की को चाहिए कि प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखे और बृहस्पति की मंत्र के साथ पूजा करे। इसके अतिरिक्त उन्हें टाटके के तौर पर बृहस्पतिवार को पीले वस्त्र दान करने चाहिए। इस पूजा और टोटके का असर एक माह के भीतर ही दिखने लगता है। अपनी संतान की खुशियों के आगे उन्हें झुकना ही पड़ता है।

प्रेम-विवाह का वशीकरण
यदि कोई लड़की अपनं मनपसंद लड़के से विवाह करना चाहती है, लेकिन लड़के के घरवाले से अधिक अपने घरवाले विरोध कर रहे हों ता उसे निम्नलिखित विधियों का प्रयोग करते हुए प्रेम-विवाह का वशीकरण मंत्र जाप करना चाहिए।

लड़की को चाहिए कि वह सबसे पहले अपने प्रेमी को अपने विश्वास में ले। उसे भी अपने स्तर से अपने माता-पिता को विवाह के लिए राजी करने की सलाह दे।
प्रेमी को भी नीचे दिए गए कामदेव मंत्र का 108 बार जाप करने को कहे। मंत्र इस प्रकार है- नमः कामदेवाय सहकल सह्द्रश सहमसहलिये वन्हे धुनन जन्मदर्शनम उत्कंठित कुरु-कुरु, दक्ष दक्शु धर कुसुम वानेन हन हन स्वाहा!
इस जाप को प्रातः सूर्योदय से पहले ही कर लें। दिन में एक बार प्रेमी या उसके माता-पिता से संपर्क करने की अवश्य कोशिश करें। लड़की कम से कम किसी बहने से प्रेमी की मां या उसके दूसरे रिश्तेदार से फोन पर ही जरूर बात करे।
यही टोटका करने के लिए लड़की अपने प्रेमी केा भी कहे। यह भी कहे कि वह उसके माता-पिता कोई उनके पसंद की कोई वस्तु उपहार भेंट करे। या फिर उनके किसी काम में मदद करे।
रात को सोने से पहले ऊपर के मंत्र का जाप एक बार फिर 21 बार अवश्य करें और प्रेमी-युगल एक-दूसरे के माता-पिता का स्मरण करते हुए सो जाएं।
यह तबतक करते रहें जबतक कि प्रेमी-युगल के मां-बाप एक-दूसरे से विवाह के सिलसिले में मुलाकात न कर लें। साथ ही इस मंत्र का जाप पूरे विधि विधान के साथ एवं स्नान आदि के बाद ही करें।
प्रेम-विवाह का अनोखा टोटका
मां-बाप को मनाने का यह अनोखा टोटका तेजी से असर करने वाला है। इसके अचूक प्रभाव से दोनों के परिवार वालों की तमाम आपत्तियों खत्म हो जाती हैं। प्रेमियों के ख्वाब अवश्य पूरे होते हैं। इसका तरीका निम्न प्रकार से करें-

इस टोटके के लिए मंगलवार की अर्धरात्री मंे आधे मीटर का एक काला कपड़ा, लाल धागा, अक्षत, कुछ सूखी लकड़ियों के टोटके, पांच काली मिर्च, नमक और नारियल लें। मिट्टी का पुतला बनाएं।
जमीन पर काले कपड़े को बिछाकर मिट्टी के पुतले पर लाल रंग के धागे को बांध दें। अपने बाएं हाथ पर भी लाल धागा बांध लें। पुतले के माथे पर पांच काली मिर्च और उसके नारियल को रख दें। उसके बाद आपको लकड़ियों में आग जलाएं।
एक हाथ में नमक लेकर और दूसरे मंे अक्षत को लेकर 108 बार दिए गए मंत्र का जाप करें। मंत्र है- ऊँ एआईएम ह्रीम कलीम कालिके ‘सरवन’ मम वषयं, कुरु, कुरु सरवन कमान मैं साध्य साध्य स्वाहा!!
मंत्र जाप पूरा होने के बाद जलाई हुई लकड़ी की लपटों की सात बार परिक्रमा करें। परिक्रमा के बाद आप हाथ के आधे अक्षत को आग में डाल दें और आधा अपने हाथ में रखें। इसी तरह से आधे नमक को पुतले के ऊपर डाल दें और आधा बचाए रखें।
बचे हुए नमक और अक्षत को दूसरी सभी सामग्रियों के साथ काले कपड़े में बांधकर अगले रोज प्रातः बहते हुए पानी में बहा दें।
इस प्रयोग के दो-तीन दिन के अंदर ही प्रेमियों के माता-पिता विवाह के लिए राजी हो जाते हैं। यहां तक कि परिवार के दूसरे सदस्यों का विरोध भी खत्म कर देंगे।
इस टोटके को प्रेमी या प्रेमिका दोनों अपनी-अपनी सुविधा और सहुलियत के अनुसार कर सकते हैं। प्रेमिका को यह टोटका आप अपने मासिक के दिनों में नहीं किया जाना चाहिए
प्रेम-विवाह का माता-पिता का वशीकरण
कुछ टोटके से शादी के लिए माता-पिता को वशीभूत किया जा सकता है। वे हैं-

प्रति-दिन माता-पिता के पैर छुएं। ऐसा करते हुए सोमवार, शुक्रवार या फिर बुधवार की सुबह सूर्योदय के बाद नौ बजे के बीच अपनी मां के दाहिने पैर के नीचे की थोड़ी मिट्टी लेकर उसमें सिंदूर मिला लें। सिंदूर की मात्रा अधिक रखें। इसी तरह से उनके सिर का एक बाल भी लेकर सिंदूर में डाल दें। उसे एक डिब्बी में बंद कर दें। इसक असर 72 घंटे में दिख जाएगा।
मंत्र प्रयोग से माता-पिता को वश में करने के लिए उनकी तस्वीर के सामने दिए गए मंत्र का 51 बार जाप करें। इसका असर 24 घंटे में ही दिखेगा। वह मंत्र काले कपड़े के साथ टोटके में दिया गया है।
दूसरे टोटके के लिए माता-पिता की तीन साल पुरानी पासपोर्ट साइज फोटे लें। किसी भी दिन दोपहर को ठीक 12 बजे छोटे काले रूमाल पर 5-5 लौंग और इलायची के साथ माता की तस्वीर रखकर उसे मोड़ लें। उसे काले धागे से दो गांठ के साथ बांध दें।

एक गांठ बांधते समय प्रेमी अपना नाम लें और दूसरी गांठ बांधते समय प्रेमिका नाम लें। यह प्रयोग पिता की तस्वीर के साथ भी करें। दोनों बंधे रूमाल को दाएं और बाएं हाथ में लेकर 251 बार मंत्र का जाप करें। मंत्र है- हे तंत्र शक्ति मम माता-पिता मनोकामना वशीकरण सिद्ध करिष्यामि नमो नमः !!!

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19/10/2019

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अहोई अष्टमी का व्रत कैसे करें? जानें व्रत का दिन और मुहूर्त !अहोई अष्टमी का व्रत इस बार 21 अक्टूबर 2019 को पड़ रहा है. इ...
19/10/2019

अहोई अष्टमी का व्रत कैसे करें? जानें व्रत का दिन और मुहूर्त !
अहोई अष्टमी का व्रत इस बार 21 अक्टूबर 2019 को पड़ रहा है. इस दिन माताएं अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं.
अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास की कृष्णपक्ष वाली अष्टमी के दिन आता है और अहोई अष्टमी बहुत महत्वपूर्ण व्रत है जो कि महिलाओं द्वारा संतान की भलाई के लिए व्रत किया जाता है. अहोई अष्टमी का व्रत भी बहुत कठोर होता है. कभी-कभी किसी को संतान का सुख नहीं मिलता तो अहोई अष्टमी का पर्व संतान के लिए विशेष है. संतान फिक्र नहीं करती तो भी इस व्रत को करने की मान्यता है. आम मान्यता है कि अहोई अष्टमी संतान के लिए होता है लेकिन अब संतान को भी मां की भलाई के लिए इस दिन कुछ खास करना चाहिए.
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे करें? जानें व्रत का दिन और मुहूर्त
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे करें? जानें व्रत का दिन और मुहूर्त
अहोई अष्टमी का व्रत इस बार 21 अक्टूबर 2019 को पड़ रहा है. इस दिन माताएं अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं.
अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास की कृष्णपक्ष वाली अष्टमी के दिन आता है और अहोई अष्टमी बहुत महत्वपूर्ण व्रत है जो कि महिलाओं द्वारा संतान की भलाई के लिए व्रत किया जाता है. अहोई अष्टमी का व्रत भी बहुत कठोर होता है. कभी-कभी किसी को संतान का सुख नहीं मिलता तो अहोई अष्टमी का पर्व संतान के लिए विशेष है. संतान फिक्र नहीं करती तो भी इस व्रत को करने की मान्यता है. आम मान्यता है कि अहोई अष्टमी संतान के लिए होता है लेकिन अब संतान को भी मां की भलाई के लिए इस दिन कुछ खास करना चाहिए.
किनकी होती है पूजा
इस व्रत में माता पार्वती की पूजा की जाती है और शाम को व्रत पूरा करके तारे देखकर जल देने के बाद व्रत खोला जा सकता है.
चांदी की अहोई
इस व्रत में चांदी की अहोई बनवाकर उसकी पूजा की जाती है और इसमें चांदी के मनके डाले जाते हैं जो हर साल के व्रत के हिसाब से बढ़ते जाते हैं. पूजा के बाद इस माला को माताएं गले में पहनती हैं !
कैसे करें अहोई अष्टमी का व्रत
अहोई अष्टमी की कथा का साहित्य ले आएं और अहोई अष्टमी का कैलेंडर भी ले आएं. इसके अलावा पंचामृत बनाएं. बच्चे आज मां के भोजन का इंतजाम करें और मां की पसंद की चीजें बनाएं. पूजा पूरी होने के बाद मां को भोजन खिलाएं. पहले मान्यता थी कि पुत्र की भलाई के लिए ये व्रत रखा जाता है लेकिन अब समय बदल चुका है. अहोई अष्टमी की पूजा में पुत्र और पुत्री दोनों का तिलक करें और सिर्फ पुत्र के भविष्य की मंगल कामना करना ठीक नहीं है.
अहोई अष्टमी पर व्रत का मुहूर्त
अहोई अष्टमी की पूजा शाम 05:42 से 06:59 बजे तक होगी और तारा देखकर पूजा करने का समय शाम 06:10 बजे से होगा. कई लोग चंद्रोदय देखकर पूजा करने को कहते हैं लेकिन ये ध्यान रखें कि अहोई अष्टमी पर चंद्रोदय देरी से होता है. उस दिन करीब रात 12 बजे के करीब चंद्रोदय होता है. तो आप तारे देखकर जल देने के बाद बच्चों का तिलक कर सकती हैं !

Vashikaran is the art of influencing someone and making him or her yours using certain mantras and tantras. It can really prove beneficial if practiced in the correct way and who could be vashikaran expert at this than a Vashikaran specialist himself who knows how to impart the maximum benefit using...

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