13/07/2026
गुरु तत्व अति सूक्ष्म, व्यापे घट घट माहिं
एक सामान्य व्यक्ति, गुरु को देह रुप में देखता है और अपने मूल लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहता है। जब तक गुरु की दिव्यता को आत्मसात नहीं करते, जोकि सिर्फ और सिर्फ गुरु कृपा से ही संभव है, तब तक माया जाल से मुक्ति नहीं मिलती।
माया हो या गुरु तत्व, यह दोनों एक ही ऊर्जा के दो स्वरूप हैं, माया दृश्य है, जो चर्म चक्षुओं से दिखाई देती है, जो कि अस्थाई है, यह यूं कहें कि सिर्फ दिखाई देती है, जैसे दर्पण में प्रतिबिंब। फिल्म के पर्दे पर चलचित्र।
मगर अज्ञानता वश साधारण मनुष्य इसे ही सत्य मानकर, फिल्म में दिखाई देने वाली घटनाओं से प्रभावित हो जाता है, कलाकार के सुख और दुःख से प्रभावित हो जाता है। जबकि उसमें एक प्रतिशत भी सत्यता नहीं होती।
लेकिन जब गुरु का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है, जब गुरु के आभामंडल की दिव्यता, शिष्य के अंतर्मन को स्पर्श करती है, तब उसे यथार्थ का ज्ञान होता है, तब वह गुरु को देह भाव से परे होकर, गुरु के सूक्ष्म व सक्षम स्वरूप के दर्शन कर पाता है।
यहीं से शिष्य शुद्र से द्विज बनकर अपना व अपने पूर्वजों का उद्धार करता है और समाज कल्याण हेतु कार्यरत हो जाता है।
यह गुरु की ही उदारता के फलस्वरूप ही संभव हो पाता है।
गुरु की विराटता, गुरु सानिध्य में बैठ कर, गुरु वाक्यों का मनन करने से, गुरु आज्ञा को निसंदेह, निश्छल भाव से शिरोधार्य करने से, समझ पड़ती है।
इस बार गुरु पूर्णिमा पर, अपने गुरु के चरणों में प्रणिपात होकर, गुरु आज्ञा को शिरोधार्य करने में ही, आत्मोत्थान संभव है।
जय गुरुदेव जय निखिलेश्वर जय सनातन