22/05/2026
PCOS से PMOS
(विज्ञान और परंपरा का साम्य)
बचपन में स्कूल न जाने के बहानों में सबसे लोकप्रिय बहाना अक्सर “पेट दर्द” हुआ करता था। यहाँ “पेट” का अर्थ केवल आमाशय (Stomach) नहीं होता था, बल्कि पूरे उदर (Abdomen) क्षेत्र से होता था। सामान्य बोलचाल में शब्द कई बार अपने शाब्दिक अर्थ से आगे बढ़ जाते हैं और व्यवहारिक जीवन में अपना विस्तृत अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
इसी प्रकार एक मुहावरा है — “पेट ठीक तो सब ठीक।” यहाँ “पेट” का अर्थ केवल भोजन रखने वाले अंग तक सीमित नहीं है। लोकजीवन में इसका आशय शरीर की व्यापक कार्यप्रणाली, पाचन, ऊर्जा-संतुलन और समग्र स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की भाषा में देखें तो यह भाव कहीं न कहीं चयापचय (Metabolism) की व्यापक अवधारणा को भी स्पर्श करता दिखाई देता है।
हालाँकि यहाँ एक वैज्ञानिक बात समझना आवश्यक है। Metabolism (चयापचय) केवल Digestion (पाचन) नहीं है। इसमें शरीर की ऊर्जा निर्माण प्रक्रिया, ऊर्जा का उपयोग, उसका भंडारण, हार्मोनों का प्रभाव, शर्करा और वसा का संतुलन, कोशिकाओं की क्रियाशीलता — सब सम्मिलित हैं। और महत्वपूर्ण बात यह कि चयापचय केवल उदर (Abdomen) तक सीमित प्रक्रिया भी नहीं है। यह शरीर की लगभग प्रत्येक कोशिका में निरंतर चलने वाली जैविक व्यवस्था है।
हाँ, यह भी सत्य है कि उदर क्षेत्र में यकृत (Liver), अग्न्याशय (Pancreas), आँतें तथा पाचन संस्थान के अनेक प्रमुख अंग स्थित हैं, जिनकी भूमिका शरीर की चयापचय प्रक्रियाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संभवतः इसी कारण सामान्य भाषा में हम कई बार इन जटिल प्रक्रियाओं को सरल करके “पेट” शब्द में समेट देते हैं।
हम जिस विषय पर आगे बात करने वाले हैं, उसके लिए यह भूमिका आवश्यक थी। क्योंकि कभी-कभी किसी विषय को समझने से पहले उसके शब्दों को समझना अधिक आवश्यक होता है। विज्ञान हमें तथ्यों की स्पष्टता देता है, जबकि भाषा हमें उन तथ्यों को मनुष्य के अनुभवों से जोड़ने की क्षमता देती है।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात है। भाषा केवल अनुवाद नहीं होती; वह व्यवहार और स्वीकृति का भी विषय होती है। उदाहरण के लिए — Train के लिए “लौहपथगामिनी”, Wireless के लिए “बेतार”, गणित में Sin के लिए “ज्या” और Cos के लिए “कोज्या” जैसे शब्द बने। शब्द उचित थे, पर सामान्य प्रयोग में हर शब्द समान रूप से स्थान नहीं बना पाया।
कारण सरल है — भाषा केवल शब्दकोश से नहीं चलती, वह व्यवहार से चलती है। कुछ शब्द अपने मूल रूप में ही लोगों की समझ का हिस्सा बन जाते हैं। उनका अनुवाद संभव होता है, पर उनका भाव, उनका व्यवहारिक अर्थ और उनके साथ जुड़ी सहजता हमेशा पूर्ण रूप से अनूदित नहीं हो पाती।
इसी प्रकार Cyst को “पुटी” कह देना या Metabolism को केवल “चयापचय” कह देना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित अवश्य है, पर सामान्य व्यक्ति के मन में बनने वाला भाव हर बार समान नहीं होता। एक शब्द केवल अर्थ नहीं देता, वह समझ की दिशा भी बनाता है।
वर्षों तक Polycystic O***y Syndrome (PCOS) नाम सुनकर ऐसा प्रतीत होता रहा कि समस्या केवल अंडाशय (O***y) और उसमें बनने वाली “Cysts” (पुटी) तक सीमित है। मरीज और समाज यही सोचते रहे कि यह केवल प्रजनन या स्त्री-रोग से जुड़ी एक स्थानीय समस्या है। पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने धीरे-धीरे समझा कि स्थिति इससे कहीं अधिक व्यापक है। इसमें हार्मोन, इंसुलिन प्रतिरोध, चयापचय, वजन, त्वचा, प्रजनन क्षमता तथा शरीर की अनेक जैविक प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं।
तात्पर्य यह है कि किसी विषय के शब्दों और परिभाषाओं को सही संदर्भ में समझ लेने से जटिल विषय भी अपेक्षाकृत सरल और स्पष्ट होने लगते हैं। वैज्ञानिक शब्दावली (Scientific Terminology) को अक्षरशः तथा संदर्भ सहित समझना किसी भी गहन अध्ययन (Deep Study) की मूल शर्तों में से एक है।
दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि किसी तथ्य को कह कौन रहा है — कोई व्यक्ति, कोई विशेषज्ञ, विशेषज्ञों का समूह, या कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक संस्था?
विज्ञान में तथ्य केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हो जाते कि कोई उन्हें कह रहा है; उनका महत्व इस बात से भी बनता है कि वे कितनी जाँच, समीक्षा और वैज्ञानिक परीक्षणों से होकर आए हैं।
The Lancet चिकित्सा जगत की अत्यंत प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में से एक मानी जाती है। इसमें प्रकाशित शोध सामान्यतः विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा (Peer Review) की प्रक्रिया से गुजरते हैं। इसलिए वहाँ प्रकाशित विचार चिकित्सा जगत में गंभीर चर्चा का विषय बनते हैं।
इसी कारण जब विशेषज्ञ समूहों और वैज्ञानिक विमर्श के बाद PCOS के लिए PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome / पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम) जैसे नाम का प्रस्ताव सामने आता है, तो वह केवल शब्द परिवर्तन नहीं रह जाता; वह बीमारी को समझने की दिशा में विकसित होती वैज्ञानिक सोच का संकेत भी बन जाता है।
यहाँ केवल नाम नहीं बदला, समझ भी विस्तृत हुई है।
पुराना नाम बीमारी के व्यापक स्वरूप को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता था और ध्यान अपेक्षाकृत अधिक अंडाशय (O***y) तथा “Cysts” पर केंद्रित प्रतीत होता था। वहीं नया दृष्टिकोण यह बताने का प्रयास करता है कि यह स्थिति बहु-अंतःस्रावी (Polyendocrine), चयापचयी (Metabolic) तथा प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अनेक परस्पर निर्भर तंत्रों का विषय है।
अंडाशय इस व्यापक हार्मोनल और चयापचयी असंतुलन से प्रभावित होने वाले प्रमुख अंगों में से एक है। इसलिए अब चर्चा केवल प्रजनन क्षमता तक सीमित नहीं रहती; इसमें जीवनशैली, पोषण, इंसुलिन संतुलन, वजन नियंत्रण, हार्मोनल स्वास्थ्य और शरीर की व्यापक कार्यप्रणाली भी सम्मिलित हो जाती है।
चिकित्सा जगत का यह बदलता दृष्टिकोण कुछ लोगों को उन समग्र स्वास्थ्य अवधारणाओं (Holistic Approaches) की भी याद दिला सकता है जो शरीर को अलग-अलग अंगों का समूह न मानकर एक परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था के रूप में देखने पर बल देती रही हैं।
Lajpatrai Mehra Neurotherapy (LMNT) भी लंबे समय से शरीर की समग्र कार्यप्रणाली, उदर क्षेत्र, पाचन व्यवस्था तथा स्वास्थ्य के व्यापक संबंधों के महत्व पर बल देती रही है। आधुनिक विज्ञान आज जिन स्थितियों को हार्मोन, चयापचय (Metabolism), अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) और शरीर की परस्पर जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास कर रहा है, पारंपरिक स्वास्थ्य-दृष्टियाँ तथा LMNT भी लंबे समय से शरीर को एक समग्र व्यवस्था (Holistic System) के रूप में देखने पर बल देती रही हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का विकसित होता दृष्टिकोण और पारंपरिक स्वास्थ्य अवधारणाएँ — दोनों अलग वैचारिक पद्धतियों का उपयोग करते हुए भी शरीर की जटिल, परस्पर जुड़ी प्रक्रियाओं की ओर संकेत करती दिखाई देती हैं।
कभी विज्ञान शब्द बदलता है, कभी शब्द विज्ञान को बेहतर समझने में सहायता करते हैं। और कभी-कभी दोनों मिलकर हमें बताते हैं कि बीमारी केवल नाम नहीं होती — वह शरीर की अनेक परस्पर जुड़ी प्रक्रियाओं की कहानी होती है।
और शायद स्वास्थ्य को समझने की यात्रा भी यहीं से शुरू होती है — शरीर को भागों में नहीं, एक समग्र व्यवस्था के रूप में देखने से।
पूजनीय गुरुजी डॉ. लाजपतराय मेहरा जी सदैव शरीर को एक समग्र इकाई के रूप में समझने के महत्व को रेखांकित करते रहे हैं। यदि आधुनिक वैज्ञानिक समझ और पारंपरिक स्वास्थ्य-दृष्टियाँ मानव स्वास्थ्य के व्यापक हित में संवाद स्थापित कर सकें, तो यह निश्चित रूप से लोकहितकारी दिशा हो सकती है।
(SIMPLOGY - MOHIT PANDEY)