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PCOS से PMOS(विज्ञान और परंपरा का साम्य)बचपन में स्कूल न जाने के बहानों में सबसे लोकप्रिय बहाना अक्सर “पेट दर्द” हुआ करत...
22/05/2026

PCOS से PMOS
(विज्ञान और परंपरा का साम्य)
बचपन में स्कूल न जाने के बहानों में सबसे लोकप्रिय बहाना अक्सर “पेट दर्द” हुआ करता था। यहाँ “पेट” का अर्थ केवल आमाशय (Stomach) नहीं होता था, बल्कि पूरे उदर (Abdomen) क्षेत्र से होता था। सामान्य बोलचाल में शब्द कई बार अपने शाब्दिक अर्थ से आगे बढ़ जाते हैं और व्यवहारिक जीवन में अपना विस्तृत अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
इसी प्रकार एक मुहावरा है — “पेट ठीक तो सब ठीक।” यहाँ “पेट” का अर्थ केवल भोजन रखने वाले अंग तक सीमित नहीं है। लोकजीवन में इसका आशय शरीर की व्यापक कार्यप्रणाली, पाचन, ऊर्जा-संतुलन और समग्र स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की भाषा में देखें तो यह भाव कहीं न कहीं चयापचय (Metabolism) की व्यापक अवधारणा को भी स्पर्श करता दिखाई देता है।
हालाँकि यहाँ एक वैज्ञानिक बात समझना आवश्यक है। Metabolism (चयापचय) केवल Digestion (पाचन) नहीं है। इसमें शरीर की ऊर्जा निर्माण प्रक्रिया, ऊर्जा का उपयोग, उसका भंडारण, हार्मोनों का प्रभाव, शर्करा और वसा का संतुलन, कोशिकाओं की क्रियाशीलता — सब सम्मिलित हैं। और महत्वपूर्ण बात यह कि चयापचय केवल उदर (Abdomen) तक सीमित प्रक्रिया भी नहीं है। यह शरीर की लगभग प्रत्येक कोशिका में निरंतर चलने वाली जैविक व्यवस्था है।
हाँ, यह भी सत्य है कि उदर क्षेत्र में यकृत (Liver), अग्न्याशय (Pancreas), आँतें तथा पाचन संस्थान के अनेक प्रमुख अंग स्थित हैं, जिनकी भूमिका शरीर की चयापचय प्रक्रियाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संभवतः इसी कारण सामान्य भाषा में हम कई बार इन जटिल प्रक्रियाओं को सरल करके “पेट” शब्द में समेट देते हैं।
हम जिस विषय पर आगे बात करने वाले हैं, उसके लिए यह भूमिका आवश्यक थी। क्योंकि कभी-कभी किसी विषय को समझने से पहले उसके शब्दों को समझना अधिक आवश्यक होता है। विज्ञान हमें तथ्यों की स्पष्टता देता है, जबकि भाषा हमें उन तथ्यों को मनुष्य के अनुभवों से जोड़ने की क्षमता देती है।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात है। भाषा केवल अनुवाद नहीं होती; वह व्यवहार और स्वीकृति का भी विषय होती है। उदाहरण के लिए — Train के लिए “लौहपथगामिनी”, Wireless के लिए “बेतार”, गणित में Sin के लिए “ज्या” और Cos के लिए “कोज्या” जैसे शब्द बने। शब्द उचित थे, पर सामान्य प्रयोग में हर शब्द समान रूप से स्थान नहीं बना पाया।
कारण सरल है — भाषा केवल शब्दकोश से नहीं चलती, वह व्यवहार से चलती है। कुछ शब्द अपने मूल रूप में ही लोगों की समझ का हिस्सा बन जाते हैं। उनका अनुवाद संभव होता है, पर उनका भाव, उनका व्यवहारिक अर्थ और उनके साथ जुड़ी सहजता हमेशा पूर्ण रूप से अनूदित नहीं हो पाती।
इसी प्रकार Cyst को “पुटी” कह देना या Metabolism को केवल “चयापचय” कह देना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित अवश्य है, पर सामान्य व्यक्ति के मन में बनने वाला भाव हर बार समान नहीं होता। एक शब्द केवल अर्थ नहीं देता, वह समझ की दिशा भी बनाता है।
वर्षों तक Polycystic O***y Syndrome (PCOS) नाम सुनकर ऐसा प्रतीत होता रहा कि समस्या केवल अंडाशय (O***y) और उसमें बनने वाली “Cysts” (पुटी) तक सीमित है। मरीज और समाज यही सोचते रहे कि यह केवल प्रजनन या स्त्री-रोग से जुड़ी एक स्थानीय समस्या है। पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने धीरे-धीरे समझा कि स्थिति इससे कहीं अधिक व्यापक है। इसमें हार्मोन, इंसुलिन प्रतिरोध, चयापचय, वजन, त्वचा, प्रजनन क्षमता तथा शरीर की अनेक जैविक प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं।
तात्पर्य यह है कि किसी विषय के शब्दों और परिभाषाओं को सही संदर्भ में समझ लेने से जटिल विषय भी अपेक्षाकृत सरल और स्पष्ट होने लगते हैं। वैज्ञानिक शब्दावली (Scientific Terminology) को अक्षरशः तथा संदर्भ सहित समझना किसी भी गहन अध्ययन (Deep Study) की मूल शर्तों में से एक है।
दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि किसी तथ्य को कह कौन रहा है — कोई व्यक्ति, कोई विशेषज्ञ, विशेषज्ञों का समूह, या कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक संस्था?
विज्ञान में तथ्य केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हो जाते कि कोई उन्हें कह रहा है; उनका महत्व इस बात से भी बनता है कि वे कितनी जाँच, समीक्षा और वैज्ञानिक परीक्षणों से होकर आए हैं।
The Lancet चिकित्सा जगत की अत्यंत प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में से एक मानी जाती है। इसमें प्रकाशित शोध सामान्यतः विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा (Peer Review) की प्रक्रिया से गुजरते हैं। इसलिए वहाँ प्रकाशित विचार चिकित्सा जगत में गंभीर चर्चा का विषय बनते हैं।
इसी कारण जब विशेषज्ञ समूहों और वैज्ञानिक विमर्श के बाद PCOS के लिए PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome / पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम) जैसे नाम का प्रस्ताव सामने आता है, तो वह केवल शब्द परिवर्तन नहीं रह जाता; वह बीमारी को समझने की दिशा में विकसित होती वैज्ञानिक सोच का संकेत भी बन जाता है।
यहाँ केवल नाम नहीं बदला, समझ भी विस्तृत हुई है।
पुराना नाम बीमारी के व्यापक स्वरूप को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता था और ध्यान अपेक्षाकृत अधिक अंडाशय (O***y) तथा “Cysts” पर केंद्रित प्रतीत होता था। वहीं नया दृष्टिकोण यह बताने का प्रयास करता है कि यह स्थिति बहु-अंतःस्रावी (Polyendocrine), चयापचयी (Metabolic) तथा प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अनेक परस्पर निर्भर तंत्रों का विषय है।
अंडाशय इस व्यापक हार्मोनल और चयापचयी असंतुलन से प्रभावित होने वाले प्रमुख अंगों में से एक है। इसलिए अब चर्चा केवल प्रजनन क्षमता तक सीमित नहीं रहती; इसमें जीवनशैली, पोषण, इंसुलिन संतुलन, वजन नियंत्रण, हार्मोनल स्वास्थ्य और शरीर की व्यापक कार्यप्रणाली भी सम्मिलित हो जाती है।
चिकित्सा जगत का यह बदलता दृष्टिकोण कुछ लोगों को उन समग्र स्वास्थ्य अवधारणाओं (Holistic Approaches) की भी याद दिला सकता है जो शरीर को अलग-अलग अंगों का समूह न मानकर एक परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था के रूप में देखने पर बल देती रही हैं।
Lajpatrai Mehra Neurotherapy (LMNT) भी लंबे समय से शरीर की समग्र कार्यप्रणाली, उदर क्षेत्र, पाचन व्यवस्था तथा स्वास्थ्य के व्यापक संबंधों के महत्व पर बल देती रही है। आधुनिक विज्ञान आज जिन स्थितियों को हार्मोन, चयापचय (Metabolism), अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) और शरीर की परस्पर जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास कर रहा है, पारंपरिक स्वास्थ्य-दृष्टियाँ तथा LMNT भी लंबे समय से शरीर को एक समग्र व्यवस्था (Holistic System) के रूप में देखने पर बल देती रही हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का विकसित होता दृष्टिकोण और पारंपरिक स्वास्थ्य अवधारणाएँ — दोनों अलग वैचारिक पद्धतियों का उपयोग करते हुए भी शरीर की जटिल, परस्पर जुड़ी प्रक्रियाओं की ओर संकेत करती दिखाई देती हैं।
कभी विज्ञान शब्द बदलता है, कभी शब्द विज्ञान को बेहतर समझने में सहायता करते हैं। और कभी-कभी दोनों मिलकर हमें बताते हैं कि बीमारी केवल नाम नहीं होती — वह शरीर की अनेक परस्पर जुड़ी प्रक्रियाओं की कहानी होती है।
और शायद स्वास्थ्य को समझने की यात्रा भी यहीं से शुरू होती है — शरीर को भागों में नहीं, एक समग्र व्यवस्था के रूप में देखने से।
पूजनीय गुरुजी डॉ. लाजपतराय मेहरा जी सदैव शरीर को एक समग्र इकाई के रूप में समझने के महत्व को रेखांकित करते रहे हैं। यदि आधुनिक वैज्ञानिक समझ और पारंपरिक स्वास्थ्य-दृष्टियाँ मानव स्वास्थ्य के व्यापक हित में संवाद स्थापित कर सकें, तो यह निश्चित रूप से लोकहितकारी दिशा हो सकती है।
(SIMPLOGY - MOHIT PANDEY)

120 /80 - उत्साह और अनुशासन ..........................................................बिहार में एक कहावत है ' ट्रेनुवा अ...
13/05/2026

120 /80 - उत्साह और अनुशासन ..........................................................
बिहार में एक कहावत है ' ट्रेनुवा अपनी ओर खींचता है ' , आपने अनुभव भी किया होगा कि जब कभी बस ट्रक जैसे बड़े वाहन निकलते हैं तो हवा का झोंका महसूस होता है । बारिश हो रही है , अचानक हवा चलने लगी , तो छाता उपर की तरफ पलट जाता है , ये सामान्य जीवन में दिखाई पड़ने वाले उदाहरण हैं । हम जानते ही हैं कि ऐसा क्यों होता है , क्योंकि वायुदाब समान करने के लिये हवा तेजी के साथ कम घनत्व की ओर जाती है । यदि बरनौली नियम जैसे क्लिष्ट वैज्ञानिक तथ्य को छोड़ भी दें तो भी अनुभव तो होता ही है । हमने बात की वायु दाब की , वायु दाब क्या है ? धरती के ऊपर लगभग 9 किलोमीटर तक हवा है , हालांकि ऊँचाई के साथ यह विरल होती जाती है , पर प्रभावित कर सके , इतनी तो होती ही है । कभी आपने भरा हुआ LPG सिलैंडर उठाया है ? भारी लगता है ना , अब कल्पना करें एक 9 किमी लंबे सिलैंडर की , कितना वजन होगा उसमें ? यह वजन ही धरती के इंच इंच पर पड़ने वाला वायुदाब है । और हम सब पर ही यह भार पड़ता है , पर महसूस नहीं होता है ना ? बैल को अपने सींग भारी लगते हैं क्या ? प्रश्न उठता है कि हम इतना वजन सहन कैसे कर लेते हैं ? कल्पना करें जमीन पर पड़े एक कागज की , उस पर भी उतना ही वजन पड़ रहा है , यही उसे स्थितिज ऊर्जा देता है । पर जैसे ही हल्की हवा चले या आप कागज को हिला दे तो वह अपना स्थान छोड़ देता है , इतना वजन आपने कैसे हिला दिया या हल्की हवा से कैसे प्रभावित हो गया । कागज पर पड़ने वाले वायुमंडलीय दाब और नीचे से आने वाला दबाब बराबर हो जाता है तो कुल दबाव शून्य हो जाता है , कागज पर प्रभावी बल शून्य हो जाता है , अब कागज की जगह स्वयं की कल्पना कर लें । स्पष्ट हो गया कि वायु ( द्रव में भी ) संचरण तभी होगा जब दाब में अंतर होगा । अच्छा इसे ऐसे समझें Current तभी Flow होगा जब voltage में अंतर होगा । स्थितिज ( स्थिति के कारण ) ऊर्जा में अंतर ही गतिज ऊर्जा ( movement ) को उत्पन्न करता है । एक रोचक तथ्य और ये है कि हमारे शरीर के प्रति वर्ग इंच पर लगभग 6.5 Kg से ज्यादा भार पड़ता है । पर हमारा शरीर इस वजन के लिये अनुकूलित हो जाता है । पर अब एक नई समस्या है , दबाब बराबर है , अब Blood flow से क्या संबंध , यह तो heart का Department है । सही है , पर heart कितना Force लगायेगा यह तो तय वायमुंडलीय दाब से ही तय होता है ।
Heart इतना Pressure उत्पन्न करेगा कि सारे शरीर में रक्त संचरण अच्छे से हो जाये । हम जानते ही हैं कि Blood vessels की कुल लंबाई लगभग चार लाख किमी हो जाती है , तो इतने बड़े पाइप में Blood flow Proper हो इसके लिये heart को वायुदाब से 120 यूनिट अधिक दबाव देना पड़ता है । मशीन में इसे हम पारे की लंबाई से नापते हैं । प्रश्न ये भी उठ सकता है कि , पारा ही क्यों ? उसका कारण है , पारा सामान्य ताप पर Liquid Form में मिलता है ।
वो तो पानी भी Liquid form में ही मिलता है !
दूसरा और महत्व पूर्ण कारण है , पारा एक धातु है , धातु होने का अर्थ है , इसकी Density Liquids से बहुत अधिक होगी । धातु के गुण और द्रव का स्वभाव ही इसे वायुमंडलीय दबाव का प्रतिनिधि बनाता है । अब उसी 120 पर आते है , अगर heart 120 mm Hg से अधिक दबाव उत्पन्न करे तो क्या Problem है ? बल्कि और भी निश्चित् हो जायेगा कि . अंतिम कोशिका तक Blood पहुँच रहा है , है कि नहीं ? नहीं , शरीर के लिये यहाँ Biology की सावधानियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है , Blood vessels , जैसे - जैसे आगे बढ़ती हैं , पतली होती जाती हैं , Diameter भी कम होता जाता है और thikness भी कम होती जाती है , सबसे अंत में Blood vessel ( अब यह Capilary कहलाती हें )की Thickness लगभग एक कोशिका जितनी रह जाती है , तो स्वाभाविक रूप से दबाव सहने की सामर्थ्य भी कम हो जाती है , इसलिए systen को यह भी देखना पड़ता है कि ' अधिक दबाव का लाभ लेने का उत्साह कहीं capilary को नुकसान ना पहुंचा दे । कभी खेलते हुऐ , Exercise करते हुऐ या अन्य कारण से BP बढ़ता है , बल्कि system के लिये आवश्यक हो जाता है BP को बढ़ाना , तो एक निश्चित समय के लिये एक Range तक की सहनशक्ति capilaries को By defoult मिली ही होती है । पर यदि यह BP 24 X 7 X 365 अर्थात् लगातार बढ़ा हुआ आये तो चिंता का विषय बन जाता है । यदि वायु मंडलीय दाब को सुविधा के लिये शून्य मान लें तो पूरे शरीर को सुरक्षित रूप से proper Blood Supply के लिये 120 unit दबाव आवश्यक होगा । यही औसत आवश्यक दबाव हमारा Syslolic BP कहलाता है । Blood का काम है सामान दे जाना , wastage ले जाना । तो जो Blood आला है वो वापिस भी तो जायेगा , हाँ वापिसी में उतने दबाव की आवश्यक्ता नहीं होगी , पर lower body से भी तो blood वापिस heart की ओर लाना है , और इसी समय Left ventricle में Blood भर भी रहा होता है , यानी heart पूरा Free होना चाहिये , यदि उसमें दबाव है तो उसका volume कम हो जायेगा , आगे की पूरी कहानी खराब हो जायेगी । heart के इसी आराम करने वाले समय जो Blood Pressure होता है उसे Distolyic BP कहते है । ( Simplogy - मोहित पांडे )

नाम से क्यों डरना BRO ?अभी एक फोन आया वो RADICULOPATHY समझना चाह रहे थे , वास्तव में समस्या ये थी कि , एक तो कठिन सा नाम...
06/05/2026

नाम से क्यों डरना BRO ?
अभी एक फोन आया वो RADICULOPATHY समझना चाह रहे थे , वास्तव में समस्या ये थी कि , एक तो कठिन सा नाम , इसे समझें कैसे , और सामने वाले को समझाऐं कैंसे ? " मैंने बोला कि " परेशान होने की आवश्यक्ता ही नहीं है ना , ये RADICULOPATHY तो भाई का School वाला नाम है , है तो ये अपना रिंकू BRO " "मैं समझा नहीं " उन्होंने कहा । मैंने कहा भाई , इस विषय पर एक Article Post कर देता हूँ " .. बड़े - बड़े नाम से प्रभावित होने से अधिक महत्वपूर्ण है , उस नाम का अर्थ और आवश्यक्ता को समझना । आखिर यही नाम क्यों रखा गया ? इस प्रश्न को पकड़ कर चलते हैं , अपने प्रश्न के मूल की ओर चलते है , और उत्तर ढूँढने का प्रयास करते हैं , वास्तव में मूल या जड़ का पुराना Latin अर्थ Radix से हमारे प्रश्न के तार जुड़े हैं , Radix का अर्थ है जड़ / root । LATIN भाषा का एक नियम है कि सूक्ष्म रूप बताने के लिए ula या Culus suffix जोड़ देते हैं । इस प्रकार Radiculas का अर्थ हुआ सूक्ष्म जड़ / Micro roots से संबंधित अध्ययन । Medical science वालों ने SPINE को एक पेड़ के तने की तरह मान लिया , उससे बाहर निकलने वाली NERVE के ROOT को RADICULAS नाम दे दिया । अब अगला Part है PATHY , Pathy का अर्थ है , कष्ट , पीड़ा , दर्द , परेशानी आदि । RADICULOPATHY का अर्थ हो गया , BIOPHYSICAL DISTARBANCE के कारण NERVEROOT में पड़ने वाला दबाव , जो कि upper या lower limb ( हाथ - पैर ) में दर्द , सुन्नपन , चुभन के रूप में महसूस होता है । और ये BIOPHYSICAL DISTARBANCE कुछ नहीं है , आड़ा - तिरछा खड़े होकर शरीर पर बोझ डालने वाली बात है , यानि खड़े होने / बैठने / लेटने की आदतों की छपरी गिरी .. कहने का अर्थ है कि Mr. RADICULO PATHY को समझने के लिये रिंकू भाई से दोस्ती कर लेनी चाहिये , पर ये रिंकुवा उमर में हमसे छोटा है , तो ज्यादा ही Friendly नहीं होना है उसके साथ , उसे Decipline में भी तो रखना है , और उसे अनुशासन में रखने का आसान तरीका Somatogeometry के नियमों का पालन । अरे भाई इस 'Somatogeometry ' शब्द से क्यों घबरा गये , इसका अर्थ वही जो दादी के नियम हैं , करवट लेकर ही लेटो - उठो , बैठ के झाडू - पोछा करो वाले । (सामान्यतयाः इसका संबंध posture और body mechanics से होता है, पर ये disc या अन्य संरचनात्मक कारणों से भी जुड़े हो सकते हैं। और यह Article केवल Basic जानकारी के लिये है ) अगर हाथ की उंगलियों में चींटियाँ (Tingling) चल रही हैं, तो समझ लो रिंकू भाई की Friend request आ चुकी है ... ( Simplogy - Mohit Pandey )

हे भगवान तू फिर आ गया !बहुत बार यह देखने में आता है कि , LMNT treatment के बाद लगता है कि सब ठीक हो गया , No pain , No s...
06/05/2026

हे भगवान तू फिर आ गया !
बहुत बार यह देखने में आता है कि , LMNT treatment के बाद लगता है कि सब ठीक हो गया , No pain , No stiffness , good energy level , good Entheuism . पर कुछ समय बाद ' वो ही दर्द भरे दिन ' फिर लौट आते हैं , कभी लंबी यात्रा के बाद , कभी किसी पारिवारिक - सामाजिक समारोह में सक्रिय भागीदारी के बाद , कभी कुछ खाने - पीने के बाद , कभी खाँसी - बुखार के बाद । ये ' वापिसी ' थैरेपिस्ट और पेशेंट दोनों के लिये पहेली बन जाती है , क्यों - कैसे की अनुत्तरित उलझन सामने आ जाती है ।
वस्तुतः हमें ठीक हो जाने और ठीक हो रहे होने में अंतर को समझना पड़ेगा ।
दर्द , जकड़न नहीं होना , ऊर्जा , उत्साह में बृद्धि का अर्थ है कि , दर्द देने वाला कारक निष्क्रिय या शांत ( Remission ) अवस्था में चला गया है ।
Rheumatoid Arthritis (RA) एक autoimmune और chronic disease है। इसका मतलब यह है कि यह “पूरी तरह खत्म” नही होती है, बल्कि remission (शांत अवस्था) और flare (उभार) के रूप में चलती रहती है।
Autoimmunity वास्तव में शरीर की ज्यादा ही चिंता करने जैसी प्रवृति है , कुछ भी परिवर्तन होने पर Alert होते - होते Active भी हो जाती है । बारिश में छाता लेना ठीक है , पर पोपट लाल की तरह छाते के छाती से चिदकाऐ रखने से मजाक बनता है । ये Autoimmunity भी बैचेन आत्मा की तरह शरीर को परेशान करके रख देती है । Disciplined immunity में ऊपर से साहब के order आने के बाद action होता है , पर Auto immunity में साहब को कोई नही पूछता , गुंडागर्दी शुरू हो जाती है ।
कहावत है ना 'जैसी संगत - वैसी रंगत ' ठीक वैसे ही बाहरी कारक , शरीर के अंदर के गुंडो को active कर देते हें , तो यह हमें ही manage करना पड़ेगा कि बाहरी तत्वों को कैसे Control किया जाये ? अर्थात् दैनिक जीवन की सावधानियां ..
LMIT Treatment से क्या हुआ ?
पहले पेशेंट को आराम मिला

यानी RA remission में चला गया ।

शरीर में सूजन और दर्द कम हो गया

disease activity low हो गई
लेकिन अंदर की प्रवृत्ति (autoimmune tendency) पूरी तरह खत्म नहीं हुई
फिर symptoms क्यों आए?
पारिवारिक समारोह में,
ज्यादा शारीरिक मेहनत
थकान
संभवतः नींद/खानपान में गड़बड़ी
मानसिक/भावनात्मक तनाव
ये सभी मिलकर trigger बन सकते हैं, जिससे RA फिर से flare-up दे सकता
पेशेंट remission में था, लेकिन overexertion (अधिक श्रम) ने disease को फिर से activate (flare) कर दिया।
ध्यान दीजिये ये दर्द जकड़न ( बिमारी का नाम जो भी हो ) शरीर स्वस्थ था , फिर कुछ ( शारीरिक , सामाजिक , मानसिक , आहार संबंधी ) कारकों ने शरीर को प्रभावित किया , तो ये परेशानियां उत्पन्न हुई । कहने का अर्थ है कि वाह्य कारको का प्रभाव , शरीर पर पड़ता ही है , इसलिए अपने शरीर की सीमा - सामर्थ्य को समझकर , इन कारको का प्रबंधन करना चाहिये ।
अपने LMNT therapist से सम्पर्क में रहें , स्वस्थ रहें , प्रसन्न रहें ।
फिर ' हे भगवान , तू फिर आ गया ' नहीं कहना पड़ेगा , बल्कि मन से आवाज आयेगी ' हे भगवान , स्वस्थ शरीर और प्रसन्न मन के लिये तेरा धन्यवाद ' ....
( Simplogy - Mohit Pandey )

09/04/2026

इतनी शक्ति हमें देना दाता ..
हमारे क्लीनिक्स का आरम्भ इसी प्रार्थना से होता है । साकारत्मक शक्ति का निवेदन । ऐसे ही हमारे शरीर को भी शक्ति की आवश्यक्ता होती है । पर शक्ति के प्रबंधन का उत्तरदायित्व है थायरायड चन्द्र के पास । चन्द्र शब्द जोड़ने का उद्देश्य यह समझाना है कि जैसे चंद्रकलाओं के घटने से अंधकार बढ़ता है वैसे ही थायरायड के कम काम करने से विषाद / स्फूर्तिहीनता / थकान बढ़ने लगती हैं ।
पहले थोड़ा Anatomical introduction हो जाये , ये सभी Endocrine glands में सबसे बड़ी ग्रंथि है ।
यानि छोटे - छोटे भाइयों के बड़े भय्या ..
जिस उम्र में सामर्थ्य शिखर पर होनी चाहिये , थायरायड की आलसी प्रवृति ( Hypomode ) बिल्कुल निस्तेज , निर्बल , निरुत्साहित बना देता है ।
Endocrine gland अर्थात् जैसे जिले का जिलाधिकारी । वह व्यवस्था नहीं बनाता वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से व्यवस्था बनवाता है ।
ऐसे ही थायरायड चंद्र के दो अधिकारी है ,
1 - Triiodotyronin ( lodine के 3 Molicule )
2 - Tetraiodotyronin ( lodine के 4 Molicule )
( Tri - 3 , Tetra - 4 )
यहाँ थोड़ा ध्यान दीजिये , हम भोजन में सीधा आयोडीन को नहीं लेते , बल्कि उसका अक्रिय रूप lodide लेते है , जो oxygen का साथ पाकर ( oxydation ) lodine में बदल जाता है । यही आगे सारा काम करता है । lodide एक फसल है , जिसे बाजार में बेचकर पैसा मिलेगा । अब इस पैसे को आप इच्छानुसार उपयोग कर सकते हें । lodine वही पैसा है ।
अब जैसे अलग अलग देश की currency भी अलग अलग होती है , वैसे ही यहाँ भी है , Thyroid सीधे lodine को मान्यता नहीं देता , उसकी मुद्रा है MONOIODOTYRONIN . इस समस्या को सुलझाने वाले Agent का नाम है TYROSINE Amino acid , जिससे जुड़कर यह lodine MIT अर्थात् Monoiodotyronin यानि Thyroid की मुद्रा में बदल जाता है । यहाँ तनिक व्यवहारिक रूप से देखिये तो एक रूपए के सौ नोट रखने से अच्छा है कि सौ रुपये का एक नोट रखा जाय , मूल्य वही झंझट नहीं । तो दो MIT मिलकर DIT ( DIIODOTYRONIN ) बनाते हैं , और फिर
MIT + DIT = T3
DIT + DIT = T4
ये T3 और T4 ही वो अधीनस्थ अधिकारी है , जिन पर अभी बात की थी ।
इसमें से T3 दया और अभिजीत की तरह Active mode में रहते हैं पर T4 अपने ACP प्रद्युम्न की तरह ऑफिस से कमान संभालते है , हाँलाकि जरूरत पड़ने पर यह स्वयं भी Field में active हो जाते है ( T4 भी T3 में ही टूट जाता है ) ...
प्रश्न ये है कि Thyroid अगर जिलाधिकारी है तो उसके ऊपर भी तो कोई व्यवस्था होगी ना ?
है ना , PTUTARY और HYPOTHALA MUS ..
​HYPOTHALAMUS (कैबिनेट मिशन):
यह शरीर का 'सुप्रीम कमांडर' है। यह लगातार जिले (शरीर) की रिपोर्ट लेता रहता है। जैसे ही इसे लगता है कि जिले में ऊर्जा (शक्ति) की कमी हो रही है, यह एक विशेष फैक्स भेजता है जिसे TRH (Thyrotropin-Releasing Hormone) कहते हैं।
​PITUITARY (मुख्य सचिव/सचिवालय):
हाइपोथैलेमस का फैक्स मिलते ही, सचिवालय (पिट्यूटरी ग्रंथि) हरकत में आता है। यह TSH (Thyroid Stimulating Hormone) नाम का 'सरकारी आदेश' जारी करता है।
​TSH का काम: यह जिलाधिकारी (थायराइड) के कार्यालय में जाकर आदेश की copy दे देता है , ऊपर से आदेश तो तुरंत क्रियान्यवन होता है— काम शुरू करने के लिये , T-3 और T-4 को case handover ...
प्रशासनिक तालमेल: 'नेगेटिव फीडबैक' का चक्र
​जब T3 और T4 फील्ड में बहुत ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, तो सचिवालय और सुप्रीम कमांडर को इसकी 'रिपोर्ट' मिल जाती है।
​फाइल क्लोजर (Negative Feedback): जैसे ही अधिकारियों की संख्या (हार्मोन लेवल) पर्याप्त होती है, सुप्रीम कमांडर (Hypothalamus) अपना फैक्स (TRH) भेजना बंद कर देता है और सचिवालय (Pituitary) अपना जैवरासायनिक आदेश (TSH) रोक देता है।
​अनुशासन: यह अनुशासन ही शरीर को 'हाइपर' (अति-सक्रिय) होने से बचाता है।
​सचिवालय (Pituitary) की 'कड़ी नज़र'
जब THYROD आलसी होकर काम नहीं करता, तो सचिवालय (Pituitary) बार-बार और सख्ती से आदेश भेजता है।
​चिकित्सीय संकेत: इसीलिए जब ब्लड रिपोर्ट में TSH बढ़ा हुआ आता है, तो उसका मतलब है कि सचिवालय 'चिल्ला' रहा है क्योंकि Mr. Thyriod काम नहीं कर रहे हैं ..
परिणाम (Hypothyroidism)।

( Simplogy - Mohit Pandey )

07/04/2026

L-6: सच या भ्रम? ​
आमतौर पर इंसान की कमर में 5 कशेरुकाएँ (Vertebrae) होती हैं, जिन्हें L1 से L5 तक गिना जाता है। लेकिन कई बार X-ray या MRI रिपोर्ट में 'L6' का जिक्र आता है, जो लोगों के बीच कौतूहल और भ्रम पैदा करता है। वास्तव में यह कोई अतिरिक्त हड्डी नहीं, बल्कि रीढ़ की बनावट में एक बदलाव है। ​

1. Lumbarization: जब S1 अलग दिखने लगे ​इसका मतलब यह है कि जब Sacrum का संलयन (Fusion) अधूरा रह जाता है, तो S1 का अलग अस्तित्व महसूस होता है। यह एक स्वतंत्र मनके की तरह व्यवहार करने लगता है और छठे Vertebra जैसा दिखने लगता है। मेडिकल भाषा में इसे Lumbarization कहते हैं। ​

2. Sacralization: जब एक मनका कम हो जाए ​इसके विपरीत, अगर Lumbar का आखिरी मनका (L5) Sacrum से चिपक जाए या उसमें समा जाए, तो वहां एक मनका कम महसूस होता है। इस स्थिति को Sacralization कहा जाता है। ​
शरीर पर इसका प्रभाव ​-
इन दोनों ही Conditions में Body mechanics और load distribution में परिवर्तन हो सकता है, जिससे कुछ व्यक्तियों में निचले कमर क्षेत्र पर अतिरिक्त stress महसूस हो सकता है।
संख्या बल से महत्वपूर्ण है , किसी भी बिंदु पर लगने वाला प्रभावी बल (Effective force) ...
और ,
L6 गिनती का नहीं,
बलों के संतुलन का विषय है।

(Simplogy - Mohit Pandey)

20/03/2026

THE 33 - देह में देव
​'तैतीस कोटि देवता'
आइये इस वाक्यांश की व्याख्या करें। तैतीस अर्थात् 33, इससे तो हमारा पुराना परिचय है। 'कोटि' का अर्थ है प्रकार (Category), जैसे सचिन तेंदुलकर उच्च कोटि के बल्लेबाज हैं।
​अब आते हैं देवता पर। देवता शब्द की मूल धातु 'द्यु' है। द्यु का अर्थ है प्रकाश। इसी से 'द्युति' शब्द बना है। देवता का अर्थ हुआ—प्रकाश देने का भाव, या प्रकाश देने वाला। सूर्य के प्रकाश की बात करें तो इसमें सात तरंगदैर्ध्य (Wavelengths) हैं— 'सप्ताश्व रथी सूर्य देव'। फिर आप Infrared (अवरक्त) और Ultraviolet (पराबैंगनी) की बात करें तो इनमें कई तरंगदैर्ध्य होंगी। ये प्रकाश के ही विभिन्न प्रकार या कोटियाँ हैं।
​द्युति, प्रकाश या चमक का सीधा संबंध जैव विद्युत तरंग (bio electrical signals) से है। विद्युत का ही एक प्रकार हमारे शरीर को ऊर्जा दे रहा है।
​“द्युतिरेव जीवनस्य मूलम्।”
​शरीर की द्युति का मूल है मस्तिष्क (Brain) और यहाँ से Spinal Cord (मेरु रज्जू) से होते हुए यह पूरे शरीर में विचरण करती है।
​मेरुदण्डे स्थिता द्युति:, सूक्ष्ममार्गेण गच्छति।
नाडीषु सञ्चरन्ती सा, देहं सञ्चालयत्यपि॥
​मस्तिष्क से bioelectrical signals के रूप में आने वाले आदेशों का क्रियान्वयन Spinal Cord ही करती है।
​सम्यग्द्युति: प्रवर्तेत, जीवनं भवति पूर्णकम्।
सम्यग् मेरुदण्डयुक्ते, सुखमस्ति निरन्तरम्॥
​ऊर्जा के प्रवाह का उत्तरदायित्व निभाने वाले Spinal Cord या मेरु की रक्षा करने वाले भी तो विशेष ही होंगे! Spinal Cord अर्थात् Most Protected Entity (अत्यंत सुरक्षित इकाई) और इसकी रक्षा करता है मेरुदंड (Spinal Column)।
​मेरुदंड अर्थात् कुछ Vertebrae (कशेरुकाओं) का संयोजन। कितनी कशेरुकाएँ? 33!
​जो हमारे जीवन की रक्षा करें, जीवन को शक्ति दें, शव को शिव बनाएँ (क्योंकि निष्प्राण, ऊर्जाहीन शरीर तो शव ही है), तो वे तो देवता ही हुए। ये सभी Vertebrae आकार, प्रकार और संरचना में भिन्न-भिन्न हैं। ये 33 भिन्न-भिन्न प्रकार या कोटियों वाले देवता, जो हमारे शरीर को जीवन देते हैं, उन्हें नमस्कार करना ही चाहिए।
​देवा न दूरदेशस्थाः, न दिवि न च स्वर्गस्तथा।
मेरुदण्डे स्थिताः सर्वे, द्युतिरूपेण चेतसि॥
​( मोहित पांडे )

॥ सर्वे सन्तु निरामया ॥​सेवा | समर्पण | स्वास्थ्य | स्वावलंबन | समृद्धी​“औषधाशिवाय अद्भुत उपचार पद्धती”नैसर्गिक व वैज्ञा...
06/03/2026

॥ सर्वे सन्तु निरामया ॥
​सेवा | समर्पण | स्वास्थ्य | स्वावलंबन | समृद्धी
​“औषधाशिवाय अद्भुत उपचार पद्धती”
नैसर्गिक व वैज्ञानिक सिद्धांताच्या संगमातून साकारलेली उपचार पद्धती
​ही पद्धत डॉ. लाजपतराय मेहरा यांच्या संशोधनातून विकसित झाली असून, महर्षि पतंजलींच्या योग सूत्रावर (३.२९ - "नाभिचक्रे कायाव्यूहज्ञानम्") आधारित आहे. नाभीला केंद्रस्थानी मानून शरीरातील रसायनांचे संतुलन साधणे, हे या पद्धतीचे मुख्य वैशिष्ट्य आहे.
​खालील व्याधींवर प्रभावी उपचार:
​विशेष उपचार: मणक्याचे त्रास, मतिमंदत्व आणि विकलांगता.
​पोटाचे विकार: मधुमेह, आम्लपित्त (Acidity), भूक न लागणे.
​श्वसन विकार: दमा, अस्थमा, खोकला.
​हाडे व सांधे: मान, कंबर, गुडघेदुखी, सायटिका, संधिवात, आमवात.
​इतर: मिर्गी (फीट येणे), हृदयविकार, अर्धांगवायू (Paralysis), लठ्ठपणा, मूतखडा, किडनी विकार, स्त्रियांच्या शारीरिक समस्या.
​एक महत्त्वाचा विचार:
मतिमंदत्व किंवा विकलांगता हा कोणताही 'दैवी प्रकोप' नसून शरीरातील रसायनांचे असंतुलन असू शकते. न्यूरोथेरपीद्वारे रसायनांचे संतुलन साधून आणि ऑक्सिजनचा पुरवठा वाढवून यात लक्षणीय सुधारणा करता येते.
​आपले स्वास्थ्य, हीच राष्ट्राची संपत्ती!
२००३ पासून निरंतर सेवारत:
​मोहित पांडे
(निष्णात LMNT Therapist )
​📞 संपर्क: 8275828165 / 9028988165
☘️आरोग्यम् धन संपदा☘️
आयुष्मान भव: तुमचे आरोग्य तुमच्या हातात🤝 , स्वतः वर 🫂कृपा करा 🙏

14/02/2026

साढ़े तीन ADR
ADR – RUB STRUCTURAL DOCTRINE
ADR Treatment के लिये जो व्यवस्था दी गई है , उसका विश्लेषण निम्नवत् है ।
FRME WORK -

ADR–RUB प्रणाली चार मूल स्तंभों पर आधारित है:
a) Pattern Completion Logic
यह केवल calculation नहीं है।
Pattern तब पूर्ण माना जाएगा जब उसका Matrix पूरा हो जाए।
b) Vertical Integrity . Method
ऊपर-> बीच -> नीचे
यह क्रम Step-by-Step पूर्ण किया जाएगा।

c) Fixed Structural Framework
संरचना (Frame) स्थिर है:
Vertical cycles = 2
Horizontal Positions = 3
फ्रेम नहीं बदलता।
d) Variable Intensity Application
Intensity (ADR का मान) बदल सकता है।

SCALE -
ADR के लिये scale
1 ADR = 2 RUB है ।
परंतु यह ऊपर , बीच में , नीचे एक पूरा Set होने के बाद फिर ऊपर, बीच में , नीचे होता है । मतलब Vertically step by step आना है ।
ये नहीं कि ऊपर पूरा , किया फिर बीच में फिर नीचे पूरा किया । Horizontall set नहीं है ।
जैसे
(1) ADR -
1 1 1
1 1 1
(2) ADR
2 2 2
2 2 2
(6) ADR
6 6 6
6 6 6
जितना ADR देना है उसकी Double Rubbing होगी ।
( X ) ADR
X X X
X X X
( RUB )
3 AND 1/2 ADR के लिये RUBBING होंगी 7
जिन्हे 4 +3 में देंगे ।
पहले 3 RUB दो बार ( 3 ADR ) पूरा फिर 3 का एक ही Set देने से Total Rub हो जायेंगे - 9, और यह हो जायेगा 4 and 1/2 ADR .

14/02/2026

वेलेंटाइन डे , फागुनी बयार और कारण
जीवन के 48 साल बीत गये , फागुन का आनन्द तो खूब लिया , जिया भी और ' नदिया के पार ' में देखा भी ।
पर इस वेलेंटाइन का पता अब चला । इस उमर में ' मन्नू तेरा हुआ अब मेरा क्या होगा ? भी नहीं गा सकते तो ईर्ष्या के वशीभूत होकर लाया हूँ ' आपके आज के आनन्द का MOOD OFF करने वाली Post .
मिलते ही आँखे दिल हुआ दीवाना किसी का ...
ना देखूँ तो चैन मुझे आता नहीं है ..
सामने यूँ ही बैठी रहो..
सामने जब तुम आते हो दिल धक से मेरा रह जाता है ...
नायक / नायिका गाना गाकर अपनी भावनाऐं व्यक्त कर रहे हैं ।
ये जो दिल धक से रह जा रहा है ना इसके पीछे ' लड़ो या भागो वाला ' fight OR flight वाला NOREPINEPHRIN bro का हाथ है ।
जिन्हे ताजा - ताजा प्यार हुआ है उन्हें समझ में आ रहा होगा कि ' उनके ' सामने आने पर कैसा महसूस होता है ?
ये वैसा ही होता है जैसा शेर के सामने आने पर होगा । ( आपकी शेर / शेरनी आप देख लो ) ..
एक और हैं , श्रीमान DOPAMINE SIR . जब ये हमारे शरीर में walk के लिये निकलते हैं तो हमें बहुत अच्छा महसूस होता है । इस समय होने वाली अनुभूति को कोकीन की अनुभूति जैसा कहा जाता है ।
ये अनुभूति तब भी होती है जब ..
रात भर मोबाइल में टिक टिक चैटिंग चल रही होती है ...
फोन पर घंटे - घंटे बात हो रही होती है ।
जब नायक और नयिका
'चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो '
गा रहे होते हैं तो ,
वास्तव में वे चाँद से एक चम्मच ENDOR PHIN लाने का सोच रहे होते हैं ...
( मोहित पांडे )

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