Anilyoga

Anilyoga Promotion and propagation of Yoga and Naturopathy. I am always there for improvement in " YOUR" ph

त्रिफला चूर्ण एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि है त्रिफला मुख्य रूप से कब्ज, अपच और पेट की गैस को ठीक करने के लिए उपयोग की जा...
13/08/2026

त्रिफला चूर्ण एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि है

त्रिफला मुख्य रूप से कब्ज, अपच और पेट की गैस को ठीक करने के लिए उपयोग की जाती है।

यह तीन प्राकृतिक फलों—आंवला, बहेड़ा और हरड़ (हरितकी)—के समान मिश्रण से बनती है, जो पाचन तंत्र को साफ और स्वस्थ रखते हैं।

मुख्य घटक (Ingredients)

1. आंवला (Amalaki):

यह पाचन सुधारने और शरीर को विटामिन सी देने में मदद करता है।

2. हरड़ (Haritaki):

यह मल को नरम करके पेट साफ करने का काम करती है।

3. बहेड़ा (Bibhitaki):

यह आंतों की सफाई और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करती है।

मुख्य फायदे (Key Benefits)

1. कब्ज से सुरक्षित और असरदार राहत देता है✅

2. पाचन शक्ति और मेटाबॉलिज्म को मजबूत बनाता है✅

3. शरीर से हानिकारक टॉक्सिन (विषाक्त पदार्थ) बाहर निकालता है

4. एसिडिटी और पेट फूलने की समस्या को कम करता है✅

उपयोग करने का तरीका (Dosage)आधा से एक चम्मच (3 से 6 ग्राम) चूर्ण।इसे रात को सोते समय गुनगुने पानी या हल्के गर्म दूध के साथ लेना सबसे अच्छा माना जाता है।

13/08/2026
12/08/2026
कपालभाति के तीन प्रकार
11/08/2026

कपालभाति के तीन प्रकार

मॉनसून में बढ़ गया है वात? अपनाएं ये योग अभ्यास और क्रियाएं
09/08/2026

मॉनसून में बढ़ गया है वात? अपनाएं ये योग अभ्यास और क्रियाएं

पंचदृष्टिपाँच प्रकार की दृष्टियों का वर्णन स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी जी ने अपनी पुस्तक "यौगिक सूक्ष्म व्यायाम" में किया...
02/08/2026

पंचदृष्टि
पाँच प्रकार की दृष्टियों का वर्णन स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी जी ने अपनी पुस्तक "यौगिक सूक्ष्म व्यायाम" में किया है।

तिर्यक भुजंगासन
31/07/2026

तिर्यक भुजंगासन

सोरायसिस एक ऐसी दीर्घकालिक और जटिल त्वचा की समस्या है जो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि व्यक्ति के ...
28/07/2026

सोरायसिस एक ऐसी दीर्घकालिक और जटिल त्वचा की समस्या है जो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालती है। त्वचा पर उभरने वाले लाल चकत्ते, उन पर जमी चांदी या सफेद रंग की सूखी पपड़ी, और लगातार बनी रहने वाली खुजली या जलन इस स्थिति के आम लक्षण हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इसे मुख्य रूप से एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर माना जाता है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से स्वस्थ त्वचा कोशिकाओं पर हमला कर देती है और उनकी वृद्धि को अत्यधिक तेज कर देती है। हालांकि, आयुर्वेद इस समस्या को केवल त्वचा तक सीमित न मानकर इसे पूरे शरीर के आंतरिक असंतुलन, विशेष रूप से दोषों और रक्त की शुद्धि से जोड़कर देखता है।
आयुर्वेद के दृष्टिकोण से, शरीर में होने वाली हर गतिविधि 'त्रिदोष' यानी वात, पित्त और कफ के संतुलन पर आधारित होती है। जब हम अपनी शारीरिक प्रकृति के विपरीत खान-पान, जीवनशैली या तनावपूर्ण आदतों को अपनाते हैं, तो ये दोष असंतुलित हो जाते हैं। सोरायसिस के संदर्भ में, मुख्य रूप से वात और पित्त दोष का असंतुलन और रक्त की अशुद्धता (रक्तदूष्टि) जिम्मेदार मानी जाती है। जब शरीर में दूषित रक्त और असंतुलित दोष त्वचा की गहरी परतों में जाकर जमा हो जाते हैं, तो वे त्वचा की कोशिकाओं में सूजन पैदा करते हैं और शुष्क पपड़ी के रूप में बाहर प्रकट होते हैं। इस विषय को गहराई से समझना और इसके आयुर्वेदिक कारणों तथा समाधानों को जानना इस बीमारी के प्रबंधन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आयुर्वेद में 'रक्तदूष्टि' यानी रक्त का दूषित होना इस प्रकार की त्वचा समस्याओं का मूल कारण माना जाता है। हमारा रक्त पूरे शरीर को पोषण देता है और प्राण ऊर्जा का संचार करता है। जब हम अत्यधिक मसालेदार, तली-भुनी, खट्टी, या कृत्रिम पदार्थों से युक्त चीजों का सेवन करते हैं, तो हमारे पाचन तंत्र में 'आम' (विषाक्त पदार्थ) का निर्माण होता है। यह विषैला पदार्थ हमारे पाचक रस और रक्त में मिलकर उसकी गुणवत्ता को बिगाड़ देता है। दूषित रक्त जब त्वचा की सूक्ष्म वाहिकाओं तक पहुंचता है, तो वहां की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे त्वचा में सूजन, लालिमा और रुखापन उत्पन्न होता है।
इसके अलावा, वात और पित्त दोष की भूमिका को भी समझना महत्वपूर्ण है। वात दोष अपनी शुष्क और ठंडी प्रकृति के कारण त्वचा में अत्यधिक रुखापन और पपड़ी बनने की स्थिति पैदा करता है, जबकि पित्त दोष अपनी गर्म और तीखी प्रकृति के कारण त्वचा में जलन, सूजन और लाल चकत्ते का कारण बनता है। जब वात और पित्त दोनों एक साथ असंतुलित होकर रक्त को दूषित करते हैं, तो सोरायसिस जैसे गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं। आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध और अनियमित दिनचर्या इन दोषों को और अधिक भड़काने का काम करती है।
सोरायसिस होने के पीछे कई प्रमुख कारण और ट्रिगर हो सकते हैं, जिन्हें समझना इसके नियंत्रण में मदद करता है:
1. रक्तदूष्टि (रक्त की अशुद्धि): जैसा कि स्पष्ट किया गया है, दूषित रक्त इस स्थिति का मुख्य शारीरिक कारण है। जब रक्त में अशुद्धियां बढ़ जाती हैं, तो त्वचा का प्राकृतिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है।
2. अस्वास्थ्यकर आहार और खान-पान की आदतें: अत्यधिक तैलीय, मसालेदार, खट्टे, और फास्ट फूड का सेवन करना। इसके अलावा, दूध और खट्टी चीजों का एक साथ सेवन करना (विरुद्ध आहार) आयुर्वेद के अनुसार रक्त और त्वचा के लिए बेहद हानिकारक माना जाता है, जो सोरायसिस को बढ़ावा देता है।
3. अत्यधिक मानसिक तनाव और चिंता: तनाव हमारे तंत्रिका तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली को सीधे प्रभावित करता है। मानसिक तनाव के कारण शरीर में हॉर्मोनल असंतुलन होता है, जो सोरायसिस के लक्षणों को अचानक गंभीर (flare-ups) बना सकता है।
4. वात और पित्त का असंतुलन: जीवनशैली की गड़बड़ी और गलत खान-पान से वात और पित्त का बढ़ना त्वचा की कोशिकाओं के विकास चक्र को बिगाड़ देता है, जिससे त्वचा पर परतें जमने लगती हैं।
5. आनुवंशिक कारण और पारिवारिक इतिहास: कई मामलों में सोरायसिस परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा होता है, जिसका अर्थ है कि कुछ व्यक्तियों में इसके प्रति आनुवंशिक प्रवृत्ति होती है।
6. पर्यावरणीय कारक और त्वचा की क्षति: अत्यधिक ठंड का मौसम, त्वचा का रूखापन, या त्वचा पर किसी प्रकार की चोट या खरोंच भी इस समस्या को ट्रिगर कर सकती है।
आयुर्वेद इस समस्या के समाधान के लिए केवल ऊपर से मलहम लगाने के बजाय इसके मूल कारणों यानी 'रक्तदूष्टि' और दोषों के संतुलन को ठीक करने पर जोर देता है। इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाता है, जिसमें आंतरिक शुद्धि, आहार में बदलाव और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का उपयोग शामिल है:
1. शोधन चिकित्सा (पंचकर्म): आयुर्वेद में रक्त की शुद्धि और गहरी सफाई के लिए पंचकर्म चिकित्सा को सबसे प्रभावी माना जाता है। इसमें विरेचन (औषधीय रेचक) और रक्तमोक्षण जैसी प्रक्रियाएं शरीर से विषाक्त पदार्थों और दूषित रक्त को बाहर निकालने में मदद करती हैं।
2. रक्तशोधक जड़ी-बूटियाँ: नीम, मंजिष्ठा, गिलोय, और हल्दी जैसी जड़ी-बूटियाँ प्राकृतिक रक्तशोधक (blood purifiers) के रूप में काम करती हैं। ये रक्त को शुद्ध करती हैं, सूजन को कम करती हैं और त्वचा की कोशिकाओं को स्वस्थ बनाती हैं।
3. वात और पित्त को शांत करने वाला आहार: अपने आहार में ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, और आसानी से पचने वाले हल्के भोजन को शामिल करें। अत्यधिक मसालेदार, खट्टे और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों से पूरी तरह परहेज करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं ताकि शरीर हाइड्रेटेड रहे।
4. तनाव प्रबंधन और मानसिक शांति: योग, प्राणायाम (जैसे अनुलोम-विलोम और भ्रामरी), और ध्यान का नियमित अभ्यास करने से मानसिक तनाव कम होता है, जो सोरायसिस को नियंत्रित करने में एक बहुत बड़ा कदम है।
5. बाहरी देखभाल और स्नेहन: त्वचा के रूखेपन को दूर करने के लिए शुद्ध नारियल का तेल, एलोवेरा जेल, या आयुर्वेदिक medicated तेलों (जैसे महामंजिष्ठदि तेल) का नियमित रूप से उपयोग करना त्वचा को राहत देता है और पपड़ी को कम करता है।
सोरायसिस का सामना करना मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाला हो सकता है, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि संतुलन ही इसका वास्तविक समाधान है। इसे केवल एक बाहरी त्वचा रोग न मानकर अपने जीवन की आंतरिक प्रणालियों को सुधारने का अवसर मानना चाहिए। स्वस्थ रक्त, संतुलित दोष और शांत मन ही स्वस्थ त्वचा की कुंजी हैं। यदि यह समस्या अत्यधिक गंभीर हो जाए या लंबे समय तक बनी रहे, तो किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेना चाहिए ताकि उचित और व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

प्राणायाम
28/07/2026

प्राणायाम

Address

Dwarka D D A Sports Complex
New Delhi
110075

Opening Hours

Tuesday 6am - 8:30pm
Wednesday 6am - 8:30pm
Thursday 6am - 8:30pm
Friday 6am - 8:30pm
Saturday 6am - 8:30pm
Sunday 6am - 9am

Telephone

9871624282

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Anilyoga posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Anilyoga:

Shortcuts

Share