02/09/2026
Operation Sindoor में पाकिस्तान के ऊपर जो विमान उड़े, उनका हुक्म देवरिया के इस आदमी का था... अब यही आदमी रामलला के चढ़ावे का एक-एक पैसा गिनेगा। नाम है जीतेंद्र मिश्रा... रिटायर्ड एयर मार्शल, और अब अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट के पहले CEO। पहले इसलिए, क्योंकि ये कुर्सी कल तक थी ही नहीं... ट्रस्ट ने इसे बनाया ही अभी है।
जीतेंद्र मिश्रा कौन ?
जीतेंद्र मिश्रा देवरिया के हैं और करीब 39 साल वर्दी में रहे। 1986 के दिसंबर में वो एयरफोर्स में fighter pilot बनकर घुसे थे, और 2026 की 30 अप्रैल को एयर मार्शल की रैंक पर वहां से निकले। बीच के इन सालों में उन्होंने वो सब किया जो एक लड़ाकू पायलट का सपना होता है... लड़ाकू squadron की कमान, दो हवाई अड्डों की कमान, और test pilot का वो काम जिसमें नया विमान सबसे पहले आप उड़ाते हैं, ये जांचने के लिए कि उसमें कोई खोट तो नहीं। और उड़ान का हिसाब सुनिए... 3,000 घंटे से ऊपर, यानी अगर लगातार उड़ते रहें तो करीब 4 महीने ज़मीन पर पैर ही न पड़े।
पर उनकी नौकरी का सबसे बड़ा मोड़ 2025 का पहला दिन है। उस दिन उन्होंने दिल्ली में पश्चिमी वायु कमान संभाली... ये एयरफोर्स का वो हिस्सा है जो पाकिस्तान की तरफ वाली पूरी सरहद देखता है। उसी साल मई में पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर हुआ, जिसमें पाकिस्तान के अंदर बैठे आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए गए। जिस कमान के विमान उड़े, उसके सबसे बड़े अफसर यही थे। इसके बाद उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल मिला... युद्ध के वक्त की सेवा का सबसे बड़ा सम्मान। तो ऐसे आदमी को रिटायर होने के 4 महीने के अंदर मंदिर ने क्यों बुलाया?
तीन नए ट्रस्टी कौन ?
तीन नए ट्रस्टियों में सबसे पुरानी कहानी अयोध्या के वकील मदन मोहन पांडेय की है। ये वो आदमी हैं जो राम जन्मभूमि और बाबरी विवाद में रामलला की तरफ से मुकदमा लड़ने वाली टीम में रहे... इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक। 2024 में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके 51 साल की वकालत की सबसे बड़ी जीत था। सोचिए, जिस जमीन के लिए आधी जिंदगी कागज़ और दलीलें जुटाईं, अब उसी मंदिर की मेज़ पर बैठेंगे।
दूसरे हैं दिल्ली के कारोबारी महेश भागचंदका... जिनका घर उस अशोक सिंघल से जुड़ा है जो राम मंदिर आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद का चेहरा थे। सिंघल के नाम का foundation आज यही चलाते हैं। 2020 के भूमि पूजन में जब मंदिर की नींव रखी गई, उस पूजा के मुख्य यजमान यही थे... यजमान मतलब वो जिसके नाम से पूजा होती है। जनवरी 2024 की प्राण-प्रतिष्ठा में भी यजमान यही। यानी मंदिर की दोनों सबसे बड़ी रस्मों में जो आदमी सबके सामने बैठा था, अब वो फैसले वाले कमरे में भी है।
तीसरा नाम इतिहास बना रहा है... शिकोहाबाद की निर्मला यादव, संघ से जुड़ी, और इस ट्रस्ट की पहली महिला ट्रस्टी। 2020 में बने इस ट्रस्ट में आज तक एक भी महिला नहीं थी। तीनों नाम एक ही परिवार से हैं... संघ, परिषद और मुकदमे वाला परिवार। और यहीं से असली सवाल निकलता है... इतने अपनों के बीच बाहर से आया fighter pilot किसकी सुनेगा?
CEO का बॉस कौन ?
CEO का बॉस महासचिव होगा। ट्रस्ट ने साफ कहा है कि ये अफसर सरकार को नहीं, ट्रस्ट के महासचिव को रिपोर्ट करेगा और उस पर कोई सरकारी दखल नहीं होगा। पर आज की तारीख में महासचिव की कुर्सी पर कार्यवाहक बैठे हैं। यानी जो आदमी पूरी उम्र फौज की सीधी चेन ऑफ कमांड में रहा, वो अब उस कुर्सी के नीचे काम करेगा जो खुद अभी अस्थायी है।
अयोध्या का ये ट्रस्ट फरवरी 2020 में बना। उसके बाद मंदिर की नींव पड़ी, दीवारें उठीं, प्राण-प्रतिष्ठा हुई, और करोड़ों लोग दर्शन करके लौटे... इन साढ़े 6 सालों में किसी को CEO की ज़रूरत नहीं पड़ी। ज़रूरत तब पड़ी जब भक्तों के दानपात्र से पैसा गायब होने का मामला बाहर आया। जीतेंद्र मिश्रा ने 39 साल वो आसमान संभाला जहां गलती की कीमत जान होती है... अब उन्हें वो दानपात्र संभालना है जहां गलती की कीमत भरोसा होती है। और आप बताइए... भरोसा एक अफसर के नाम से लौटता है, या उस कागज़ से जो अभी लिखा नहीं गया?