17/12/2023
माँ वनदेवी की कृपा आशीर्वाद और सतत संरक्षण व मार्गदर्शन
पुस्तक: गाथा वनदेवी महाधाम की
लेखक: चन्द्रशेखर/ महिमा शर्मा, अमहरा
माँ वनदेवी की कृपा सर्वविदित है। शरणागत को हर मुश्किल से सहज ही निकाल कर रख देती हैं। गाथा वनदेवी महाधाम के लेखक द्वय इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
विषम से विषम परिस्थितियों में माँ ने हमें सदमार्ग पर बने रहने की प्रेरणा देकर दुष्टों के संहार और दमन में जरा सी भी संकोच नहीं की हैं।
माँ वनदेवी महाधाम भक्तों पर माँ की कृपा पर सदैव रहती है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव हर माँ भक्त को है।
माँ वनदेवी महाधाम भक्तों के प्रति दुराग्रह से बचने की सलाह दी जाती है। भक्तों के प्रति वैमनस्य का भाव रखने वाले केवल और केवल पतन को ही प्राप्त होते हैं।
जिन माँ भक्तों ने अपना सबकुछ माँ वनदेवी पर छोड़ दिया है, अपनी बागडोर उन्हें दे दिया है; उनकी कृपा-छांव को वह भक्त सहज ही प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।
महाधाम भक्त के प्रति विद्वेष, उसके परिवार के प्रति नकारात्मक सोच, उसकी चल- अचल सम्पत्ति पर बुरी नजर रखने वाले की रत्ती भर भी खैर नहीं।
माँ अपने प्रति थोड़ा दुराग्रह भले ही स्वीकार कर लें; पर जिन भक्तो ने सबकुछ उनपर छोड़ दिया है, उसके प्रति दुराग्रह तनिक भी बर्दाश्त नहीं कर सकती हैं। फिर उसके अहित सोचने वाला भला इस धरती पर भार बनकर कैसे रह सकता है?
समाज में दो-चार लोग मिल ही जाते हैं जो जोड़-तोड की कुप्रक्रिया में सदैव सक्रिय रहता है। ऐसा लोग मनुज के भेष में साक्षात् नर बानर ही है जो आपको लड़ा-भिड़ा कर, विरोध में कर आपके जीवन को नारकीय बना देगा। ऐसो का काम ही यही है। दुष्टता करना ही इसकी पहचान है।
महाधाम भक्तों के विरोध में आकर ऐसों का जीवन पतन के दौर में आ गया है। अनेक शारीरिक, मानसिक, आर्थिक असह्य पीडा के चंगुल में यह पड़ा लोग आपको भटकाने में, टीक लड़ाने में जरा सा भी कसर नहीं रखेगा।
अनेकानेक लोग ऐसे बानरों के भटकाव का शिकार बनकर अपना धन-जन खो चुके हैं। ऐसे में आप इनकी पहचान कर इसका शिकार न बनें। सावधान रहने में ही भलाई है। दुष्प्रवृत्तियों के ऐसे उदाहरण का संरक्षण व पोषण अथवा संगति आपको विनाश की ओर ही ले जायेगा।
हाल ही के वर्षों में एक सामाजिक कार्य जिसके तहत सफल जीर्णोद्धार कार्य सम्पन्न हुआ; काफी लोग सहयोगी बने। कुछ ने बढ़-चढ़कर सहयोग किया। पर देखिये! गांव के अंदर विद्यमान दुष्टों के साथ साथ बाहरी दुष्प्रवृत्तियों ने इन्हें भटका कर विरोध में खड़ा कर दिया। जो भी विरोध में गये, हर तरह से नष्ट-भ्रष्ट हो गये।
यह सोचना और देखना होगा कि कौन क्या है? जो विरोध में आपको उकसा रहा है उससे क्या आपका कोई हित है? लाभ मिले तो विरोध अवश्य की जाय! पर बिना कारण के इन राहु-केतू जैसे दुष्टों के प्रभाव में अपने जीवन को क्यों नरक में धकेलना?
जो जो भटकाने का कार्य किया अथवा भटके; उन सबकी बुरी स्थिति हुई। अकारण जीवन में ऐसों की वजह से सुख की जगह दु:ख क्यों लेना?
इन दुष्टों को भले ही जेल क्यों न हो जाय, समाज में अपयश हो जाय, हृदयाघात हो जाय, धनहानि अथवा जन हानि हो जाय, असाध्य रोग हो जाय; इससे इसे फर्क नहीं पड़ता। फिर इसके चपेट में आप जैसे संभ्रांत क्यों पड़े?
जब आपके पास आकर महाधाम भक्तों के विरोध की बातें करने लगे तब समझ जायें कि यह वही दुष्ट बानर है जिसके बारे में सभी बातें सविस्तार लिखी गई है। हाँ में हाँ मिलाया नहीं कि आप भी राहु केतु के विषाक्त जाल में फंस गये। अनचाहे विपदा को गले से लगा लिया।
समाज शुद्ध रहे, शांत रहे, समृद्ध रहे; यही हम सभी की शुभेच्छा है और रहनी भी चाहिए। ऐसे में दुष्ट दुराचारियों का संकट आपके उपर न मंडराये इसलिए शुद्धचित्त रहिये। माँ वनदेवी पर पूरी आस्था रखें। जहाँ रहें वहीं से अपना प्रणाम निवेदित कर दें।
माँ वनदेवी सभी महाधाम भक्तों पर अपनी कृपा आशीर्वाद अनुग्रह सदा बरसाती रहीं हैं और आगे आप सब इनके कृपा आशीर्वाद से अनुग्रहित होते रहें।