Vedant 'आरोग्यम'

Vedant 'आरोग्यम' A complete centre of NATUROPATHY& PANCHKARMA ..AYURVED..YOG....
& MEDITATION

12/08/2023
04/03/2023

वेदांतम आरोग्यम

जेल रोड रायबरेली 9454149696

04/11/2021

ओउम🙏

स्वयं जीवन

🚩 मैं अपने जीवन को साफ तौर पर दो हिस्सों में बांट सकता हूं एक गुरुकृपा के पूर्व और एक गुरु कृपा के बाद मैं आध्यात्मिक किताबों में डूबा रहने वाले था।
दिव्य व्यक्तित्व ,गुरु ,प्रवचनकर्ताओं को खूब सुना करता था, आध्यात्मिक शिविरों में काफी समय बिताया लेकिन गुरु कृपा के बाद मैंने अपने भीतर बहुत बड़ा परिवर्तन पाया।।
2004 में पूज्य गुरुशक्तिपात से उतपन्न शांति मुझे भीतर तक इतनी प्रभावित करते चली गई मेरे अंदर बहुत कुछ बदलता चला गया मेरे अंदर रहने वाली उद्दीगनता, अधीरता, दुख व्यग्रता सदा के लिए विदा हो गये।
3 दिन स्वयं का होश ही नही रहा तीन दिन तक समय नदी के किनारे बीतता रहा।।
🔹मेरा जीवन समस्या रहित हो गया आध्यात्मिक रुचि रखने वाले कुछ लोगों से जब मैंने ये घटना बताई तब उन्होनें मजाक में ही कहा शायद आप एनलाइटेंड हो गए हैं। मुझे नहीं पता क्या होता है लेकिन लगता है।अब कोई समस्या नहीं है।।
🚩17 वर्षो के बाद पुनः वो अनुभव प्राप्त हुआ जो शायद
अनेको योगगुरुओ ,धर्मगुरुओं से योग ध्यान सीखने के बाद भी वो परम आनंद न प्राप्त हुआ।।जो उस दिन अनायास ही अचानक ही एक सहज घटना से प्राप्त हुआ।
2 घंटे का सहज ध्यान वर्षों की प्यास को शायद बुझा गया।शायद ऐसे ही पल की स्वयंम को तलाश थी।।
: ध्यान के बाद मेरी आंखों में आंसू थे।मन मे शान्ति थी।हर चीज नई पहली बार देखी हुई प्रतीत हो रही थी।।लग रहा था अभी-अभी अस्तित्व में आई है।। प्रकृति की सुंदरता को देखकर मन मंत्रमुग्ध हो गया।
होंठो से स्वर नही निकल रहे थे।
मन हर्षित था।
कोई भी द्वेष नही विकलता नही बस परम शांत

: सन्यास का अर्थ है दिव्यता के पद पर होना सन्यास का अर्थ है समता में जीना हर स्थिति में भीतर कोई चोट ना होना ,अन्तःकरण में कोई झंकार ना होना ,अंतरम ऐसा अछूता रह जाए जीवन की सारी यात्रा से जैसे कमल के पत्ते पानी में रहकर भी पानी से अछूते रह जाते हैं ऐसे ऐसे आनंद ऐसे जीवन से गुजरते हुए भी जीवन के बाहर रहने की कला है सन्यास।।

: संन्यासी अपूर्वरूप से सुंदर हो जाता है। संन्यास जैसा सौंदर्य देता है मनुष्य को और कोई चीज नहीं देती। संन्यस्त होकर तुम सुंदर न हो जाओ, तो समझना कि कोई भूलचूक हो रही है। और संन्यासी का कोई श्रृंगार नहीं है। संन्यास इतना बड़ा श्रृंगार है कि फिर किसी और श्रृंगार की कोई जरूरत नहीं है।

तुमने देखा कि संसारी भोगी है। जवानी में शायद सुंदर होता हो, लेकिन जैसे —जैसे बुढ़ापा आने लगता है, असुंदर होने लगता है। लेकिन उससे उलटी घटना घटती है संन्यासी के जीवन में; जैसे—जैसे संन्यासी वृद्ध होने लगता है, वैसे—वैसे और सुंदर होने लगता है। क्योंकि संन्यास का कोई वार्द्धक्य होता ही नहीं, संन्यास कभी का होता नहीं। संन्यास तो चिर—युवा है।

25/02/2017

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