30/08/2026
*"गुरु" कोई "व्यक्ति" नहीं,
कोई "शरीर" नहीं,
"गुरु" एक "तत्व" है ,
एक "शक्ति है" ।
"गुरु" यदि "शरीर" होता,
तो इस छोटी सी "दुनिया" में,
एक ही "गुरु" "पर्याप्त" होता ।
"गुरु" एक "भाव" है,
"गुरु" "श्रद्धा" है ।
"गुरु" "समर्पण" है ।
आपका "गुरु: आपके "व्यक्तित्व" का "परिचय" है ।
"कब" "कौन", "कैसे" आपके लिये "गुरु" "साबित" हो, यह आप की "दृष्टि "एवं "मनोभाव "पर निर्भर करता है ।
"गुरु" "प्रार्थना" से मिलता है ।
"गुरु" "समर्पण" से मिलता है,
"गुरु" "दृष्टा" "भाव" से मिलता है,
"गुरु" "किस्मत: से मिलता है ।
. और
"गुरु" "किस्मत" वालों को "मिलता" है*
योगगूरूजी श्री अमीतजी