05/08/2026
महाराष्ट्र के मुंबई के रहने वाले कपड़ा व्यापारी शिवचरण रामरत्न गुप्ता (74) की हरियाणा के सोनीपत में वृद्ध आश्रम में मौत हो गई। तीन साल से वे इस आश्रम में रह रहे थे। दो साल पहले इसी आश्रम में उनकी पत्नी ने अंतिम सांसें ली थीं।
मंगलवार आश्रम स्टाफ ने उनकी मौत की जानकारी उनकी तीन टीचर बेटियों को दी। मगर, तीनों ने दूरी और समय का बहाना बनाकर अंतिम संस्कार में आने से मना कर दिया।
यही नहीं, 5100 रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर कर अंतिम संस्कार सोनीपत में ही करने के लिए कहा।
मुखाग्नि की बात आई तो तीनों ने कहा कि वीडियो कॉल पर दिखा देना। आश्रम संचालक आनंद कुमार के मुताबिक, एक पिता के प्रति उसकी संतानों की इस तरह की बेरुखी हमने आज तक नहीं देखी।
हद तो तब हो गई चिता को अग्नि दी जा रही थी और फोन पर बेटी पूछ रही थी- “अभी और कितना टाइम लगेगा?” बताया कि अग्नि दे दी गई है, 10-15 मिनट में प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इस पर बेटी ने कहा- “सारा काम अच्छे से हो गया ना, मुझे सारी वीडियो भेज देना।”
ये तो थी असल कहानी अब इसकी समीक्षा करते हैं,,
माता-पिता केवल हमें जन्म नहीं देते, वे अपना पूरा जीवन हमारी खुशियों के लिए समर्पित कर देते हैं। लेकिन जब वही माता-पिता बुढ़ापे में अकेले पड़ जाएँ, तो यह केवल एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की हार है।
आज ऐसी घटनाएँ पढ़ने और सुनने को मिलती हैं, जहाँ वृद्ध माता-पिता अपने अंतिम समय में अपने ही बच्चों के स्नेह और साथ से वंचित रह जाते हैं। यदि यह सच है, तो यह केवल एक दुखद समाचार नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा, आधुनिकता और संस्कारों पर एक गंभीर प्रश्न है।
बेटा हो या बेटी, सफलता का वास्तविक अर्थ तभी है जब माता-पिता के चेहरे पर सम्मान और संतोष की मुस्कान बनी रहे। धन, पद और व्यस्तता कभी भी उस कंधे का विकल्प नहीं बन सकते, जिसकी प्रतीक्षा माता-पिता जीवन भर करते हैं।
आइए, संकल्प लें कि अपने माता-पिता को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। उनका सम्मान, सेवा और स्नेह ही हमारी सबसे बड़ी पूजा और सबसे बड़ा धर्म है।
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