23/08/2026
संस्कृत में “चिरायता” को किराततिक्त (Kiratatikta) कहा गया है। प्राचीन काल में हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली पराक्रमी 'किरात' जनजाति (जिनका उल्लेख महाभारत और पुराणों में आता है) इसका उपयोग औषधीय रूप से करती थी। किरात देश (हिमालय) में उत्पन्न होने और अत्यधिक तिक्त (कड़वा) होने के कारण इसका नाम किराततिक्त पड़ा।
महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत ने चिरायता को तिक्तस्कन्ध (कड़वे द्रव्यों का समूह) और स्तन्यशोधन (स्तन दुग्ध को शुद्ध करने वाले द्रव्य) में रखा।
आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध सुदर्शन चूर्ण का यह एक मुख्य घटक है। प्राचीन काल से ही जब भी असाध्य, जीर्ण या विषम ज्वर (बार-बार लौटने वाला बुखार) होता था, चिरायता का काढ़ा मुख्य औषधि माना जाता था।
18वीं और 19वीं सदी में जब ब्रिटिश भारत में आए, तो उन्हें मलेरिया और उष्णकटिबंधीय बुखारों से निपटने के लिए सिनकोना (Cinchona) की कमी महसूस हुई। भारतीय पारंपरिक वैद्यों के ज्ञान से उन्होंने चिरायता को मलेरिया-रोधी और लिवर टॉनिक के रूप में अपनाया।
1839 के आसपास इसे आधिकारिक रूप से पश्चिमी औषधि संहिताओं में शामिल किया गया।
होम्योपैथी में इसे भारतीय वनस्पतियों के औषधीय गुणों के आधार पर मदर टिंचर और डायल्यूशन के रूप में स्थान दिया गया, जहाँ यह यकृत विकारों, मंदाग्नि और दुर्बलता के लिए एक अचूक औषधि बनी।
प्राचीन काल में ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में यह परंपरा रही है कि मौसमी बदलाव और संक्रामक बीमारियों के समय चिरायता की डंडियों को रातभर मिट्टी के कुल्हड़ में भिगोकर सुबह उसका पानी पिया जाता था, जिससे पूरे परिवार की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बनी रहती थी और त्वचा रोग नहीं होते थे।
#किराततिक्त #चिरायता