19/04/2026
हमारे विकास के साथ कुछ ऐसी बाते भी हमने सीखी जिसके उपयोग के साथ समस्या खड़ी हो जाती है। जैसे की एक इंसान दूसरे की बात को समझे उसके लिए ध्यान से सुनने की समझने की जरूरत पड़ती है। पर यह आदत बन गई। अब आसानी से किसी को भी सुनकर तुरंत हम समझ जातें है की क्या कहा जा रहा है। समझने केलिए ज्यादा चिंतन करना नही पड़ रहा। इससे समस्या यह खड़ी हो गई है की हम किसी को भी सुनकर बिना चिंतन किए हम उसे समझकर तुरंत उसे सही या गलत ठहरा देते हैं।
अगर उसको सही ठहराया तो आनंद आता है,प्रभावित होते हैं और अगर वो हमारी समझ से ऊपर की या नीचे की बात करता है तो क्योंकि हमारी समझ से परे है,हम उसे गलत समझ लेते है।
अगर कोई गाली देता है,तो हमारी आदत के कारण हम तुरंत रिएक्ट कर देते है। परंतु चिंतन नही करते। चिंतन की स्पेस रखते ही अब जो भी निर्णय लिया जाएगा वो तुम्हारा होगा। वरना तो आदत के कारण निर्णय आ जायेगा।
" अगर एक आदमी रोज अपने आपको बेहतर नही करता,रोज कल से ज्यादा समझदार नही बन रहा तो यह इंसान अपने आसपास वालो की जिंदगी को वैंपायर की तरह चूसना चालू कर देगा।" _aspujitha
अपरिग्रह से भरो,अपरिग्रह बने। किसी भी किस्म का परिग्रह रखने की क्या जरूरत है आखिर! हम आखिर क्यों भरे हुए है परिग्रह से। क्या मिल जाता है हमे दुनिया को जज कर के। किसको क्या करना चाहिए,क्या नही करना चाहिए! इस विषय में क्यों इतने सटीक होना चाहते हैं। मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? यह मुझे तय करना हैं,और दुसरेको क्या करना चाहिए और क्या नहीं? यह उसे तय करने दीजिए। आपको आखिर किसी और को कैसे बोलना चाहिए,कैसे नही? कैसे कपड़े पहनने चाहिए कैसे नही? उसे कौन से सिद्धांतो को मनाना चाहिए,कौन से नही? उसे non veg खाना चहिए या नहीं? उसे जॉब करनी चाहिए या बिज़नेस? उसे शादी टिकाए रखने चाहिए या डाइवोर्स लेना चाहिए? उसे गली बोलनी चाहिए या नहीं? उसे मदिरापान करना चाहिए या नहीं? किस को क्या करना चाहिए और क्या नहीं वो खुद तय करेगा। बस हम यह तय कर सकते है,की हमे क्या करना चाहिए?
अपरिग्रह से अगर भरे तो जान पाओगे, की सब कुछ अच्छा है। अगर तुम्हारे हिसाब से दुनिया चली तो दुनिया अपने रंग खो देगी। संसार अपना नृत्य को देगा। सृष्टि अपनी विविधता को देगी। विश्व अपनी सुन्दरता को देगा।
क्योंकि इंसान अपने हिसाब से कुछ करे तो बगीचे बनते है जंगल नहीं। और प्राकृतिक सुंदरता जंगल में है बगीचे में नहीं।
जो लोग परिग्रह से भरे हो वो दुनिया पर शासन करना चाहते है इसलिए वो चाहते है उसके आसपास संसार उसके नियमो से चले। नही चलता तो बड़े दुखी हो जातें है। सब को दोष देने लगते हैं। और वैसे भी दुनिया पर शासन नही किया जा सकता बस खुद पे शासन करना पर्याप्त हैं।
दूसरे के कारण जिसका मूड खराब हो जाता है। दुखी दुखी हो जाते है। वो किसी और पर शासन करना चाहते है और हो नही पाता तो दुखी हो जाते हैं। पर यह तो साबित हो ही गया की अगर मूड खराब किसी और के कारण हो जाता है तो आप पर जरूर कोई शासन कर रहा हैं।
पुनर्विन्यास केंद्र
सूरत,गुजरात