06/07/2022
🌾✨️दूध वर्ग✨️🌾
(Milk and Dairy Products)
➡️ दूध और दूध से निर्मित पदार्थ जैसे दही, छाछ, मक्खन, घी आदि द्रव्यों की गणना दुग्ध वर्ग में होती है। आयुर्वेद ने 'क्षीरं जीवनीयानां' ऐसा वर्णन किया है, अर्थात् दूध आयु को बनाए रखने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठ होने से उत्तम रसायन कार्य भी करता है। दूध को पूर्णान्न कहा जाता है। क्योंकि वह परिपूर्ण अन्न है, दूध जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक सभी के लिए अनुकुल होता है। दूध मधुर रसयुक्त, शीत और स्निग्ध गुणों का होता है। शरीर पुष्टी और बल को बढ़ाने के लिए दूध उपयुक्त है। दूध बुद्धिवर्धक, शुक्रपोषक वार्धक्य अवस्था को रोकने वाला एवं आयुष्यवर्धक होता है। यह मांसपेशियों के लिए पोषक और हड्डियों को जोड़ने वाला होने के कारण अस्थिक्षय तथा फ्रेक्चर हुए रुग्ण में दूध पिने की सलाह देते हैं। दूध में कॅल्शिअम की मात्रा अधिक होने से हड्डीयाँ मजबूत बनती है। दूध का रोजाना सेवन करने से रोग प्रतिकारशक्ति बढ़ने में सहायता होती है। छोटे बच्चे, वृद्ध व्यक्ति, क्षय के रुग्ण और थकान से पीडित लोगों ने दूध का सेवन जरूर करना चाहिए। दूध जन्म से सात्म्य होने के बावजूद भी पचने में थोडा गुरु होता है और इसलिए पचन संस्थान से संबंधित तकलीफ होने वाले कुछ व्यक्तियों में दूध का पाचन ठीक से नहीं होता।
बच्चों के लिए माँ का दूध सबसे उत्तम होता है। माँ के पहले तीन दिनों के दूध में स्निग्धता (चिक), केसिन एवं एल्बुमिन अधिक मात्रा में पाया जाता है। जिस वजह से बच्चे का स्नायुवर्धन जल्द होता है और उसमें एक विशेष प्रकार की रोग प्रतिकारशक्ति बढ़ती है।
आयुर्वेद में बच्चों के उम्र के अनुसार उनका आहार वर्णन किया है। जन्म से लेकर एक वर्ष तक बालक यह अर्थात् केवल दूध सेवन करता है। कुछ आचार्यों के अनुसार यह अवस्था 6 महिनों तक कही गई है। इस अवस्था में विशेष रूप से बच्चे के लिए माँ का दूध ही पूर्णान्न होता है। माँ का दूध उपलब्ध न हो तो देसी गाय का दूध दे सकते है। 1 से 2 वर्ष का बालक दूध एवं अन्न का सेवन करता है और 2 साल के उपर बालक संपूर्ण आहार सेवन करता है। लेकिन आहार के साथ ही दूध का नियमित सेवन बड़े बच्चों के लिए आवश्यक है।
आयुर्वेद ने आठ प्रकार के प्राणीयों से प्राप्त होने वाले दूध का वर्णन किया है, जैसे गाय, भैस, बकरी, हथिनी, उटनी, घोडी, मेंढी(भेड़) और स्त्री दूध। इन दुग्ध प्रकारों के विशेष गुणधर्म आगे दिए है।
• गाय का दूध - ओजवर्धक, पोषक
• भैंस का दूध - गुरु, निद्राकारक
• उटनी का दूध - कुछ नमकीन, वातकफजन्य रोगों के लिए उपयुक्त.
• घोडी का दूध - कुछ खट्टा, स्थैर्यकर, बातविकारों के लिए उपयुक्त.
• बकरी का दूध - क्षयरोग में उपयुक्त
• मेंढी(भेड़)का दूध - हिचकी एवं दमे में उपयुक्त.
• हथिनी का दूध - बलकार, पचने में भारी, स्थैर्यकर.
• स्त्री का दूध - जीवनीय, पुष्टीकर, सात्म्यकर.
👉उपरोक्त प्रकारों में से गाय, भैंस और बकरी का दूध मनुष्य दूध के गुणों के समान होने से उनका वर्णन आगे किया है।
➡️ गाय का दूध :-
आयुर्वेद ने गाय के दूध को सबसे अधिक महत्त्व दिया है। जहाँ भी दूध यह संज्ञा वर्णित है, वहाँ गाय का दूध ही अपेक्षित है। गाय का दूध मधुर (मिठा), रस में शीतल, स्निग्ध, रुचिकर, बलकर और कांतीवर्धक है। साथ ही वह पुष्टीकारक, वीर्य और बुद्धिवर्धक भी है। दूध वातपित्तशामक कार्य करता है। रक्तविकार होने पर गाय के दूध का सेवन हितकर है। श्रम, भ्रम, दमा, खाँसी, अत्यधिक प्यास आदि रोगों में गाय के दूध का सेवन करना चाहिए। दूध उत्तम रसायन अर्थात् शरीर धातुओं का पोषण कर उन्हें सदृढ बनाने का कार्य भी करता है।
✔️भावप्रकाश इस ग्रंथ में गाय के वर्ण के अनुसार गुणधर्म वर्णन किए है। जैसे
• काली गाय का दूध वातशामक और अधिक गुणकारक होता है।
• पिली गाय का दूध पित्त एवं वातनाशक होता है।
• सफेद गाय का दूध कफवर्धक और गुरु होता है।
• लाल रंग के गाय का दूध वातनाशक होता है।
• युवा गाय का दूध मधुर, रसायन एवं त्रिदोषनाशक होता है।
➡️ धारोष्ण दूध :-
तुरंत का दुहा हुआ दूध अमृत के समान गुणकारक होता है। धारोष्ण अर्थात् दूध निकालने पर कुछ समय तक गरम होता है और कुछ समय पश्चात् ठंडा होता है। ठंडा होने के पूर्व ही इसका सेवन करना चाहिए। धारोष्ण दूध वृष्य (प्रजोत्पत्तिकारक), धातुवर्धक, कांतिकर, पथ्य, मधुर, पाचन शक्ति बढ़ाने वाला और पुष्टिवर्धक होता है। परंतु इस दूध को निकालने वाला व्यक्ति, दूध एकत्रित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला पात्र, पशु का अंग इन सब की शुद्धता रखना आवश्यक होता है।
➡️ भैंस का दूध :-
यह दूध पौष्टिक, शरीर में स्निग्धता को उत्पन्न करने वाला, शारीरिक बल बढ़ाने वाला, पचने में भारी होता है। इसलिए इसके सेवन से नींद आने के साथ ही कफ एवं आलस्य बढ़ता है। भैंस का दूध वीर्यवर्धक होता है। वह गरम करने के पश्चात् पिने से बल बढ़ता है। और सभी धातुओं की पुष्टि होती है। भैंस का दूध दाह और श्रमनाशक है। स्थौल्य(Obesity), मधुमेह(Diabetes) जैसे कफप्रधान विकारों से ग्रस्त रुग्णों को भैंस के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। भैंस दूध गाय के दूध की तुलना में अधिक गुरु होता है। हर रोज व्यायाम करने वाला व्यक्ति भैंस के दूध का सेवन कर सकता है। जिन लोगों को नींद नहीं आती, उन्होंने भैंस का दूध गरम कर उसमें थोड़ी मात्रा में जायफल डालकर रात को सेवन करें। जिनकी पचनशक्ति उत्तम है, वह लोग भी भैंस का दूध सेवन कर सकते है।
➡️ बकरी का दूध :-
बकरी का दूध पचने में हल्का, कसैले रस का और ठंडे स्वभाव का होता है। बकरी का दूध सेवन करने से क्षय, खाँसी, बुखार इन विकारों में उत्तम लाभ मिलता है। आयुर्वेद ने क्षयरोग(Tuberculosis) से पीड़ित व्यक्ति को बकरी के सान्निध्य में रहकर ताजा बकरी का दूध सेवन करने का निर्देश दिया है। इस विवरण से बकरी के दूध का महत्त्व समझ आता है।
➡️ दूध से संबंधित नियम / मुद्दे :-
■ छोटे बच्चे, वृद्ध व्यक्ति, अतिमैथुन से क्षीण, मद्यपान करने वाले दुर्बल व्यक्तियों के लिए दूध हितकारक है।
■ गरम दूध कफवातनाशक होता है।
■ गरम करने के पश्चात् ठंडा किया हुआ दूध पित्तशामक होता है। उबला हुआ दूध अधिक वीर्यवर्धक होता है।
■ समभाग पानी डालकर गरम किया हुआ दूध कच्चे दूध की तुलना में पचने में हलका होता है।
■ देसी गाय का दूध अधिक लाभकर होता है।
■ दूध पच रहा है या नहीं इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
■ आप जो दूध खरीदते हो वह कहाँ से और कितने दिनों में आप तक पहुँचता है, इस बात पर ध्यान देना जरूरी है।
■ दूध और फल एक साथ सेवन न करें।
■ दूध यह रस में मिठा और फल प्राय: खट्टे होने के कारण यह संयोग आयुर्वेद के अनुसार विरुद्ध हैं, इसलिए फलों के मिल्कशेक का सेवन टालना चाहिए। परंतु मिठा आम और दूध कुछ मात्रा में सेवन किया जा सकता है। दूध के साथ नमकीन पदार्थ भी नहीं खाने चाहिए।
■ कफप्रधान प्रकृति के, कफ विकार से पीडित, स्थूल व्यक्ति, मधुमेह(Diabetes) रुग्ण ने भूख न होने पर दूध का सेवन नहीं करना चाहिए।
➡️ दूध की मलाई :- मलाई ठंडी, स्निग्ध और वीर्यवर्धक होती है। बल बढ़ाती है। तृप्तीदायक होती है। दूध की मलाई कफ बढाती है और पित्त एवं रक्तविकार, वात कम करती है।
👉वैदिक केयर आयुर्वेद एवं पंचकर्म चिकित्सालय, बरूही(हि. प्र)
7508890218, 9780092201.