डा.ए के सिंह

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❤️ किसी भी व्यक्ति में Heart Attack अचानक दिखाई देता है, लेकिन उसकी कहानी अक्सर वर्षों पहले शुरू हो चुकी होती है। हमारा ...
08/09/2026

❤️ किसी भी व्यक्ति में Heart Attack अचानक दिखाई देता है, लेकिन उसकी कहानी अक्सर वर्षों पहले शुरू हो चुकी होती है। हमारा Heart एक pump की तरह लगातार पूरे शरीर में Blood पहुंचाता रहता है। लेकिन इस pump को खुद काम करने के लिए भी Blood और Oxygen चाहिए। Heart की मांसपेशियों तक Blood पहुंचाने वाली नसों को Coronary Arteries कहते हैं।

इसे पानी के पाइप के उदाहरण से समझिए। अगर पानी का पाइप पर्याप्त चौड़ा है, तो पानी आसानी से निकलता रहता है। लेकिन गंदगी या काई जमने से पाइप धीरे-धीरे संकरा हो जाए, तो एक समय पानी निकलना कम हो जाता है।

हमारी Coronary Arteries में भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। समय के साथ artery की अंदरूनी दीवार में Cholesterol और दूसरे पदार्थ जमा होकर Plaque बना सकते हैं। इससे artery धीरे-धीरे narrow हो सकती है।

शुरुआत में कोई symptom नहीं भी होता। क्योंकि जब हम आराम कर रहे होते हैं, Heart को Blood और Oxygen की जरूरत कम होती है। इसलिए संकरी artery के बावजूद Blood Supply पर्याप्त हो सकती है। लेकिन जब हम तेज चलते हैं, सीढ़ियां चढ़ते हैं या Exercise करते हैं, Heart को ज्यादा काम करना पड़ता है और Oxygen की जरूरत बढ़ जाती है। अगर Blood Supply जरूरत के अनुसार नहीं बढ़ पाती, तो सीने में Pressure, Heaviness या Pain हो सकता है। इसे Angina कहते हैं। लेकिन कहानी का सबसे खतरनाक हिस्सा अभी बाकी है।

💥 कभी-कभी Plaque की सतह अचानक टूट जाती है। वहां Blood Clot बनता है और Coronary Artery को अचानक Block कर सकता है। इससे Heart Muscle के एक हिस्से तक Blood और Oxygen पहुंचना बंद हो जाता है और उस हिस्से को आक्सीजन कम/न मिलने के कारण वह क्षतिग्रस्त या फिर dead हो जाता है। यही Heart Attack है। और इसलिए Heart Attack में हर मिनट महत्वपूर्ण है। जितनी जल्दी Blood Flow बहाल किया जाए, उतनी ज्यादा Heart Muscle को बचाने की संभावना होती है।

⚠️ Heart Attack के लिए सबसे महत्वपूर्ण risk factors High LDL Cholesterol, High Blood Pressure, Diabetes और Smoking हैं।‌ इसके अलावा बढ़ता वजन, physical inactivity, unhealthy diet, excessive alcohol, chronic stress, खराब sleep और family history भी risk बढ़ा सकते हैं।

पहले रोजमर्रा की जिंदगी में शरीर ज्यादा चलता था। आज Car, Lift, Chair और Screen ने हमारी physical activity काफी कम कर दी है। Fast Food और ultra-processed food की बढ़ती आदत ने भी समस्या को बढ़ाया है। इसलिए कोई व्यक्ति बाहर से बिल्कुल fit दिखाई दे, फिर भी उसकी Coronary Arteries में बीमारी विकसित हो सकती है। और याद रखिए Heart Attack केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। कम उम्र में भी यह हो सकता है।

🚨 Heart Attack के सबसे सामान्य symptom
सीने के बीच में Pressure, Heaviness, Tightness या Pain का होना है जो हाथ, कंधे, पीठ, गर्दन या जबड़े तक फैल सकता है। इसके साथ में सांस फूलना, ठंडा पसीना, Nausea, चक्कर और अचानक कमजोरी हो सकते हैं। लेकिन हर Heart Attack में व्यक्ति सीना पकड़कर जमीन पर नहीं गिरता। खासकर महिलाओं, बुजुर्गों और Diabetes वाले लोगों में symptoms अलग या अपेक्षाकृत हल्के हो सकते हैं। इसलिए नया और unexplained Chest Discomfort, खासकर जो कुछ मिनट से अधिक रहे या बार-बार हो, उसे सिर्फ Gas समझकर घर पर इंतजार मत कीजिए। तुरंत Medical Help लीजिए।

❤️ Heart Attack और Cardiac Arrest एक नहीं हैं
Heart Attack में Heart की artery का Blood Flow Block होता है। जबकि Cardiac Arrest में Heart अचानक प्रभावी रूप से धड़कना बंद कर देता है और व्यक्ति बेहोश हो सकता है। हालांकि Heart Attack कभी-कभी Cardiac Arrest का कारण बन सकता है।

❤️ हर Heart Attack को रोकना संभव नहीं है लेकिन अपना risk काफी कम किया जा सकता है। इसके लिए नियमित व्यायाम करें, वजन संतुलित रखें, ब्लडप्रेशर और शुगर नियंत्रित रखें, LDL Cholesterol बढ़ने न दें, Smoking न करें, हरी सब्जियां फल Whole Grains और Pulses खाएं, Fried और Ultra-processed Food को सीमित रखें, पर्याप्त Sleep लें और Chronic Stress को नजरअंदाज न करें। ध्यान रखें कि Heart की Health की कहानी 50 या 60 साल की उम्र में शुरू नहीं होती। हमारी Lifestyle और risk factors का असर वर्षों पहले से जमा होना शुरू हो सकता है। इसलिए Heart की देखभाल उस दिन से मत शुरू कीजिए, जिस दिन वह शिकायत करना शुरू करे।

❤️ Heart Attack अचानक दिखाई देता है, लेकिन उसका risk अक्सर धीरे-धीरे बनता है। हम सो रहे होते हैं तब भी Heart धड़क रहा है। हम काम कर रहे हैं तब भी Heart धड़क रहा है। हम खुश हैं, परेशान हैं, दौड़ रहे हैं या आराम कर रहे हैं, Heart अपना काम करता रहता है। Heart दिन-रात बिना छुट्टी लिए काम करता है। इसलिए उसकी कद्र कीजिए। उसकी देखभाल कीजिए और उसकी चेतावनी को कभी नजरअंदाज मत कीजिए। क्योंकि Heart की सुरक्षा केवल बीमारी का इलाज नहीं—जीवन को लंबे समय तक स्वस्थ रखने की तैयारी है।

इस बारे में किसी तरह की शंका या प्रश्न या फिर कोई नई जानकारी हो तो बिना संकोच कमेंट करें। परामर्श/इलाज के इच्छुक व्यक्तिगत व्हाट्सएप पर संपर्क (फोन न करें) करें। फेसबुक पर इलाज असंभव है।
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GERD/Acid Reflux को केवल "ज्यादा एसिड" की समस्या न समझें। पेट और भोजन नली के बीच Lower Esophageal Sphincter (LES) एक वाल...
06/09/2026

GERD/Acid Reflux को केवल "ज्यादा एसिड" की समस्या न समझें। पेट और भोजन नली के बीच Lower Esophageal Sphincter (LES) एक वाल्व की तरह काम करता है। सामान्यतः यह बंद रहता है और पेट का एसिड नीचे रखता है। भोजन के बाद पेट फैलने पर यह कभी-कभी गलत समय पर थोड़ी देर के लिए ढीला हो जाता है। इसे Transient LES Relaxation कहते हैं।
इसी दौरान पेट का पदार्थ ऊपर इसोफेगस में आ सकता है।

भोजन के बाद पूरा पेट समान रूप से अम्लीय नहीं रहता।भोजन अधिकांश एसिड को neutralize कर देता है, लेकिन पेट के ऊपरी हिस्से में बहुत अम्लीय एसिड की एक छोटी परत/pocket बनी रह सकती है। जब LES खुलता है, तो यही concentrated acid ऊपर आ सकता है और जलन (heartburn) पैदा कर सकता है। इसी को "Acid Pocket" भी कहा जाता है।‌

रिफ्लक्स निम्न चीजों से बढ़ सकता है-
1. पेट की अतिरिक्त चर्बी:
पेट के अंदर दबाव बढ़ाकर reflux की संभावना बढ़ा सकती है।
2. भोजन के तुरंत बाद लेटना:
इससे acid pocket भोजन नली के junction के पास आ सकता है।
3. सोने के बहुत करीब भोजन करना:
रात में निगलने और saliva production कम होने से इसोफेगस से एसिड साफ होने की गति घट जाती है।
4. सोने की करवट:
अक्सर बाईं करवट GERD में दाईं करवट की तुलना में बेहतर मानी जाती है, क्योंकि पेट की स्थिति एसिड को LES से दूर रखने में मदद करती है।

Omeprazole या Ranitidine जैसी दवाएं पेट में बनने वाले एसिड की मात्रा कम करता है, इसलिए यह महत्वपूर्ण और प्रभावी उपचार है। लेकिन यह LES के गलत समय पर खुलने को सीधे नहीं रोकता। इसलिए कुछ लोगों में पर्याप्त acid suppression के बावजूद reflux के लक्षण बने रह सकते हैं।

GERD केवल "बहुत ज्यादा एसिड" की समस्या नहीं है।
इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे पेट पानी की टंकी है,
LES गेट है और Acid pocket गेट के ठीक पीछे जमा concentrated acid है।‌ अगर गेट गलत समय पर खुलता है, तो थोड़ी मात्रा में भी बहुत अम्लीय पदार्थ ऊपर आकर जलन पैदा कर सकता है।

इसलिए GERD के प्रबंधन में केवल trigger foods हटाने के साथ-साथ वजन नियंत्रण, भोजन और सोने के बीच पर्याप्त अंतर, सही sleeping position और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा भी महत्वपूर्ण हैं।

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LDL Cholesterol और हृदयरोगों का खतरा जब 🫀 LDL Cholesterol की बात होती है तो सिर्फ आज का नंबर नहीं, जीवनभर का Exposure मा...
05/09/2026

LDL Cholesterol और हृदयरोगों का खतरा

जब 🫀 LDL Cholesterol की बात होती है तो सिर्फ आज का नंबर नहीं, जीवनभर का Exposure मायने रखता है। हम अक्सर Lipid Profile देखकर पूछते हैं—“मेरा LDL कितना है?” लेकिन Cardiovascular Disease के संदर्भ में एक और सवाल उतना ही महत्वपूर्ण है कि “मेरा LDL कितने वर्षों से इतना ऊँचा रहा है?”
Atherosclerosis अचानक नहीं बनती। Arteries में LDL/ApoB-containing lipoproteins का exposure वर्षों और दशकों तक चलता है और धीरे-धीरे plaque formation और progression में योगदान देता है। इसीलिए LDL को केवल एक laboratory number नहीं, बल्कि cumulative lifetime exposure के रूप में समझना उपयोगी है।

LDL exposure जितने लंबे समय तक कम रहेगा, cumulative cardiovascular benefit उतना अधिक हो सकता है। अब 🧬 Lifetime LDL Exposure क्यों महत्वपूर्ण है इसे एक सरल उदाहरण से समझते हैं। माना कि व्यक्ति A में LDL 160 mg/dL और लगभग 30 वर्षों से इसी range में रहा है। जबकि व्यक्ति B में LDL 160 mg/dL लेकिन हाल के कुछ वर्षों में ही बढ़ा।

आज दोनों की report में लिखा होगा कि LDL = 160 mg/dL लेकिन उनकी cumulative LDL exposure समान नहीं है। Atherosclerosis एक धीमी प्रक्रिया है। इसलिए केवल आज का LDL देखकर पूरी lifetime कहानी समझना मुश्किल है।

इसे ऐसे समझिए जैसे artery में LDL exposure की बूंदें लगातार गिर रही हों। एक-दो दिन का exposure महत्वपूर्ण नहीं लगता, लेकिन हर दिन × हर वर्ष × कई दशकों का cumulative effect महत्वपूर्ण हो सकता है।

💊 Statins LDL-C को प्रभावी ढंग से कम करती हैं। यदि किसी व्यक्ति का LDL 160 से 120 mg/dL हो जाता है, तो लगभग 40 mg/dL की कमी आई। लेकिन महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं कि LDL आज कितना कम हुआ। महत्वपूर्ण यह भी है कि यह LDL reduction कितने वर्षों तक बना रहता है। इसीलिए clinically indicated Statin therapy में long-term adherence महत्वपूर्ण है।

⚠️ लेकिन स्टडी के परिणाम के अनुसार यह कहना सही नहीं होगा कि “39 mg/dL LDL कम करने से हर व्यक्ति का lifetime heart-attack risk 50% कम हो जाएगा।” यह interpretation बहुत सरल कर दी गई है। विशेष रूप से Mendelian Randomization studies में जिन लोगों का LDL genetic कारणों से जीवनभर कम रहा, उनका exposure किसी ऐसे व्यक्ति से अलग है जो 45 या 50 वर्ष की उम्र में Statin शुरू करता है। इसलिए lifetime genetic data को सीधे Statin treatment के लिए 50% risk reduction मानना उचित नहीं है। LDL lowering का benefit केवल magnitude पर नहीं, duration of exposure पर भी निर्भर हो सकता है।

📉 Relative Risk बनाम Absolute Risk का distinction भी बेहद महत्वपूर्ण है। मान लीजिए किसी व्यक्ति का 10-year cardiovascular risk 10% है। यदि treatment से relative risk 20% कम होता है तो 10% का 20% यानी 2% कमी आई। तो risk लगभग 10% से घटकर 8% होगा। यानी Relative Risk Reduction तो 20% रहा लेकिन Absolute Risk Reduction सिर्फ 2% रहा। इसलिए किसी Statin के वास्तविक लाभ को समझने के लिए केवल “20% risk reduction” सुनना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी जानना चाहिए कि उस व्यक्ति का baseline risk कितना था?

❤️ Statin का फायदा हर व्यक्ति में समान नहीं होता। किसी व्यक्ति का baseline cardiovascular risk केवल LDL से तय नहीं होता। इसके साथ साथ उम्र, LDL-C, Diabetes, Blood Pressure, Smoking, Family history, Kidney disease, Existing ASCVD और अन्य risk-enhancing factors भी देखना पड़ता है।

उदाहरण के लिए दो लोगों का LDL दोनों का 100 mg/dL हो सकता है। लेकिन एक व्यक्ति जिसे diabetes नहीं है, normal BP है और non-smoker होने के साथ physically active है और दूसरे व्यक्ति को Diabetes के साथ hypertension, smoking की आदत के साथ obesity हो सकती है। तो इस स्थिति में दोनों का LDL समान है, लेकिन उनका overall cardiovascular risk समान नहीं होगा।

🥗 Statin अकेले सब कुछ नहीं है। LDL कम करना महत्वपूर्ण है, लेकिन cardiovascular prevention का मतलब केवल Statin लेना नहीं है। साथ में Smoking बंद करना, Blood pressure control, Healthy whole food dietary pattern, Regular physical activity, Healthy body composition, Diabetes, metabolic health का नियंत्रण और पर्याप्त नींद पर भी ध्यान देना चाहिए।

इन सभी factors का cumulative effect ही cardiovascular risk तय करता है। इसलिए सिर्फ Statin लेना सही approach नहीं है। LDL को केवल “आज मेरी Lipid Profile में कितना है?” के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि “मेरी lifetime LDL exposure कितनी रही है?” के रुप में देखना चाहिए। LDL exposure जितना अधिक और जितने लंबे समय तक रहेगा, atherosclerotic burden का potential उतना अधिक हो सकता है। और यदि clinically appropriate तरीके से LDL को कम किया जाए और वह reduction लंबे समय तक बना रहे, तो cardiovascular events को रोकने का cumulative benefit बढ़ सकता है।

🫀Early prevention का मतलब है Risk को जल्दी पहचानना और जहाँ treatment indicated हो, वहाँ अनावश्यक देरी न करना। Statin कोई magic pill नहीं है और न ही हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। लेकिन जिन लोगों में Statin clinically indicated है, उनके लिए इसे केवल “cholesterol की गोली” समझना भी उचित नहीं। यह LDL-C कम करके atherosclerotic cardiovascular events के risk को कम करने की strategy है। और शायद इस पूरे लेख को एक वाक्य में सबसे अच्छी तरह ऐसे समझा जा सकता है कि “आज का LDL एक snapshot है; lifetime LDL exposure पूरी फिल्म है।” 🫀

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Pancreatic fat और Type 2 Diabetesअग्न्याशय में जमा अतिरिक्त वसा (pancreatic fat) का Type 2 Diabetes की pathophysiology म...
03/09/2026

Pancreatic fat और Type 2 Diabetes
अग्न्याशय में जमा अतिरिक्त वसा (pancreatic fat) का Type 2 Diabetes की pathophysiology में एक महत्वपूर्ण योगदान होता है। सामान्यत: अग्न्याशय के भीतर सामान्यतः थोड़ी मात्रा में fat हो सकती है। लेकिन metabolic dysfunction और obesity में ectopic fat बढ़कर pancreatic tissue में जमा हो सकती है। इसे pancreatic steatosis / fatty pancreas कहा जाता है।

Body fat बढ़ने से Visceral fat भी बढ़ता है जिससे Liver fat बढ़ता है और फिर Pancreatic fat भी बढ़ सकती है। लेकिन pancreatic fat केवल शरीर के कुल वजन का दूसरा नाम नहीं है। समान BMI वाले लोगों में भी pancreatic fat अलग-अलग हो सकती है।

अग्न्याशय में मौजूद β-cells insulin बनाती हैं। Type 2 Diabetes की शुरुआत में अक्सर स्थिति कुछ ऐसी होती है कि Insulin resistance बढ़ने शरीर को अधिक insulin चाहिए। जिसके लिए β-cells insulin production बढ़ाती हैं‌। अब कुछ समय तक तो glucose सामान्य रह सकता है। लेकिन metabolic stress लगातार बना रहता है जिससे β-cell function धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। इस कारण Insulin secretion अपर्याप्त यह जाता है जिससे Blood glucose बढ़ने लगती है। Pancreatic fat इस प्रक्रिया में योगदान देने वाले factors में से एक है।

Fat द्वारा β-cells को नुकसान पहुंचाने को lipotoxicity कहते हैं। Pancreatic adipose tissue से निकलने वाले free fatty acids (FFAs) आसपास के cells को प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से लंबे समय तक excessive saturated fatty-acid exposure से intracellular lipid intermediates बढ़ते हैं जिससे mitochondrial stress या ER stress होकर β-cell dysfunction होता है।
कुछ परिस्थितियों में ceramide जैसे lipid metabolites भी mitochondrial dysfunction और apoptosis pathways को बढ़ा सकते हैं।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यह प्रक्रिया मानव शरीर में इतनी सरल नहीं है कि “pancreatic fat → ceramide → beta-cell death” को हर diabetic patient में सिद्ध mechanism माना जाए। यह molecular mechanism experimental studies में अच्छी तरह समर्थित है, लेकिन मानव Type 2 Diabetes में pancreatic fat की मात्रा और β-cell failure के बीच causal relationship अभी पूरी तरह स्थापित नहीं है।

Fat tissue metabolically inactive नहीं है। Pancreatic fat और आसपास के inflammatory environment में macrophages तथा अन्य immune cells सक्रिय हो सकते हैं।

इसके परिणामस्वरूप Inflammatory signalling बढ़ जाती है जिससे IL-1β, TNF-α आदि pathways सक्रिय होते हैं। जिससे oxidative या ER stress बढ़ जाता है और फिर β-cell insulin secretion कम हो जाता है। इसके कारण लंबे समय में β-cell dysfunction /apoptosis होती है।‌ लेकिन यह भी multifactorial process है। केवल IL-1β को diabetes का कारण नहीं माना जा सकता।

कुछ शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि pancreatic fat blood supply को दबाकर β-cells को नुकसान करती है। Pancreatic fat और tissue remodeling pancreatic microenvironment तथा vascular function को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन यह कहना कि सामान्य fatty pancreas में fat physically capillaries को दबाकर insulin production रोक देती है, मानवों में स्थापित clinical mechanism नहीं है।

इसलिए इसे संभावित mechanism की तरह देखना बेहतर है, proven primary mechanism की तरह नहीं।
Pancreatic fat और Diabetes remission के बारे में Roy Taylor और Newcastle studies का काम बहुत महत्वपूर्ण है। उनके Twin Cycle Hypothesis के अनुसार susceptible व्यक्तियों में Excess calorie accumulation से Liver fat बढ़ता है जिससे Hepatic insulin resistance होता है और Insulin levels/ energy balance में बदलाव आता है। जिससे Pancreas में excess fat accumulation होता है जिससे β-cell function में गिरावट आती है और Type 2 Diabetes होता है।

वहीं पर्याप्त weight loss होने पर Calorie deficit / weight loss से Liver fat कम होता है और फिर Pancreatic fat भी कम होता है। इससे कुछ लोगों में β-cell function recovery होकर Diabetes remission होता है।

यहाँ “कुछ लोगों में” शब्दों पर ध्यान देना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि हर व्यक्ति में β-cell function पूरी तरह वापस नहीं आती।
मान लीजिए शरीर में तीन अलग-अलग fat depots हैं:
1. Visceral fat जिससे abdominal metabolic inflammation होता है।
2. Liver fat जिससे hepatic insulin resistance होता है और liver glucose production बढ़ जाता है।
3. Pancreatic fat जिससे β-cell environment पर metabolic stress की स्थिति आती है और insulin secretion/function प्रभावित हो सकती है।
इसलिए Type 2 Diabetes को केवल “खून में sugar ज्यादा है” समझना अधूरा है।

अधिकांशतः असल कहानी कई बार ऐसी होती है कि Energy surplus से ectopic fat बढ़ कर insulin resistance होता है। इससे β-cell stress/failure होकर hyperglycemia की स्थिति बनती है।‌

Pancreatic fat Type 2 Diabetes का अकेला कारण नहीं है। Genetics, visceral adiposity, liver fat, muscle insulin resistance, physical inactivity, inflammation और β-cell genetic/functional vulnerability ये सभी भूमिका निभाते हैं।

और “pancreatic fat हटाना diabetes reversal का सबसे अच्छा उपलब्ध रास्ता है”। वर्तमान evidence यह जरूर बताता है कि महत्वपूर्ण weight loss और ectopic-fat reduction कुछ लोगों में β-cell function और Type 2 Diabetes remission में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Type 2 Diabetes में समस्या सिर्फ blood glucose की नहीं है। इसमें शरीर के गलत स्थानों पर जमा excess fat (विशेषकर liver और संभवतः pancreas में), metabolic dysfunction और β-cell failure महत्वपूर्ण योगदान होता है। पर्याप्त और टिकाऊ weight loss कुछ लोगों में इस metabolic overload को कम करके diabetes remission तक ले जा सकता है।

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क्या आप जानते हैं कि भारत में बिकने वाले कोका कोला जैसे कोल्डड्रिंक और UK में बिकने वाले कोका कोला या उस जैसे कोल्डड्रिं...
02/09/2026

क्या आप जानते हैं कि भारत में बिकने वाले कोका कोला जैसे कोल्डड्रिंक और UK में बिकने वाले कोका कोला या उस जैसे कोल्डड्रिंक में चीनी की मात्रा में बहुत अंतर है। भारत में यह UK की तुलना में करीब 3 गुना है। यानी यह कहा जा सकता है कि भारत में बिकने वाला कोका कोला ब्रिटिश कोका कोला की तुलना में 3 गुना ज्यादा नुकसानदायक/ कैलोरी वाला है।

इसके मूल में भारत के regulatory environment की भूमिका है। यह भी कह सकते हैं कि “भारत के खराब norms के कारण Coca-Cola/Fanta में ज्यादा sugar है”।

सबसे पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत में FSSAI ने Acesulfame-K और Sucralose को स्वीटनर के रूप में carbonated beverages में इस्तेमाल करने की अनुमति दी हुई है। FSSAI के वर्तमान beverage standards में carbonated water में Acesulfame-K और Sucralose दोनों permitted हैं, निर्धारित maximum levels के भीतर। यानी कंपनी को भारत में केवल चीनी इस्तेमाल करने के लिए मजबूर नहीं किया गया है।

अब यहाँ UK की Soft Drinks Industry Levy (SDIL) बहुत बड़ा फर्क पैदा करती है। UK में 2018 से sugary soft drinks पर ऐसी levy है जो manufacturers/ importers को sugar कम करने के लिए आर्थिक incentive देती है। UK सरकार खुद कहती है कि levy का उद्देश्य soft drinks में sugar reduction को incentivise करना है। और अब UK इसे और कड़ा कर रहा है। 1 January 2028 से lower threshold 5 g से घटाकर 4.5 g sugar/100 ml किया जाना प्रस्तावित/निर्धारित है।

यानी UK में Coca-Cola जैसी कंपनी के सामने एक सीधा आर्थिक calculation है कि बहुत ज्यादा sugar डालने पर levy ज्यादा जिससे cost बढ़ जाती है जबकि
Sugar कम डाल Sucralose/Acesulfame-K डालने पर बहुत कम calories और फिर levy से बचने/कम करने की संभावना रहती है। इसलिए reformulation commercially attractive हो जाती है।

वहीं 🇮🇳 भारत में FSSAI ने non-caloric sweeteners को प्रतिबंधित नहीं किया है। FSSAI स्वयं बताता है कि Sucralose, Acesulfame potassium, Aspartame, Steviol glycosides आदि non-caloric sweeteners हैं और इनके लिए safety limits निर्धारित हैं, जिनका आधार risk assessment, JECFA और Codex recommendations हैं। और FSSAI के carbonated-water standard में सीधे लिखा है कि Acesulfame-K, Sucralose, Aspartame या फिर Saccharin डाला जा सकता है।
अर्थात भारत में Fanta को 13–14 g sugar/100 ml रखने के बजाय UK की तरह sugar घटाकर sweeteners इस्तेमाल करने से regulatory barrier नहीं है।

इसलिए असली सवाल यह है कि जब भारत में sweeteners की अनुमति है, तो Coca Cola भारत में भी sugar क्यों नहीं घटाती? इसका उत्तर मुख्यतः regulatory pressure के साथ साथ taxation, consumer preference और business strategy का combination है।

सबसे बड़ा अंतर यह है कि UK सरकार ने reformulation को financially reward किया है। इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। मान लीजिए कंपनी के पास दो विकल्प हैं-
1--🇮🇳 भारत में कोल्डड्रिंक formulation में Sugar बहुत ज्यादा जिसमें Calories बहुत ज्यादा होती है।‌ कंपनी को sugar कम करने पर कोई बड़ा regulatory आर्थिक लाभ नहीं मिलता। तो कंपनी सोच सकती है कि “भारतीय consumer को यही taste पसंद है और product legal है—तो formulation क्यों बदलें?”

2--वहीं 🇬🇧 UK में वही formulation होने पर यदि Sugar बहुत ज्यादा हो तो Soft Drinks Industry Levy के कारण लागत मूल्य बढ़ जाता है। अब कंपनी के पास incentive है कि Sugar कम करके Sucralose/ Acesulfame-K मिला दें जिससे Calories भी कम और Levy भी कम या समाप्त। यानी UK सरकार ने essentially कहा कि “आप sugar कम करेंगे तो आपका आर्थिक फायदा होगा।”यही policy mechanism बहुत महत्वपूर्ण है।

लेकिन भारत में high-sugar beverages को reformulate करने के लिए UK जैसा मजबूत economic और regulatory pressure लंबे समय तक नहीं रहा। यही बड़ा policy gap है। और भारत में front of pack warning labels को लेकर भी regulation काफी विवादित और धीमा रहा है। हाल ही में FSSAI ने high sugar/salt/fat foods के लिए warning label framework का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। इस मुद्दे पर Supreme Court और public-health experts की आलोचना भी सामने आई है।

यह केवल “भारत बनाम UK” का मामला नहीं है। यह हमें एक बड़े public-health principle की तरफ ले जाता है कि Food companies वही formulation नहीं बनातीं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वोत्तम हो।वे ऐसा formulation बनाती हैं जो taste के साथ साथ consumer acceptance, ingredient cost, regulation, taxation, competition और marketing इन सबका संतुलन हो।

इसलिए यदि सरकार चाहती है कि Coca-Cola, Fanta, Pepsi आदि में sugar कम हो, तो केवल यह कहना कि “कंपनियों को जिम्मेदार होना चाहिए” बहुत प्रभावी नीति नहीं है। UK ने दिखाया है कि financial incentive/ disincentive और reformulation policy कंपनियों के formulation decisions को वास्तव में बदल सकते हैं। UK सरकार के अनुसार SDIL लागू होने के बाद उसका उद्देश्य ही soft drinks में sugar reduction को incentivise करना रहा है।

और यही भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण lesson है। भारत में sweeteners पर रोक लगाने की जरूरत नहीं है बल्कि high sugar beverages को कम sugar वाली formulation की ओर economically push करने की जरूरत हो सकती है। यानी समस्या सिर्फ “Fanta में sugar क्यों है?” नहीं है। असल policy question है कि “भारत में ऐसी regulatory और taxation व्यवस्था क्यों नहीं है जो Coca-Cola जैसी कंपनियों को UK की तरह sugar reformulation के लिए मजबूर/प्रोत्साहित करे?”

और यह सवाल आज खास तौर पर relevant है, क्योंकि अगस्त 2026 में भारत में high-sugar packaged foods और beverages के लिए front-of-pack warning labels को लेकर FSSAI ने नया प्रस्ताव आगे बढ़ाया है।

Whole-food sources से मिलने वाले saturated fat की “rehabilitation” को पिछले दो दशकों में nutritional science के महत्वपूर...
01/09/2026

Whole-food sources से मिलने वाले saturated fat की “rehabilitation” को पिछले दो दशकों में nutritional science के महत्वपूर्ण developments में से एक बताया गया है। कई बड़े meta-analyses जिसमें से एक 2010 में 21 prospective cohort studies हुई जिसमें 347,747 participants थे। फिर 2014 में 32 observational studies शामिल थीं। इन सबने saturated-fat intake और cardiovascular disease risk के बीच significant association नहीं पाया। ये fringe findings नहीं हैं बल्कि human dietary evidence के बड़े bodies का cumulative assessment हैं।

Saturated fat किस context में खाया जाता है, इसका बहुत महत्व है। Low-fat era के दौरान Saturated fat को refined carbohydrates से replace किया गया। इससे cardiovascular outcomes खराब होते हैं।

🔴 Saturated fat को omega-6-rich vegetable oils से replace करने पर recovered trials के आधार पर यह potentially harmful हो सकता है।
🔴 वहीं Saturated fat को omega-3 या monounsaturated fats से replace करने पर यह beneficial हो सकता है।
🔴 और Mediterranean dietary pattern में saturated fat, जहाँ साथ में भरपूर vegetables, legumes, olive oil और fish होती हैं, high-sugar, high refined carbohydrate dietary pattern में उसी saturated fat की तुलना में अलग metabolic consequences दे सकता है।

Food matrix महत्वपूर्ण है, isolated fat महत्वपूर्ण नहीं होता है। Whole foods में saturated fat अकेले नहीं आता। उसके साथ protein, vitamins, minerals और अन्य fatty acids आते हैं जो उसके metabolic effects को modify कर सकते हैं। उदाहरण के लिए full-fat dairy में odd-chain saturated fatty acids (C15:0 और C17:0) होते हैं, जिन्हें संभावित cardioprotective effects के लिए अब study किया जा रहा है।

कई meta-analyses में full-fat dairy consumption का cardiovascular disease के साथ neutral या favourable association पाया गया है।

सभी saturated fats भी एक जैसे नहीं होते हैं।
🔴 Stearic acid जो कि Beef और dark chocolate में प्रमुख saturated fat होता है, LDL नहीं बढ़ाता और शरीर में oleic acid में convert हो सकता है।
🔴 जबकि Palmitic acid LDL बढ़ाता है, लेकिन HDL भी बढ़ा सकता है। इसका net effect context पर काफी निर्भर करता है।
🔴 Myristic acid को Common saturated fats में LDL बढ़ाने की सबसे अधिक क्षमता वाला माना जाता है।
इसलिए “saturated fat” को एक single entity मानना और सभी saturated fats के समान effects मान लेना इस क्षेत्र में काफी confusion पैदा करता है।

Medium-chain triglycerides जो coconut oil में concentrated होते हैं और MCT oil के रूप में उपलब्ध हैं, एक specific category के saturated fat हैं जिनके metabolic properties अलग हैं। Long-chain fats के विपरीत, MCTs सीधे सीधे gut से absorb होते हैं। इनके पाचन में bile की आवश्यकता कम होती है। ये lipoproteins में packaging के बिना absorb हो सकते हैं और तुरंत energy के रूप में उपलब्ध होते हैं। ये liver में तेजी से ketones में convert होते हैं। इससे brain को blood glucose से स्वतंत्र alternative energy source मिल सकता है।

Mild cognitive impairment और early Alzheimer's disease में, जहाँ brain का normal glucose metabolism impaired होता है, MCT supplementation से cognitive function में benefits documented बताए गए हैं। MCT oil का smoke point कम होता है और इसे primary cooking fat के रूप में उपयोग नहीं करना चाहिए।

और जब नुकसानदायक फैट की बात आती है तो पहला नाम आता है seed oils का। Industrial seed oils 20वीं सदी का सबसे consequential dietary change के रुप में जाना जाता है। Industrial seed oils में sunflower oil में safflower oil, corn oil, soybean oil, cottonseed oil, grapeseed oil और standard canola oil शामिल हैं।

ये low-fat movement की उस recommendation से जुड़े प्रमुख dietary fats हैं जिसमें saturated fat को polyunsaturated vegetable oils से replace करने की सलाह दी गई थी। यह dietary fats की वह category है जिसके harmful effects के पक्ष में सबसे अधिक concerning evidence हैं। हालाँकि यह harm उस cholesterol mechanism से नहीं होता जिसे diet-heart hypothesis ने प्रस्तावित किया था।

वहीं Seeds में oil की मात्रा relatively कम होती है। इस oil को निकालने के लिए high heat के साथ high pressure का उपयोग किया जाता है। ये processes fragile polyunsaturated fatty acids का oxidation oil के factory से निकलने से पहले ही शुरू कर सकते हैं। Extracted oil को फिर industrial refining processes से गुजारा जाता है जिसमें chemicals से treatment, bleaching और deodorisation शामिल हैं। इनमें temperatures 270°C तक पहुँच सकते हैं।

इससे PUFAs का oxidation और बढ़ सकता है तथा ऐसे trans fats और oxidation products बन सकते हैं जो मूल seed में मौजूद नहीं थे। इसके बाद refined oil translucent bottles में supermarket lighting के नीचे रखा जाता है, जहाँ photo oxidation की प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है।

इस बारे में किसी तरह की शंका या प्रश्न या फिर कोई नई जानकारी हो तो बिना संकोच कमेंट करें। परामर्श/इलाज के इच्छुक व्यक्तिगत व्हाट्सएप पर संपर्क (फोन न करें) करें। फेसबुक पर इलाज असंभव है।

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Omega-3 EPA और DHA— सबसे evidence-supported supplemental fats में से एक हैं। Long-chain marine omega-3 fatty acids EPA औ...
31/08/2026

Omega-3 EPA और DHA— सबसे evidence-supported supplemental fats में से एक हैं। Long-chain marine omega-3 fatty acids EPA और DHA अनेक health domains में सबसे consistently positive evidence वाले dietary fats में शामिल हैं।

Cardiovascular health-
REDUCE-IT trial में statin लेने वाले high-risk patients को 4 grams/day purified EPA दिया गया। इससे major cardiovascular events में 25% reduction reported हुई। इसे randomized controlled trial में किसी supplement द्वारा प्राप्त बड़े cardiovascular risk reductions में से एक माना गया।

VITAL trial में 25,000 से अधिक adults को 1 gram/day combined EPA+DHA दिया गया। इसमें cardiovascular events में significant reduction दिखाई दी, विशेषकर उन लोगों में जो बहुत कम fish खाते थे।

EPA और DHA: 3–4 g/day की मात्रा पर triglycerides को लगभग 15–30% कम कर सकते हैं, anti-arrhythmic effects रखते हैं, platelet activity को प्रभावित करते हैं और
endothelial protection में भूमिका निभाते हैं।

Brain health-
DHA brain का प्रमुख structural fatty acid है और cerebral cortex में कुल fatty acids का लगभग 10–20% हो सकता है। Neuronal membranes DHA से rich होती हैं।
DHA का मुख्य काम synapse formation, neurotransmitter receptor function, membrane fluidity के साथ साथ rapid neural signalling को support करना है। कम plasma DHA का संबंध epidemiological studies में cognitive decline,
smaller brain volume और higher Alzheimer's disease risk से पाया गया है।

Pregnancy और early childhood में DHA विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि critical developmental periods में deficiency neurological development को प्रभावित कर सकती है।

Mental health-
Depression के संदर्भ में विशेष रूप से EPA और वह भी EPA:DHA ratio 2:1 से अधिक सबसे evidence supported omega-3 form बताया गया है। कई meta analyses में significant antidepressant effects पाए गए हैं।
संभावित mechanisms में neuroinflammatory pathways का modulation, serotonin receptor function को support करना और neurotransmitter signalling पर membrane-fluidity effects शामिल हैं।

Inflammation-
EPA और DHA specialised pro-resolving mediators (SPMs) नामक molecules के एक family के precursors हैं। इनमें resolvins, protectins और maresins शामिल हैं।
ये केवल inflammation को suppress नहीं करते बल्कि inflammation को resolve करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यह anti-inflammatory drugs से mechanistically अलग है। EPA और DHA inflammatory process के biological completion को support करते हैं। अपर्याप्त EPA और DHA इस resolution process को impair कर सकते हैं और chronic, unresolved inflammation में योगदान कर सकते हैं।

उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण के अनुसार therapeutic effects के लिए 3–4 g EPA+DHA/day और general maintenance के लिए 1–2 g/day लेना चाहिए।‌ Fish oil का triglyceride form चुनने की सलाह दी जाती है। इसका absorption cheaper ethyl-ester form की तुलना में लगभग 70% बेहतर है। सबसे rich food sources sardines, mackerel, herring, wild salmon और anchovies हैं। सप्ताह में 2–3 servings meaningful मात्रा प्रदान करती हैं, हालांकि आमतौर पर therapeutic supplemental doses से कम है। Fish न खाने वालों के लिए algal oil genuine EPA और DHA प्रदान करता है।

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