डा.ए के सिंह

डा.ए के सिंह Consultant in Ayurveda
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खाने में तेल का उपयोग हमारी सेहत पर सीधे प्रभाव डालता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल का सेवन सोच-समझकर और संतुलित मात्...
09/06/2026

खाने में तेल का उपयोग हमारी सेहत पर सीधे प्रभाव डालता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल का सेवन सोच-समझकर और संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। खासकर भारतीय भोजन में जहां रोज दाल और सब्जी बनती हैं, वहां सब्जी बनाने में इस्तेमाल होने वाले तेल का चुनाव स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है।

खाद्य तेल मुख्य रूप से वसा अम्ल (Fatty Acids) से बने होते हैं, जो तीन प्रकार के होते हैं—
संतृप्त वसा (Saturated Fatty Acids - SFA): अधिक मात्रा में सेवन करने से यह हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकते हैं।
असंतृप्त वसा (Unsaturated Fatty Acids): संतृप्त वसा की तुलना में हृदय-स्वास्थ्य के लिए अधिक अनुकूल मानी जाती हैं। इसमें दो प्रकार आते हैं:
•मोनो-अनसैचुरेटेड फैट (MUFA)
• पॉली-अनसैचुरेटेड फैट (PUFA)
ट्रांस फैट (Trans Fatty Acids): यह अत्यंत हानिकारक होता है और हृदय रोग, कोलेस्ट्रॉल बढ़ने, मोटापा आदि का कारण बन सकता है।

सामान्यतः असंतृप्त वसा (Unsaturated Fat), संतृप्त वसा (Saturated Fat) की तुलना में स्वास्थ्य के लिए बेहतर मानी जाती है। इन दोनों का तुलनात्मक प्रभाव देखें तो संतृप्त वसा LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) बढ़ा सकती है जबकि असंतृप्त इसे
कम करने में मदद कर सकती है। HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) को संतृप्त वसा थोड़ा बढ़ा सकती है जबकि असंतृप्त इसे सामान्यतः बनाए रखती है। हृदय रोग जोखिम संतृप्त वसा से अधिक मात्रा में बढ़ सकता है जबकि असंतृप्त वसा हृदय जोखिम कम करने से जुड़ी मानी जाती है। संतृप्त वसा से सूजन (Inflammation) कुछ स्थितियों में बढ़ सकती है जबकि कई असंतृप्त वसाएं सूजन कम करने से जुड़ी हैं‌। इसलिए संतृप्त वसा को आहार में प्राथमिकता सीमित मात्रा में देनी चाहिए और असंतृप्त वसा प्राथमिक स्रोत के रूप में बेहतर होती है।

इसका मतलब यह भी नहीं है कि संतृप्त वसा खराब है। संतृप्त वसा अपने-आप में आवश्यक पोषक तत्व नहीं है, क्योंकि शरीर इसे बना सकता है। फिर भी घी, दूध और दही जैसे खाद्य पदार्थ अन्य उपयोगी पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। समस्या तब होती है जब इसका सेवन बहुत अधिक हो और असंतृप्त वसा की जगह ले ले।

संतृप्त वसा के स्रोत हैं घी, मक्खन, पनीर, नारियल तेल, लाल मांस और फुल-फैट डेयरी उत्पाद। जबकि जैतून का तेल (Olive oil), मूंगफली का तेल, सरसों का तेल, तिल का तेल, अलसी (Flaxseed), अखरोट, बादाम और वसायुक्त मछलियाँ असंतृप्त वसा के स्रोत हैं।

मोनो-अनसेचुरेटूड फैट (Monounsaturated Fat, MUFA) वह है जिसमें एक डबल बॉन्ड होता है। उदाहरण के लिए जैतून तेल, मूंगफली तेल, एवोकाडो। जबकि पॉली-अनसैचुरेटेड फैट (Polyunsaturated Fat PUFA) में कई डबल बांड होते हैं। उदाहरण के लिए ओमेगा-3 और ओमेगा-6। ओमेगा-3 के प्रमुख स्रोत अलसी (Flaxseed), चिया सीड्स, अखरोट और वसायुक्त मछलियाँ (सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल) हैं जबकि
ओमेगा-6 के प्रमुख स्रोत सूरजमुखी तेल, सोयाबीन तेल, मक्का (Corn) तेल, तिल और कई बीज हैं।

स्वास्थ्य केवल तेल के प्रकार पर निर्भर नहीं करता। निम्न कारक अक्सर अधिक महत्वपूर्ण होते हैं-
•कुल कैलोरी सेवन
•अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन
•फाइबर की मात्रा
•फल और सब्जियों का सेवन
•धूम्रपान
•शारीरिक गतिविधि
•शरीर का वजन
कई बार लोग "स्वस्थ तेल" चुन लेते हैं लेकिन अत्यधिक मात्रा में उपयोग करके कुल कैलोरी बहुत बढ़ा देते हैं जो सही नहीं है।

निष्कर्ष यह निकलता है कि
•अधिकांश वयस्कों में कुल वसा का सेवन दैनिक कैलोरी का लगभग 20–35% होना चाहिए। 2000 कैलोरी के आहार में यह लगभग 44–78 ग्राम प्रतिदिन के बराबर है।
•वसा की आवश्यकता आयु, लिंग, वजन और कुल कैलोरी पर निर्भर करती है।
•तेल को बार-बार गर्म करके पुनःउपयोग न करें, इससे विषैले यौगिक बन सकते हैं।
•कोल्ड-प्रेस्ड और कच्चे (unrefined) तेल स्वास्थ्य के लिए अधिक उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि कोल्ड-प्रेस्ड और अनरिफाइंड तेलों में कुछ प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और सूक्ष्म पोषक तत्व अधिक बचे रह सकते हैं।
•यदि आहार विविध है और उसमें पर्याप्त MUFA तथा ओमेगा-3 शामिल हैं, तो तेल बदलना अनिवार्य नहीं है। हालांकि विभिन्न तेलों का उपयोग करने से विभिन्न प्रकार के फैटी एसिड प्राप्त हो सकते हैं।

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वर्तमान में उपयोग में आने वाली प्रमुख statins जैसे Atorvastatin, Rosuvastatin, Simvastatin और Pravastatin दुनिया के प्रम...
07/06/2026

वर्तमान में उपयोग में आने वाली प्रमुख statins जैसे Atorvastatin, Rosuvastatin, Simvastatin और Pravastatin दुनिया के प्रमुख देशों में स्वीकृत (approved) हैं और व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं। एक statin — Cerivastatin (Baycol/Lipobay) — को 2001 में विश्व बाज़ार से वापस ले लिया गया था क्योंकि इसमें गंभीर मांसपेशी-क्षति (rhabdomyolysis) और उससे संबंधित मौतों का जोखिम अन्य statins की तुलना में काफी अधिक पाया गया था।

अधिकांश लोग statins को बिना किसी गंभीर समस्या के सहन कर लेते हैं, लेकिन कुछ लोगों में दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
1. मांसपेशियों में दर्द (Myalgia)- यह सबसे सामान्य शिकायत है। लक्षणों में पैरों में दर्द, जकड़न, भारीपन और
कमजोरी मिलते हैं। यह आमतौर पर reversible होता है और दवा बदलने या खुराक कम करने पर ठीक हो सकता है।

2. मांसपेशियों की कमजोरी- कुछ लोगों में statins प्रयोग से
व्यायाम क्षमता कम होने और जल्दी थकान होने की शिकायत मिलती है हालाँकि सभी अध्ययनों में इसका समान प्रमाण नहीं मिला है।

3. Liver Enzymes बढ़ना- कुछ मरीजों में ALT, AST अस्थायी रूप से बढ़ सकते हैं। कुछ मरीजों में गंभीर यकृत क्षति हो सकती है।

4. रक्त शर्करा में हल्की वृद्धि- Statins से HbA1c थोड़ा बढ़ सकता है और Diabetes का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है। ऐसा विशेषकर उन लोगों में होता है जिनमें पहले से insulin resistance मौजूद हो। लेकिन उच्च cardiovascular risk वाले व्यक्तियों में heart attack और stroke में कमी का लाभ आमतौर पर इस जोखिम से अधिक माना जाता है।

5. पाचन संबंधी लक्षण- कुछ लोगों में गैस, पेट दर्द, मतली और कब्ज़ हो सकते हैं।

6. दुर्लभ लेकिन गंभीर Rhabdomyolysis नामक स्थिति सबसे चर्चित लेकिन बहुत दुर्लभ दुष्प्रभाव है। इसमें मांसपेशियाँ टूटने लगती हैं, CK (Creatine Kinase) बहुत बढ़ जाता है और किडनी को नुकसान हो सकता है। यही वह समस्या थी जिसके कारण Cerivastatin बाज़ार से हटाई गई थी।

Statins के बारे में चर्चा अक्सर दो चरमों में चली जाती है-
1. "Statins पूरी तरह सुरक्षित हैं, कोई दुष्प्रभाव नहीं।"
या
2. "Statins बहुत खतरनाक हैं और कभी नहीं लेनी चाहिए।"
दोनों कथन सही नहीं हैं। वर्तमान वैज्ञानिक साक्ष्य यह दिखाते हैं कि कुछ लोगों में वास्तविक दुष्प्रभाव होते हैं। लेकिन अधिकांश दुष्प्रभाव reversible होते हैं।

अब तक की चर्चा का सारांश देखा जाए तो Statins atherosclerosis का संपूर्ण इलाज नहीं हैं। वे LDL को कम करने और plaque को अधिक स्थिर (stable) बनाने में मदद करते हैं, जिससे heart attack और stroke का जोखिम घटता है। लेकिन atherosclerosis एक बहु-कारकीय रोग है, इसलिए दीर्घकालिक हृदय स्वास्थ्य के लिए insulin resistance, blood pressure, blood glucose, smoking, inflammation, obesity, sleep, stress और समग्र metabolic health पर भी ध्यान देना आवश्यक है। सर्वोत्तम परिणाम आमतौर पर lifestyle optimization और उचित दवा-चिकित्सा के संयोजन से प्राप्त होते हैं।

यदि insulin resistance, उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त शर्करा, धूम्रपान, inflammation, खराब नींद, तनाव और metabolic health को नहीं सुधारा जाता, तो केवल statin लेने से आदर्श परिणाम नहीं मिलेंगे। लेकिन उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में statins plaque stabilization और cardiovascular events (heart attack/stroke) को कम करने का प्रमाणित लाभ भी देते हैं।

यह निष्कर्ष अनेक बड़े randomized controlled trials और meta-analyses से समर्थित है। और यही निष्कर्ष वर्तमान कार्डियोलॉजी और preventive cardiology के अधिकांश वैज्ञानिक साक्ष्यों के सबसे निकट है।

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अब मान लीजिए किसी व्यक्ति की coronary artery में 30–40% stenosis वाला soft plaque है। यह artery को बहुत नहीं रोक रहा, ले...
06/06/2026

अब मान लीजिए किसी व्यक्ति की coronary artery में 30–40% stenosis वाला soft plaque है। यह artery को बहुत नहीं रोक रहा, लेकिन यदि वह plaque फट जाए तो कुछ मिनटों में clot बनकर 100% blockage और heart attack हो सकता है। इसलिए cardiology में अक्सर प्राथमिक लक्ष्य होता है Plaque rupture रोकना, Thrombus (clot) बनने से बचाना और Heart attack और stroke का जोखिम घटाना। Statins इन तीनों में मदद करते हैं।

और statins सिर्फ calcification ही नहीं बढ़ाते हैं। Statins के प्रभावों में LDL कम करना, Inflammation कम करना, Fibrous cap को मोटा करना, Plaque lipid core को छोटा करना और कुछ रोगियों में plaque volume घटाना भी शामिल है। यानी statins केवल "soft को hard" नहीं बनाते, बल्कि कई बार plaque burden भी कम कर सकते हैं।

अब यदि किसी व्यक्ति में Insulin resistance कम हो, HbA1c सामान्य हो, Blood pressure नियंत्रित हो, Smoking न हो, Visceral fat कम हो, Sleep अच्छी हो और Inflammation कम हो तो plaque progression धीमी पड़ सकती है और कुछ मामलों में regression भी देखा गया है। इसलिए आज preventive cardiology में बढ़ता हुआ दृष्टिकोण यह है कि "Plaque stabilization" और "root-cause management" दोनों आवश्यक हैं। Statins मुख्यतः rupture risk कम करते हैं, जबकि metabolic health सुधारने के उपाय plaque बनने के मूल कारणों पर काम करते हैं। इसलिए healthy lifestyle का cardiovascular स्थितियों में महत्वपूर्ण योगदान है।

यदि किसी व्यक्ति में पहले से coronary artery disease, prior heart attack, diabetes के साथ उच्च जोखिम, या बहुत अधिक LDL/ApoB है, तो वर्तमान वैज्ञानिक साक्ष्य यह नहीं दिखाते कि केवल lifestyle intervention statins जितनी cardiovascular event reduction दे सकता है। ऐसे रोगियों में दोनों का संयोजन सबसे अधिक लाभकारी पाया गया है।

इसलिए cardiologists soft plaque को "hard बनाने" के लिए statins नहीं देते; वे उन्हें plaque को अधिक स्थिर बनाने और heart attack/stroke के जोखिम को कम करने के लिए देते हैं। Soft plaque का संभावित reversibility एक लाभ है, लेकिन उसकी instability एक बड़ा खतरा भी है, और statins मुख्यतः उसी खतरे को कम करते हैं।

यहां तक तो हमने statins की अच्छाइयों को समझा। अगली पोस्ट में statins के दुष्प्रभावों पर चर्चा करेंगे।

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क्या आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है और आपको डाक्टर ने statins लिखा है तो यह पोस्ट आपके लिए ही है।यदि आपको बताया गया है कि ...
05/06/2026

क्या आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है और आपको डाक्टर ने statins लिखा है तो यह पोस्ट आपके लिए ही है।

यदि आपको बताया गया है कि आपको उच्च कोलेस्ट्रॉल के कारण statins की आवश्यकता है, तो यह आपके डाक्टर से पूछा जाना चाहिए कि Аров, Lp(a), Fasting insulin, HbA1c, hsCRP, Blood pressure, Triglycerides and HDL, के साथ साथ CAC scan (यदि उपयुक्त हो) क्या जांचा गया है। सिर्फ कोलेस्ट्रॉल पैनल कराने पर यह दिखाता है कि रक्त में क्या ले जाया जा रहा है। यह metabolic health, plaque burden, inflammation, vascular function या cardiovascular risk की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता है।

क्योंकि एलडीएल को कम करना cardiovascular risk मैनेज करने का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह स्वतः यह नहीं बताता है कि calcification क्यों हुआ। और यह आपको यह नहीं बताता कि शरीर में भीतर ही भीतर और क्या हो रहा है।

वास्तव में आधुनिक हृदय-रोग जोखिम मूल्यांकन में केवल LDL-cholesterol नहीं देखा जाता। ऊपर बताए गए कई अन्य जोखिम कारक भी महत्वपूर्ण हैं जैसे-
✿ Lipoprotein(a) [Lp(a)] — आनुवंशिक जोखिम का महत्वपूर्ण संकेतक है।
✿ Fasting insulin — इंसुलिन प्रतिरोध का आकलन करने में सहायक होता है।
✿ HbA1c — पिछले 2–3 महीनों की औसत रक्त शर्करा का सूचक है।
✿ hs-CRP — शरीर में सूजन (inflammation) का संकेतक है।
✿ Blood pressure — हृदय रोग का प्रमुख जोखिम कारक।
✿ Triglycerides और HDL — मेटाबोलिक स्वास्थ्य और इंसुलिन प्रतिरोध के अप्रत्यक्ष संकेतक हैं।
✿ Coronary Artery Calcium Scan (CAC scan) — कोरोनरी धमनियों में कैल्शियमयुक्त प्लाक की मात्रा का प्रत्यक्ष आकलन करता है।

इन सभी जानकारियों से किसी व्यक्ति का समग्र (overall) cardiovascular risk बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। Statin की आवश्यकता का निर्णय व्यक्ति के कुल जोखिम प्रोफ़ाइल पर निर्भर करता है, न कि किसी एक परीक्षण की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर। Statin देने के लिए प्रमुख अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों (विशेषकर American College of Cardiology / American Heart Association तथा European Society of Cardiology) का मूल सिद्धांत यह है कि उपचार LDL-C की संख्या के साथ-साथ व्यक्ति के कुल cardiovascular risk पर आधारित होना चाहिए।

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार statin की सिफारिश मुख्यतः इन स्थितियों में होती है:
✿ स्थापित एथेरोस्क्लेरोटिक हृदय-रोग।
✿ LDL-C ≥190 mg/dL।
✿ 40–75 वर्ष की आयु में मधुमेह।
✿ पर्याप्त रूप से ऊँचा अनुमानित cardiovascular risk।
✿ जोखिम बढ़ाने वाले कारकों (Lp(a), ApoB, CAC, पारिवारिक इतिहास आदि) की उपस्थिति।
इसलिए आधुनिक दिशानिर्देश केवल "कोलेस्ट्रॉल ज्यादा है, इसलिए statin लें" पर आधारित नहीं हैं। वे कुल हृदय-रोग जोखिम (overall cardiovascular risk) का आकलन करने पर आधारित हैं।

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हममें से अधिकतर लोग यह समझते हैं कि फास्टिंग ब्लड शुगर कम होना अच्छा है। पर वैज्ञानिक अध्ययनों को सही संदर्भ में देखें, ...
04/06/2026

हममें से अधिकतर लोग यह समझते हैं कि फास्टिंग ब्लड शुगर कम होना अच्छा है। पर वैज्ञानिक अध्ययनों को सही संदर्भ में देखें, तो उनके निहितार्थ काफी रोचक हैं। उनसे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि "जितनी कम fasting glucose, उतना बेहतर" या "100 mg/dL से कम glucose हमेशा सुरक्षित है।"

DECODE अध्ययन (Diabetes Epidemiology Collaborative analysis Of Diagnostic criteria in Europe) और ताइवानी सरकार के अध्ययन के परिणामों से पता चलता है कि कम फास्टिंग ग्लूकोज (≤100mg/dl) वाले लोगों में हृदय रोग का खतरा अधिक होता है, जबकि उच्च फास्टिंग ग्लूकोज (>100mg/dl) वाले लोगों में नहीं।

ताइवान के 36,386 सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के 11-वर्षीय अध्ययन में fasting glucose और मृत्यु-दर के बीच J-shaped relationship पाया गया। सबसे कम fasting glucose समूह (50–75 mg/dL) में सभी कारणों से मृत्यु का जोखिम लगभग दोगुना था, जबकि उच्च glucose स्तरों पर भी जोखिम बढ़ा हुआ था।

बाद की एक बड़ी meta-analysis में भी पाया गया कि बहुत कम fasting glucose (

रात में पेशाब करने के लिए एक या अधिक बार जागने की आवश्यकता को नोक्टुरिया कहा जाता है। एन्यूरिसिस या बिस्तर गीला करने के ...
03/06/2026

रात में पेशाब करने के लिए एक या अधिक बार जागने की आवश्यकता को नोक्टुरिया कहा जाता है। एन्यूरिसिस या बिस्तर गीला करने के विपरीत, नोक्टुरिया में पेशाब करने के लिए बिस्तर से बाहर निकलने का सचेत प्रयास शामिल होता है। यह नींद की गुणवत्ता और, परिणामस्वरूप, दैनिक कामकाज को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। यह स्वयं एक बीमारी नहीं है, बल्कि किसी अंतर्निहित समस्या का लक्षण है। आजकल किसी को इसकी शिकायत होने पर वह सिर्फ मधुमेह (मुख्य कारण) के ही बारे में सोचता है जो कि सही नहीं है। इसके अन्य बहुत कारण हो सकते हैं।

नोक्टुरिया के प्राथमिक कारणों में से मुख्य कारण इंसुलिन रजिस्टेंस और मधुमेह है, खासकर जब रक्त शर्करा के स्तर को ठीक से नियंत्रित नहीं किया जाता है। रक्त में उच्च ग्लूकोज स्तर मूत्र उत्पादन में वृद्धि का कारण बन सकता है, जिसे पॉलीयूरिया के रूप में जाना जाता है। यह रात में बार-बार पेशाब आने का कारण बन सकता है, जिससे नींद में खलल पड़ता है।

मुख्य कारणों को चार समूहों में समझा जा सकता है-
1. रात में अत्यधिक मूत्र बनना (Nocturnal Polyuria)- इसमें शरीर रात के समय सामान्य से अधिक मूत्र बनाता है। इसके कारण हैं - शाम या रात में अधिक पानी पीना, चाय, कॉफी, कोला जैसे कैफीनयुक्त पेय, शराब का सेवन, पैरों में सूजन (edema), हृदय विफलता (Heart Failure), स्लीप एपनिया (Obstructive Sleep Apnea) और कुछ हार्मोनल विकार।

2. मूत्राशय की क्षमता कम होना- मूत्राशय सामान्य मात्रा का मूत्र भी लंबे समय तक नहीं रोक पाता है। इसके कारण हैं -अतिसक्रिय मूत्राशय (Overactive Bladder), मूत्राशय में सूजन, इंटरस्टिशियल सिस्टाइटिस, मूत्राशय की पथरी औरमूत्राशय का ट्यूमर।

3. मूत्र मार्ग में रुकावट (Bladder Outlet Obstruction)- यह स्थिति विशेषकर पुरुषों में मिलती है। इसके कारण हैं- Benign Prostatic Hyperplasia (प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ना), प्रोस्टेट कैंसर या फिर मूत्रमार्ग (urethra) का संकुचन। ऐसी स्थिति में मूत्राशय पूरी तरह खाली नहीं हो पाता और बार-बार पेशाब की इच्छा होती है।

4. अधिक मूत्र बनना (24-hour Polyuria)- पूरे दिन और रात दोनों समय अधिक मूत्र बनता है। इसके कारण हैं- Type 2 Diabetes, अनियंत्रित मधुमेह, Diabetes Insipidus, अत्यधिक पानी पीने की आदत (Polydipsia) और कुछ दवाएँ। रिसर्च बताती हैं कि 45 से अधिक उम्र के लोगों में रात में बार-बार पेशाब के लिए उठने के महत्वपूर्ण कारकों में मुख्यतः मेटाबॉलिक सिंड्रोम और इंसुलिन रजिस्टेंस मिलते हैं। जब रक्त शर्करा का नियंत्रण खराब हो जाता है, तो गुर्दे अतिरिक्त ग्लूकोज को साफ करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, जिसका अर्थ है अधिक मूत्र उत्पादन और फिर नोक्टुरिया।

♟ नोक्टुरिया के किडनी से जुड़े कारणों में Chronic Kidney Disease, किडनी की concentrating ability कम हो जाना और वृद्धावस्था में गुर्दों की कार्यक्षमता में परिवर्तन शामिल हैं।

♟ कुछ दवाओं से भी नोक्टुरिया की शिकायत होती है जिनमें Diuretics (Furosemide, Torsemide आदि), कुछ रक्तचाप की दवाएँ, SGLT2 inhibitors (डायबिटीज की दवाएँ) और Lithium शामिल हैं।

♟ तंत्रिका तंत्र के कुछ रोगों में भी नोक्टुरिया मिलती है जैसे Parkinson's Disease, Multiple Sclerosis, स्ट्रोक और स्पाइनल कॉर्ड के रोग। Autonomic तंत्रिका तंत्र की शिथिलता के कारण मस्तिष्क और मूत्राशय के बीच सिग्नलिंग अनियमित और कम सटीक हो जाती है और फिर नोक्टुरिया के लक्षण दिखते हैं।

♟ उम्र बढ़ने के साथ मूत्राशय की क्षमता कम हो सकती है या फिर ADH (Antidiuretic Hormone) का रात्रिकालीन स्राव कम हो सकता है। कई बार उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट समस्याएँ बढ़ कर नोक्टुरिया कर सकती हैं। इसलिए 60–70 वर्ष की आयु के बाद nocturia काफी सामान्य हो जाती है। पुरानी लो ग्रेड की सूजन, मूत्राशय के ऊतकों को सीधे प्रभावित नोक्टुरिया पैदा कर सकती है।

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De novo lipogenesis (DNL) वह प्रक्रिया है जिसमें शरीर अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट (विशेषकर sugar/fructose) को बदलकर नई वसा (...
02/06/2026

De novo lipogenesis (DNL) वह प्रक्रिया है जिसमें शरीर अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट (विशेषकर sugar/fructose) को बदलकर नई वसा (fat) बनाता है। “De novo” का अर्थ है “नई शुरुआत से”, और “lipogenesis” का अर्थ है “fat बनाना”। यह प्रक्रिया मुख्यतः लिवर (यकृत) और कुछ हद तक adipose tissue (fat tissue) में होती है।

जब हम बहुत अधिक मात्रा में refined carbohydrates, sugary drinks, fructose-rich foods, या लगातार अधिक calories लेते हैं, तो शरीर की glycogen storage भर जाती है। इसके बाद extra glucose/fructose को शरीर fat में बदलने लगता है।

इसका क्रम है-
Carbohydrate → Glucose → Pyruvate → Acetyl-CoA → Fatty acids. अब Fatty acids + glycerol → Triglycerides

1. DNL से इंसुलिन resistance बढ़ती है। जब liver में बहुत triglyceride जमा होने लगते हैं, तो fatty liver बनने लगता है। यह liver cells को insulin के प्रति कम संवेदनशील बना देता है। परिणामस्वरूप liver अधिक glucose बनाता रहता है, fasting blood sugar बढ़ती है और Type 2 diabetes का खतरा बढ़ता है।

2. Fructose DNL को बहुत तेजी से बढ़ा सकता है। Fructose सीधे liver में metabolize होता है और DNL को activate कर सकता है। इसलिए ज्यादा soft drinks, HFCS (high fructose corn syrup), ज्यादा चीनी या फिर packaged juices का सेवन नुकसानदायक होता है।‌

3.Non-alcoholic fatty liver disease (NAFLD) में DNL अक्सर बढ़ी हुई मिलती है। NAFLD वाले लोगों में insulin resistance,high triglycerides, obesity, metabolic syndrome और Type 2 diabetes अधिक देखे जाते हैं। यानी fatty liver और Type 2 diabetes का मजबूत संबंध है।

4.शुरुआती insulin resistance में शरीर अधिक insulin बनाता है। Insulin स्वयं भी DNL को stimulate करता है। इससे और अधिक fat बनता है, फिर liver fat बढ़ता है। अब insulin resistance और बढ़ती है और एक metabolic vicious cycle बन जाती है।

DNL को नियंत्रित करने के लिए sugary beverages, refined flour, excessive sugar, ultra-processed foods, लगातार overeating कम करें। साथ ही fiber-rich foods, protein, physical activity, resistance training, अच्छी नींद और वजन कम करने पर ज्यादा ध्यान रखें।

शोध बताते हैं कि Mediterranean diet, low refined- carb diet, calorie restriction और intermittent fasting (कुछ लोगों में) ऐसे dietary patterns हैं जिनसे DNL कम हो सकती है।

Exercise का DNL में बहुत बढ़िया रोल है। Exercise glycogen stores खाली करती है। तब अतिरिक्त glucose को fat में बदलने की आवश्यकता कम पड़ती है।

DNL सामान्य परिस्थितियों में “बुरी” प्रक्रिया नहीं है। समस्या तब होती है जब लगातार excess calories, sugar overload, sedentary lifestyle और chronic hyperinsulinemia मौजूद हों। तब DNL अत्यधिक सक्रिय होकर metabolic disease में योगदान दे सकती है।

DNL को समझने के लिए यह केंद्रीय समीकरण उपयोगी है कि Insulin resistance से hyperinsulinemia होता है जिससे De novo lipogenesis होकर fatty liver होता है। अब फैटी लीवर के कारण इंसुलिन रजिस्टेंस बढ़ता जाता है।

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पिछली पोस्ट में हम सबने chronological age (जन्म से बीते वर्ष) और biological age (शरीर वास्तव में कितना बूढ़ा हो चुका है)...
31/05/2026

पिछली पोस्ट में हम सबने chronological age (जन्म से बीते वर्ष) और biological age (शरीर वास्तव में कितना बूढ़ा हो चुका है) के बारे में बात करते हुए Epigenetic clocks के बारे में जानकारी ली थी। अब बात करते हैं कि किस तरह बायोलॉजिकल उम्र (Biological Age) बढ़ने की गति को धीमा किया जाये या फिर सरल शब्दों में बुढ़ापे को यथासंभव टाला जाये।

बायोलॉजिकल उम्र (Biological Age) बढ़ने की गति मुख्यतः सूजन (inflammation), ऑक्सीडेटिव तनाव, इंसुलिन प्रतिरोध, हार्मोनल बदलाव और DNA/epigenetic क्षति से प्रभावित होती है। इन प्रक्रियाओं को धीमा करके उम्र बढ़ने की गति कम की जा सकती है।

1. नियमित शारीरिक गतिविधि- रोज़ 30–45 मिनट ब्रिस्क वॉक या फिर सप्ताह में 2–3 बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें। लंबे समय तक लगातार बैठने से बचें। इससे माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता बढ़ती है, इंसुलिन संवेदनशीलता सुधरती है और सूजन कम होती है।

2. पादप आधारित आहार (plant based diet) अधिक लें। जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दालें, फल, साबुत अनाज, मेवे और बीज। विशेष रूप से Flaxseed, Walnut और तिल (Sesame) का प्रयोग ज्यादा करें। साथ ही अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, मीठे पेय, अत्यधिक चीनी कम से कम खाएं।

3. पर्याप्त नींद लें। प्रतिदिन 7–9 घंटे सोयें। सोने- जागने का समय नियमित रखें। अच्छी नींद हमारे ग्रोथ हार्मोन स्राव बढ़ाती है, DNA मरम्मत में सहायता करती है और सूजन कम करती है।

4. तनाव नियंत्रण करें। दीर्घकालिक तनाव कोर्टिसोल बढ़ाता है, जो aging को तेज कर सकता है। इसके लिए उपयोगी उपाय हैं - ध्यान (Meditation), योग, अनुलोम विलोम। सामाजिक जुड़ाव रखें।

5. वजन, शुगर और रक्तचाप नियंत्रण करें। मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप का संबंध तेजी से बढ़ती biological age से पाया गया है। आपका लक्ष्य होना चाहिए कि कमर का घेरा नियंत्रित रहे। अपने HbA1c, रक्तचाप और लिपिड प्रोफाइल पर नज़र रखें।

6. धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाए रखें। धूम्रपान DNA methylation पैटर्न को प्रभावित करता है, ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ाता है और Epigenetic age को तेज़ी से बढ़ा सकता है।

7. मांसपेशियों को बनाए रखें। उम्र के साथ मांसपेशियाँ कम होना (sarcopenia) जैविक उम्र बढ़ने का महत्वपूर्ण संकेत है। इसलिए पर्याप्त प्रोटीन लें और नियमित प्रतिरोधक व्यायाम करें‌

8. सामाजिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहें। नई चीजें सीखना, पढ़ना, संगीत और मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना बेहतर होगा। ये मस्तिष्क स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करते हैं।

संक्षेप में बायोलॉजिकल उम्र (Biological Age) बढ़ने की गति धीमी करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से सबसे प्रभावी उपाय हैं - नियमित व्यायाम, स्वस्थ वजन बनाए रखना, अच्छी नींद, पादप आधारित संतुलित आहार और धूम्रपान से पूर्ण दूरी।

इन उपायों का प्रभाव केवल जीवनकाल (lifespan) पर ही नहीं, बल्कि healthspan—यानी स्वस्थ और सक्रिय जीवन के वर्षों—पर भी पड़ता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाने वाले लोगों की epigenetic aging की गति औसत से धीमी हो सकती है।

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आज हम Epigenetic Clocks के बारे में जानकारी लेते हैं। Epigenetic clocks ऐसे जैविक परीक्षण (biomarkers) हैं जो DNA पर होन...
30/05/2026

आज हम Epigenetic Clocks के बारे में जानकारी लेते हैं।

Epigenetic clocks ऐसे जैविक परीक्षण (biomarkers) हैं जो DNA पर होने वाले epigenetic changes, विशेषकर DNA methylation, को मापकर किसी व्यक्ति की biological age (जैविक आयु) का अनुमान लगाते हैं। हमारी chronological age (जन्म से बीते वर्ष) और biological age (शरीर वास्तव में कितना बूढ़ा हो चुका है) हमेशा समान नहीं होती। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक आयु 50 वर्ष है और Epigenetic age 42 वर्ष है तो इसका मतलब है कि शरीर औसत (50 वर्ष) से "युवा" है। वहीं Epigenetic age 58 वर्ष होने का मतलब है कि शरीर औसत से तेजी से वृद्ध हो रहा है।

अब आते हैं DNA methylation पर। DNA के कुछ स्थानों पर छोटे methyl groups (–CH₃) जुड़ जाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ इनका पैटर्न बदलता रहता है। सरल शब्दों में कहा जाये तो DNA एक किताब की तरह है जिसमें Genes यानी अध्याय हैं और Epigenetic marks यानी बुकमार्क और हाइलाइटर हैं। ये बुकमार्क बताते हैं कि कौन से जीन अधिक सक्रिय होंगे और कौन से कम।

Epigenetic Clocks को समझने के लिए रक्त, लार या अन्य ऊतकों से DNA लिया जाता है। फिर हजारों CpG sites पर methylation pattern का विश्लेषण किया जाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सांख्यिकीय मॉडल इन पैटर्नों की तुलना बड़े जनसंख्या डेटाबेस से करके biological age का अनुमान लगाते हैं।

प्रमुख Epigenetic Clocks
1. Steve Horvath का Horvath Clock (2013)- यह सबसे प्रसिद्ध epigenetic clock है जो विभिन्न ऊतकों में biological age का अनुमान लगाता है।

2. Hannum Clock- यह मुख्यतः रक्त-आधारित clock है।

3. PhenoAge- यह केवल उम्र नहीं बल्कि रोग और मृत्यु जोखिम का भी अनुमान लगाता है।

4. GrimAge- वर्तमान में सबसे शक्तिशाली predictors में से एक है। यह मृत्यु जोखिम, हृदय रोग और कैंसर का अनुमान लगाने में उपयोगी पाया गया है।

5. DunedinPACE- इसे "aging speedometer" कहा जाता है। यह बताता है: "आप अभी कितनी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं।"

Epigenetic clocks का महत्व (Clinical Importance)- 1. समय से पहले वृद्धावस्था पहचानना- यदि biological age वास्तविक आयु से अधिक है, तो यह संकेत हो सकता है कि हृदय रोग, मधुमेह, किडनी के रोग और कैंसर आदि बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है।

2. जीवनशैली के प्रभाव को मापना- इनसे यह देखा जा सकता है कि व्यायाम, वजन कम करना, धूम्रपान छोड़ना, बेहतर नींद लेना और तनाव कम करना जैविक उम्र को किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं।

3. Anti-aging अनुसंधान- नई दवाओं और हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता जांचने के लिए इनका उपयोग किया जा रहा है। उदाहरण के लिए कैलोरी प्रतिबंध (Calorie Restriction), व्यायाम कार्यक्रम, नई geroscience दवाएँ इत्यादि।

4. रोग जोखिम का पूर्वानुमान- तेजी से बढ़ती epigenetic age का हृदय रोग, स्ट्रोक, अल्जाइमर, कैंसर जैसी मृत्यु जोखिम से संबंध पाया गया है। इसलिए स्वस्थ जीवन के लिए इसकी समझ अत्यावश्यक है।

Epigenetic clocks बहुत उपयोगी हैं, लेकिन अभी पूर्ण नहीं हैं। इनकी कुछ सीमाएं भी हैं। ये भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी नहीं करते और व्यक्तिगत स्तर पर त्रुटि हो सकती है। अलग-अलग clocks अलग-अलग परिणाम दे सकते हैं। इसलिए इन्हें अभी मुख्यतः research tools और emerging biomarkers माना जाता है।

कुल मिलाकर Epigenetic clocks DNA methylation पैटर्न को पढ़कर शरीर की biological age और कभी-कभी aging speed का अनुमान लगाते हैं। इनका महत्व इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि वे केवल यह नहीं बताते कि आपकी उम्र कितनी है, बल्कि यह भी संकेत दे सकते हैं कि आपका शरीर कितनी तेजी से वृद्ध हो रहा है और भविष्य में रोगों का जोखिम कितना हो सकता है। इन्हें आधुनिक Geroscience (aging science) के सबसे महत्वपूर्ण biomarkers में गिना जाता है।

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