29/01/2026
विस्मृत घाव पुराना फिर से पीड़ादायक हो जाएगा।
जग से पीर न कहना साथी, जग निर्णायक हो जाएगा।
कितना दुख तुमने भोगा है, कितनी रैन जगे हैं नयना?
कितने सपने लुटे तुम्हारे, कितनी बार ठगे हैं नयना?
क्यों एकाकीपन प्यारा है, क्यों सुख का हर घट रीता है?
कैसे पल-पल मृत्यु माँगकर, कोई सदियों तक जीता है?
इस सबके ऊपर क्षण भर का सुख परिचायक हो जाएगा।
जग से पीर न कहना साथी जग निर्णायक हो जाएगा।
अनुमानों को तथ्य बताने वाले, झूठे ईश मिलेंगे।
बिन सुनवाई निर्णय देने वाले न्यायाधीश मिलेंगे।
सबको दोष पराए दिखते अपने कौन देख पाता है?
इसीलिए शायद दर्पण में उत्तर दक्खिन हो जाता है।
दण्डधरों की महाभीड़ में कौन सहायक हो जाएगा?
जग से पीर न कहना साथी जग निर्णायक हो जाएगा।